गुरुवार, दिसंबर 30, 2010

इसका हिंदी से संबंध नहीं है परंतु सामज से है और हिंदी समाज की वाहिका-लायबिलिटी अर्थात् ज़िम्मेदारी


सुप्रीम कोर्ट की महिला जज ने अपनी ज़िम्मेदारी को अंग्रेज़ी में लायबिलिटी क्या कह दिया कि बवाल मच गया। अंग्रेज़ी के दुष्प्रभाव का एक और उदाहरण। क्या सुप्रीम कोर्ट की महिला जज को समाज की सच्चाई व्यक्त करना ग़लत है। कानून प्रशासन ही ऐसा व्यवसाय है जिसमें समाज के हर प्रकार के व्यक्तियों से साबका पड़ता है जिसकी वजह से कानून के व्यवसाय से जुड़े वकील और जज को समाज की ज़्यादा समझ होती है। जज को मालूम है कि अपनी किसी भी लड़की की शादी में 20-25 लाख से कम नहीं खर्च करना होगा। अतः उस खर्चे का प्रावधान करना होगा। प्रावधान करना है तो लायबिलिटी ही लिखना होगा। यही किया है महिला जज ने और समाज को आईना दिखा दिया है। अपना असली चेहरा देखकर समाज तिलमिला गया है। दहेज़ और मान प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए धन तो खर्च करना ही होगा वरना जज की क्या प्रतिष्ठा रहेगी और अच्छा रिश्ता कैसे मिलेगा। पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों की स्थिति  तो यही दर्शाता है कि लड़की दायित्व ही है, ताउम्र।

बुधवार, दिसंबर 29, 2010

'विश्व हिंदी दिवस' मनाने की प्रथा की शुरुआत


हर वर्ष कार्यालयों में हिंदी दिवस मनाया जाता है। यह सिलसिला 11 नवंबर 1953 में नागपुर में किए गए निर्णय के अनुसरण में 14 सितंबर 1954 से शुरू हुआ है और अनंत काल तक चलता रहेगा क्योंकि संविधान ने हिंदी को अंग्रेज़ी का स्थान लेने पर रोक लगा दी है और किसी भी एक राज्य को वीटो पावर दे दी है जब तक वह नहीं चाहेगा हिंदी अंग्रेज़ी का स्थान नहीं ले पाएगी। लेकिन हिंदी सेवी तो अपने कार्य में निरंतर लगे हुए हैं। इसी प्रकार नागपुर में ही 14 जनवरी 1975 को संकल्प पारित हुआ कि हर वर्ष 10 जनवरी को अंतरराष्ट्रीय हिंदी दिवस मनाया जाए। तब से हर साल विदेशों में, अपने दूतावासों में तथा अन्यत्र भी 'विश्व हिंदी दिवस'  मनाया जाता है। 37 देशों में हिंदी का प्रचलन हो चुका है और 110 विश्व विद्यालयों में हिंदी भाषा की शिक्षा दी जा रही है। परंतु हमारे देश के अनेक कार्यालयों में 'विश्व हिंदी दिवस' मनाने की प्रथा की शुरुआत अभी नहीं हुई है। इस पोस्ट द्वारा मैं सभी ब्लॉगर बंधुओं से अनुरोध करना चाहता हूं कि इस संदेश को यथा संभव प्रसारित किया जाए और आगामी 10 जनवरी को देश में तथा कार्यालयों में 'विश्व हिंदी दिवस' मनाने की प्रथा की शुरुआत हो।

हिंदुस्तानी की हिपॉक्रेसी


मेरे एक मित्र का मेल आया कि "आज लगभग सारी जनता अंग्रेज़ी का Happy New Year मनाने में अपनी शान समझ रही रही है और बड़े उत्साह से मना रही है परंतु वही जनता सन् की जगह संवत् में अपना भारतीय नव वर्ष नहीं मनाती है।" मैंने उन्हें जवाब में लिखा कि विचार बहुत अच्छे हैं और सराहनीय भी। परंतु यह हिंदुस्तानी की मुहिम चलाने वालों की हिपॉक्रेसी है। केवल इतना ही कर देने से हम अपनी संस्कृति छोड़ देंगे या इसका अनुसरण करते रहने से हम अभारतीय नहीं हो जाएंगे। क्या अब गार्गियन कैलेंडर को छोड़ा जा सकता है? भारतीयता तो हमारे जीवन में रची-बसी है। अंग्रेज़ बहुत कुछ छोड़ गए हैं, क्या हमने उन सब का त्याग कर दिया है? क्या हमने उन समस्त बातों और उत्पादों को त्याग दिया है जिसे अंग्रेजों ने विरासत में हमें दी थी? मैं क्या उदाहरण दूं आप स्वयं इस पर ग़ौर करें और सोचें कि मात्र नव वर्ष न मनाने से हमारे परिवार में खुशी की लहर दौड़ जाएगी? मेरा विचार तो है कि जहाँ तक हो सके उन बुराइयों को छोड़ने की कोशिश करें जोकि हमें अंग्रेज़ों ने दी है। सार-सार को गहि रखैं, थोथा देंय उड़ाय। हमारा समाज अंग्रेज़ों की सबसे बड़ी खामी अंग्रेज़ी भाषा ही नहीं छोड़ रहा है जिसकी वजह से समाज में खांई बन गई है। पढ़ा लिखा इंसान गांव वालों को कमतर आंकता है और पढ़ लिखकर गांव से निकलता है तो फिर वापस गांव जाता ही नहीं। आप और मैं गांव के हैं। हमारा मन तो आज भी गांव में बसता है। अपनी बचत का तीन चौथाई गांव में खर्च कर रहे हैं। अतः न संस्कृति भूलेगी न छूटेगी। अब तो ऐसा दौर आ गया है कि गांव के लोग भी अपने बच्चे को गांव में नहीं रहने देना चाहते हैं और अपनी भाषा के बजाय अंगेरज़ी के मोहजाल में उलझा हुआ है।

