शनिवार, जून 04, 2011

कार्यालयों की कार्यप्रणाली का बदलता स्वरूप और हिंदी कार्यशालाओं की भूमिका

विचारणीय मुद्दे
अतः हमें दो बातों पर विचार करना है - एक, `कार्यालयों की कार्यप्रणाली का बदलता स्वरूप', दो, `हिंदी कार्यशालाओं की भूमिका'। पहले हम पहली बात पर विचार कर लें। कार्यालयों की कार्यप्रणाली के बदलते स्वरूप से हमारा क्या आशय है? क्या कार्यालयों की कार्यप्रणाली बदली है? बैंकों की कार्यप्रणली तो बदली है। इनकी कार्यप्रणाली में कोई खास परिवर्तन हुआ है। वैश्वीकरण और उदारीकरण के कारण इनका क्षेत्र और अधिक व्यापक हो गया है। तेज़ी से विकास करती सूचना प्रौद्योगिकी के कारण संचार व संप्रेषण के माध्यमों में ज़रूर बदलाव आ गया है। कार्यालयों की कार्यप्रणाली कुछ हद तक बदली है। अतः इनकी कार्यप्रणाली के बदलते स्वरूप से संभवतः हमारा आशय सूचना प्रौद्योगिकी के अत्यधिक प्रयोग की आवश्यकता के कारण तेज़ी से परिवर्तनशील माहौल से है। इसलिए इलेक्ट्रॉनिक युग और संचार के नए माध्यमों के माहौल में कार्यशालाओं की भूमिका की चर्चा करना समीचीन लगता है। लेकिन इससे पहले पृष्ठभूमि पर विचार करना समीचीन रहेगा।
कार्यशालाओं की शुरुआत
कार्यालयों में राजभाषा कक्षों की स्थापना राजभाषा नियम...1976 के अस्तित्व में आने के बाद हुई। हिंदी में काम करने वाले अधिकारियों/कर्मचारियों की सहायता के लिए कार्यशालाएं आयोजित करने का निदेश है। उसके बाद तीसरे खंड में भी इसका ज़िक्र आया और समिति ने कहा कि कारअयशालाओं का अच्छा प्रभाव हुआ है इसलिए नियमित आधार पर इनका आयोजन किया जाता रहे और पाँच वर्ष तक कार्यशालाओं का आयोजन इसी प्रकार से जारी रखा जाए ताकि कार्यालय के हर व्यक्ति को साल में कम से कम एक बार भाग लेने का अवसर मिल सके। संसदीय समिति ने अपने पहले, तीसरे और चौथे प्रतिवेदनों में कार्यशालाएँ आयोजित करने का सुझाव दिया था परंतु विषयों के बारे में कोई निदेश नहीं था। पहले प्रतिवेदन में केवल शब्दावली का अभ्यास कराने का ज़िक्र था।
वर्तमान कार्यशाला का स्वरूप
`कार्यशाला' शब्द अंग्रेजी के शब्द `वर्कशॉप का पर्याय है। इसका मतलब है, `काम करके सीखना', अर्थात्, अभ्यास उन्मुख प्रशिक्षण। इसका अर्थ है कि व्याख्यान आधारित प्रशिक्षण के बजाय व्यावहारिक कार्य की परिस्थिति में कार्य आधारित प्रशिक्षण दिया जाए। हमारी कार्यशाला में दोनों ही विधियों का अनुसरण किया जाता है, अर्थात्, व्याख्यान और अभ्यास दोनों का शुमार है। कार्यशाला के विषय और प्रशिक्षण के तरीके में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कुछ परिवर्तन के साथ कार्यशालाएँ आज भी उसी प्रकार आयोजित की जा रही हैं।
वर्तमान कार्यशाला का स्वरूप
`कार्यशाला' शब्द अंग्रेजी के शब्द `वर्कशॉप का पर्याय है। इसका मतलब है, `काम करके सीखना', अर्थात्, अभ्यास उन्मुख प्रशिक्षण। इसका अर्थ है कि व्याख्यान आधारित प्रशिक्षण के बजाय व्यावहारिक कार्य की परिस्थिति में कार्यालय के कार्य आधारित प्रशिक्षण दिया जाए।
