रविवार, मार्च 13, 2011

राजभाषा हिंदी के बारे में मनोवृत्ति परिवर्तन की आवश्यकता


कार्यालयों में अंग्रेज़ी का प्रयोग आज भी उसी प्रकार व उतनी ही मात्रा में हो रहा है जितना कि 1965 से पहले हो रहा था। हिंदी प्रयोग के आंकड़े कितने सही और वास्‍तविक हैं यह तो राजभाषा कक्ष/अनुभाग/विभाग के प्रभारी ही जानते हैं। इससे भी ख़तरनाक बात यह है कि हिंदी के प्रश्‍न को संविधान में अनंत काल तक के लिए टाल दिया गया है। हिंदी के प्रयोग के बारे में आज तक जितनी भी समितियां, आयोग बने किसी ने भी हिंदी के प्रश्न को समय सीमा से परे रखने की सिफ़ारि‍श नहीं की थी। लेकिन हिंदी के विरोधी और नकारात्मक मनोवृत्ति तथा अंग्रेज़ी के आधार पर अपना वर्चस्व बनाए रखने के हिमायतियों ने यह दलील दी कि हिंदी के कारण देश के टुकड़े हो जाएंगे। अतः अंग्रेज़ी को विकल्प के रूप में रखा जाना अपरिहार्य है। क्या सचमुच ऐसा है? इसका अखिल भारतीय स्तर पर अध्ययन किया जाना चाहिए और उस अध्ययन के आधार पर संविधान में संशोधन करके अनिश्चितता समाप्त की जानी चाहिए। हिंदी ब्लॉगर बंधुओं का आह्वान करता हूं कि राजभाषा के बारे में भी चिंतन करें और जनमत तैयार करें ताकि संविधान संशोधन का रास्ता प्रशस्त हो। संविधान में कर दिए गए अनिश्चतता के प्रावधान के प्रति अंग्रेज़ीदाँ की विगलित मानसिकता ही ज़िम्मेदार है। इस मानसिकता के निवारण हेतु सामाजिक स्तर पर कार्य किया जाना चाहिए। 

बुधवार, मार्च 09, 2011

महिलाओं के प्रति लैंगिक भेदभाव और यौन उत्पीड़न - अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस


राजभाष विकास परिषद द्वारा अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (आठ मार्च) के अवसर पर दो दिवसीय सेमिनार आयोजित किया था। इसमें बैंकों और सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं की महिला अधिकारियों ने भाग लिया। विभागों के प्रमुखों ने इस कार्यक्रम में कार्यरत पुरुषों को भेजना उचित नहीं समझा। इसके तो आयोजक पुरुष थे परंतु सहभागी महिलाएं ही रहीं। ऐसा करके पुरुष वर्ग ने यह संदेश दिया है कि महिलाओं को अपनी लड़ाई स्वयं ही लड़नी है। इसलिए वे अपने अधिकारों के बारे में जान लें और समाज में लैंगिक भेदभाव या उनपर हो रहे अन्याय के प्रति अपनी आवाज़ उठाएं।

इस दो दिवसीय कार्यक्रम में 'सेक्‍सुअल हरैसमेंट ऑफ़ वीमेन ऐट वर्क प्‍लेस' विषय के विवधि पहलुओं पर चर्चा की गई। इन विषयों पर चर्चा करने के लिए कानून के जानकार, शिक्षण और न्‍यायालयों में कानून की प्रैक्टिस करने वाले न्‍याय विदों को आमंत्रित किया गया था। सहभागियों ने अपनी सक्रिय सहभागिता द्वारा कार्यक्रम को उपयोगी बनाया और अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम में महिलाओं को तो आना ही चाहिए साथ ही पुरुषों को भी आना चाहिए ताकि उन्हें ज्ञात हो सके कि महिलों की स्थिति क्या है और उन पर किस प्रकार से ज़्यादतियाँ हो रही हैं? चर्चा में कहा गया कि यद्यपि संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ ने 1910 से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्य करने के लिए अनेक कॉन्वेंशन आयोजित की और 8 मार्च को अंतरराष्‍ट्रीय महिला दिवस मनाने की घोषणा की थी उसके 36 वर्ष बाद 1946 में 'महिलाओं के अधिकार' विषय पर विचार किया था और 'कॉमिशन ऑन स्‍टेटस ऑफ़ वीमेन' गठित किया था। परंतु बहुत वर्षों तक इस पर गंभीरता से कार्रवाई नज़र नहीं आती है। लेकिन ह्यूमन राइट को विश्‍व के अनेक देशों में महत्‍वपूर्ण माना गया और इस पर गंभीरता से अमल जारी रखा। विशेष और गंभीर प्रयासों की शुरुआत 1975 के बाद ही देखने में आती है। संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ ने 1975 को अंतरराष्‍ट्रीय महिला वर्ष घोषित किया और 1975 (मैक्सिको), 1980 (कोपेनहेगेन), 1985 (नैरोबी) तथा 1995 (बीजिंग) में सम्‍मेलन आयोजित किए। इसमें लिंग के आधार पर भेदभाव समाप्‍त करने तथा महिलाओं के सशक्तीकरण के मामले पर वचनबद्धता को पूरा करने का संकल्‍प लिया गया था। भारत में भी महिलाओं के अधिकार और उनके प्रति होने वाले अनैतिक व्‍यवहारों से निपटने के लिए कई कानून बनाए गए परंतु महिलाओं के कार्यस्‍थल पर यौन उत्‍पीड़न के नि‍वारण के लिए अलग से अधिनियम अथवा कानूनी प्रावधान नहीं बनाए गए ।

