सोमवार, मई 02, 2011

वाक्य संरचना के संदर्भ में काल और वृत्ति विचार

कार्य के घटित होने का समय प्रदर्शित करने के रूप को "काल" कहते हैं। "काल" का सामान्य अर्थ "समय" है। व्याकरण में "काल" क्रिया के उस रूपांतर या व्याकरणिक रूपांतर को कहते हैं जिससे क्रिया के घटित होने के समय का पता चलता है। कामता प्रसाद गुरु के अनुसार (हिंदी व्याकरण, 1946:221) "क्रिया के उस रूपांतरण को काल कहते हैं जिससे क्रिया के व्यापार का समय तथा उसकी पूर्ण अथवा अपूर्ण अवस्था का बोध होता है। डॉक्टर सूरजभान सिंह का विचार (हिंदी का वाक्यात्मक व्याकरण,  1985:349) है कि "काल (टेंस) और समय (टाइम) के बीच अंतर समझना होगा। "काल" व्याकरणिक कोटि है जिसकी सत्ता व्याकरण से बाहर नहीं है। "समय" लौकिक कोटि है जिसका संबंध जगत से है। समय अनादि और अनंत है जिसका खंड नहीं हो सकता है। तथापि वक्ता या लेखक की दृष्टि से "समय" के तीन भाग कल्पित किए जा सकते हैं जिसमें वक्ता या लेखक बोलता हो या लिखता हो उसे "वर्तमान काल" उसके पहले का समय "भूतकाल" और बाद का समय भविष्य कहलाता है। इन तीनों कालों का बोध क्रिया के रूप से होता है। इसलिए क्रिया के रूप भी काल कहलाते हैं, जैसे, "वह जा रहा है" से यह पता चल पाता है कि क्रिया वर्तमान काल में घटित हो रही है। "वह जाएगा" से क्रिया के भविष्य काल में घटित होने का पता चल रहा है और "वह गया" से क्रिया के वर्तमान से पूर्व घटित हो चुकने की सूचना मिलती है। "काल की इन अवस्थाओं को क्रमशः वर्तमान काल, भूत काल और भविष्य काल कहा जाता है।

वाक्य रचना के दृष्टिकोण से काल (वर्तमान काल, भूत काल और भविष्य काल) के और विभाजन संभव हैं। परंतु इन वाक्यों पर ध्यान दें –

 

अगर वह आता तो मैं उसके साथ ज़रूर जाता (शर्त)।

अगर आपने पहले कहा होता तो काम ज़रूर हो जाता (शर्त)।

काश! वे भी इस वक्त यहाँ होते (इच्छा)।

काश! मैं भी आपके साथ गया होता (इच्छा)।

मैं चाहता हूं कि आप भी मेरे साथ चलें (इच्छा)।

शायद, वह पास हो जाए (संभावना)।

भगवान आपको सफलता दे (कामना)।

कल अनुपस्थित न रहें (अप्रत्यक्ष आदेश)।

उससे कहिए जल्दी काम समाप्त करे (अप्रत्यक्ष आदेश)।

मैं कक्षा में आऊँ (अनुज्ञा याचना)।

शायद, वह यहीं रहता हो (नित्य संभावना)।

संभव है वह भी आ रहा हो (सातत्य संभावना)।

हो सकता है आपने भी खबर सुनी हो (पूर्ण संभावना)।

अगर बत्ती जल रही हो तो बंद कर देना (शर्त सातत्य)।

अगर का काम हो चुका हो तो बता देना (पूर्ण शर्त)।

मुझे ऐसा सहायक चाहिए जो काम से घबड़ाता न हो (शर्त नित्य)।

उसने ऐसा हड़कंप मचाया जैसे भूचाल आ गया हो (पूर्ण कल्पना)।

वह ऐसे बात करती है जैसे/मानो प्रभारी वही हो (कल्पना सातत्य)।

 

क्या इन वाक्यों से काल विभाजनों का पता नहीं चलता है। अतः भाषा में केवल "काल" के अनुसार वाक्य विन्यास या वाक्य रचना की शिक्षा दी जाती है तो मातृ भाषा से इतर भाषी व्यक्ति को भाषा सीखने में सफलता नहीं मिलेगी। इसी प्रकार हिंदी भाषा में भी केवल तीन काल बता देने से ही भाषा नहीं सिखाई जा सकती है बल्कि इसके लिए "वृत्ति" और "पक्ष" की भी शिक्षा दी जानी चाहिए। हिंदी भाषा की शिक्षा में आधुनिक शोध एवं प्रवृत्तियों को शामिल किया जाना चाहिए। इन वाक्यों को वृत्ति और पक्ष के अनुसार पढ़ाया जाना चाहिए। इन वाक्यों में प्रयुक्त क्रिया रूपों से क्रिया की प्रकृति का पता चलता है। क्रिया के जिस रूप से उसकी प्रकृति का पता चलता है उसे "वृत्ति" कहा जाता है। परंपरागत वैयाकरण "वृत्ति" को "अर्थ"  भी कहते थे जिससे किसी कार्य व्यापार या अवस्था के घटित या विद्यमान होने का बोध होता है। जिन वाक्यों से आज्ञा, इच्छा, संभावना आदि का बोध होता हो उन्हें "वृत्ति" या "प्रकार" कहा जाता है। इन्हें आज्ञार्थक वृत्ति (इंपरेटिव मूड), संकेतार्थक वृत्ति (इंडिकेटिव मूड) और संभावनार्थक वृत्ति ("सबजंक्टिव मूड) कहते हैं।  