रविवार, दिसंबर 19, 2010

विजेता बनाम विजित



भारतीय तट रक्षक संगठन ने 11 दिसंबर 2010 को अपने बेड़े में ICG VIJIT नामक जहाज़ को शामिल किया और इसका लोकार्पण रक्षा राज्य मंत्री श्री पल्लम राजू ने किया। उसके बाद लगभग एक सप्ताह बाद विवाद खड़ा हुआ कि "विजित" नाम तो ग़लत है क्योंकि विजित का मतलब होता है "हारा हुआ"। विजित शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है- वि (उपसर्ग) + जि (धातु-जीतना) + क्त (प्रत्यय-पूर्ण भूतकालिक)। इसमें "वि" उपसर्ग विपरीत अर्थ देने वाला है। यह बात तो कोई भी हिंदी अधिकारी जानता है। क्या इस जहाज़ के नामकरण के समय किसी हिंदी अधिकारी से सलाह नहीं ली गई थी या हिंदी वाले ने ही ग़लत नाम सुझाया था? इस बेड़े का निर्माण गोवा शिपयार्ड लिमिटेड ने किया है। वहाँ भी राजभाषा विभाग है और राजभाषा अधिकारी भी। भारतीय तट रक्षक संगठन में भी राजभाषा कक्ष होगा ही। अतः नामकरण से पूर्व कोई संजीदगी बरती गई है ऐसा नहीं लगता है।     

सन् 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में पाकिस्तान की हार हुई थी और जब  पाकिस्तानी कमांडिंग इन चीफ़ जनरल नियाज़ी ने हमारे जनरल अरोड़ा के सामने घुटने टेके थे और भारतीय अखबार ने लिखा था कि दोनों जनरल एनडीए के पास आउट हैं और एक ही बैच के, परंतु एक विजित और दूसरा विजेता। मतलब नियाजी हारे हुए और अरोड़ा जीते हुए के रूप में। यह बात किसी और को याद रहे  न रहे परंतु सेना के संगठनों तथा सेना में कार्यरत हिंदी वालों को तो याद रहनी ही चाहिए।

अमरीका में प्रथम नाम के रूप में VIJIT शब्द बहुत प्रचलित है। आज की तारीख में 443 अमरीकियों का नाम विजित है। उनके अनुसार विजित का अर्थ है zest, better, excelled. अब अगर अमरीकी प्रभाव मानें और नामकरण में उनकी सलाह मानें तो यह नाम सही ही लगता है। परंतु यह बात हज़म नहीं होती। क्या हम 'राजा राम' को 'बादशाह राम' कहकर पुकार सकते हैं या 'सीता' को 'राम की बेग़म सीता'। अंग्रेज़ी के कुप्रभाव का एक और उदाहरण। यह कुप्रभाव हम कब तक ढोते रहेंगे?


सोमवार, दिसंबर 13, 2010

अभिव्यक्ति की आज़ादी और बयान वापस लेने की कला


अभिव्यक्ति की आज़ादी हमारा सांविधानिक अधिकार है और हम इसका भरपूर उपयोग कर रहे हैं। यह ऐसा अधिकार है कि हम जब चाहें, जो चाहें बोल सकते हैं। किसी के भी खिलाफ़ बोल सकते हैं। ज़्यादा से ज़्यादा इतना ही तो करना होगा कि जब दूसरों को आपत्ति हो तो मीडिया में कह देंगे कि मेरी बात को तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत किया गया है या मैं भी तो इसमें शामिल हूं और मैं अपना बयान वापस लेता हूं। यह तो वैसे ही है कि सरे आम जूता मार अकेले में अफ़सोस ज़ाहिर करना। संविधान चाहे जो भी प्रावधान करता हो, कानून की व्याख्या द्वारा, मेरा विचार है कि किसी भी जन प्रतिनिधि को बयान वापस लेने की आज़ादी नहीं होनी चाहिए। यदि उसका बयान जन विरोधी हो तो उसे जनता की अदालत में ही सफाई पेश करनी चाहिए। गृह मंत्री, चिदंबरम् का बयान किसी भी प्रकार से क्षम्य नहीं है। यह तो अरुंधती रॉय के बयान से भी ज़्यादा ख़तरनाक है। इससे तो यही ध्वनित होता है कि भारत का कोई भी व्यक्ति अपने घर के बाहर जाए ही नहीं। चिदंबरम् को दिल्ली छोड़कर चिदंबरम (तमिल नाडु) वापस चला जाना चाहिए।  