वर्षों से इससे संबंधित अपराधों को भारतीय दंड संहिता (इंडियन पीनल कोड) के अंतर्गत किए गए प्रावधानों के  अनुसार कार्रवाई होती रही है। परंतु इस बारे में अलग से व्‍यवस्‍था की आवश्‍यकता और मामले की गंभीरता को महसूस करके उच्‍चतम न्‍यायालय ने 1997 में पहली बार 'वि‍शाखा और अन्‍य बनाम राजस्‍थान सरकार' मामले में कुछ मार्गदर्शी सिद्धांत सुझाए और सरकार को निदेश दिया कि जब तक कि भारत के संसद द्वारा इस बारे में कोई उपयुक्‍त कानून नहीं बनाया जाता तब तक उच्‍चतम न्‍यायालय के इस मार्गदर्शी सिद्धांत को, संवि‍धान के अनुच्‍छेद 141 के अनुसार कानून माना जाए और किसी भी कार्यस्‍थल पर चाहे वह सरकरी या निजी हो, इसका अनुसरण किया जाए।

भारत सरकार ने 'सेक्‍सुअल हरैसमेंट ऑफ़ वीमेन ऐट वर्क प्‍लेस (प्रिवेंशन, प्रॉहिवशिन ऐंड रिड्रेसल, 2006) नामक वि‍धेयक तैयार किया था। उस बिल में पुनः संशोधन किया गया और उसे ''दि प्रोटेक्‍शन ऑफ़ वीमेन अगेंस्‍ट सेक्‍सुअल हैरेसमेंट ऐट वर्क प्‍लेस बिल, 2007'' नाम से वेबसाइट के पब्लिक डोमेन में रखा और अनुरोध किया कि इसमें सुझाव दिया जाए। चूंकि वह बिल अभी भी संसद द्वारा पारित करने के लिए संसद के समक्ष लंबित है और इस बीच मीडिया में, हरि‍याण के भूतपूर्व डी. जी. पी. का मामला बहुत उछाला गया इसलिए सरकार ने इसमें कुछ और संशोधन करने के विचार से पुनः विचार आमंत्रित किया है तथा इस वर्ष इसे पास करने का मन बना लिया है। इसमें छह अध्‍याय, 40 धाराएं और तीन अनुसूचियां थीं। अब इसमें पांच अध्‍याय, 22 धाराएं और एक अनुसूची है जिसमें विभिन्‍न कार्यस्‍थलों का विवरण दिया गया है। यह व्‍यापक व सरल भाषा में बनाया गया विधेयक है जो पास होने पर उपयोगी सिद्ध्‍ा होगा।

चर्चा के दौरान बात उठी कि आजकल मुंह पर कपड़ा बांधकर लड़कियां झुंड में अपनी सहेली को मिलने के लिए किसी हाउसिंग सोसायटी में आती हैं तो सोसायटी का भी उनकी आइडेंटिटी की जांच नहीं कर पाता है। ऐसे में सुरक्षा के मामले में ख़तरे का अंदेशा  बढ़ता जा रहा है। यदि कोई आपत्ति उठाकर उसे हटाने के लिए कहता है तो उसपर सेक्सुअल हैरेसमेंट का मामला आईपीसी की धारा 354 का मामला बन जाता है। इसपर मेरा कहना था कि यदि आज की महिला खुद को ढंक कर रखना चाहती है तो पर्दा प्रथा या बुर्क़ा प्रथा को ख़राब क्यों कहा जाता है। जवाब था वह पुरुष समाज द्वारा थोपी गई थी। यह हमने ने अपनी मर्ज़ी से अपनाया है। अपनी ज़रूरत के अनुसार। व्यक्ति स्वातंत्र्य।  पहले हम, समाज बाद में।

शनिवार, मार्च 05, 2011

स्वायत्त संस्था की परिभाषा (An Autonomous Institution) व राजभाषा हिंदी


भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आई.आई.टी.) में इंजीनियरी की पढ़ाई करने के लिए प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों की प्रवेश परीक्षा में अंग्रेज़ी को ही माध्यम रखने के बारे में संसद में पूछे गए सवाल के जवाब में मानव संसाधन मंत्रालय के मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने जिनके अंतर्गत उच्च शिक्षा भी आती है, ने जबाव दिया कि ये संस्थाएं स्वायत्त हैं इसलिए परीक्षा के माध्यम के बारे में निर्णय करने के लिए स्वतंत्र हैं। मंत्री जी ने सही कहा कि ये संस्थाएं स्वायत्त हैं।