-           डॉ. दलसिंगार यादव
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6 टिप्‍पणियां:

  1. यह पाठ भी मुझे कुछ समझ में आ रहा है उदहारण के वाक्य से समझाना लाभप्रद है आभार

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  2. आप के ब्लॉग का जीकर एक ब्लोगेर बंधू से कर रहा था ...तो कुछ बाते सामने आयीं ..
    उम्मीद है आप अन्यथा नहीं लेंगे...
    सच बताऊँ तो थोडा क्लिष्ट लगता है आप का लेख..इसलिए शयद बहुतों के समझ से बाहर होता है..
    मगर ये कोई साहित्य तो है नहीं की चटकारे ले कर पढ़ सके .ये तो ब्याकरण सम्मत हिंदी का सुध ज्ञान है तो में समझ सकता हूँ की व्यक्ति को केन्द्रित हो कर पढना पड़ता हैं..
    में शयद आप से ज्ञान में कम ही हूँ मगर एक सलाह है की अगर राजभाषा के कुछ सरल पहलुओं पर भी प्रकाश डालते रहे बिच बिच के लेखों में तो शयद सामान्य जनमानस जो हिंदी से विरक्त हो रहा है उसे जोड़ने में सफलता प्राप्त हो..





    आशुतोष की कलम से....: मैकाले की प्रासंगिकता और भारत की वर्तमान शिक्षा एवं समाज व्यवस्था में मैकाले प्रभाव :

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  3. आशुतोष जी!
    इधर चार पाँच पोस्टें व्याकरण से संबंधित हैं। इनमें पारिभाषिकों का उपयोग हुआ है। मैं तो शुद्ध और मानक हिंदी लिखता हूं। इससे पहले की पोस्टें तो सामान्य विषयों पर थीं और कोशिश करता हूं उनमें क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग न हो। लेकिन कुछ नया नहीं होगा तो कोई क्यों पढ़ेगा? मेरे ब्लॉग का उद्देश्य राजभाषा की समस्याओं पर चर्चा करना है। फिर भी कोशिश करूंगा कि सरल भाषा का प्रयोग करूं। प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद।

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  4. हम जैसे सामान्य हिंदी जानने वालों के लिए समझाना थोडा मुश्किल होगा ...मगर समझना अच्छा लगा ! आपका कार्य सम्मान योग्य है ! हार्दिक आभार !!

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  5. सतीश जी! आप कवि हैं और आपनी भावना के अनुसार सामान्य शब्दों का चुनाव कर सकते हैं। इधर जिन विषयों पर पोस्टें आई हैं वे सभी हिंदी से संबंधित व्याकरणिक विषय हैं या हिंदी भाषा के गंभीर विषय जो शोध परक हैं। अतः इन विषयों को एक बार पढ़कर भूल जाने के लिए नहीं लिखा गया है बल्कि इन पर चिंतन और मनन करने के लिए लिखा गया है। मेरा विचार है कि हिंदी पढ़ने की आदत छूट गई है। भाषा का स्तर गिर रहा है। यह हिंदी के बारे में ही नहीं बल्कि अन्य भाषाओं के बारे में भी है। मैं महाराष्ट्र में हूं तो जानता हूं मराठी के बारे में मराठी भाषियों की भी यही चिंता है। अंग्रेज़ी के बारे में तो ब्रिटेन की महारानी ने स्वयं चिंता जताई है और इसका स्तर सुधारने का आह्वान किया है। मैं भी हिंदी सेवियों और प्रेमियों का आह्वान करता हूं। अब मेरा कोई ऐसा स्टेटस तो नहीं है कि किसी पर कोई प्रभाव पड़े। इससे कोई प्रेरित हो जाता है तो मैं इसे हिंदी सेवा समझूंगा।
    आपको शायद याद हो कि मैंने राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के बारे में चर्चा की थी। आयोग को अंग्रेज़ी के गिरते स्तर की चिंता है इसलिए पहली कक्षा से अंग्रेज़ी की पढ़ाई कराने की योजना बनाई गई है और उस पर अमल भी जारी हो गई है। किसी हिंदी प्रेमी या हिंदी भाषी ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की। क्या यह गंभीरता से चिंतनीय विषय नहीं है?

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  6. भाई जी !

    कल सी एम् प्रसाद जी के ब्लॉग "कलम" पर उनकी एक चिंता के जवाब में निम्न प्रतिक्रिया थी मेरा ! आपके समक्ष रख रहा हूँ !

    @ "इसे संयोग कहें या दुर्भाग्य कि आज तक राष्ट्रभाषा हिंदी का कोई भी साहित्यकार इस अकादमी का अध्यक्ष या उपाध्यक्ष नहीं बना।"

    मुझे लगता है साहित्य अकादमी में अब तक चुने जाते रहे, हिंदी भाषी मेम्बरों की उदासीनता अधिक जिम्मेवारहै !

    देश में हिंदी भाषी राज्यों से चुनकर जो एक्ज़िकयूतिव सदस्य चुनकर आते हैं उन्हें शायद ही अपने दायित्व का ध्यान रहता होगा इसके विपरीत देश के अन्य भागों ( खास तौर पर दक्षिण एवं उत्तर पूर्व )से आये लोग अधिक सक्रिय हैं अपने अंचल की संस्कृति सुरक्षा को लेकर ! नतीजा यही है जिसके लिए आप दुखित हैं !

    मैं आपकी चिंता हेतु, आपका अभिनन्दन करता हूँ !

    सादर
    शुभकामनायें !

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