गुरुवार, दिसंबर 09, 2010

भारत सरकार का वार्षिक कार्यक्रम और अनुपालन में संजीदगी की ज़रूरत



भारत सरकार ने वर्ष 2010 11 के वार्षिक कार्यक्रम में अनेक बातें लिखी हैं परंतु ये दो बातें बहुत ही महत्वपूर्ण हैं और इन पर बहुत गंभीरता से कार्रवाई करना ज़रूरी है।  
पहली बात, "राजभाषा कार्य से संबंधित अधिकारियों को विभाग के समस्त कार्यकलापों से परिचित कराया जाना आवश्यक है, जिससे कि वे अपने दायित्व अच्छी तरह निभा पाएं।"
पहली बात के बारे में, भारत सरकार ने, देर ही सही लेकिन समयबद्ध कार्यक्रम के ज़रिए इसे पूरा करने की ज़िम्मेदारी संस्थाओं पर डाली है और यह अच्छी बात है क्योंकि प्रशिक्षण के नाम पर राजभाषा अधिकारियों को अंतिम पायदान पर रखा जाता हैं जिसका नंबर ही नहीं आता।  मैंने पहले भी विचार व्यक्त किया था कि राजभाषा अधिकारी अपने आप में एक संस्था की भाँति है जो अनुवाद करता है, शिक्षण करता है, जन संपर्क का कार्य करता है, सृजनात्मक लेखन कार्य करता है, पत्रिका का संपादन करता है, हिंदी समारोह का मंच संचालन भी करता है, हिंदी को बढ़ावा देने के लिए प्रदर्शनी आयोजित करता है साथ ही कार्यालय का अन्य काम भी करता है। आज उससे कंप्यूटर के ज्ञान के साथ हिंदी में काम करने के लिए लोगों को कंप्यूटर का प्रशिक्षण देने की भी अपेक्षा की जाती है। ऐसे में यदि एक अधिकारी से विविध भूमिकाओं की अपेक्षा की जाती है तो उसे गहन प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी। परंतु इस अधिकारी की भर्ती करके इसे विभाग में नियुक्त कर दिया जाता है और कहा जाता है कि संस्था/विभाग में हिंदी में सारा काम करने की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है लेकिन उसे संस्था/विभाग के कार्यों की सुनियोजित जानकारी या प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है जबकि संगठन से अपेक्षा की जाती है कि उसे संस्था/विभाग के समस्त कार्य की समग्र जानकारी तथा आधुनिकतम प्रौद्योगिकी का गहरा और व्यापक प्रशिक्षण देकर इस प्रकार योग्य बनाए कि वह उक्त सारे कार्यों को अंजाम दे सके।
अतः भारत सरकार (राजभाषा विभाग) ने, सन् 1975 (विभाग की स्थापना) से अब तक पहली बार राजभाषा अधिकारियों के बारे में सकारात्मक पहल की है और समयबद्ध कार्यक्रम के ज़रिए इसे सुनिश्चत करने की बात कही है। अब भारत सरकार के कार्यालय, सरकारी क्षेत्र के उपक्रम, बैंक, केंद्र सरकार के नियंत्रण के निगम और आयोगों में कार्यरत राजभाषा विभागों की ज़िम्मेदारी है कि अपने राजभाषा अधिकारियों के गहन और विकासात्मक कार्यक्रम बनाएं और उन्हें प्रशिक्षित करके सक्षम बनाएं ताकि वे अपनी भूमिका सकारात्मक ढंग से निभाए।  
दूसरी बात, "भारतीय प्रशासनिक सेवा और अन्य अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों के लिए लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी में प्रशिक्षण के दौरान हिंदी भाषा का प्रशिक्षण अनिवार्य रूप से दिया जाता है, ताकि सरकारी कामकाज में वह इसका प्रयोग कर सकें तथापि, अधिकांश अधिकारी सेवा में आने के पश्चात् सरकारी कामकाज में हिंदी का प्रयोग नहीं करते इससे उनके अधीन कार्य कर रहे अधिकारियों/ कर्मचारियों में सही संदेश नहीं जाता परिणामस्वरूप, सरकारी कामकाज में हिंदी का प्रयोग अपेक्षित मात्रा में नहीं हो पाता मंत्रालयों/विभागों/कार्यालयों/उपक्रमों आदि के वरिष्ठ अधिकारियों का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह अपने सरकारी कामकाज में अधिक से अधिक हिंदी का प्रयोग करें इससे उनके अधीन कार्य कर रहे अधिकारियों/ कर्मचारियों को प्रेरणा मिलेगी तथा राजभाषा नीति के अनुपालन को गति मिलेगी।" 
इस बारे में, मेरा विचार है कि मंत्रालयों/विभागों/कार्यालयों/उपक्रमों आदि के वरिष्ठ अधिकारियों के इस संवैधानिक दायित्व के बारे में उच्च स्तरीय, मानसिकता परिवर्तन कार्यक्रम आयोजित करके उन्हें प्रेरित किया जाए और तुरंत हिंदी में काम शुरू करके अपने मातहत काम करने वालों को संदेश दें कि हिंदी में काम किया जाए तथा हिंदी में काम करना अनिवार्य है।