श्री कपिल सिब्बल जाने-माने कानून विद् भी हैं। अतः अन्हें कानूनी दांवपेंच तथा नियम और कानून की बेहतर समझ होगी ऐसा माना जा सकता है। विधि शब्दकोश के अर्थ के अनुसार स्वायत्त का अर्थ है  स्व-शासित, स्वतंत्र, केवल अपनी ही विधि के अधीन कार्य करने का अधिकार। क्या इस अधिकार में भारत के संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का हनन भी शामिल है? हिंदी माध्यम या अन्य भाषाओं के माध्यम से 12वीं पास करने वाले विद्यार्थियों के अधिकारों का हनन करने अधिकार है? क्या आई.आई.टी. परिसरों में घटने वाले अपराधों पर इन संस्थाओं अपनी मर्ज़ी से कार्रवाई करने का अधिकार है? क्या सी.पी.सी., सीआर. पी.सी, आई.पी.सी. आदि के अंतर्गत किए गए कानूनी प्रावधनों को न मानने की आज़ादी है? नहीं। फिर राजभाषा अधिनियम के प्रवधानों को न मानने की छूट कैसे मिल जाती है? स्वायत्त संस्था का मतलब होता है अपने दैनिक कार्य व्यापार में बाहरी हस्तक्षेप से स्वतंत्रता ताकि संस्था को सुचारु और तीव्र गति से चलाने में बाधा न आए।

भारतीय रिज़र्व बैंक और ऐसी ही अनेक शीर्ष संस्थाएं हैं जो किसी अधिनियम के अंतर्गत गठित की गई स्वायत्त हैं। फिर भी इन संस्थाओं पर राजभाषा अधिनियम और भारत सरकार की नीतियाँ लागू होती हैं तथा वे सहर्ष इनका पालन करती हैं। अतः स्वायत्ता या निजी कंपनी के नाम पर देश की राजभाषा से संबंधित नीतियों को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। श्री देवव्रत चतुर्वेदी राजभाषा संसदीय समिति के उपाध्यक्ष हैं और उन्होंने इस बात को बहुत ही सही ढंग से उठाया। वे इसके लिए बधाई के हकदार हैं। राजभाषा के मामले में सतत जागरूक रहने की ज़रूरत है। अंग्रेज़ीदां और इसके समर्थक सदैव अंग्रेज़ी का वर्चस्व कायम रखने में लगे रहते हैं।   

राजभाषा विकास परिषद उनकी प्रशंसा करती है और धन्यवाद ज्ञापित करती है।     

गुरुवार, मार्च 03, 2011

वर्ष 1963 व 1967 के हिंदी आंदोलन तथा हिंदी आज भी अस्तित्व की तलाश में


हिंदी के बारे में पुनर्विचार की आवश्यकता है। हालाँकि नेहरू जी अंग्रेज़ी समर्थक थे और उनका प्रारंभिक जीवन ऐसे वातावरण में बीता था जिसमें अंग्रेज़ी का प्रभुत्व था परंतु वे अंग्रज़ी के अंध भक्त नहीं थे। उनके पिता जी हिंदी के विरोधी नहीं थे परंतु इसके प्रति उदासीन ज़रूर थे। चूंकि नेहरू जी की ज़िंदगी में अंग्रेज़ी का अहम स्थान था और उनके अच्छे दोस्तों में अंग्रेज़ शामिल थे इसलिए उनकी नज़र में अंग्रेज़ी के लिए विशेष अनुराग होना स्वाभाविक था। इसके अलावा, हिंदुस्तान में अंग्रेज़ों की वर्ण संकर संतानें, ऐंग्लो-इंडियन जिनकी संख्या 1947 में लगभग 3,00,000 थी और स्वतंत्रता के बाद देश में अपने भविष्य के बारे में उनको भरोसा नहीं था इसीलिए अंग्रेज़ों के जाने के साथ ही देश छोड़कर यू.के., अमरीका, आस्ट्रेलिया तथा कनाडा जाने लगे थे, उनके प्रति भी विशेष अनुराग था। अब यह संख्या 1,50,000 से भी कम हो गया है। ऐंग्लो-इंडियनों के प्रति इसी अनुराग के कारण ही संभवतः वे फ़्रैंक एंथोनी के खिलाफ़ नहीं गए और उन पर बहुत विश्वास भी करते थे। अतः उन्हीं के दबाव में आकर ऐंग्लो-इंडियनों के लिए देश में न केवल विशेष स्थान दिलाया बल्कि उन्हीं के दबाव में आकर 1965 के बाद भी हिंदी को राजभाषा का असली दर्ज़ा अनंत काल तक के लिए टल गया और अंग्रेज़ी उसी तरह बरकरार रही।

