रविवार, फ़रवरी 26, 2012

सरकारी हिंदी का स्वरूप

पंद्रह फ़रवरी की हमारी पोस्ट “हिंदी भाषा को कार्यालयों में लागू कराने में सरकारों को कोई रुचि नहीं है” पर श्रीमती गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने 22 फ़रवरी 2012 को अपनी टिप्पणी लिखी कि “सरकार का हिंदी के प्रति क्या रवैया है इसका एक और उदाहरण मैंने आज ही अखबार में पढ़ा उसी की प्रतिक्रिया में मैंने भी आज ही कुछ लिखा है। वास्तव में यह विडम्बना है कि नीति वे बना रहे हैं जो उसे जानते नहीं या उसका दुरुपयोग करते हैं।” श्रीमती कुलश्रेष्ठ की पोस्ट साभार उद्धृत कर रहा हूँ अपने मित्रों से इस बारे में प्रतिक्रिया चाहता हूँ कि आखिर हिंदी भाषा पर ही शनि की कुदृष्टि क्यों है। कुछ ऐसे ही सुझाव सरकारी कार्यालयों के अध्यक्षों से भी हिंदी दिवस के अवसर पर या ऐसे ही किन्हीं अवसरों पर सुझाव प्राप्त होते रहते हैं कि शुद्ध हिंदी लिखने पर ज़ोर देने के बजाय सरल, सुबोध और आम हिंदी लिखने पर बल दिया जाए ताकि हिंदी का प्रचलन हो। क्या अंग्रेज़ी के बारे में ऐसी ही छूट मिलेगी?
“Wednesday, February 22, 2012
चिता या चीता
आज ही अखबार में पढ़ा कि परीक्षा परिणाम को अच्छा बना कर अपनी साख को बचाने के लिये विभाग के आला अफसरों ने एक नया किन्तु विचित्र सुझाव दिया है कि उत्तर-पुस्तिकाओं के परीक्षण में छोटी--मोटी भूलों(??) जैसे छात्र ने पवन की जगह पबन लिखा हो या छोटी बड़ी मात्राओं की गलती हो तो उसके अंक न काटे जाएं।
आहा, ऐसी उदारता पर कौन न मर जाए!! छात्र सूरदास को सुरदास या रमानाथ को रामनाथ लिखदे तो कोई गलती नही मानी जाएगी। फिर तो गजवदन गजबदन भी हो सकते हैं और कृष्ण, कृष्णा(द्रौपदी)(अंग्रेजी की कृपा से कृष्ण को कृष्णा बोला भी जारहा है)। लुट गया व लूट गया तथा पिट गया व पीट गया में कोई फर्क नही होगा। अब जरा समान लगने वाले वर्ण,अनुस्वर व मात्राओं के हेर-फेर वाले कुछ और शब्दों पर भी ध्यान दें---सुत-सूत, कल-कलि-कली, अंश-अंस, सुरभि-सुरभी, अशित-असित, चिता-चीता,कुच-कूच,सुधि--सुधी, शिरा-सिरा,चिर--चीर, कहा-कहाँ, लिखे-लिखें, गई--गईं, तन-तना-तान-ताना, तरनि-तरनी, मास--मांस, रवि-रबी, जित-जीत, शोक--शौक, पिसा-पीसा, आमरण--आभरण, पिला--पीला, सुना-सूना, गबन-गवन, अजित-अजीत, पुरुष-परुष, शन्तनु-शान्तनु, वसुदेव-वासुदेव आदि। विराम चिह्नों की तो बात पीछे आती है किन्तु वह क्या कम महत्त्वपूर्ण है?--रुको, मत जाओ। तथा रुको मत, जाओ। इसी तरह --वह गया।, वह गया!, तथा वह गया? में विराम चिह्न का ही चमत्कार है।
ये तो बहुत छोटे-मोटे उदाहरण हैं। अखबारों,टेलीविजन,व सस्ती पत्रिकाओं और जगह--जगह अशिक्षित पेंटरों द्वारा बनाए गए बोर्ड व पोस्टरों ने वैसे ही हिन्दी की हालत खराब कर रखी है। पाठ्य-पुस्तक निगम की पुस्तकों में भी हिन्दी के साथ कम छेडछाड नही की। ऊपर से इस तरह के प्रस्ताव भाषा पर क्या प्रभाव छोडने वाले हैं उसका कथित विद्वानों को अनुमान तक न होगा। प्रश्न यह है कि क्यों परीक्षा परिणाम ही शिक्षा का एकमात्र लक्ष्य रह गया है? क्या अध्ययन की उपेक्षा करके परीक्षा को ही लक्ष्य बनाना उचित है? बार-बार परीक्षा लेने से और किसी भी तरीके से परिणाम के आँकडे इकट्ठे करने से शिक्षा का स्तर क्या उठ पाएगा? ऐसे परीक्षा प्रमाण पत्र का क्या अर्थ व औचित्य है जिसमें छात्र शुद्ध पढना व लिखना तक न जान पाए। अर्थ की समझ तो बहुत बाद की बात है। भाषा की इस दशा पर विचार करने की अत्यन्त आवश्यकता है। गलत तरीके से गलत परिणाम देकर शिक्षा का ढिंढोरा पीटने से बेहतर है कि परीक्षा ली ही न जाए। परीक्षा हो तो सही हो वरना नहीं। Posted by गिरिजा कुलश्रेष्ठ at 11:53 AM”

2 टिप्‍पणियां:

  1. दलसिंगार जी प्रश्न कठिन या सरल का नही( भाषा का सरल होना उसके विकास में सहायक ही है )बल्कि शुद्ध अशुद्ध लेखन का और शब्दों के सही प्रयोग का है । मैंने उदाहरण-स्वरूप जितने भी शब्द लिये हैं वे अपने आप में शुद्ध ही हैं लेकिन जरा मात्रा या बिन्दी के इधर-उधर होने से पूरा अर्थ ही बदल जाता है । तो जरूरत है यही बात समझने की जो आज प्रायः नही समझी जाती । मेरी पोस्ट को यहाँ प्रस्तुत करने का धन्यवाद ।

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  2. नमस्ते सर, क्या यूनीकोड टाईपिंग में काम मिल सकता है? ई मेल MK39431@GMAIL.COM

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