रविवार, दिसंबर 05, 2010

साइबर अपराध - अपरिहार्य परंतु रोकथाम संभव

राजभाषा विकास परिषद ने अभी नवंबर में साइबर अपराध और निवारक उपाय विषय पर तीन दिन का प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया था (यद्यपि उसमें संस्थाओं की सहभगिता नगण्य थी) और उस समय कंप्यूटर विशेषज्ञों ने कहा था कि साइबर अपराध तो रोकना संभव नहीं है क्योंकि अपराधियों के उपजाऊ दिमाग़ केवल अपराध के बारे में ही प्रयासरत रहते हैं जब कि हमें अपने दैनिक काम को निपटाने के साथ साथ साइट व अपने कंप्यूटरों की सुरक्षा का भी ध्यान रखना होता है। पुलिस ही अपराधों की छानबीन करती है और अपराधियों को सज़ा भी दिलाती है परंतु उसी की साइट हैक हो जाए, वह भी जो कि बहुत ही संरक्षित साइट हो (सी.बी.आई. की साइट पाकिस्तानी हैकरों द्वारा हैक कर ली गई) तो आप क्या कहेंगे? अतः यह मानकर न बैठें कि हमने फ़ायर वॉल लगा दिया है या इंट्रू़ज़न डिटेक्शन सिस्टम (आई डी एस) लगा दिया है तो हमारी साइट सुरक्षित हो गई है। हमें निरंतर, मतलब हर क्षण, चौकस रहना होगा तथा सिक्यूरिटी ऑडिट पर ध्यान देना होगा। सरकारी कार्यालयों और एन आई सी द्वारा चलाई जा रही साइटों की सिक्यूरिटी ऑडिट पर ध्यान न देना सबसे बड़ी कमी है। चौकस रहना ही सुरक्षा की गारंटी है। 


शुक्रवार, दिसंबर 03, 2010

हिंदी की स्थिति भारत के राष्ट्रपति जैसी है और अंग्रेज़ी को प्रधानमंत्री की हैसियत प्राप्त

डॉ. नामवर सिंह ने 2007 में कहा था कि कभी-कभी लगता है कि भाषा के क्षेत्र में हिंदी की स्थिति भारत के राष्ट्रपति जैसी है और अंग्रेज़ी को प्रधानमंत्री की हैसियत प्राप्त है। हिंदी एक सम्मानजनक पद पर तो है, पर व्यवहार में दूसरे दर्ज़े पर है और सारे अधिकार अंग्रेजी के पास है। यह एक ऐसी हकीकत है जिसे बदलने का कोई तरीका फिलहाल दिखाई नहीं पड़ रहा। ऐसे में हमारा समूचा देश द्विभाषी होने के लिए अभिशप्त है। यह अभिशाप कब तक रहेगा, यह कोई नहीं बता सकता क्योंकि हिंदी को राजभाषा का वास्तविक दर्ज़ा जो दिला सकता है वही तो हिंदी की ख़िलाफ़त कर रहा है? हर विभाग के प्रमुख का यह दायित्व है कि वह हिंदी का प्रशिक्षण शीघ्रातिशीघ्र पूरा कराए और हिंदी का ज्ञान रखने वाले से हिंदी में काम कराए। चूंकि वह खुद हिंदी में काम नहीं करता है इसलिए किसी और से हिंदी में काम करने के लिए कहने का नैतिक साहस नहीं जुटा पाता है, न प्रधान मंत्री, न गृह मंत्री। ख़ुद मियां फ़ज़ीहत दीगरे नसीहत।    