फ़्रैंक एंथोनी का जन्म जबलपुर में हुआ था और वे वहीं पर वकालत करते थे। बोलने में बहुत ही मुखर थे और ऐंग्लो-इंडियन होने के कारण अपनी मातृभाषा अंग्रेज़ी मानते थे। ऐसा किसी देश में नहीं होगा कि वहाँ की स्थानीय भाषा समृद्ध होने के बावज़ूद दूसरे दर्ज़े की भाषा हो। एक सौ दस करोड़ की जनसंख्या वाले देश में केवल 1.5 लाख लोगों की मातृभाषा को प्रथम भाषा का दर्ज़ा और लगभग 60 प्रतिशत से ज़्यादा हिंदी बोलने वालों के साथ सौतेला व्यवहार।

मेरी समझ में एक बात और आई है। वर्ष 1963 व 1967 के हिंदी आंदोलन में दक्षिण भारतीयों को नाहक मोहरा बनाकर लड़ाई लड़ी गई। जबकि संसद में हिंदी के विरोध में और अंग्रेज़ी के पक्ष में सबसे ज़्यादा शोर मचाने तथा नेहरू जी से आश्वासन लेने वाले ऐंग्लो-इंडियन फ़्रैंक एंथोनी थे। आज मैकाले की नीति के धर्मध्वजी ऐंथोनी नहीं हैं परंतु उनके द्वारा बनाई गई राह को बदलना असंभव तो नहीं पर आसान भी नहीं दिखती है।

राजभाषा अधिनियम, 1963 पर, लोक सभा में 23 अप्रैल 1963 को बोलते हुए बंगाल के श्री हीरेंद्रनाथ मुखर्जी ने कहा था कि मुझे यक़ीन है कि "उस अवसर पर प्रधान मंत्री ने जो वक्तव्य दिया वह उन जैसे राजनेता की सूझबूझ के अनुरूप था। मुझे आशा है कि वे उससे कभी नहीं मुकरेंगे। परंतु मुझे यह भी उम्मीद है कि वे इस बात को स्पष्ट कर देंगे कि हम अपने क़ानून में ऐसी व्यवस्था नहीं रखेंगे जिससे हिंदी या दूसरी राष्ट्रीय भाषाओं के विषय में क़ानून बनाना असंभव हो जाए। जनतांत्रिक पद्धति से लिए गए निर्णयों को वीटो करने का अधिकार किसी भी अल्प संख्यक वर्ग को, चाहे वह कितना ही मुखर और शोर मचाने वाला क्यों न हो, नहीं देना चाहिए।"

अब जब हम राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 5(5) पर नज़र डालते हैं तो पाते हैं कि श्री हीरेंद्रनाथ मुखर्जी का डर सही साबित हुआ और केंद्र सरकार ने "असंभव निष्पादन" का नियम चरितार्थ कर दिया है। "देश में अंग्रेज़ी को राजकाज के लिए तब तक नहीं रोका जा सकता है और हिंदी को राजभाषा का वास्तविक दर्ज़ा नहीं मिल सकता है जब तक कि अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग समाप्त कर देने के लिए ऐसे सभी विधान मंडलों द्वारा, जिन्होंने हिंदी को राजभाषा के रूप में नहीं अपनाया है, संकल्प पारित नहीं कर दिए जाते और जब तक पूर्वोक्त संकल्पों पर विचार कर लेने के पश्चात ऐसी समाप्ति के लिए संसद के हर एक सदन द्वारा संकल्प पारित नहीं कर दिया जाता।"  क्या यह संभव है? कोई संविधान संशोधन के लिए दो तिहाई राज्यों का समर्थन आवश्यक है। परंतु राजभाषा हिंदी के मामले में यह शर्त 100 प्रतिशत रख दी गई है। असंभव की स्थिति। यह साजिश है। इस पर फिर से विचार किया जाना चाहिए।           

