मंगलवार, सितंबर 07, 2010

हिंदी नहीं आई

चौदह सितंबर को हिंदी दिवस है। एक बार स्वर्गीय शरद जोशी ने लिखा था कि आज हिंदी दिवस है आज तो हिंदी होगी ही। वैसे भी इकसठ साल तो बीत गए, आस लगाए बैठे हैं कि हिंदी आएगी परंतु अभी भी नहीं आई। इतनी देर क्यों लगा दी? कहीं रास्ता तो नहीं भूल गई। संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को घोषित किया था कि यह भारत की राजभाषा होगी और 26 जनवरी 1950 को आ जाएगी। तभी से आस लगाए बैठा हूं कि हिंदी आती ही होगी। परंतु अब तो बहुत ही देर हो गई है। कहीं हिंदी की चलने की क्षमता तो समाप्त नहीं हो गई है? वैसे यही तो महीना है जब सभी कार्यालयों में, संसद में, विज्ञान भवन में, कॉलेजों में, स्कूलों में, रेडियो पर, टी.वी. चैनलों पर गोष्ठियां आयोजित की जाती हैं, हिंदी अखबारों में लेख छापे जाते हैं और आश्वासन दिए जाते हैं, शुभकामनाएं व्यक्त की जाती हैं कि हिंदी का भविष्य बहुत उज्ज्वल, यह बहुत सशक्त भाषा है, यह सरल और आसानी से सीखी जा सकने वाली भाषा है जो भारत के हिंदीतर भाषी क्षेत्रों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहज संपर्क सूत्र का काम करती है। इसमें कोई भी संकल्पना व्यक्त की जा सकती है। अभी हाल ही में श्री शेरबहादुर सिंह जी.. अंतराष्ट्रीय हिंदीं समिति.के पूर्व अध्यक्ष... ने भी कहा,"यह एक स्वर्ण युग है हिंदी भाषा के लिए। इतने हिंदी सेवी निष्ठा से इस प्रचार प्रसार के आंदोलन में जुटे हुए हैं, अब हिंदी के प्रवाह को कोई नहीं रोक सकता। अब अपने संगठित प्रयासों से भाषा जी जड़ों को और मज़बूत करना है।" परंतु मुझे तो अब शक होने लगा है कि इतनी खूबियों वाली सशक्त भाषा को कार्यालयों, संसद, कॉलेजों, स्कूलों, रेडियो, टी.वी. चैनलों तक का सफ़र तय करने में इतना समय क्यों लग रहा है?
मुझे लगता है कि हिंदी को हमारी मदद की ज़रूरत है। लेकिन हिंदी मदद तो मांग नहीं रही है। फिर मैं इसकी मदद क्यो करूं? मैं कोई देवता तो हूं नहीं कि बिन बुलाए ही आकर बलि की हविषा ग्रहण कर लूं। देवता अयाचमानाय बलिं हरंति। मेरे अलावा अन्य लोगों के पास तो शंकर की भांति तीसरा नेत्र भी है जिसे ज़रूरत पड़ने पर खोल भी सकेंगे। अब अगर हिंदी आने की ज़ुर्रत भी कर ले तो ऐसे त्रयंबक लोगों के डर से नहीं आएगी। अब सचमुच ऐसा लगता है कि हिंदी ऐसे लोगों से डरती है जिनके पास त्रिनेत्र है। इसीलिए तो नहीं आ रही है वरना अब तक आ नहीं जाती। अतः त्रिनेत्र के समाप्त होने और हिंदी की धाविका गति बढ़ने की प्रतीक्षा की जाए। हिंदी आएगी ज़रूर, यह मेरा आश्वासन है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तो बहुत तेज़ प्रयास हो रहे हैं। विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा जी इसे यू.एन.ओ. में स्थापित करने जा रहे हैं। कर्नाटक में तो कर ही चुके थे। वाजपेयी जी तो केवल भाषण ही देकर छोड़ दिए थे असली प्रयास तो अब होंगे।

रविवार, अगस्त 29, 2010

देश के लिए रोमन लिपि या अंग्रेज़ी भाषा नहीं बल्कि हिंदी व देवनागरी लिपि

जो लोग राजभाषा के कार्य से या इसके आंदोलन से जुड़े हुए हैं वे इस बात को भली भांति जानते हैं कि अंग्रेज़ लोग भारत में अपने शासन काल के प्रारंभ से ही अंग्रेज़ी भाषा के व्यापक प्रचार प्रसार के साथ ही रोमन लिपि के व्यापक प्रचार के लिए उतने ही प्रयत्नशील रहे जितना कि अपने धर्म, साहित्य एवं सभ्यता के लिए। देवनागरी के स्थान पर रोमन लिपि का प्रचार उनकी इसी योजना का अंग था जिसे मैकाले ने 2 फ़रवरी 1835 को व्यक्त किया था।

यद्यपि अंग्रेज़ी भाषा के व्यापक प्रचार प्रसार के साथ ही रोमन लिपि का प्रसार तो स्वयं ही हो रहा था परंतु वे इतने से ही संतुष्ट नहीं थे। वे भारत की विभिन्न भाषाओं की विभिन्न लिपियों के स्थान पर रोमन लिपि को ही प्रतिष्ठित करना चाहते थे। अंग्रेज़ शासकों ने अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए साम, दाम, भय, भेद आदि सभी प्रकार की नीतियों का उपयोग किया। धर्म प्रचारक पादरी थे या पुलिस अधिकारी, न्यायाधीश थे या फ़ौज के अफ़सर, सभी अंग्रेज़ और उनके फ़रमाबरदार भारतीय, चाहे वे किसी भी विभाग या क्षेत्र के क्यों न थे, रोमन लिपि के गुणगान को प्रभु भजन के समान ही अपना परम कर्तव्य समझते थे।

रोमन के प्रचार के लिए पुस्तकें छापी गईं, लेख लिखे गए, गोष्ठियां आयोजित की गईं। इस प्रकार भारत के हज़ारों शिक्षितों के मन में धारणा बद्धमूल कर दी गई कि रोमन लिपि संसार की अद्वतीय लिपि है। परिणाम स्वरूप भारत के अनेक ख्यातनाम भाषा शास्त्रियों, शिक्षा विशारदों एवं उच्च व्यक्तियों ने रोमन प्रचार का झंडा अपने हाथों में ले लिया और बिना गंभीर चिंतन किए, देवनागरी के विरुद्ध खुले आम प्रचार के लिए कृतसंकल्प होकर रणक्षेत्र में कूद पड़े। इनमें प्रमुख भाषा वैज्ञानिक सुनीति कुमार चाटुर्ज्या अग्रणी थे। उन्होंने 1935 में कलकत्ता विश्व विद्यालय के जर्नल, डिपार्टमेंट ऑफ़ लेटर्स के भाग 27 में "रोमन अल्फ़बेट्स फ़ॉर इंडिया" शीर्षक से निबंध प्रकाशित किया। उस लेख में उन्होंने सभी भारतीय भाषाओं के लिए रोमन लिपि के प्रयोग को उचित बताया तथा रोमन में लिखने की प्रणाली भी बताई। परंतु हमारे सुधी और देशप्रेमी नेताओं ने रोमन को एक सिरे से नकारते हुए देवनागरी को ही उपयुक्त और अनिवार्य बताया। 3 जुलाई 1937 को महात्मा गांधी ने हरिजन सेवक में स्पष्ट शब्दों में यह घोषणा की कि रोमन लिपि न तो हिंदुस्तान की सामान्य लिपि हो सकती है और न होनी चाहिए। इसी प्रकार जब रोमन के समर्थकों के दबाव में आकर असम में कुछ जातियों ने देवनागरी लिपि की जगह रोमन लिपि में लिखना पढ़ना प्रारंभ किया तो गांधी जी ने 18 फ़रवरी 1939 को पुनः हरिजन में लिखा कि मुझे मालूम हुआ है कि असम में कुछ जातियों को देवनागरी लिपि की जगह रोमन लिपि में लिखना पढ़ना सिखाया जा रहा है। मैं अपनी राय पहले ही ज़ाहिर कर चुका हूं कि हिंदुस्तान में सर्व सामान्य हो सकने वाली कोई लिपि है तो वह देवनागरी ही है, भले ही उसमें सुधार की गुंजाइश हो न हो।

देवनागरी लिपि के समर्थन में केशवचंद्र सेन, भूदेव मुखर्जी, महात्मा हंसराज, स्वामी श्रद्धानंद, लोकमान्य तिळक, पं. मदन नोहन मालवीय, काका कालेलकर, पुरुषोत्तम दास टंडन, विनोबा भावे आदि सैकड़ों राष्ट्र हितैषियों ने हिंदी भाषा एवं देवनागरी लिपि को देश के लिए अनिवार्य घोषित किया। कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश शारदाचरण मित्र ने अपने अकाट्य तर्कों द्वारा भारत की समस्त भाषाओं के लिए देवनागरी लिपि के प्रयोग का प्रस्ताव रखा, "अब भारत में एक लिपि के व्यवहार एवं उसके आसेतु हिमालय तक प्रसार का समय आ गया है और वह लिपि देवनागरी के सिवाय और कोई नहीं हो सकती है।"

हिंदी के साथ नागरी के अंतर प्रांतीय प्रचार प्रसार हेतु देश में अनेक संस्थाओं की स्थापना हुई। उत्तर से दक्षिण तक अनेक संस्थाएं सेवा भाव से कार्यरत रहीं और रोमन लिपि के चंगुल से भारतीय भाषाओं की रक्षा की तथा भारत की राष्ट्रीय, राजनैतिक, भावात्मक एवं सांस्कृतिक एकता की नींव सुदृढ़ की। परंतु आज छुद्र निजी स्वार्थों के कारण देवनागरी और हिंदी दोनों का विरोध किया जा रहा है। सबसे नया उदाहरण है रुपए के नए प्रतीक को हिंदी का प्रतीक मानकर विरोध की आवाज़ उठाना।