गुरुवार, दिसंबर 02, 2010

एक शिक्षण संस्था की सच्ची दास्तान


मुझे पता है कि आपके पास समय नहीं है परंतु आपसे आग्रह है कि मेरी दास्तान पूरी पढ़ लें। यदि एक बार में समय न मिले तो दो बार में पढ़ें लेकिन अवश्य पढ़ें। मैं छह कमरों की एक इमारत हूं जो 1960 से वैसी ही हूं। बिना प्लास्टर, बिना सीमेंटेड फ़र्श, बिना लॉन, बिना वृक्ष, बिना पक्की सड़क। लोग मुझे स्कूल पुकारते हैं। स्कूल, जहां अध्यापक आते हैं, बैठते हैं, गपशप करते हैं, घर गृहस्ती की, अपनी तनख़ाह के बारे में बात-चीत करते हैं, स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की हाज़िरी लगाते हैं, बच्चों से फ़ीस जमा करने के निदेश देते हैं, प्रधानाचार्य के मिजाज़ के बारे में खोज खबर लेते हैं और चार बजते बजते घर चले जाते हैं। रामलौट कमरों के दरवाज़े बंद कर देते हैं और चाबी बड़े बाबू को देकर चले जाते हैं। अगले दिन सुबह आठ बजे आकर दरवाज़े खोल देते हैं और कल की ही भांति दिनचर्या शुरू होती है एवं समाप्त होती है।

मेरा परिसर बड़ा है और स्कूल के परिसर के अलावा मेरे पास पौने दो बीघा ज़मीन भी है। वह ज़मीन ग्राम पंचायत की ओर से मिली है ताकि उसका उपयोग करके मैं अपना भरण पोषण कर सकूं तथा अपनी हालत ठीक रख सकूं। लेकिन जैसा कि सभी गांवों में होता है मेरी ज़मीन ग्राम प्रधान की ज़ागीर बन गई है और वह वहां पर ईंट बनाने का काम करता है और जहां से चाहे खोदाई करके मिट्टी निकाल लेता है। मैं क्या करूं? मेरी रखवाली करने की ज़िम्मेदारी स्कूल की प्रबंध समिति की है परंतु मुझे तो मालूम ही नहीं है कि वह समिति कहां है और उसका मुखिया कौन है? स्कूल के अध्यापकों को तो अपने सिलेबस की ही जानकारी नहीं होती है तो किसी और के बारे में क्या जानकारी रखेंगे। अतः ऐसे ही 43 साल से चल रहा है परंतु है सब सामान्य। किसी प्रकार की कोई कठिनाई कभी नहीं आई। जब निरीक्षण वगैरह की बात आती है तो प्रधानाचार्य के रसूक की वजह से सब निपट जाता है। बच्चे इतने होशियार हैं कि पास भर के नंबर तो ले ही लेते हैं। उन्हें आगे चलकर कौन सा डॉक्टर इंजीनियर या वैज्ञानिक बनना है। जिन्हें बनना है वे कहीं और जाकर बनें। यहां तो शादी होने तक की गारंटी है। उसके बाद की पढ़ाई का क्या फ़ायदा है? स्कूल छोड़ने के बाद तो रोज़गार गारंटी योजना में जॉब कार्ड बन ही जाएगा क्योंकि प्रधान जी तो खोजते ही रहते हैं कि कोई नया आदमी मिले जिससे कार्डों की संख्या बढ़े और आमदनी बढ़े। हमें क्या? कोई भी व्यक्ति यदि बिना काम किए केवल दस्तख़त बनाकर 20-30 रुपए रोज़ पा जाता है तो इससे अच्छा और क्या हो सकता है? सरकार भी कितनी समझदार है कि लोगों को गांव में ही रोक लेती है, जनसंख्या बढ़वाती रहती है और चुनाव के समय वोट तो लेती है जलसा मोर्चा निकालना होता है तो एक दो बस भर कार्यकर्ता भी इकट्ठा मिल जाते हैं। इसी बहाने शहर की सैर कर लेते हैं।

सन् 1959-60 से 1961-62 तक एक विद्यार्थी था। घर का तो बहुत अच्छा नहीं था परंतु पढ़ने में अच्छा था। स्मरणशक्ति अच्छी थी और हिंदी, संस्कृत, गणित तथा अंग्रेज़ी विषयों में अच्छा प्रदर्शन करता था। यहां से निकलकर आगे की पढ़ाई जारी रखी और गांव का पहला पोस्ट ग्रेजुएट और डॉक्टोरेट करने वाला व्यक्ति रहा। उसके बाद तो अब लगता है कोई पढ़ने के विचार से आता ही नहीं। वह कभी कभी स्कूल में आता रहता है स्कूल के ख़सता हाल पर दुःख भी व्यक्त करता है और चाहता है कि आठवीं से आगे की कक्षाएं भी खुलें और साइंस की पढ़ाई शुरू हो। परंतु अध्यापक और प्रबंध समिति इसे हाई स्कूल नहीं बनाना चाहते क्योंकि स्कूल स्तर बढ़ने के साथ ही स्कूल का प्रबंध उनके हाथ से तो निकल ही जाएगा साथ ही सरकारी सहायता मिलना बंद हो जाएगी और अध्यापकों की तनख़ाह अपने संसाधनों से ही जुटाना होगा जिसके लिए बहुत प्रयास और श्रम की ज़रूरत होगी। वर्तमान छात्रों से मिलने वाली फ़ीस से तो खर्चा निकलना असंभव है। अतः कौन ज़हमत उठाए? जैसा चल रहा है चलने दिया जाए। अपनी तनख़ाह तो मिल ही रही है। जब गांव के मानिंद लोगों और अपने बच्चों को पढ़ाने वालों को ही किसी प्रकार की चिंता नहीं है तो हमें क्या? जैसे 43 साल खड़ी हैं आगे भी कट ही जएगी। अजी, किस किस को कोसिए, किस किस को रोइए; आराम बड़ी चीज़ है मुंह ढंक कर सोइए।