मंगलवार, मार्च 01, 2011

हिंदी विरोध अब बेमानी लगता है

दुनिया के छोटे-से-देश का अंतरराष्ट्रीकरण हो रहा है और लोगों को अब भाषा तथा धर्म के नाम पर भेद करना संगत नहीं लग रहा है। तमिल नाडु के नेताओं ने जब से केंद्र सरकार में सक्रिय सहभागिता का स्वाद चखा है और अकूत धन कमाने का रास्ता दिल्ली में तलाश लिया है तब से तमिल नाडु में हिंदी का विरोध कुछ कम हुआ है और अब गैर तमिल भाषियों को तमिल नाडु में घूमने और हिंदी माध्यम से बात चीत करने में कठिनाई नहीं आ रही है। परंतु अभी भी कुछ कट्टर पंथी हिंदी के विरोध का झंडा उठाकर अपना भविष्य तो कूपमंडूक जैसा बना ही रहे हैं अन्य निरीह और गंदी राजनीति से परे लोगों को गुमराह कर रहे हैं। अब तमिल नाडु के नेताओं को हिंदी विरोध का मुद्दा त्यागकर भ्रष्टाचार विरोध का झंडा उठाना चाहिए।
 कांग्रेस जैसी अखिल भारतीय और धर्म निरपेक्ष पार्टी से उम्मीद की जाती है कि तमिलनाडु के नेताओं से कहा जाए कि बदलते परिवेश में भाषा विरोध को मुद्दा बनाने के बजाय राज्य की जनता के रोज़गार को ध्यान में रखते हुए लोगों को बाहर निकलने का रास्ता बनाएं। इस बारे में मैंने कांग्रेस के महासचिव श्री राहुल गांधी को भी पत्र लिखा है कि आने वाले चुनाव के मद्दे नज़र तमिल नाडु सरकार आपकी सरकार के साथ गठबंधन करने जा रही है। आपसे करबद्ध निवेदन है कि तमिल नाडु सरकार से केवल इतना कहें कि आपके साथ तभी गठबंधन होगा जब आप हिंदी का विरोध छोड़ने की घोषणा करें। उत्तर भारत की सभी पार्टियाँ आपका अनुसरण करेंगी। दक्षिण में हिंदी विरोध खत्म होने पर पूरे देश में सही संदेश तो जाएगा ही विघटन की प्रक्रिया रुकेगी और संवाद निर्बाध रूप से हो सकेगा। आम जनता को हिंदी भाषा से कोई विरोध नहीं है। यह मेरा स्वयं का अनुभव है। मैंने दक्षिण के गांवों का भ्रमण किया है और लोगों से बात की है। क्षुद्र राजनीति करने वाले नेता ही ऐसा कार्य करते हैं जिससे विघटन को बढ़ावा मिलता है। यदि आप हिंदी को साथ लेकर चलने की अपील करेंगे तो तमिल के युवा और महत्वाकांक्षी नेता आपके साथ सहज रूप से जुड़ेंगे क्योंकि उन लोगों को अंग्रेज़ी सचमुच नहीं आती है। इसीलिए तो दक्षिण से नेता नहीं प्रोफ़ेशनल व्यवसायी राजनीति में आ रहे हैं।
 
 

रविवार, फ़रवरी 27, 2011

कंप्यूटर आधारित एकीकृत गहन विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम (GAHN27)

राजभाषा विकास परिषद (परिषद), नागपुर, ने विंडोज़, एम. एस. ऑफ़िस के साथ कंप्यूटर सॉफ़्टवेयरों की सहायता से हिंदी में पेपरलेस कार्यालय का प्रगत (ऐडवांस) प्रशिक्षण कार्यक्रम का 27वाँ कार्यक्रम 11-15 अप्रैल 2011 तक आयोजित है जिसका घोषणापत्र संस्थाओं को भेज दिया गया है। नामांकन की अंतिम तारीख 24/03/2011 है।

शुक्रवार, फ़रवरी 25, 2011

रेल बजट और हिंदी

ममता जी की तारीफ़ की जानी चाहिए। उन्होंने जनता के मंत्रालय में जनता की भाषा का ख्याल रखा। हिंदी में जवाब दिया।

गुरुवार, फ़रवरी 24, 2011

लालू मुलायम के आते ही मंत्रालयों में हिंदी क्यों आ जाती है?


क्या आपने इस बात पर ग़ौर किया है कि लालू मुलायम के आते ही मंत्रालयों में हिंदी क्यों आ जाती है? मतलब साफ है कि ब्यूरोक्रेसी की रीढ़ नहीं होती है। वे हवा का रुख देखकर रंग बदल लेते हैं। वास्तव में हिंदी न आने के लिए हमारे नेता ही कारण हैं। अतः अगली बार वोट देने से पहले अपने नेता से पूछें कि हिंदी के बारे में संसद में कोई प्रश्न क्यों नहीं पूछा? जब संसद में अंग्रेज़ी के विकास की बात की जाती है तो राजभाषा हिंदी के विकास की बात क्यों नहीं की जाती? राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने पहली कक्षा से अंग्रेज़ी पढ़ाए जाने की सिफ़ारिश की है और हिंदी का नाम तक नहीं लिया। केवल अंग्रेज़ी और क्षेत्रीय भाषा पढ़ाए जाने की वकालत की है। शायद त्रिभाषा सूत्र की तिलांजलि दे दी है।