इस सच्चाई के बावज़ूद कि रोमन वर्णमाला और रोमन लिपि अत्यंत दोषपूर्ण हैं और जिन ध्वनियों का हम उपयोग कर सकते हैं उन्हें लिखने में नितांत असमर्थ है फिर भी इसे सरल बताया जा रहा है। सरकारी कार्यालयों में जो लोग रोमन लिपि का इस्तेमाल करके हिंदी लिख रहे हैं या हिंदी लिखने के लिए रोमन प्रणाली का उपयोग करने की सलाह देते हैं वे जाने अनजाने हिंदी भाषा व संस्कृति का अहित कर रहे हैं। मुझे तो बड़ा आश्चर्य होता है जब हिंदी अधिकारी भी ट्रांसलिटरेशन पद्धति द्वारा देवनागरी टाइप करने की सलाह देते हैं। मैं इसके सख्त ख़िलाफ़ हूं और अपने हर कार्यक्रम में हिंदी लिपि और लेखन पद्धति पर ही बल देता हूं। इस विषय पर व्यापक और गंभीरता से वैज्ञानिक चर्चा की ज़रूरत है। अतः कंप्यूटर पर देवनागरी टाइपिंग के लिए केवल दो ही लेआउट – टाइपराइटर और ट्रेडीशनल, का उपयोग किया जाए और इन्हीं का प्रशिक्षण दिया जाए। ट्रांसलिटरेशन पद्धति के उपयोग को प्रश्रय न दिया जाए। ट्रांसलिटरेशन पद्धति द्वारा देवनागरी टाइप करने के लिए ट्रेडीशनल या टाइपराइटर लेआउट के मुक़ाबले अधिक स्ट्रोकों का उपयोग करना पड़ता है।

शनिवार, अगस्त 28, 2010

रुपए के प्रतीक का विवाद - चिंतनहीन विवाद

डी. उदय कुमार ने जब रुपए के प्रतीक की कल्पना की होगी तो उनके मन में भाषावाद, क्षेत्रीयतावाद, व्यक्तिवाद या संपूर्ण देश के सिवाय कोई अन्य संकीर्णतावाद की बात निश्चित ही नहीं आई होगी। परंतु देश के बुद्धिजीवियों में एक, दि टाइम्स ऑफ़ इंडिया के वरिष्ठ और अंग्रेज़ीदां जग सुरैया ने दूर की कौड़ी लाकर परोस दिया कि यह क्षेत्रीयतावाद और हिंदी भाषियों की संकीर्णतावादी नीति का परिचायक है(दि टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 27 अगस्त 2010, पृष्ठ 12)। अपनी बात के समर्थन में इन्होंने बंद पिंजड़े में सीमित रहकर, संकुचित दायरे में दहाड़ने वाले निस्तेज पड़ गए शेर बाल ठाकरे, आतंकित और सहमे हुए गुजरातियों के सामने केसरी बने मोदी, आउटडेटेड और दूसरे के कंधों का सहारा लेकर चलने वाले संकुचित विचार वाले करुणानिधि तथा निहित स्वार्थ से प्रेरित एवं अपने निजी स्वार्थ के आगे देश हित की बलि चढ़ा देने वाले राज नेताओं द्वारा किए गए प्रदर्शनों का उल्लेख किया है जिन्हें क्षेत्रीयतावाद, संकीर्णतावादी धर्मवाद, जातिवाद तथा व्यक्तिवाद की राजनीति करने का अवसर मिल गया।
स्वतंत्र भारत में सभी को अपना विचार व्यक्त करने की आज़ादी हमारा संविधान देता है, यह हमारा मौलिक अधिकार है। परंतु हम सिर्फ़ अधिकारों की ही बात करते हैं। कर्तव्य की नहीं। अतः मुख है तो कुछ तो बकना चाहिए(मुखस्ति किंचित् वक्तव्यम्)। इसलिए किसी के बकने पर तो प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है। लेकिन बुद्धिजीवियों को ऐसे लोगों के झांसे में नहीं आना चाहिए। तभी तो बंगलौर वासी कंप्यूटर इंजीनियर ने कुछ ही घंटों में 'रुपी फ़ोरेडियन' (Rupee Foradian) नाम से फ़ॉन्ट बनाकर मुफ़्त में बांट दिए। क्या यह का स्वनामधन्य नेताओं या जग सुरैया जी ने किया? रुपए के इस प्रतीक का सबसे पहले और आज भी सबसे ज़्यादा उपयोग टाइम्स समूह ही कर रहा है और पूरे विश्व में इस पहचान को लोकप्रिय बनाकर डॉलर, पौंड, यूरो के समकक्ष लाकर खड़ा कर दिया है। इसके लिए टाइम्स समूह बधाई व धन्यवाद का पात्र है।
डी. उदय कुमार व 'रुपी फ़ोरेडियन' के निर्माता न तो हिंदी भाषी हैं और न ही हिंदी की वकालत करने वाले हैं। फिर भी इन्होंने देश के लिए महान कार्य में बहुत बड़ा योगदान किया है। ये दोनों सज्जन सम्माननीय और सराहनीय हैं।
भारतीय रिज़र्व बैंक जिसने इस कार्य को कराकर देश का गौरव बढ़ाया है वह कोई मामूली संस्था नहीं है। यह देश की सर्वश्रेष्ठ, ईमानदार तथा देश हित में काम करने वाली सर्वोच्च संस्था है जो विवादों और माडिया से परे रहकर देश की सेवा में कार्यरत है। इसके ऊपर भाषावाद, क्षेत्रीयतावाद, व्यक्तिवाद और संकीर्णतावाद का आरोप नहीं लगाया जा सकता है। यह इन सबसे ऊपर देश की गौरवशाली संस्था है। अतः रुपए के प्रतीक को चिंतन विहीन विवाद का विषय न बनाया जाए।

शनिवार, अगस्त 14, 2010

अंग्रेज़ी बनाम तमिल

आज स्थिति यह है कि आम व्यक्ति अंग्रेज़ी के मोह में अपनी मातृ भाषा को सही ढंग से नहीं लिख पा रहा है और न ही उसकी शब्दावली को समझ पा रहा है। अंग्रेज़ी कितना समझता है या जानता है इसका आभास तो संसद में हिंदी के अंग्रेज़ी अनुवाद के हंगामे से हो जाता है। अंग्रेज़ी तमिल नाडु की मातृ भाषा तो है नहीं। अतः तमिल भाषी सांसदों की समझ में नहीं आती है तो इस पर इतना हंगामा मचाने की क्या आवश्यकता है? इससे कम प्रयास और समय में हिंदी का प्रयोग सीखा जा सकता है या तमिल अनुवाद उपलब्ध कराया जा सकता है। परंतु वे तो ऐसे व्यवहार कर रहे हैं जैसे हिंदुस्तान की संसद में नहीं इंग्लैंड की पार्लियामेंट में भाग ले रहे हों। उनकी नज़र में देश अंग्रेज़ी की बदौलत चल रहा है जिसे कितने लोग समझते हैं? लगता है सांसदों ने तो संसद में जो शपथ ली थी वह अंग्रेज़ी में ली थी इसीलिए वह भी समझ में नहीं आई होगी। तभी तो अंग्रेज़ी में ही कमी बता दी और उस समय तमिल की भी याद नहीं आई अन्यथा अंग्रज़ी के बजाय तमिल अनुवाद की मांग करते तो तमिल भाषा के विकास के साथ तमिल भाषियों के लिए रोज़गार के अवसर भी बढ़ते। सांसद जनता के मार्गदर्शक होते हैं जनता के पथभ्रष्टक नहीं। तमिल नाडु की जनता को कब तक भ्रम में रखेंगे? एस. रामकृष्णसाई जैसे ही अनेक तमिल भाषी लोग भी ऐसा ही सोचते हैं परंतु अपने विचार व्यक्त करने की ज़हमत नहीं उठाते हैं या फिर जानबूझकर टी आर बालू जैसों की संकुचित सोच पर ध्यान देना व्यर्थ समझते होंगे।
मैंने भी तमिल नाडु के भीतरी इलाकों की यात्रा की है और आम लोगों से हिंदी के बारे में बात भी की है। उनके विचार सुनकर तो मुझे तो लगा कि राजनीतिज्ञ अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए किसी के भी हितों की बलि चढ़ाने में न तो शर्म करते हैं और न ही हिचकते हैं। अब समय आ गया है जब जनता को नेताओं का पल्लू छोड़कर आगे आना होगा।

