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मंगलवार, सितंबर 13, 2011

दुनिया से कह दो कि गांधी अंग्रेज़ी नहीं जानता

पंद्रह अगस्त 1947 को गांधी जी ने बी.बी.सी. लंदन को संदेश दिया था कि दुनिया से कह दो कि गांधी अंग्रेज़ी नहीं जानता। चंदन कुमार मिश्र के ब्लॉग "भारत के भावी प्रधान मंत्री की जबानी" पर यह संदेश देखने को मिला।
संभवतः इस संदेश का प्रचार नहीं हुआ और न ही इसकी व्याख्या की गई। क्या यह जानबूझकर नहीं किया गया? संभवतः हाँ। अतः "हिंदी दिवस, 2011" के अवसर पर इस पर विचार किया जाना और अमल किया जाना चाहिए। वैसे मैं इस "चाहिए" शब्द का प्रयोग करने के बजाय "मैं कर रहा हूँ", "मैं करता हूँ" जैसी अभिव्यक्तियों में विश्वास रखता हूँ और अमल करने की ईमानदार कोशिस करता हूँ। "कोशिश करता हूँ" इसलिए कि कोशिस ही तो कामयाबी की पहली सीढ़ी है।
गांधी जी बैरिस्टर थे। उन दिनों बैरिस्टरी की पढ़ाई इंग्लैंड में होती थी। पढ़ाई का माध्यम स्वाभाविक है कि अंग्रेज़ी रहा होगा। उन्होंने दक्षिण अफ़्रीका में वकालत की थी। वहाँ भी अंग्रेज़ी माध्यम से ही बहस की होगी। फिर गांधी ने ऐसा क्यों संदेश दिया कि दुनिया से कह दो कि "गांधी अंग्रेज़ी नहीं जानता" जबकि आजकल लोग बड़े फ़ख़्र से कह देते हैं कि मुझे हिंदी नहीं आती। अंग्रेज़ी तो आती है। हिंदी तो बड़ी कठिन है। क्या हम गांधी जी के संदेश को समझ पाए?
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