बुधवार, फ़रवरी 23, 2011

स्वायत्त राष्ट्रीय राजभाषा कार्यान्वयन आयोग का गठन हो


देश में वर्ष 2005 में राष्ट्रीय ज्ञान आयोग का गठन किया गया तथा प्रारंभ में इसका इसका कार्यकाल तीन वर्ष रखा गया था। यह आयोग योजना आयोग के माध्यम से प्रधान मंत्री के सीधे प्रभार में रखा गया था। बाद में इसका कार्यकाल मार्च 2009 तक बढ़ा दिया गया था। इस आयोग के अध्यक्ष सैम पित्रोदा थे। इसके सदस्य थे, डॉ. अशोक गांगुली, रिज़र्व बैंक के बोर्ड में निदेशक और कई प्राइवेट कंपनियों के बोर्डों में सदस्य हैं, डॉ. जयति घोष, जवाहर लाल नेहरू विश्व विद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं, डॉ. दीपक नैयर, जवाहर लाल नेहरू विश्व विद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं , डॉ. पी. बलराम, भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलौर के निदेशक हैं, डॉ. नंदन निलेकनी, कंप्यूटर विज्ञानी हैं, डॉ. शुजाता रामदोई, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ंडामेंटल रिसर्च में गणित के प्रोऱेसर हैं, डॉ. अमिताभ मट्टू, जम्मू विश्व विद्यालय के उप कुलपति हैं। राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने अपनी अंतिम रिपोर्ट 2009 में प्रस्तुत कर दी है और उसके कार्यान्वयन का काम शुरू हो गया है।

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग का उद्देश्य ज्ञान के क्षेत्र में देश को 21 वीं शताब्दी में सबसे आगे ले जाने के लिए शिक्षा और अनुसंधान हेतु आधारभूत और मज़बूत ढांचा तैयार करना है। आयोग ने अपनी सिफ़रिश में कहा है कि देश में अंग्रेज़ी की पढ़ाई पहली कक्षा से शुरू की जाए और दो भाषाएं, अर्थात, अंग्रेज़ी तथा क्षेत्रीय भाषा पढ़ाई जाए। आयोग ने हिंदी की सिफ़ारिश नहीं की है और न ही त्रिभाषा सूत्र को लगू करने की बात की है। प्नधान मंत्री ने भी इसे स्वीकार कर ली है और राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की सिफ़रिशों को लागू कराने की प्रक्रिया शुरू करा दी है।  

हिंदी को देश की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया है और 26 जनवरी 1965 से अंग्रेज़ी के स्थान पर हिंदी को राजकाज की मुख्य भाषा बनाया जाना था। परंतु 1963 में जब देश में हिंदी के विरोध में आंदोलन उठा तो नेहरू जी ने आश्वासन दिया कि हिंदी 1965 से लागू नहीं की जाएगी। लेकिन हिंदी विरोधियों ने आश्वासन को कानून का रूप देने पर अड़ गए और संसद ने राजभाषा अधिनियम, 1963 बनाकर हिंदी के कार्यान्वयन का रास्ता रोक दिया परंतु सदन को विश्वास दिलाया कि हिंदी का कार्यान्वयन समयबद्ध तरीके से धीरे-धीरे किया जाएगा। इसके लिए दोनों सदनों में 18 जनवरी 1968 को संकल्प पारित किया गया था कि –

"जबकि संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी रहेगी और उसके अनुच्छेद 351 के अनुसार हिंदी भाषा की प्रसार वृद्धि करना और उसका विकास करना ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सब तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम हो सके, संघ का कर्तव्य है,  

"यह सभा संकल्प करती है कि हिंदी के प्रसार एवं विकास की गति बढ़ाने हेतु तथा संघ के विभिन्न राजकीय प्रयोजनों के लिए उत्तरोत्तर इसके प्रयोग हेतु भारत सरकार द्वारा एक अधिक गहन एवं व्यापक कार्यक्रम तैयार किया जाएगा और उसे कार्यान्वित किया जाएगा और किए जाने वाले उपायों एवं की जाने वाली प्रगति की विस्तृत वार्षिक मूल्यांकन रिपोर्ट संसद की दोनों सभाओं के पटल पर रखी जएगी और सब राज्य सरकारों को भेजी जाएगी।

"2.  जबकि संविधान की आठवीं अनुसूची में हिंदी के अतिरिक्त भारत की 14 मुख्य भाषाओं का उल्लेख किया गया है और देश की शैक्षणिक और सांस्कृतिक उन्नति के लिए यह आवश्यक है कि इन भाषाओं के पूर्ण विकास हेतु सामूहिक उपाय किए जाने चाहिए।

" यह सभा संकल्प करती है कि हिंदी के साथ-साथ इन सब भाषाओं के समन्वित विकास हेतु भारत द्वारा राज्य सरकारों के सहयोग से एक कार्यक्रम तैयार किया जाएगा और उसे कार्यान्वित किया जएगा ताकि वे शीघ्र समृद्ध हों और आधुनिक ज्ञान के संचार का प्रभावी माध्यम बनें।
" 3. जबकि एकता की भावना के संवर्धन तथा देश के विभिन्न भागों में जनता में संचार की सुविधा हेतु यह आवश्यक है कि भारत सरकार द्वारा राज्यों के परामर्श से तैयार किए गए 'त्रिभाषा सूत्र' को भी राज्यों में पूर्णतः कार्यान्वित करने के लिए प्रभावी किया जाना चाहिए।