गुरुवार, अगस्त 12, 2010

Rule of Impossible Performance

Official Language of the Union of India ? Infirmity of Constitution ? Law of impossible Performance Hindi is an official language of the states of Uttar Pradesh, Bihar, Jharkhand, Uttarakhand, Madhya Pradesh, Rajasthan, Chhattisgarh, Himachal Pradesh, Haryana and the National Capital, the Territory of Delhi. Bengali is the official language of West Bengal,Manipur Tripura and certain other parts of the North-east. Marathi is the official language of Maharashtra. Punjabi is the official language of Punjab, Himachal Pradesh,Haryana, and the National Capital, the Territory of Delhi. Gujarati is the official language of Gujarat. Tamil is the official language of Tamil Nadu, Puducherry and the Andaman and Nicobar Islands. Malayalam is the official language of Kerala and Lakshadweep. Kannada is the official language of Karnataka. Telugu is the official language of Andhra Pradesh. Oriya is the official language of Orissa;Oriya is spoken also in parts of West Bengal, Chattishgarh and Jharakhand. Assamese is the official language of Assam; it is spoken widely in many of the seven northeastern states. Urdu has official status in the states of Delhi, Uttar Pradesh, Bihar, Andhra Pradesh and Jammu and Kashmir English is the co-official language of the Indian Union, and each of the several states mentioned above may also have another co-official language.
The legal framework governing the use of languages for official purpose currently includes the Constitution, the Official Languages Act, 1963, Official Languages (Use for Official Purpose of the Union) Rules, 1976, and various state laws, as well as rules and regulations made by the central government and the states. The Constitution of India, in 1950, declared Hindi in Devanagari script to be the official language of the union. Unless Parliament decided otherwise, the use of English for official purposes was to cease 15 years after the constitution came into effect, i.e., on 26 January 1965. The prospect of the changeover, however, led to much alarm in the non Hindi-speaking areas of India. As a result, Parliament enacted the Official Languages Act, 1963 which provided for the continued use of English for official purposes along with Hindi up to 1965. On 23rd April 1963, while speaking on the Official Language Act, 1963 Shri Heerendra Nath Mukherjee said that we should not make any provision in our constitution to this effect that regarding Hindi or some other national languages, there would be any sort of impediment before the Parliament in making any law in future. To counter any decision taken by a democratic method, the veto power should not be given to any minority section be it even a very vocal.
In late 1964, an attempt was made to expressly provide for an end to the use of English, but it was met with protests from states such as Tamil Nadu, Kerala, West Bengal, Karnataka, Pondicherry and Andhra Pradesh. Some of these protests also turned violent. As a result, the proposal was dropped and the Act itself was amended in 1967 to provide that the use of English would not be ended until a resolution to that effect was passed by the legislature of every state that had not adopted Hindi as its official language, and by each house of the Indian Parliament.
The current position is thus that the Union government may continue to use English in addition to Hindi for its official purposes as a "subsidiary official language," but is also required to prepare and execute a programme to progressively increase its use of Hindi. The exact extent to which, and the areas in which, the Union government uses Hindi and English, respectively, is determined by the provisions of the Constitution, the Official Languages Act, 1963, the Official Languages Rules, 1976, and statutory instruments made by the Department of Official Language under these laws.
Article 120, 210 and Part XVII (Articles 343 to 351) of the Constitution of India bear the provisions for Languages to be used in Parliament, Language to be used in Legislature and Languages to be used for the official work of the Union of India.
Article 120 of the Constitution of India provides for the Language to be used in the Parliament. According to the Article 120 (1), not withstanding any thing in Part XVII, but subject to provision of Article 348, business in Parliament shall be transacted in Hindi or English: Provided that the Chairman of the Council of States or the Speaker of the House of the People, or person acting such, as the case may be, may permit any member who can not adequately express himself in Hindi or English to address the House in his mother-tongue.
Article 120 (2) the Constitution of India provides that : Unless Parliament by law otherwise provides, this article shall after the expiration of period of fifteen years from the commencement of this Constitution have effect as if the words "or in English" were omitted there from.
According to the Article 210 (1), not withstanding any thing in Part XVII, but subject to provision of Article 348, business in Legislature of a State shall be transacted in the official language or languages of the State or in Hindi or English: Provided that the Speaker of the Legislative Assembly or the Chairman of the Legislative Council, or person acting such, as the case may be, may permit any member who cannot adequately express himself in any of the languages aforesaid to address the House in his mother-tongue.
Article 120 (2) of the Constitution of India provides that : Unless the Legislature of the State by law otherwise provides, this article shall after the expiration of period of fifteen years from the commencement of this Constitution have effect as if the words "or in English" were omitted there from: [Provided that in relation to the [Legislatures of the States of Himachal Pradesh, Manipur, Meghalay and Tripura] this clause shall have effect as if for the words "fifteen years" occurring therein, the words "twenty-five years" be substituted.] (Amended in 1977). [Privided further that in relation to the [Legislatures of the States of [Arunachal Pradesh, Goa and Mizoram]] this clause shall have effect as if for the words "fifteen years" occurring therein, the words "forty years" be substituted.] (amended in 1986, 1986 and 1987 and 1987 respectively). {Virtually the period has already expired in 1975 and 1990}.
The Respective State Legislatures did not further extend the period instead are implementing their Language Policy. But the Parliament has, instead extending the period to a suitable date, abolished the time limit and by amending the Official Language Act, 1963, in the Sec. 3(iii) (5) provided that English language shall remain in force until resolutions for the discontinuance of the use of the English language for the purposes mentioned therein have been passed by the legislatures of all the States which have not adopted Hindi as their Official Language and until after considering the resolution aforesaid, a resolution for such discontinuance has been passed by each House of Parliament. The Parliament, on the basis of Articles-120, 210 and 343 to 351 has enacted the Official Language Act, 1963 and amended the same in 1967 which provides for continuance of English even after the expiration of fifteen years from 26 January 1950 with no definite period or any specific date as was earlier fixed as 26 January 1965.
In the circumstances expressed above it is evident that it has made practically the situation impossible to such an extent that Hindi will never be in a position to replace English as to what to say about other states one of the states of the Union of India i.e., Nagaland has not till today declared its Language and preferred to use English as provided in the Article 345 of the Constitution of India. In the light of provision in Sec. 343(3) (a) and Article 345 it is evident that theory of impossible performance applies in this regard. Since the Official Language Act, 1963 as amended in 1967 puts restriction on becoming Hindi de facto Official language of the Union of India, it violates the constitutional rights of citizens of India. Hence, it is unconstitutional and needs to be declared unconstitutional and set aside. It is also imperative to direct the Government of India to fix a suitable time limit to replace English with Hindi in every field.

स्वतंत्रता दिवस - महान संकल्प दिवस - सकारात्मक सोच

अपने देश की आज़ादी की 64वीं जन्मतिथि के अवसर पर मुझे गर्व है कि मैं भारतीय हूं। देश की आज़ादी का उत्सव हर साल मानाया जाता है और उसी परंपरा में इस वर्ष भी मनाया जा रहा है। अपने बचपन से हम इस उत्सव को मनाते और देखते आ रहे हैं। इस उत्सव का मुख्य उद्देश्य उन शहीदों और विभूतियों का स्मरण करना है तथा उन्हें श्रद्धांजलि देना है जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर हमें आज़ाद कराया है। मैं अपनी ओर से उन रणबांकुरों को श्रद्धा के सुमन अर्पित करता हूँ।

इसके बाद देश के वर्तमान हालात पर कुछ कहना चाहूँगा हालाँकि देश के बुद्धिजीवियों का इसमें कोई सकारात्मक योगदान नहीं हो पा रहा है क्योंकि समाज और समाज सेवा और देश प्रेम की परिभाषा बदल गई है। हम अपने आपको असहाय पा रहे हैं। 9 प्रतिशत की विकास दर के बावजू़द किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर हैं। गांव आज भी बाढ़ और सूखे की मार से उबर नहीं पा रहे हैं। किसान की खेती तैयार होते ही बाज़ार भाव धूल चाटने लगता है। किसान को मजबूरन उत्पाद को न्यून मूल्य पर बेचकर साहूकार को चुकाना पड़ता है। आज भी स्थिति वही है। आज़ादी और विकास में कोई तालमेल नहीं रहा है। जो कुछ करने में सक्षम हैं वे भी असहाय लगते हैं। हमारे हाथ में वह शक्ति नहीं है इसलिए हम असहाय हैं। फिर भी हमें अपना कर्तव्य सत्यनिष्ठा से निभाना है। यदि हम ऐसा करते हैं तो हमें आत्म संतुष्टि तो मिलेगी ही इससे समाज का विकास होगा।

आप जानते हैं कि हमारे देश पर कई विदेशियों ने आक्रमण किया था, हमें लूटा था, हमें गु़लाम बनाया था। उनकी गु़लामी से छुटकरा पाने के लिए हमें अपना खून बहाना पड़ा था तब जाकर हमें स्वतंत्रता मिली थी। परंतु हमने किसी देश पर आक्रमण नहीं किया था और न ही किसी देश को गु़लाम बनाया था। ऐसा नहीं था कि हम कायर थे या हममें कुछ करने का माद्दा नहीं था। क्या हम कमज़ोर थे? नहीं। फिर भी हमने ऐसा नहीं किया क्योंकि हम किसी की स्वतंत्रता में खलल नहीं डालना चाहते। हम सबकी स्वतंत्रता की क़द्र करते हैं और सभी को स्वतंत्र देखना चाहते हैं। हमारा दृष्टिकोण व्यापक व सर्व हितकारी होना है। हमें इसी दृष्टिकोण से सोचना होगा और कार्य करना होगा।

हमरा दूसरा सपना होना है देश को विकसित देखने का। इस विषय में मेरा विचार बहुत ही स्पष्ट और दृढ़ है। विकसित देश के जो लक्षण होते हैं वे सभी हमारे देश में भी मौजूद हैं। हमारा देश कई क्षेत्रों में नंबर एक है :

1. हमारा देश विश्व में सबसे अधिक दूध पैदा करता है,
2. गेहूँ उत्पादन में हम विश्व में दूसरे नंबर पर हैं,
3. चावल उत्पादन में हम विश्व में दूसरे नंबर पर हैं,
4. रिमोट सेंसिंग में हम नंबर एक हैं,
5. हमारे पास अत्याधुनिक वायुयान व एयरपोर्ट हैं,
6. हमारे पास सर्वोत्तम सड़कें, शिक्षा के साधन, इंजीनियर और वैज्ञानिक हैं,
7. हमारी अर्थव्यवस्था बहुत ही मज़बूत है।

फिर भी हम विकसित देश नहीं हैं। क्यों? क्योंकि हममें आत्मविशवास की कमी है। हम विदेशी भाषा के सहारे आम जनता से दूरी बनाए हुए हैं, प्रशासन और अनुसंधान में आम आमदमी को दूर रखने की साजिश में लगे हुए हैं। हमें आत्मविश्वास बढ़ाना होगा। हमारा आत्मविश्वास केवल सकारात्मक सोच से ही बढ़ेगा। सकारात्मक सोच तभी आएगी जब हम आम लोगों के बारे में सोचेंगे। आम आदमी को अपनी नीतियों में सहभागी बनाना होगा। हमें अपनी भाषा को अपनाना होगा। इसका सर्वंगीण विकास करना होगा। आइए 64 वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर संकल्प करें कि हम उस किसी काम की आलोचना नहीं करेंगे जो हम स्वयं करते हैं और हर क्षेत्र में अपनी भाषा को अपनाकर इसका सम्मान विकास करेंगे।