शनिवार, नवंबर 27, 2010

भारत के सर्वोच्च न्यायालय में हिन्दी में लिखी हुई याचिका स्वीकार नहीं

'अदालत' नामक वेब साइट पर किसी बेनाम व्यक्ति ने लिखा है -
"यह घोर आश्चर्य का विषय है कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय हिन्दी में लिखी हुई न तो कोई याचिका ही स्वीकार करता है और न ही हिन्दी भाषा में कोई आदेश ही पारित करता है । केवल यही नहीं, अंग्रेजी भाषा में प्रस्तुत की गयी याचिका में भी अगर कोई संलग्नक भी हिन्दी भाषा का है तो यह याचिका भी सुनवाई के लिए तब तक जज महोदय के सामने प्रस्तुत नहीं की जाती जब तक कि उस हिन्दी के संलग्नक का सम्पूर्ण अनुवाद प्रमाणित रूप से शुद्ध अंग्रेजी भाषा में नहीं करवा लिया जाता । इस प्रक्रिया के अन्तर्गत याचिका हफ्‌तों से लेकर महीनों तक लटकी पडी रह जाती है । हिन्दी से अंग्रेजी अनुवाद के लिए कुछ फीस अलग से भी देनी होती है । हालांकि यह फीस अधिक नहीं होती लेकिन आश्चर्य यह सोचकर होता है कि क्या भारत के सर्वोच्च न्यायालय के जजों को हिन्दी नहीं आती है अथवा यह भाषा उन्हें किसी दूसरे संसार की लगती है । कौन सा ऐसा देश संसार में है जहां के न्यायालय अपने देश की भाषा को अस्वीकार करके किसी विदेषी भाषा में लिखी गयी याचिका ही स्वीकारते हों ? वर्तमान में भारत के सर्वोच्च न्यायालय में कुल 30 जजों में 26 हिन्दी भाषी जज हैं । केवल 4 जज ऐसे हैं जो दक्षिण भारतीय हैं ; इनके नाम सर्वश्री के.जी बालाकृष्णन (मुख्य न्यायाधीश), आर. रविन्द्रन, बी. सुदर्शन रेड्डी और पी. सदाशिवम्‌ हैं, और यह माना जा सकता है कि उन्हें हिन्दी भाषा का ज्ञान नहीं है । लेकिन जब 26 जज हिन्दी भाषी हों तो हिन्दी में लिखी गयी याचिका क्यों नहीं स्वीकार की जा सकती ? यह सभी 26 जज बचपन से लेकर सर्वोच्च न्यायालय की कुर्सी तक पहुंचने में निश्चय ही हिन्दी में ही काम करते रहे होंगें, तो आज वे हिन्दी की याचिका क्यों नहीं पढ. सकते ? अगर याचिका किसी दूसरी राज्य भाषा में हो तो वे अस्वीकार की जा सकती है, परन्तु राष्ट्र भाषा में लिखी गयी याचिका स्वीकार न हो तो इससे अधिक दुर्भाग्य भारत राष्ट्र के लिए हो ही नहीं सकता । भारतवर्ष को अंग्रेजों की दासता से मुक्त हुए 60 वर्ष से अधिक का समय व्यतीत हो चुका है फिर भी किसी राष्ट्रपति ने, किसी प्रधानमंत्री ने, किसी कानून मंत्री ने इस बात पर आपत्ति क्यों नहीं की कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय देश की सर्वोच्च भाषा हिन्दी को सहर्ष स्वीकार करे ! प्रान्तीय भाषाओं में लिखी गयी याचिकाओं को समझने और निर्णय देने में दिक्कत हो सकती है, यह बात तो मानी जा सकती है, लेकिन राष्ट्र भाषा हिन्दी में प्रस्तुत याचिका स्वीकार न की जाय यह बात किसी भी राष्ट्र प्रेमी के लिए स्वीकार करना संभव नहीं है। आज अगर देश के सभी सांसद मिल करके हिन्दी भाषा के समर्थन में आवाज उठायें तो निश्चय ही सर्वोच्च न्यायालय हिन्दी की याचिकाएं स्वीकार करने में सहमत हो सकता है । इस राष्ट्रीय धर्म के परिपालन में किसी भी सांसद को पीछे नहीं रहना चाहिए।"
इस बारे में सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय कुछ नहीं कर सकते अथवा नहीं करेंगे क्योंकि हमारा संविधान ऐसा करने से रोकता है। भारत सरकार भी इस मामले में एकदम उदासीन है अथवा कुछ न करने के लिए वचनबद्ध है। ऐसी वचनबद्धता जिसका डर दिखाकर असहायता प्रकट की जाती है। जब तक जनता खुद मैदान में नहीं उतर जाती। क्या यह संभव है? कब संभव होगा? सरकारी कार्यालय और सरकार की सबसे बड़ा सलाहकार विभाग- राजभाषा विभाग तो कुछ नहीं कर पाएगा क्योंकि उनके पास तो कोई आंकड़ा ही नहीं है कि कितने कर्मचारियों को हिंदी आती है? देश में कितने राज्यों ने त्रिभाषा सूत्र लागू किया है? क्या हमारी संसद जिसके सदस्य जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं और संसद में ली गई शपथ का निर्वाह करते हैं तथा 1968 में दोनों सदनों के समक्ष पारित संकल्प का सम्मान करते हैं, अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास करते हुए पुनः संसद में संकल्प पारित करके अनंतकाल तक अंग्रेज़ी को चलने से रोकने की कार्रवाई शीघ्र करेगी?  