विभिन्न केन्द्रीय कार्यालयों, उपक्रमों, सरकारी बैंकों में राजभाषा कार्यान्वयन की एक चुनौती हिंदी में कामकाज करने का प्रशिक्षण प्रदान करना है। सामान्यतया अधिकांश कर्मचारी अपने टेबल का कार्य अंग्रेजी में ही करना पसंद करते हैं। अंग्रेज़ी में कार्य करने के दो प्रमुख कारण है – पहला कारण अंग्रेज़ी भाषा में कार्य करने की आदत है तथा दूसरा कारण अंग्रेज़ी भाषा को एक बेहतर भाषा मानने की मानसिकता है। हिंदी कार्यशाला प्रमुखतया इन्हीं दो पक्षों पर केंद्रित रहती है। यह प्रशिक्षण न्यूनतम एक दिवस से लेकर अधिकतम सात दिनों का रहता है। यद्यपि वर्तमान में सामान्यतया यह 2 अथवा 3 दिवसीय होती है। विशेष परिस्थितियों में एक दिवसीय कार्यशालाएँ आयोजित की जाती है जो महज खाना पूर्ति साबित होती हैं। इससे आँकड़े तो तैयार हो जाते हैं परंतु हिंदी का भला नहीं होता है।
हिंदी कार्यशाला अधिकारियों तथा लिपिकों के लिए अलग-अलग आयोजित की जाती है। अलग-अलग आयोजन का उद्देश्य इन प्रवर्गों के अलग-अलग कार्यप्रणाली के कारण है। कहीं-कहीं अधिकारियों तथा लिपिकों की संयुक्त कार्यशालाएँ आयोजित की जाती हैं जिसे व्यावहारिक नहीं कहा जा सकता है। इस कार्यशाला का प्रथम चरण नामांकन का होता है जिसमें हिंदी के कार्यसाधक ज्ञान कर्मचारियों को ही नामित किया जाता है। मैट्रिक स्तर तक एक विषय के रूप में हिंदी का अध्ययन अथवा प्राज्ञ परीक्षा उत्तीर्ण या लिखित घोषणा को हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान माना जाता है। इस नामांकन में यह भी ध्यान रखना होता है कि नामित कर्मचारी को पिछले 5 वर्षों तक हिंदी कार्य़शाला में प्रशिक्षण हेतु नामित नहीं किया गया हो। प्रत्येक वर्ष हिंदी कार्यशालाओं के लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं तथा तदनुसार कार्यशालाएँ आयोजित की जाती हैं अतएव यह प्रतिवर्ष जारी रहने वाला कार्यक्रम है।
कार्यशाला के विषय व अवधि
कार्यशाला में भाग लेने वाले अधिकारियों/कर्मचारियों की यही प्रवृत्ति होती है कि कुछ लिखना न पड़े जबकि कार्यशाला का उद्देश्य ही अभ्यास है। अतः कार्यशाला में सत्रों के संचालन के लिए दोनों ही विधियों का अनुसरण किया जाता है, अर्थात्, व्याख्यान और अभ्यास दोनों का शुमार है।
कार्यशाला के विषय और प्रशिक्षण के तरीके में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कुछ परिवर्तन के साथ कार्यशालाएँ आज भी उसी प्रकार आयोजित की जा रही हैं जबकि विषयों का चयन कार्यशाला में नामित कर्मचारियों के कार्यों के अनुरूप होना चाहिए। सभी कार्यालयों के केंद्रीय कार्यालयों से कार्यशाला का पहला सत्र राजभाषा नीति का होना चाहिए । यह बहुत महत्वपूर्ण सत्र है। कार्यालयों में, राजभाषा के बारे में बहुत भ्रामक बातें प्रचलन में हैं। राजभाषा नीति को देश हित में व्यापक रूप से समझना तथा भाषा के बारे में नकारात्मक मानसिकता को दूर करके यसकारात्मक महौल तैयार करने की ज़िम्मेदारी इसी सत्र की है। शब्दावली निर्माण की आवश्यकता, हिंदी पत्राचार में इनके प्रयोग, प्रोत्साहन योजनाएँ, आंतरिक कामकाज में हिंदी का प्रयोग, हिंदी पारिभाषिकों के निर्माण की विधि, उच्चारण के नियम, मानक वर्तनी, प्रौद्योगिकी में हिंदी आदि विषयों का समावेश किया जाना चाहिए। इस प्रकार कार्यशाला में शामिल कर्मचारियों को हिंदी में चर्चा करने, हिंदी में लिखने तथा कंप्यूटर पर यूनीकोड आधारित हिंदी में कार्य करने आदि का पूर्ण और उपयोगी अवसर मिलता है।
कार्यशाला के प्रशिक्षकों की भूमिका