गुरुवार, जुलाई 01, 2010

हिंदी बनाम तमिल

यद्यपि दि टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने 29 जून 2010 के अंक में करुणा निधि के बयान को संकीर्णवाद बताकर उसे रोकने का आह्वान किया है परंतु अंग्रेज़ी की वकालत करके इसने भी वही संदेश दिया है जोकि करुणा निधि ने दिया है। करुणा निधि का कहना है कि तमिल को भारत की राजभाषा घोषित किया जाए, संकुचित तथा हिंदी के प्रति प्रच्छन्न विद्वेष प्रतीत होता है। करुणा निधि, बाल ठाकरे, राज ठाकरे का दायरा बहुत संकरा है। उनकी सोच बहुत संकुचित और अपने घरों की हदों तक ही सीमित रही है। परंतु उन्हीं के क्षेत्रों से आने वाले नेता जिनकी सोच व्यापक व सकारात्मक है वे भाषा को छुद्र राजनीति का ज़रिया नहीं बना रहे हैं। अतः करुणानिधि की सोच का जीवन अब बहुत कम बचा है। यह मसला अगली पीढ़ी के लोग सुलझा लेंगे।
2. जब तमिल भाषी व्यक्ति या बंगाली भाषी व्यक्ति तमिल अथवा बंगाली को भारत की राजभाषा घोषित करने की बात करता है और हिंदी का विरोध करता है तो यह न समझें कि वह तमिल/बंगाली या तमिल/ बंगाली भाषियों का हितैषी है। वह तो अपनी पुरानी और घटिया सोच सब पर लादना चाहता है क्योंकि पी. सुब्बारायन व सुनीति कुमार चटर्जी का विचार था कि "हिंदी को राजभाषा बनाए जाने का निर्णय करने से पहले विश्व विद्यालयों के विद्यार्थियों की राय ली जानी चाहिए थी।" (राजभाषा आयोग 1956 का प्रतिवेदन, पृष्ठ 263 (हिंदी संस्करण))। इस बारे में मैं पूछना चाहूंगा कि क्या अंग्रेज़ी को लादते वक्त किसी से पूछा गया था?
नई पीढ़ी और व्यापक सोच वाले लोग आगे आ रहे हैं। वे इसे नकार देंगे और संकुचित सोच वाले नेताओं की राह पर नहीं चलेंगे। वे देश की राजभाषा का सम्मान करेंगे और देश के हित में उसका उपयोग करना एवं कराना चाहेंगे। देश के तथा कथित देशप्रेमी नेताओं को सीख देना पत्थर सिर टकराने के बराबर है। चुनाव में वोट मांगने, दिल्ली में सत्ता की गद्दी पर बैठने लिए हिंदी का सहारा लेना अच्छा लगता है परंतु विघटन के लिए हिंदी भाषा का हथियार सही नहीं है।
करुणा निधि की सोच को नकारते हुए एस. रामकृष्णसाई (यद्यपि दि टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने 01 जुलाई 2010) ने लिखा है कि तमिल का व्यापक इस्तेमाल नहीं है और न ही लोग इसे तमिल नाडु से बाहर के लोग बोलते अथवा समझते हैं। अतः यह भारत की राजभाषा नहीं बन सकती है। देश की एकता के लिए हिंदी को मान्यता मिलनी चाहिए। एस. रामकृष्णसाई जैसे ही अनेक तमिल भाषी लोग सोचते हैं परंतु अपने विचार व्यक्त करने की ज़हमत नहीं उठाते हैं या फिर जानबूझकर करुणा निधि की संकुचित सोच पर समय देना व्यर्थ समझते होंगे।

मंगलवार, जून 22, 2010

प्रधान मंत्री को लिखे गए पत्र पर प्रतिक्रिया

अमरीश जी! प्रधान मंत्री को लिखे गए पत्र पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए धन्यवाद। अपनी 36 वर्ष की सेवा के दौरान कई बार अपने वरिष्ठों से हिंदी के काम में उलझा, जोश दिखाया और अपनी ड्यूटी के अलावा अन्य काम भी करके दिया। परंतु किसी भी संस्था में व्यक्ति नहीं काम अहम होता है। इसलिए किसी की खुशी या नाराज़गी की परवाह किए बग़ैर निष्ठापूर्वक काम करता रहा। लेकिन कई बार इस बात से आहत भी हुआ कि जिस व्यक्ति को हिंदी का प्रयोग सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है हिंदी के प्रति उसकी ही निष्ठा में खोट है। प्रच्छन्न विद्वेष की भावना मन में है जो नकारात्मक निर्णयों के रूप में सामने आती है परंतु खुलकर नहीं बोल सकते क्योंकि व्यवस्था से बंधे हैं। ऐसे में राजभाषा अधिकारी की स्थिति तो 32 दुश्मनों के बीच जीभ जैसी है। जब तक सेवा में था तो ऐसा नहीं कर सकता था। अब राजभाषा विकास परिषद के मंच का उपयोग करके, प्रशिक्षण के माध्यम से यूनीकोड आधारित कंप्यूटर द्वारा हिंदी को अंग्रेज़ी के समकक्ष लाने और ब्लॉग के माध्यम से जनमत तैयार करने तथा राजभाषा अधिनियम (संशोधन) अधिनियम, 1967 द्वारा लाई गई अनिश्चितता को न्यायालय के माध्यम से समाप्त कराने के काम में लगा हूं। बहुत सी जानकारी इकत्रित कर ली है। बैंकों, पीएसयू में कार्यरत राजभाषा कर्मियों का सहयोग चाहिए।

रविवार, जून 20, 2010

प्रधान मंत्री को लिखे गए पत्र पर प्रतिक्रिया

अमरीश जी! प्रधान मंत्री को लिखे गए पत्र पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए धन्यवाद। अपनी 36 वर्ष की सेवा के दौरान कई बार अपने वरिष्ठों से हिंदी के काम में उलझा, जोश दिखाया और अपनी ड्यूटी के अलावा अन्य काम भी करके दिया। परंतु किसी भी संस्था में व्यक्ति नहीं काम अहम होता है। इसलिए किसी की खुशी या नाराज़गी की परवाह किए बग़ैर निष्ठापूर्वक काम करता रहा। लेकिन कई बार इस बात से आहत भी हुआ कि जिस व्यक्ति को हिंदी का प्रयोग सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है हिंदी के प्रति उसकी ही निष्ठा में खोट है। प्रच्छन्न विद्वेष की भावना मन में है जो नकारात्मक निर्णयों के रूप में सामने आती है परंतु खुलकर नहीं बोल सकते क्योंकि व्यवस्था से बंधे हैं। ऐसे में राजभाषा अधिकारी की स्थिति तो 32 दुश्मनों के बीच जीभ जैसी है। जब तक सेवा में था तो ऐसा नहीं कर सकता था। अब राजभाषा विकास परिषद के मंच का उपयोग करके, प्रशिक्षण के माध्यम से यूनीकोड आधारित कंप्यूटर द्वारा हिंदी को अंग्रेज़ी के समकक्ष लाने और ब्लॉग के माध्यम से जनमत तैयार करने तथा राजभाषा अधिनियम (संशोधन) अधिनियम, 1967 द्वारा लाई गई अनिश्चितता को न्यायालय के माध्यम से समाप्त कराने के काम में लगा हूं। बहुत सी जानकारी इकत्रित कर ली है। बैंकों, पीएसयू में कार्यरत राजभाषा कर्मियों का सहयोग चाहिए।

शनिवार, जून 12, 2010

माननीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जी को पत्र

दिनांक 12 जून 2010 22 ज्येष्ठ 1932 (शक)
माननीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जी,

राजभाषा हिंदी की सांविधिक स्थिति और वास्तविक दुर्दशा

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में स्थायी समिति के रूप में केंद्रीय हिंदी समिति वर्ष 1967 में गठित हुई थी। यह शीर्ष समिति है जो संघ की राजभाषा के रूप में हिंदी के प्रगामी प्रयोग के लिए दिशानिदेश व नीति निर्धारित करती है। आप इसके वर्तमान अध्यक्ष हैं। संभवतः आपने अपने कार्यकाल में किसी बैठक की अध्यक्षता भी की होगी। परंतु मुझे नहीं लगता है कि आपके सामने राजभाषा हिंदी का असली मुद्दा रखा गया होगा। मैं उस असली मुद्दे की बात कर रहा हूं जिसे राजभाषा अधिनियम, 1963 द्वारा अनंत काल के लिए टाल दिया गया था और अब वह समय बीतने के साथ भुला दिया गया है। राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 3(5) ने राजभाषा हिंदी की स्थिति को वास्तविक रूप में, देश की राजभाषा के दर्जे को अनंत काल तक के लिए टाल दिया है और अनंत काल काल का मतलब राजभाषा के रूप में हिंदी को नकारना है।

2. हिंदी के प्रश्न को संवविधान में अनंत काल तक के लिए टालने का फ़ैसला जनता द्वारा नहीं किया गया है और न ही किसी समिति द्वारा सुझाया गया था। आज तक जितनी भीं समितियां, आयोग बने किसी ने भी हिंदी के प्रश्न को समय सीमा (पंद्रह साल) से परे रखने की सिफ़ारि‍श नहीं की है। राजभाषा आयोग, विश्व विद्यालय अनुदान आयोग, केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड, सभी ने हिंदी व क्षेत्रीय भाषाओं में ही शिक्षा दीक्षा देने की सिफ़ारिश की है। तब संविधान में हिंदी को अनिश्चित काल के लिए टालने की बात कहां से आई? यह निश्चित रूप से कोई सोची समझी चाल तथा प्रच्छन्न विद्वेष की भावना लगती है। इसे समझने और गलती को सुधारने की आवश्यसकता है।