साइबर अपराध और निवारक उपाय


ई-, साइबर- और वर्चुअल शब्दों का प्रयोग पहले से प्रचलन में आ रहे उत्पादों या सेवाओं या अवधारणाओं के कंप्यूटरीकरण या कंप्यूटर से संबंधित नामकरण के साथ उपसर्ग के रूप में प्रयोग करने के किया जा रहा है, जैसे, हम काग़ज़ पर पत्र लिखते थे और अब कंप्यूटर और इंटरनेट की सहायता से ई-मेल भेज रहे हैं। इसी प्रकार ई-कॉमर्स, ई-गवर्नेंस, ई-रिटर्न, ई-टिकट, साइबर कफ़े, साइबर वार, वर्चुअल कीबोर्ड, वर्चुअल क्लासरूम आदि। अतः ये तीनों शब्द एक तरह से इलेक्ट्रॉनिक के पर्याय के रूप में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इसी संदर्भ में साइबर शब्द को क्राइम (अपराध) से जोड़ दिया गया है जो इस बात का द्योतक है कि कोई अपराध किया गया हो जिसमें किसी न किसी रूप में कंप्यूटर का उपयोग किया गया हो, जैसे, इलेक्ट्रोनिक रूप में नग्नता, इलेक्ट्रोनिक रूप में बच्चों का यौन शोषण, धर्म, जाति, जन्म स्थान, निवास, भाषा आदि के आधार पर दो संप्रदायों में दुश्मनी पैदा करना (ऑन लाइन हेट कम्युनिटी), ईमेल खाते की हैकिंग, महिला के शील को भंग करने के विचार से ग़लत नाम से ईमेल, क्रेडिट कार्ड फ़्रॉड, ऑन लाइन शेयर ट्रेडिंग फ़्रॉड, कर की चोरी और धन शोधन (मनी लांड्रिंग), कॉपी राइट का उल्लंघन (कंप्यूटर सोर्सकोड की चोरी), सॉफ़्टवेयर की चोर बाज़ारी, संगीत या फ़िल्म की सी.डी. की चोर बाज़ारी, ईमेल घोटाला, फ़िशिंग, नॉरकोटिक ड्रग्स ऐंड साइकोट्रॉफ़िक सब्सटैंसेज़, वन्य प्राणियों या उनसे संबंधित वस्तुओं की ऑन लाइन विक्री, देश की सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने के विचार से आतंकवादियों द्वारा नेटवर्क का उपयोग व कंप्यूटर के हार्डवेयर का उपयोग, वाइरस हमला, वेबसाइट को विकृत करना आदि।

राजभाषा विकास परिषद द्वारा 'साइबर अपराध और निवारक उपाय' विषय पर तीन दिवसीय (22-24 नवंबर) कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें कंप्यूटर व विधि विशेषज्ञों तथा महाराष्ट्र पुलिस के साइबर सेल के अधिकारी द्वारा विस्तार पूर्वक बताया गया कि साइबर अपराध से बचने के लिए क्या उपाय किए जाएं और अगर अपराध घटित हो जाए तो किस प्रकार की कार्रवाई की जाए।

वास्तव में यह पोस्ट लिखने का उद्देश्य यह है कि मेरे साथ, इस कार्यक्रम की शुरुआत से तीन दिन पहले (19 नवंबर) को, मेरे एक मित्र के नाम से ई-मेल आया। मेल को हू-ब-हू पेस्ट कर रहा हूं-
Dear,
After all my stress, finally I'm glad to get in touch with you.
I'm so sorry that you were not informed about my trip to Spain for conference, I need your help ugently as soon as you recieved my message, because It has been a very sad and bad moment for me here, the present condition that I found myself is very hard for me to explain as I mistakenly misplaced my wallet in a cab, which contain relevant document of my transport with my money and phone, and I'm sending this message to you because I'm in financial crisis at the moment,  I need the sum of €1,500Euro  to sort-out all my bills here and to get myself back home as soon as possible, pls I will appreciate all your effort to make this loan possible for me, because my hope rely on you as I know you can do it,  when I get back home I'll refund you , pls let me know how much you can afford to help me and i'll send you the details to make transfer.