हिंदी कार्यशाला के प्रशिक्षकों पर कार्यशाला का पूरा दारोमदार रहता है। हिंदी कार्यशालाओं के प्रशिक्षक राजभाषा अधिकारी या हिंदी अधिकारी होते हैं। राजभाषा अधिकारी के ज्ञान, उसका अभिव्यक्ति कौशल, विषय का गंभीरता से विश्लेषण, प्रश्नों के सार्थक समाधान करने की क्षमता से ही कार्यशाला की सफलता जुड़ी होती है। कार्यशाला में जागरूक, प्रतिभाशाली और कार्यालयी कामकाज में कुशल कर्मचारी होते हैं ऐसी स्थिति में यदि योग्य और प्रभावशाली संप्रेषण क्षमता वाले प्रशिक्षकों का चुनाव न केवल कार्यशाला को सफल बनाता है बल्कि इससे कार्यशाला का गौरव भी बनता है।
कार्यशाला की भूमिका
जहाँ तक कार्यशाला की भूमिका का प्रश्न है तो इस बारे में कोई दो राय नहीं है कि कार्यशालाएँ हिंदी में काम करने का माहौल तैयार करने और स्टाफ में हिंदी के बारे में जागरूकता फैलाने में अहम भूमिका निभा रही हैं। कार्यशालाओं के उपरांत सहभागियों से प्राप्त प्रतिक्रियाओं के आधार पर निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि कार्यशालाएँ उपयोगी हैं और इनकी भूमिका निर्विवाद है।
कार्यशलाएँ कब तक चलाई जाती रहेंगी
अब प्रश्न यह उठता है कि कार्याशालाओं की ज़रूरत है और 1976 से ही कार्यशलाएँ चलाई जा रही हैं तो अभी तक हमारे सभी स्टाफ प्रशिक्षित क्यों नहीं हो पाए? इतने वर्षों के बावज़ूद हम सभी अधिकारियों/कर्मचारियों को प्रशिक्षित नहीं कर पाए। जब हम इस पर गौर करते हैं तो कुछ अहम बातें सामने आती हैं। हम उन्हें समस्या के रूप में पहचानें और उनका समाधान करें ताकि इस उपयोगी मंच का व्यापक उपयोग हो सके।
कार्यशाला आयोजन की समस्याएँ
कार्यशालाएँ आयोजित करने में दो प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है - प्रशासनिक और अकादमिक ।
प्रशासनिक समस्याएँ
निदेशानुसार कार्यशालाओं में उन्हें प्रशिक्षित किया जाना है जिन्हें हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान हो। भारत सरकार ने कार्यसाधक ज्ञान का निर्धारण करने के लिए नया रोस्टर बनाने का निदेश दिया है। उसके अनुसार रोस्टर बनाने के बाद अब कार्यशाला में प्रशिक्षित किए जाने वाले स्टाफ़ ही नहीं मिलेंगे क्योंकि राजभाषा कक्षों के पास रोस्टर ही नहीं है।
दूसरी प्रशासनिक समस्या यह है कि कार्यशालाएँ आयोजित करने के लिए सभी विभागों और कार्यालयों में स्थान नहीं नहीं मिलता, कार्यशालाओं में भाग लेने के लिए स्टाफ़ भी आना नहीं चाहते, कार्य की आवश्यकता के नाम पर विभाग स्टाफ सदस्यों को प्रतिनियुक्त नहीं करते हैं।
अकादमिक समस्या
जब यह सिद्ध हो गया है कि हिंदी के प्रयोग में वृद्धि के लिए कार्यशालाओं की भूमिका निर्विवाद है तो दूसरा प्रश्न उठता है कि क्या वर्तमान परिस्थितियों में, उसमें पढ़ाए जाने वाले विषयों की प्रासंगिकता है और प्रशिक्षण की विधि में कुछ परिवर्तन की आवश्यकता है? अतः अब कार्यशाला आयोजित करने के स्वरूप के बारे में चर्चा करना और उसे बदलने के लिए प्रयास करना आवश्यक है।
जब यह सिद्ध हो गया है कि हिंदी के प्रयोग में वृद्धि के लिए कार्यशालाओं की भूमिका निर्विवाद है तो दूसरा प्रश्न उठता है कि क्या वर्तमान परिस्थितियों में, उसमें पढ़ाए जाने वाले विषयों की प्रासंगिकता है और प्रशिक्षण की विधि में कुछ परिवर्तन की आवश्यकता है? अतः अब कार्यशाला आयोजित करने के स्वरूप के बारे में चर्चा करना और उसे बदलने के लिए प्रयास करना आवश्यक है।
नवोन्मेषी तरीके की शुरुआत - दोनों समस्यओं का समाधान