3. कार्यालयों में हिंदी को प्रचलित करने तथा स्टाकफ़ सदस्यों को सक्षम बनाने के लिए सारी व्यवस्था में सत्यनिष्ठा का अभाव है। राजभाषा संसदीय समिति व राजभाषा विभाग के निरीक्षण, बैठकों के आयोजन सब महज खाना पूर्ति लगते हैं। यदि ऐसा नहीं है तो राजभाषा संसदीय समिति ने अब तक नागालैंड सरकार द्वारा राज्य की राजभाषा के बारे में कोई निर्णय करने की सिफ़ारिश क्यों नहीं की जोकि राजभाषा के रास्ते में रुकावट है? अब तक राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 3(5) के प्रवधान में संशोधन की सिफ़रिश क्यों नहीं की? अतः राजभाषा संसदीय समिति की भूमिका और राजभाषा विभाग की कार्यपद्धति पर पुनर्विचार की ज़रूरत है।

4. आशा है आप जैसे विद्वान, निष्पक्ष और देशप्रेमी व्यक्ति से इस विषय में पहल की उम्मीद की जा सकती है जिससे अंग्रेज़ी की वजह से करोड़ों लोगों को होने वाली क्षति और असुविधा को दूर किया जाएगा। अंग्रेज़ी से केवल हिंदी भाषी ही नहीं नुकसान उठा रहे हैं बल्कि इसकी वजह से देश का दक्षिण, पूर्व और पश्चिम भाग भी नुकसान उठा रहा है।

5. इस बारे में सभी सोचते हैं परंतु आप को लिखने में हिचकते हैं। अनुरोध है कि आप इस बारे में सार्थक पहल करेंगे और परिषद के इस पत्र की पावती देने का आदेश करेंगे।

सादर और सविनय,

भवदीय,
दलसिंगार यादव)

डॉ. मनमोहन सिंह
प्रधान मंत्री
भारत सरकार
प्रधान मंत्री का कार्यालय
साउथ ब्लॉक, रायसीना हिल्स
नई दिल्ली-110 101

मंगलवार, मार्च 30, 2010

राष्ट्र और राष्ट्रभाषा

हमारे देश का अपना राष्ट्रध्वज है, हमारा अपना राष्ट्रगान है, राष्ट्रपशु है, राष्ट्रपक्षी है और भी बहुतसी राष्ट्रीय वस्तुएं हैं परंतु हमारी राष्ट्रभाषा नहीं है। ऐसा क्यों ? ये राष्ट्रीय वस्तुएं या तो संख्या में एक हैं या फिर किसी जाति विशेष का द्योतक। उसी प्रकार हमारी राष्ट्रीय भाषा भी भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं की सूचक हो सकती है यदि हम इसे राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा दे दें। परंतु हम ऐसा होने नहीं देंगे क्योंकि हम प्रछन्न विद्वेष की संकुचित विचारधारा में फंस गए हैं।

2. मेरा विचार है कि यदि हिंदी देश का प्रतिनिधित्व करती है तो इसे राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा दिया जाना आवश्यक है क्योंकि देश के बाहर इसका प्रतिनिधित्व तो हिंदी ही करती है। हम यू. एन. ओ. में हिंदी का प्रयोग कराना तो चाहते हैं परंतु देश में इसकी हालत को सुधारने के बारे में चिंतित नहीं हैं। यदि हमने राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान, राष्ट्रपशु, राष्ट्रपक्षी स्वीकार किया है तो राष्ट्रभाषा नाम स्वीकार करने में कोई हर्ज़ नहीं है। यदि राष्ट्र शब्द से परहेज़ करना ही है तो किसी वस्तु को राष्ट्र का नाम न दिया जाए। राष्ट्र के अंदर रहने वाली सभी वस्तुएं जब स्वयमेव राष्ट्रीय हैं तो राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान, राष्ट्रपशु, राष्ट्रपक्षी घोषित करने की क्या ज़रूरत है? परंतु हमने सम्मान देने के विचार से जब राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान, राष्ट्रपशु, राष्ट्रपक्षी घोषित कर ही दी है तो हिंदी को राष्ट्रभाषा कहने में संकोच नहीं करना चाहिए। स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले हिंदी को राष्ट्रभाषा ही कहा जाता था। इसके प्रचार प्रसार के लिए 'राष्ट्रभाषा प्रचार सभा' की स्थापना की गई थी। संविधान समिति की बैठकों में भी राष्ट्रभाषा शब्द का ही प्रयोग किया जाता था। बाद में, संकुचित विचारधारा के लोगों की चाल में आकर संविधान में 'राजभाषा' का नाम दे दिया गया। इसे राष्ट्रीय सम्मान या गौरव का रूप न देकर मात्र राजकाज की भाषा का दर्ज़ा दे दिया गया जिसका अस्तित्व ब्यूरोक्रेसी की मानसिकता, उसकी सुविधा, असुविधा और दया पर निर्भर है। ब्यूरोक्रेसी यह तय कर रही है कि हिंदी का प्रयोग कितनी मात्रा में और किस काम के लिए किया जाए, वह भी ज़रूरी नहीं है? अतः हिंदी के लिए राष्ट्रभाषा शब्द ही उचित है।

3. यदि राष्ट्र शब्द की परिभाषा देखी जाए तो उसके अनुसार भी हिंदी के लिए राजभाषा नहीं बल्कि राष्ट्रभाषा शब्द ही उचित है। हमने अपना संविधान अंग्रेज़ी में लिखा है और इसे स्वयं को सौंपा है। उसी संविधान में हिंदी के लिए Official Language अभिव्यक्ति का उपयोग किया गया है जब कि संविधान समिति की चर्चाओं में National Language अभिव्यक्ति का उपयोग किया गया है(देखें पार्लियामेंटरी डिबेट्स भाग 11)। इसमें लैंग्वेज शब्द पर किसी को ऐतराज़ नहीं था। ऐसे में नैशनल शब्द पर ही आपत्ति थी। हम नैशनल शब्द की व्युत्पत्ति और इसके डिक्शनरी अर्थ पर विचार करें तो किसी नतीज़े पर पहुंच सकते हैं। इसके लिए हम ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी का सहारा ले सकते हैं क्योंकि अंग्रज़ी के लिए ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी प्रामाणिक मानी जाती है। ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी में दी गई व्याख्या के अनुसार नेशन शब्द का अर्थ है, 'व्यक्तियों का समुदाय/समूह, मुख्य रूप से जो किसी मुश्तरका (कॉमन) पूर्वजों से निकला हो, जिसका इतिहास एक हो, जिनका भाषा एक हो, जो किसी देश या क्षेत्र में वास करके हों।'

4. इस परिभाषा के अनुसार तो भारत एक राष्ट्र हुआ और इसकी जनता की एक भाषा होनी चाहिए जो सभी के बीच संपर्क सूत्र का काम करे। ऐसे में हिंदी की भूमिका निश्चत ही राष्ट्रभाषा की है क्योंकि हमने ही इसे 1947 में ही राष्ट्रभाषा मान लिया था कि यही समस्त भारत की, देश और विदेश में भी मुश्तरका संस्कृति की वाहिका होगी। अतः हिंदी राष्ट्रभाषा है और इसे राजभाषा न कहकर राष्ट्रभाषा ही कहा जाना चाहिए।

5. क्या हमारी संसद जिसके सदस्य जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं और संसद में ली गई शपथ का निर्वाह करते हैं तथा 1968 में दोनों सदनों के समक्ष पारित संकल्प का सम्मान करते हैं, अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास करते हुए पुनः संसद में संकल्प पारित करके इसे राष्ट्रभाषा का नाम देगी तथा अनंतकाल तक अंग्रेज़ी को चलने से रोकने की कार्रवाई शीघ्र करेगी?

शनिवार, मार्च 27, 2010

त्रिभाषा सूत्र - क्या है और क्यों आवश्यक है?

देश की भाषा समस्या जनता जनित नहीं है बल्कि यह जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा जनित है। जन प्रतिनि‍धियों ने ही इसे 1947 में ही स्वीकार कर लिया था कि देश में एक संपर्क भाषा हो और वह भारत की ही भाषा हो कोई विदेशी भाषा न हो। संवि‍धान लागू होने के बाद पंद्रह साल का समय भाषा परिवर्तन के लिए रखा गया था और वह समय केवल केंद्र सरकार की भाषा के लिए ही नहीं बल्कि भारत संघ के सभी राज्यों के लिए रखा गया था कि उस दौरान सभी राज्य सरकारें अपने-अपने राज्यों में अपनी राजभाषा निर्धारित कर लेंगी एवं उन्हें ऐसी सशक्त बना लेंगी कि उनके माध्यम से समस्त सरकरी काम काज किए जाएंगे तथा राज्य में स्थित शिक्षण संस्थाएं उनके माध्यम से ही शिक्षा देंगी। यह निर्णय 1949 में ही किया गया था राज्यों ने अपनी-अपनी राजभाषा नीति घोषित कर दी थी। यद्यपि वहां भी निर्णय को मुस्तैदी लागू करने का काम नहीं हुआ क्‍योंकि राज्यों के सामने अन्य आवश्यक समस्‍याएं थीं जिनपर अविलंब ध्‍यान देना था। उस चक्कर में राज्य सरकारों ने राजभाषाओं की समस्या को टाल दिया था परंतु किसी भी सरकार ने अंग्रेज़ी को राजभाषा के रूप में अनंत काल तक बनाए रखने की मंशा नहीं व्यक्त की। अतः राज्यों ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपनी राजभाषाओं को प्रचलित करने के लिए अपने यहां भाषा विभागों की स्‍थापना की और कार्यालयी भाषा की शिक्षा देना प्रारंभ किया, भाषा प्रयोग की समीक्षा करने लगे तथा प्रशासनिक शब्‍दावली बनाने की प्रक्रिया प्रारंभ की। राज्‍य सरकारों ने उसी निर्धारित समय में अपनी भाषाओं को संवर्धित किया और आज नागालैंड के सिवाय सभी राज्यों ने अपनी राज्य भाषाओं में काम करना प्रारंभ कर दिया है। ऐसे में यह और भी आवश्‍यक हो गया है कि देश में राज्यों के बीच संपर्क भाषा के रूप में हिंदी को स्थापित किया जाए। लेकिन कार्यालयों में आज भी अंगेज़ी का प्रयोग उसी प्रकार व उतनी ही मात्रा में हो रहा है जितना कि 1965 से पहले हो रहा था। हिंदी प्रयोग के आंकड़े कितने सही और वास्तविक हैं यह तो राजभाषा कक्ष/अनुभाग/व‍िभाग के प्रभारी ही जानते हैं।