" यह सभा संकल्प करती है कि हिंदी भाषी क्षेत्रों में, हिंदी तथा अंग्रेज़ी के अतिरिक्त एक आधुनिक भारतीय भाषा के, दक्षिण भारत की भाषाओं में से किसी एक को तरजीह देते हुए, और अहिंदी भाषी क्षेत्रों में प्रादेशिक भाषों और अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिंदी के अध्ययन के लिए उस सूत्र के अनुसार प्रबंध किया जाना चाहिए।

" 4. और जबकि यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि संघ की लोक सेवाओं के विषय में देश के विभिन्न भागों में लोगों के न्यायोचित दवों और हितों की पूरी रक्षा की जाए।

" यह सभा संकल्प करती है –

" (क) कि उन विशेष सेवाओं या पदों को छोड़कर जिनके लिए ऐसी किसी सेवा अथवा पद के कर्तव्यों के संतोषजनक निष्पादन हेतु केवल अंग्रेज़ी अथवा केवल हिंदी अथवा दोनों, जैसी कि स्थिति हो, का उच्च स्तर का ज्ञान आवश्यक समझा जाए, संघ सेवाओं अथवा पदों की भर्ती करने हेतु उम्मीदवारों के चयन के समय हिंदी अथवा अंग्रेज़ी में से किसी का ज्ञान अनिवार्यतः अपेक्षित होगा और,

" (ख) कि परीक्षाओं की भावी योजना, प्रक्रिया संबंधी एवं समय के विषय में संघ लोक सेवा आयोग के विचार जानने के पश्चात अखिल भारतीय एवं उच्चतर केंद्रीय सेवाओं संबंधी परीक्षाओं के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित सभी भाषाओं तथा अंग्रेज़ी को वैकल्पिक माध्यम के रूप में रखने की अनुमति होगी।"              

सन् 1968 से अब तक तो सरकार की सारी गतिविधियों और करतूतों से तो लगता है कि न सरकार को हिंदी की चिंता है और न ही गंभीरता। यदि सरकार सचमुच गंभीर होती और संसद में ली गई शपथ तथा पारित संकल्प के प्रति ईमानदार होती तो राजभाषा के बारे में भी सोचती और अपनी सारी नीतियों में हिंदी को लागू करने को प्राथमिकता देती। हिंदी का कार्यान्वयन शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर और सभी राज्यों में एकरूप ढंग से राजभाषा हिंदी की शिक्षा को प्रश्रय देती। इस बारे में तो त्रिभाषा सूत्र ही सबसे कारगर उपाय है। इसके अलावा हिंदी के  विकास के लिए गृह मंत्रालय में राजभाषा विभाग को दायित्व देने के बजाय स्वयंपूर्ण और स्थाई स्वायत्त राजभाषा कार्यान्वयन आयोग बनाया जाए जिसका अध्यक्ष ऐसा व्यक्ति हो जिसे हिंदी भाषा से लगाव हो।


मैं समझता हूं कि हिंदी के बजाय अंग्रेज़ी को प्रश्रय देकर और हिंदी की अवहेलना करके हमारे राष्ट्रीय नेता उस जनता की सेवा नहीं कर रहे हैं जिसने इन्हें चुनकर भेजा है और अपना नुमाइंदा समझती है।

रविवार, फ़रवरी 20, 2011

सहभागिता निवेश पत्र (Participatory Note)


यह भारतीय शेयर बाज़ार में निवेश करने के लिए एक प्रकार का लिखत (इन्स्ट्रुमेंट) है जिसका सहारा विदेशी निवेशक लेते हैं जोकि भारत में निवेश करने के लिए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के पास पंजीकृत नहीं होते हैं। इसे व्युत्पन्न लिखत कहा जाता है कि क्योंकि यह किसी न किसी लिखत पर आधारित होता है, जैसे, ईक्विटी शेयर। परंतु वे केवल किसी पंजीकृत निवेशक के माध्यम से निवेश कर सकते हैं। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड ने 1992 में, विदेशी निवेश संस्थाओं को भारतीय शेयर बाज़ार में निवेश करने के लिए पंजीकरण कराने की अनुमति दी थी। किसी निवेशक द्वारा 'सहभागिता निवेश पत्र'  में निवेश करने के लिए किसी पंजीकरण की पाबंदी नहीं है क्योंकि यह निवेश, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के पास पंजीकृत विदोशी संस्थागत निवेशक के माध्यम से ही किया जा सकता है। किसी अन्य निवेशक को निवेश करने की अनुमति नहीं है। 

            भारत में स्थित पंजीकृत दलाली फ़र्में भारतीय प्रतिभूतियाँ (सिक्यूरिटी) खरीद लेती हैं और बाद में उन प्रतिभूतियों के आधार पर विदेशी निवेशकों को 'सहभागिता निवेश पत्र'  जारी कर देती हैं और उन प्रतिभूतियों पर मिलने वाले लाभांश को विदेशियों को अंतरित कर देती हैं। इस सेवा के लिए वे निवेशकों से दलाली की रकम प्राप्त करती हैं। इन व्युत्पन्न लिखतों को भारत में नहीं खरीदा या बेचा जा सकता है बल्कि वे इनका उपयोग अपने देश में शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध शेयरों में निवेश करने के लिए कर सकते हैं। इसी लिए इसे ऑफ़शोर व्युत्पन्न लिखत भी कहा जाता है।