मेरे विचार में इन दोनों समस्याओं का समाधान नवोन्मेषी मॉडल अपनाकर किया जा सकता है। कार्यशालाओं के आयोजन में नवोन्मेषी मॉडल लाना अनिवार्य हो गया है क्योंकि हमारे कार्य करने का माध्यम सूचना प्रौद्यागिकी और कंप्यूटर हो गया है। हमारे सभी काम अब कंप्यूटर आधारित ही होंगे। हम पूर्ण कंप्यूटरीकरण और ऑपरेशन क्रिटिकल प्रणाली की ओर बढ़ रहे हैं। अतः सूचना प्रौद्योगिकी के आधुनिक युग में पुरातन पद्धति तथा पाठ्यक्रम एकदम कालबाह्य (Obsolete) हो गए हैं। कार्यशालाएँ इंटरैक्टिव और कंप्यूटर आधारित बनाई जा सकती हैं।
यदि कार्यालयों में इन्फ़्रास्ट्रक्चर की व्यवस्था करना संभव न हो तो स्थानीय आधार पर किसी हिंदी सेवी संस्था की मदद से इस काम को पूरा किया जा सकता है। गैर सरकारी हिंदी सेवी संस्थाएं कम खर्च में, कार्यालयों की आवश्यकता के अनुसार स्ट्रक्चर्ड प्रशिक्षण मॉड्यूल तैयार करके कम से कम तीन दिन की कार्यशाला का आयोजन कर सकती हैं। अतः कार्यालयों के स्तर पर इस प्रकार की जा सकती है। हर विभाग तथा कार्यालय स्थनीय नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति (नराकास) के माध्यम से व्यवस्था कर सकते हैं। इस प्रकार एकरूप, मानक और वांछित कार्यक्रम को लागू किया जा सकेगा तथा नराकास के माध्यम से अनुवर्तन करना भी संभव होगा। इस प्रकार हर कार्यालय द्वारा कार्यों की पुनरावृत्ति और क्लास रूम की आवश्यकता से बचा जा सकता है। हर विभाग के कार्यालय में अलग-अलग कार्यशालाएं आयोजित करना ज़रूरी नहीं होगा।
राजभाषा कार्यान्वयन समिति (नराकास) की वेबसाइट
हम सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से, नराकास की वेबसाइट के माध्यम से एक-एक विभाग के लिए, विभाग स्पेस्फिक कार्यशालाएं आयोजित कर सकते हैं। एक घंटा रोज, दस दिन तक ऑनलाइन अभ्यास हो और केंद्रीकृत ढंग से हिंदी में कंप्यूटर पर टाइपिंग करना, पत्रलेखन के टेंप्लेट (शैली) के प्रयोग से पत्र तैयार कराना तथा विभागीय टिप्पणियाँ लिखाना, कंप्यूटर द्वारा वर्तनी संशोधन करना, अंग्रेजी टेक्स्ट का हिंदी में शब्दानुवाद करके वाक्य रचना सिखाया जाए तो ज़्यादा उपयोगी होगा और छह माह के भीतर सभी विभागों, क्षेत्रीय कार्यलयों के सभी अधिकारियों / कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया जा सकता है। प्रशिक्षण के लिए अभ्यास पुस्तिका भी दी जा सकती है जिसे प्रशिक्षणोपरांत उपयोग में लाया जा सकता है। कार्यशालाओं के बाद हमारे पास प्रशिक्षित स्टाफ सदस्यों का डाटाबेस भी तैयार हो जाएगा जिसके बाद अनुवर्तन करना तथा हिंदी पत्राचार में वृद्धि सुनिश्चित करना संभव हो जाएगा।
2. सभी प्रकार की कार्यशालाओं को समन्वित करके एक ही पाठ्यक्रम बनाया जाए।
3. विभाग स्पेसिफिक क कार्यशलाएँ आयोजित की जाएँ।
4. प्रशिक्षणोपरांत अनुवर्तन ज़रूरी है। प्रशिक्षण से लौटने के बाद अभ्यास न करने से प्रशिक्षण व्यर्थ हो जाता है।
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4 टिप्‍पणियां:

  1. यूनिक कार्यक्रम बनाने से ही फायदा होगा।

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  2. नवोन्मेषी कार्यों से कार्यशालाओं को प्रभावशाली बनाया जा सकता है। कार्यशालओं की जरूरत पर एक अच्छा आलेख !

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  3. नि:संदेह एक अच्‍छी सोंच है ।

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