2. हिंदी के प्रश्न को संव‍िधान में अनंत काल तक के लिए टालने का फ़ैसला जनता द्वारा नहीं किया गया है और न ही किसी समित द्वारा सुझाया गया था। आज तक जितनी भीं समितियां, आयोग बने किसी ने भी हिंदी के प्रश्न को समय सीमा (पंद्रह साल)से परे रखने की सिफ़ारि‍श नहीं की है। राजभाषा आयोग, विश्‍व विद्यालय अनुदान आयोग, केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड, सभी ने हिंदी व क्षेत्रीय भाषाओं में ही शिक्षा दीक्षा देने की सिफ़ारिश की है। तब संविधान में हिंदी को अनिश्चित काल के लिए टालने की बात कहां से आई? यह निश्चित रूप से कोई सोची समझी चाल तथा प्रच्छन्न विद्वेष की भावना लगती है। इसे समझने और ग्रासरूट स्‍तर पर चेतना जागृत करने की आवश्‍यकता है।

3. हिंदी को वास्तविक रूप में कामकाज की भाषा बनाना हो तो देश में त्रिभाषा सूत्र स‍च्चे मन से तथा कड़ाई से लागू करना होगा। त्रिभाषा सूत्र के कार्यान्वयन की कठिनाइयों पर शिक्षा आयोग (1964-66) ने विस्‍तार से विचार किया है। व्‍यावहारिक रूप से त्रिभाषा सूत्र के कार्यान्वयन की कठिनाइयों में मुख्‍य है स्‍कूल पाठ्यक्रम में भाषा में भारी बोझ का सामान्य विरोध, हिंदी क्षेत्रों में अतिरिक्त आधुनिक भारतीय भाषा के अध्ययन के लिए अभिप्रेरण (मोटिवेशन) का अभाव, कुछ हिंदीतर भाषी क्षेत्रों में हिंदी के अध्ययन का विरोध तथा पांच से छह साल तक, कक्षा छठी से दसवीं तक दूसरी और तीसरी भाषा के लिए होने वाला भारी खर्च और प्रयत्न। शिक्षा आयोग ने कार्यान्वयन की कठिनाइयों का उल्लेख करते हुए कहा है कि गलत योजना बनाने और आध्‍ो दिल से सूत्र को कार्यान्वित करने से स्थिति और बिगड़ गई है। अब वह समय आ गया है कि सारी स्थिति पर पुनर्विचार कर स्‍कूल स्‍तर पर भाषाओं के अध्ययन के संबंध में नई नीति निर्धारित की जाए। अंग्रज़ी को अनिश्चित काल तक, भारत की सहचरी राजभाषा के रूप में स्‍वीकार किए जाने के कारण यह बात और भी आवश्‍यक हो गई है।

4. अतः ऐसी परिस्थिति में कार्यालयों में हिंदी को प्रचलित करने तथा स्‍टाफ़ सदस्‍यों को सक्षम बनाने के लिए सतत और सत्‍यनिष्‍ठा के साथ शिक्षण प्रशिक्षण का हर संभव प्रयास करना होगा एवं हिंदी की सेवा से जुड़े हर व्‍यक्ति को अपने अहम् को दूर रखकर प्रयास करना होगा। गुरु रवींद्र नाथ टैगोर की चार पंक्‍ति‍यां उल्‍लेखनीय हैं –

सांध्‍य रवि बोला कि लेगा काम अब यह कौन,
सुन निरुत्‍तर छबि लिखित सा रह गया जग मौन,
मृत्तिका दीप बोला तब झुकाकर माथ,
शक्ति मुझमें है जहां तक मैं करूंगा नाथ।।

5. हर व्‍यक्ति को अपनी शक्ति के मुताबिक प्रयास करना होगा। ऐसे में हम यह चाहते हैं कि हर व्‍यक्ति अपने आप से यह प्रश्‍न करे कि यह बड़ा और दुष्‍कर कार्य कैसे होगा और उसका उत्‍तर भी स्‍वयं ढूंढे, कुछ इस प्रकार –
बड़ा काम कैसे होता है, पूछा मेरे मन ने,
बड़ा लक्ष्‍य हो, बड़ी तपस्‍या, बड़ा हृदय, मृदुवाणी,
किंतु अहम् छोटा हो जिससे सहज मिलें सहयोगी,
दोष हमारा श्रेय राम का, यह प्रवृत्ति कल्‍याणी।।

डॉ. दलसिंगार यादव

मंगलवार, मार्च 16, 2010

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और सेक्सुअल हैरेसमेंट कार्यक्रम

यद्यपि संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1946 में 'महिलाओं के अधिकार' विषय पर विचार किया था और 'कॉमिशन ऑन स्‍टेटस ऑफ़ वीमेन' गठित किया था परंतु बहुत वर्षों तक इस पर गंभीरता से कार्रवाई नज़र नहीं आती है। लेकिन ह्यूमन राइट को विश्‍व के अनेक देशों में महत्‍वपूर्ण माना गया और इस पर गंभीरता से अमल जारी रखा। विशेष और गंभीर प्रयासों की शुरुआत 1975के बाद देखने में आती है। संय़ुक्त राष्ट्र संघ ने 1975 को अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष घोषित किया और 1975 (मैक्सिको), 1980कोपेनहेगेन), 1985 (नैरोबी) तथा 1995 (बीजिंग) में सम्‍मेलन आयोजित किए। इसमें लिंग के आधार पर भेदभाव समाप्‍त करने तथा महिलाओं के सशक्तीकरण के मामले पर वचनबद्धता को पूरा करने का संकल्‍प लिया गया था। भारत में भी महिलाओं के अधिकार और उनके प्रति होने वाले अनैतिक व्‍यवहारों से निपटने के लिए कई कानून बनाए गए परंतु महिलाओं के कार्यस्‍थल पर यौन उत्‍पीड़न के नि‍वारण के लिए अलग से अधिनियम अथवा कानूनी प्रावधान नहीं बनाए गए ।

2. वर्षों से इससे संबंधित अपराधों को भारतीय दंड संहिता (इंडियन पीनल कोड) के अंतर्गत किए गए प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई होती रही है। परंतु इस बारे में अलग से व्‍यवस्‍था की आवश्‍यकता और मामले की गंभीरत को महसूस करके उच्‍चतम न्‍यायालय ने 1997 में पहली बार 'वि‍शाखा और अन्‍य बनाम राजस्‍थान सरकार' मामले में कुछ मार्गदर्शी सिद्धांत सुझाए और सरकार को निदेश दिया कि जब तक कि भारत के संसद द्वारा इस बारे में कोई उपयुक्‍त कानून नहीं बनाया जाता तब तक उच्‍चतम न्‍यायालय के इस मार्गदर्शी सिद्धांत को, संवि‍धान के अनुच्‍छेद 141 के अनुसार कानून माना जाए और किसी भी कार्यस्‍थल पर चाहे वह सरकरी या निजी हो, इसका अनुसरण किया जाए।

3. भारत सरकार ने 'सेक्‍सुअल हैरसमेंट ऑफ़ वीमेन ऐट वर्क प्‍लेस (प्रिवेंशन, प्रॉहिविशन ऐंड रिड्रेसल, 2006) नामक वि‍धेयक तैयार किया था। उस बिल में पुनः संशोधन किया गया और उसे ''दि प्रोटेक्‍शन ऑफ़ वीमेन अगेंस्‍ट सेक्‍सुअल हैरसमेंट ऐट वर्क प्‍लेस बिल, 2007'' नाम से वेबसाइट के पब्लिक डोमेन में रखा और अनुरोध किया कि इसमें सुझाव दिया जाए। चूंकि वह बिल अभी भी संसद द्वारा पारित करने के लिए संसद के समक्ष लंबित है और इस बीच मीडिया में, हरि‍याण के भूतपूर्व डी. जी. पी. का मामला बहुत उछाला गया इसलिए सरकार ने इसमें कुछ और संशोधन करने के विचार से पुनः विचार आमंत्रित किया है तथा इस वर्ष इसे पास करने का मन बना लिया है। पहले वाले विधेयक में छह अध्‍याय, 40धाराएं और तीन अनुसूचियां थीं। परंतु नवीनतम वि‍धेयक में पांच अध्‍याय, 22 धाराएं और एक अनुसूची है जिसमें विभिन्‍न कार्यस्‍थलों का विवरण दिया गया है। यह व्‍यापक व सरल भाषा में बनाया गया विधेयक है जो पास होने पर उपयोगी सिद्ध्‍ा होगा।