Please I need your quick response because I'm having limited access to the internet.
--
Dr. H. S. Rana
Principal Director
Institute of Public Administration
Bangalore - 560 001

मेल मिलते ही मैंने अपने मित्र डॉ. राना को फ़ोन लगाया कि आपके मेल खाते से यह मेल मिला है। क्या सचमुच आप स्पेन में हैं क्योंकि उससे दो दिन पहले ही डॉ. राना से बात हुई थी तो स्पेन जाने के किसी कार्यक्रम के बारे में कोई ज़िक्र नहीं किया था। पहले डॉ. राना का फ़ोन नहीं लगा तो अपने एक दूसरे मित्र जो डॉ. राना के भी मित्र हैं उन्हें फ़ोन लगाया और मेल का ज़िक्र किया तो उन्होंने भी बताया कि डॉ. राना ने विदेश जाने का कोई ज़िक्र नहीं किया था। इस बीच डॉ. राना से बात हो गई तो उन्होंने बताया कि मेरा मेल खाता हैक हो गया था और उससे मेरे सभी परिचितों को मेल भेज दिया गया है। अतः उन्होंने जीमेल के सेवा प्रदाता से संपर्क करके मेल खाते को पुनः प्राप्त किया और पासवर्ड बदला।

अतः साइबर अपराध से सुरक्षा के लिए अपने पासवर्ड को किसी से ज़ाहिर न करें और यदि किसी साइबर कफ़े से अपना मेल खाता परिचालित करें तो विशेष सावधानी बरतें, बैंक का लेन देन साइबर कफ़े से न करें, किसी अंजान विंडो को न खोलें, उसे क्रॉस पर क्लिक करके बंद कर दें, कंप्यूटर पर से उठने से पहले कंप्यूटर को री-स्टार्ट कर दें। बात लंबी है जिसको यहां पूरा नहीं कहा जा सकता है। अतः इतना ही।

 

शुक्रवार, नवंबर 19, 2010

क्या अंग्रेज़ी न आना बदकिस्मती है?

यह गुलाम मानसिकता ही है कि हम अपनी भाषा न आने पर नहीं बल्कि अंग्रेज़ी न आने पर अपनी बदकिस्मती समझते हैं। विग बॉस में पामेला ऐंडरसन से थोड़े समय के लिए मिलने पर सीमा परिहार ने ऐसा कहा क्योंकि उसके साथ अंग्रेज़ी में बात नहीं कर पाईं। पामेला हिंदुस्तान आई थीं हिंदुस्तान की संस्कृति सीखने। बदकिस्मत तो पामेला है कि उन्हें हिंदी नहीं आती। वास्तविकता तो यह है कि वह भारत से तीन दिन में साढ़े सात करोड़ कमाने आई थी ताकि अपने देश जाकर अपनी कर की देयता को निपटा सकें। यदि हिंदुस्तान की संस्कृति सीखने आतीं तो हिंदी ज़रूर सीखकर आतीं और हिंदी न आने पर उनहें मलाल होता। अतः सीमा जी को अपनी बदकिस्मती पर रोने की ज़रूरत नहीं है।

गुरुवार, नवंबर 18, 2010

हिंदी इंडिक आई एम ई इन्पुट 2

विंडोज़ विस्टा और विंडोज़ 7 में आईएमई के संस्करण के कारण कुछ कठिनाई आ रही है। इसके लिए आईएमई के 5.2 संस्करण का उपयोग किया जाए और सेटअप चलाते समय यह ध्यान रखा जाए कि "As Administrator" इंस्टाल किया जाए। जो लोग यूज़र ग्रुप में एक यूज़र के रूप में काम कर रहे होंगे उनके पीसी में "Run As Administrator" ऑप्शन का चुनाव करके इंस्टाल किया जाए।

बुधवार, नवंबर 17, 2010

विंडोज़ 7 में आई एम ई का उपयोग

मुकेश सक्सेना ने समस्या बताई है कि उनके विंडोज़ 7 होम प्रीमियम ऑपरेटिंग सिस्टम वाले पी सी में आई एम ई IME IV 5.1 काम नहीं कर रहा है। ऐसी समस्या और भी किसी को आई हो तो वह अपनी समस्या और किए गए समाधान के बारे में इस पोस्ट की प्रतिक्रिया में लिख सकता है। वैसे विंडोज़ 7 के लिए IME IV 5.2 http://bhashaindia.com पर अपलोड है। वहां से डाउनलोड करके इंस्टाल कर लिया जाए। यह समस्या 32 बिट और 64 बिट ऑपरेटिंग सिस्टम के कारण भी हो सकती है। अतः मैचिंग बिट प्रणाली वाली आई एम ई इंस्टाल करें।

क्या रुपए का नया प्रतीक क्षेत्रीयता का परिचायक है?