            इस  ऑफ़शोर व्युत्पन्न लिखत / व्युत्पन्न लिखत/ 'सहभागिता निवेश पत्र'  में निवेश करने वाले का नाम गुप्त रहता है। परंतु जिस निवेशक संस्था के माध्यम से निवेश किया जाता है उसके पास उसका अभिलेख (रिकार्ड) रहता है। चूँकि निवेशक का नाम गुप्त रहता है इसलिए उसके पास यह धन कहाँ से आया यह बताने से बचा जा सकता है। यह केवल एक कारण है। दूसरा, बड़ा कारण यह है कि अभिलेख रखने आदि के खर्च से बचने के भी इसका सहारा लिया जाता है।

यूनीकोड आधारित हिंदी में एकीकृत गहन विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम


राजभाषा विकास परिषद (परिषद), नागपुर, ने विंडोज़, एम. एस. ऑफ़िस के साथ कंप्यूटर सॉफ़्टवेयरों की सहायता से हिंदी में पेपरलेस कार्यालय का प्रगत (ऐडवांस) प्रशिक्षण कार्यक्रम का 26वाँ कार्यक्रम 14-18 फ़रवरी 2011 तक आयोजित किया जिसमें भारतीय रिज़र्व बैंक, भारतीय रिज़र्व बैंक नोट मुद्रण प्रेस, शालबनी, मध्य रेल नागपुर, बैंक ऑफ़ इंडिया, सिंडिकेट बैंकों के आठ अधिकारियों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया। कार्यक्रम के उपरांत सहभागियों ने अपनी प्रतिक्रियाओं में बताया कि अभी तक हमने इस प्रकार का कार्यक्रम न ही सुना था और न ही उसमें भाग लिया था। यह कार्यक्रम अपने किस्म का अनोखा और अलग प्रकार का है। इसमें आने के बाद हमारा आत्मविश्वास बहुत बढ़ा है। अब हम अपना काम कंप्यूटर पर बिना किसी की मदद, यूनीकोड में तो कर ही सकते हैं साथ ही हम इतने सक्षम हो गए हैं कि अपने सहयोगियों की भी मदद कर सकते हैं।
परिषद नवंबर 2007 से बैंकों/ पीएसयू/ सरकारी कार्यालयों में कार्यरत अधिकारियों/ राजभाषा अधिकारियों के लिए विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करती आ रही है जिसमें अब तक 39 विभिन्न संस्थाओं के अधिकारी भाग ले चुके हैं। अब तक कुल 29 कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं और उनमें से 26 एकीकृत गहन विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। अगला गहन कार्यक्रम अप्रैल माह में आयोजित है जिसका घोषणा पत्र संस्थाओं के मानव संसाधन विकास विभागों को भेज दिया गया है।
इस कार्यक्रम में हिंदी भाषा, देवनागरी की मानक वर्तनी, एम.एस. ऑफ़िस वर्ड, इक्सेल, पावर प्वाइंट, ऐक्सेस, वर्ड आर्ट, विभिन्न प्रकार की इमेज प्रॉसेसिंग(पीडीएफ, जेपीजी, जीआईएफ़, टीआईएफ़) के अलावा सीडी राइटिंग, स्कैनिंग, फ़ाइलों की ज़िपिंग अनज़िपिंग, पावर प्वाइंट द्वारा स्वयं प्रेज़ेंटेशन तैयार करना और उसका प्रस्तुतीकरण कराया गया।
उन्होंने यह सुझाव भी दिए कि नव नियुक्त राजभाषा अधिकारियों के लिए ऐसे एकीकृत गहन विकास कार्यक्रम की आवश्यकता है जिसमें राजभाषा अधिकारियों को, राजभाषा अधिकारियों के कार्य (ड्यूटी) व राजभाषा के कार्यान्वयन से जुड़े समस्त पहलुओं को शामिल करते हुए पूर्ण रूप से कंप्यूटरीकृत माहौल में काम करने का गहन प्रशिक्षण दिया जाए। इसके लिए एकीकृत गहन विकास कार्यक्रम (इंडक्शन) कार्यक्रम आयोजित करने की आवश्यकता है ताकि वे संस्था में अपना काम अच्छी तरह निभा सकें। परिषद द्वारा विकसित किए गए कीबोर्ड का प्रयोग किया गया। सहभागियों ने इसे ज़्यादा सरल और हिंदी की प्रकृति के अनुकूल बताया।
कार्यक्रम में सहभागी अधिकारियों का सामूहिक चित्र


क्या रुपए का नया प्रतीक क्षेत्रीयता का परिचायक है?