4. राजभाषा विकास परिषद ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस - 8 मार्च को, 'सेक्‍सुअल हैरसमेंट ऑफ़ वीमेन ऐट वर्क प्‍लेस' विषय के विवधि पहलुओं पर चर्चा करने के लिए दो दिवसीय कार्यक्रम की शुरुआत की और इसके विभिन्‍न पहलुओं पर कानून विदों के साथ व्‍यापक चर्चा की। इन विषयों पर चर्चा करने के लिए कानून के जानकार, शिक्षण और न्‍यायालयों में कानून की प्रैक्टिस करने वाले न्‍याय विदों को आमंत्रित किया गया था।

5. ''दि प्रोटेक्‍शन ऑफ़ वीमेन अगेंस्‍ट सेक्‍सुअल हैरसमेंट ऐट वर्क प्‍लेस बिल, 2007'' में सेक्‍सुअल हैरसमेंट की वही परिभाषा शामिल कर ली गई है जोकि सुप्रीम कोर्ट ने विशाखा के मामले में दी। इस विधेयक में पुरुषों के बारे में ध्‍यान नहीं रखा गया। अतः इस पर व्‍यापक चर्चा की आवश्‍यकता है।

रविवार, मार्च 14, 2010

हिंदी में प्रशिक्षण - आम मानसिकता

आमतौर पर, प्रशिक्षण कार्यक्रम मुख्य धारा के कार्यों को अंजाम देने के लिए आयोजित किए जाते हैं जिनमें हिंदी का नामोनिशान नहीं होता है। परंतु भारत सरकार की ओर से निरंतर दबाव रहता है कि कार्यालयी कार्यों में हिंदी के प्रयोग के लिए समयबद्ध तरीके से नियत लक्ष्य प्राप्त किया जाए। इसी सिलसिले संसदीय राजभाषा समिति ने अपना आठवां प्रतिवेदन प्रस्‍तुत किया है जिसमें ‍ सिफ़ारि‍श की है कि सभी कंप्यूटर प्रणालियाँ द्विभाषिक हों और उनके माध्यम से यूनीकोड आधारित हिंदी में काम करने का प्रशिक्षण भी दिया जाए।

2. सभी संगठन/संस्थाएँ अपने हिसाब से कंप्‍यूटर द्वारा हिंदी में काम करने के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था कर रही हैं और अपने राजभाषा अधिकारी को, यूनीकोड को सिस्टम में सक्रिय करने का एक दो सत्रों का प्रशिक्षण देकर अपने दायित्‍व की इतिश्री मान लेती हैं। मुख्‍य धारा के स्‍टाफ़ सदस्‍यों को कंप्‍यूटर का सामान्‍य (जनरल) प्रशिक्षण दिलाया जाता है जिसमें हिंदी का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है। वह प्रशिक्षण कंप्‍यूटर की किसी बाहरी एजेंसी के माध्यम दिलाया जाता है जिनके पास जेनरल (सामान्‍य) किस्म का पाठ्यक्रम होता है जिसके माध्यम से सभी को प्रशिक्षित किया जाता है। संगठनों की कार्यप्रणाली के अनुसार प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है जिसकी वजह से जब प्रशिक्षणार्थी प्रशिक्षण के उपरांत अपने कार्यस्‍थल पर वापस जाता है तो उसके द्वारा सीखी गई बातों का उपयोग नहीं हो पाता है। अत: प्रशिक्षण पर लगाए गए समय व धन का वांछित प्रतिलाभ नहीं मिलता है। प्रशिक्षण का उद्देश्य स्टाफ़ सदस्यों को ऐसा कंप्‍यूटर कॉम्‍पीटेंट बनाना होना चाहिए जो यूनीकोड आधारित हिंदी माध्‍यम से दक्षतापूर्वक सारा काम कंप्‍यूटर द्वारा हिंदी में करने में सक्षम हों।

3. राजभाषा विकास परिषद (परिषद) द्वारा यह पाठ्यक्रम कार्यालय के समस्‍त दैनिक कार्यों में कंप्यूटर की अधिकाधिक सहायता लेने के लिए सहभागी को सक्षम बनाने हेतु बनाया गया है और सर्वाधिक समय कंप्‍यूटर पर काम करने के लिए दिया गया है। पाठ्य सामग्री इसी बात को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। इसे मैनुअल के रूप में उपयोग में लाया जाए। इसमें शब्द संसाधन, अंक संसाधन, पावर प्‍वाइंट, आँकड़ा संसाधन तथा नेटवर्किंग के अलावा कार्यालय के अन्‍य कार्यों से संबंधित जानकारी देने वाली समाग्री का शुमार किया गया है। कार्यालयी पत्र व्यवहार, पतों का डाटाबेस रखना, उनके आधार पर पूरी परिशुद्धता के साथ अनेक पत्र थोड़े से समय में ही तैयार करना, अपने डेस्क के काम का डाटाबेस तैयार करना, अनेक प्रकार से छवि का संसाधन, उनके उपयोग द्वारा अपने टेक्‍स्‍ट को आकर्षक और प्रभावोत्‍पादक बनाना, प्रकाशन तैयार करना और संचित जानकारी की शीघ्रता से प्राप्ति और उसके आधार पर निर्णय लेने में सहूलियत आदि के लिए दिशा निदेश देने वाली सामग्री का शुमार है। इस कार्यक्रम से प्रशिक्षणोपरांत वापस जाने पर इसका उपयोग करके प्रशिक्षणार्थी अपना काम समस्‍त काम हिंदी में, समय पर, चुस्ती तथा परिशुद्धता से कर सकेंगे।

4. राजभाषा विकास परिषद गैर सरकारी स्वैच्छिक संस्था है जिसकी स्थापना एक विशेष उद्देश्य से की गई है। इसने ऐसा विशेषीकृत कंप्‍यूटर लैब बनाया है जिसमें हिंदी में काम करने के संबंध में सॉफ़्टवेयर उपलब्‍ध हैं। इस प्रशिक्षण में दो नए उपकरण - श्रुतलेखन सॉफ़्टवेयर व मशीन ट्रांस्‍लेशन सॉफ़्टवेयर शामिल किए गए हैं जिनकी सहायता से हिंदी में काम करना सुकर होगा। अभी तक किसी संस्था ने ऐसा विशेषीकृत लैब बनाना व्यवहार्य नहीं पाया है। परिषद के उद्देश्‍य इस प्रकार हैं-

1. हिंदी के प्रयोग से संबंधित किसी भी प्रकार का और किसी भी माध्यम से ज्ञान का विस्तार करना या प्रशिक्षण देना,

2. हिंदी के विकास के लिए सामाजिक, सांस्कृतिक और बुद्धिवादी कार्यकलापों का संवर्द्धन,

3. हिंदीं के प्रयोग में सहायक किसी भी प्रकार के साहित्य का सृजन, चाहे वह मौलिक लेखन द्वारा हो, अनुवाद द्वारा हो अथवा संकलन संपादन द्वारा हो,

4. परिषद के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक या सामान्यतया उसमें सहायक कोई गतिविधि शुरू करना।

5. राजभाषा के विकास के लिए कोई संस्‍था स्‍थापित करना।

5. लैब में उपर्युक्त सॉफ़्टवेयरों, वाई फ़ाई नेटवर्किंग तथा इंटरनेट से युक्त आधुनिकतम कंप्यूटर हैं तथा विशेषज्ञ संकाय की व्यवस्था है। इन सुविधाओं का उपयोग करके, बैंक व अन्य संगठन अपने मुख्य धारा के स्टाफ़ सदस्यों तथा राजभाषा अधिकारियों को प्रशिक्षित कराने व राजभाषा के कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए कम खर्च पर प्रशिक्षण दिला सकते हैं। संगत जानकारी व संपर्क के लिए परिषद की वेबसाइट देखी जाए। वेबसाइट का पता : http://www.rvparishad.org

बुधवार, मार्च 03, 2010

कनिष्ठ/नव नियुक्त राजभाषा अधिकारियों के लिए एकीकृत गहन विकास कार्यक्रम प्रशिक्षण कार्यक्रम

राजभाषा विकास परिषद, नवंबर 2007 से बैंकों/पीएसयू/सरकारी कार्यालयों में कार्यरत अधिकारियों के लिए विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करती आ रही है। परिषद का उद्देश्य समस्त कार्यालयी कार्यों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने व वि‍शेष रूप से कंप्यूंटर द्वारा हिंदी में करने के लिए प्रशिक्षण देना है। प्रथम चरण में मुख्य धारा के अधिकारियों तथा राजभाषा अधिकारियों के लिए अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित किए गए। कार्यक्रमों के दौरान सुझाव प्राप्त हुए हैं कि राजभाषा अधिकारियों के लिए ऐसे एकीकृत गहन विकास कार्यक्रम की आवश्यकता है जिसमें राजभाषा अधिकारियों को, राजभाषा अधिकारियों के कार्य (ड्यूटी) व राजभाषा के कार्यान्वयन से जुड़े समस्त पहलुओं को शामिल करते हुए पूर्ण रूप से कंप्यूटरीकृत महौल में काम करने का गहन प्रशिक्षण दिया जाए। इसके लिए एकीकृत गहन विकास कार्यक्रम (इंडक्शान) कार्यक्रम आयोजित करने की आवश्यकता है।

2. अतः राजभाषा विकास परिषद ने कार्यक्रम विकसित किया है और इसकी सूचना बैंकों/पीएसयू/सरकारी कार्यालयों को दी है। चूंकि यह कार्यक्रम अन्यू कार्यक्रमों की अपेक्षा अधिक समयावधि वाला होगा और उसमें विभिन्नक क्षेत्रों के वि‍षय विशेषज्ञ सत्रों का संचालन करेंगे इसलिए इसकी पूर्व योजना और परि‍षद को पूर्व सूचना आवश्यक होगी। हमारे अन्य कार्यक्रम पांच दिवसीय होते हैं। आपसे अनुरोध है कि यदि आपके नव नियुक्तव राजभाषा अधि‍कारी हों और उन्हें एकीकृत गहन विकास कार्यक्रम (इंडक्शनन) में शामिल कराना चाहते हों तो 31 मई 2010 तक देने की कृपा करें ताकि व्यकवस्था की जा सके। इस कार्यक्रम में, सहभागी संस्था के विशेष के कार्यों के अनुसार विशिष्ट विषयों को भी शामिल किया जा सकता है।

3. चूंकि यह कार्यक्रम यूनीकोड आधारित हिंदी माध्यतम से पूर्णतः पेपरलेस ऑफ़िस की संकल्पना को ध्यान में रखकर बनाया गया है इसलिए सभी सत्रों में कंप्यू्टर पर ही कार्य व प्रशिक्षण होंगे। इसलिए यह आवश्यक होगा कि इसमें भाग लेने वाले अधिकारी को टाइपिंग का आधारभूत ज्ञान हो। शब्दावली सर्च व निर्माण में कंप्यूपटर के उपयोग, सॉफ़्टवेयरों की डाउनलोडिंग, यूनीकोड की सेटिंग, अन्य‍ नॉन स्टैंडर्ड कोडों में तैयार की गई टेक्सट फ़ाइलों को यूनीकोड में परिवर्तित करने और उसके उपरांत बिना किसी थर्ड पार्टी सॉफ़्टवेयर के बिना हिंदी में संपूर्ण कार्य करने का ऑन कंप्यूयटर प्रशिक्षण इस कार्यक्रम की अनोखी विशेषताएं होंगी। इस प्रशिक्षण के उपरांत कोई भी राजभाषा अधिकारी कंप्यूटर कॉम्पीटेंट बन कर जाएगा जो अपना सारा काम कंप्यूटर पर करने में न केवल सक्षम होगा बल्कि अन्य लोगों को भी प्रशिक्षण देने में कुशल होगा। यह समग्र विकास कार्यक्रम होगा जिसे 23 अगस्त से 03 सितंबर 2010 तक आयोजित करने का प्रस्ताव है।

4. अनुरोध है कि राजभाषा वि‍भाग/अनुभाग/कक्ष के प्रभारी इस बारे में अपनी संस्था से संपर्क करके कार्यक्रम का पूरा लाभ लें।

(डॉ. दलसिंगार यादव)
निदेशक

मंगलवार, फ़रवरी 23, 2010

हिंदी कार्यान्‍वयन के लिए समितियां

1. प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय हिंदी समिति वर्ष 1967 में गठित हुई. यह शीर्ष समिति है जो संघ की राजभाषा के रूप में हिंदी के प्रगामी प्रयोग के लिए दिशानिदेश नीति निर्धारित करती है। 

2. राजभाषा अधिनियम 1963 की धारा 4(4) के तहत गृह मंत्री की अध्‍यक्षता में राजभाषा संसदीय समिति का गठन 1976 में किया गया था। उसके बाद हर लोक सभा के आम चुनाव के बाद इस समिति का पुनर्गठन किया जाता है। इसमें 20 लोक सभा के सांसद होते हैं तथा 10 राज्‍य सभा के। इसकी अलग अलग उप समितियां होती हैं जिसका उपाध्‍यक्ष उप समिति के सदस्‍यों में से वरिष्‍ठतम सदस्‍य होता है। यह समिति विभिन्‍न कार्यालयों में जाती है और निरीक्षण के बाद अपनी रिपोर्ट राष्‍ट्रपति को सौंपती है। राष्‍ट्रपति उसे सदन के पटल पर रखवाते हैं और उसपर अपनी सहमति देकर सभी विभागों/मंत्रालयों में भेजवाते हैं।

3. सभी मंत्रालयों में, प्रभारी मंत्री की अध्‍यक्षता में हिंदी सलाहकार समितियों का गठत किया गया है। इन समितियों की बैठकों में,समय समय पर अपने संबंधित मंत्रालयों में हिंदी के प्रयोग की प्रगति की समीक्षा करती है। विभागों और कार्यालयों / उपक्रमों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए और उपायों का सुझाव देती है।

4. केंद्रीय राजभाषा कार्यान्‍वयन समिति का गठन सभी कार्यालयों / वि‍भागों में किया गया है। इसका अध्‍यक्ष कैबिनेट सचिव(राजभाषा) होता है।

5. हर विभाग में राजभाषा कार्यान्‍वयन समिति गठित की गई है जिसका अध्‍यक्ष वि‍भाग का संयुक्‍त सचिव होता है। विभाग में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए प्रगति की समीक्षा करती है और समयबद्ध कार्यक्रमों के अनुसार नियत लक्ष्‍यों की प्राप्ति के उपायों का सुझाव देती है।

शनिवार, फ़रवरी 20, 2010

हिंदी दिवस समारोह मनाने की शुरुआत

हिंदी दिवस समारोह मनाने की शुरुआत 14 सितंबर 1954 से हुई । 10 और 11 नवंबर 1953 को काका साहब न. वि. गाडगिल की अध्‍यक्षता में नागपुर में 'अखिल भारतीय राष्‍ट्रभाषा प्रचार सम्‍मेलन' का पांचवां अधिवेशन हुआ था। उस अधिवेशन में, जब तक हिंदी को अंग्रेज़ी के स्‍थान पर पूर्ण रूप से 'राजभाषा' का स्‍थान नहीं प्राप्‍त हो जाता तब तक '14 सितंबर' को 'हिंदी दिवस' के रूप में स्‍मरण करते रहने का विचार सामने आया और औपचारिक रूप से प्रस्‍ताव पारित हुआ कि ''यह सम्‍मेलन निश्‍चय करता है कि स्‍वतंत्र भारत के संवि‍धान ने जिस दिन हिंदी को 'राजभाषा' तथा 'देवनागरी' को राष्‍ट्रलिपि स्‍वीकार किया है उस दिन अर्थात्, 14 सितंबर को संपूर्ण भारत में 'हिंदी दिवस' मानाया जाएगा।''
2.
इस प्रस्‍ताव के प्रस्‍तावक श्री जेठामल जोशी तथा अनुमोदक श्रीमती मैना गाडगिल थे। प्रस्‍ताव के समर्थक थे श्रीमती राधा देवी गोयनका तथा श्री भा. ग. जोगलेकर। इसी प्रस्‍ताव के आधार पर राष्‍ट्र भाषा प्रचार सभा, वर्धा के तत्‍कालीन प्रधान मंत्री श्री मोहन लाल भट्ट ने 30 नवंबर 1953 को सभी प्रांतीय समितियों, ज़‍िला समतियों, नगर समितियों, हिंदी के कार्य से जुड़े, देश के तमाम कार्यालयों और विशि‍ष्‍ट व्‍यक्तियों को पत्र भेजा। उस पत्र द्वारा आगामी 14 सितंबर 1954 को ''हिंदी दिवस' मनाने का विनम्र आग्रह किया गया। इस प्रकार 14 सितंबर 1954 को 'हिंदी दिवस' मनाने का सिलसिला प्रारंभ हुआ।
3.
हिंदी सेवियों और हिंदी के वेतनभोगियों से विनम्र अनुरोध है कि हिंदी के रास्‍ते में सहायक बनें रोड़ा न बनें और अधिकारी का भाव न रखकर मशिनरी की भावना से हिंदी का प्रचार प्रसार करें।

बुधवार, फ़रवरी 17, 2010

राजभाषा हिंदी - सांविधिक स्थिति

देश की स्‍वतंत्रता के न‍िर्णय के साथ ही भारत के नेताओं ने हिंदी को देश की राष्‍ट्रभाषा के रूप में स्‍वीकार कर लिया था परंतु संवि‍धान में इसे राष्‍ट्रभाषा न कहकर राजभाषा नाम दे दिया गया और आज यह दुष्‍प्रचार किया जा रहा है कि हिंदी भारत की राष्‍ट्रभाषा नहीं है बल्कि यह अन्‍य भारतीय भाषाओं की ही भांति एक भाषा है और यह केंद्र सरकार के राजकाज की भाषा है।

2. भारत सरकार ने भी इसके साथ अच्‍छा व्‍यवहार नहीं किया और 1967 में भारत के संविधान में संशोधन करके हिंदी को 1965 के बाद अंग्रेज़ी का पर्याय बनने से रोक दिया और ऐसी परिस्थिति का निर्माण कर दिया है कि हिंदी वास्‍तविक रूप में राष्‍ट्रभाषा बन ही नहीं सकती है।

3. सांवि‍धानिक प्रावधानों के अनुसार जब तक देश के सभी राज्‍यों के दोनों सदनों में इस आशय का संकल्‍प न पारित कर दिया जाए कि हिंदी भारत संघ की राजभाषा होगी और उसके बाद भारतीय संसद के दोनों सदनों में भी ऐसा ही संकल्‍प नहीं पारित कर दिया जाता तब तक देश के काम काज से अंग्रेज़ी का संपूर्ण रूप से समापन नहीं हो पाएगा। चूंकि संविधान का अनुच्‍छेद 345 अभी नागालैंड को अंग्रेज़ी के उपयोग की शक्ति देता है इसलिए नागालैंड हिंदी को नहीं स्‍वीकार कर पाएगा। अतः यह असंभव जैसी स्थिति बन गई है। हम संसदीय समिति और समयबद्ध कार्यक्रमों के माध्‍यम से अनंत काल तक प्रयास करने और हिंदी के प्रगामी प्रयोग का दिखावा करते रहेंगे और हरसाल करोड़ों रुपए खर्च करते रहेंगे लेकिन हिंदी को राष्‍ट्रभाषा नहीं बना पाएंगे।

4. राजभाषा विकास परिषद ने इसके लिए संवैधानिक लड़ाई प्रारंभ की है। नागपुर हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। इसमें हिंदी सेवकों तथा संगठनों का सहयोग आवश्‍यक और वांछनीय है।

डॉ. दलसिंगार यादव
निदेशक
राजभाषा विकास परिषद
नागपुर
17.02.2010

क्या रुपए का नया प्रतीक क्षेत्रीयता का परिचायक है?