देश की भाषा समस्या जनता जनित नहीं है बल्कि यह जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा जनित है। जन प्रतिनिधियों ने ही इसे 1947 में ही स्वीकार कर लिया था कि देश में एक संपर्क भाषा हो और वह भारत की ही भाषा हो कोई विदेशी भाषा न हो। संविधान लागू होने के बाद पंद्रह साल का समय भाषा परिवर्तन के लिए रखा गया था और वह समय केवल केंद्र सरकार की भाषा के लिए ही नहीं बल्कि भारत संघ के सभी राज्यों के लिए रखा गया था कि उस दौरान सभी राज्य सरकारें अपने-अपने राज्यों में अपनी राजभाषा निर्धारित कर लेंगी एवं उन्हें ऐसी सशक्त बना लेंगी कि उनके माध्यम से समस्त सरकरी काम काज किए जाएंगे तथा राज्य में स्थित शिक्षण संस्थाएं उनके माध्यम से ही शिक्षा देंगी। यह निर्णय 1949 में ही किया गया था राज्यों ने अपनी-अपनी राजभाषा नीति घोषित कर दी थी। यद्यपि वहां भी निर्णय को मुस्तैदी लागू करने का काम नहीं हुआ क्योंकि राज्यों के सामने अन्य आवश्यक समस्याएं थीं जिनपर अविलंब ध्यान देना था। उस चक्कर में राज्य सरकारों ने राजभाषाओं की समस्या को टाल दिया था परंतु किसी भी सरकार ने अंग्रेज़ी को राजभाषा के रूप में अनंत काल तक बनाए रखने की मंशा नहीं व्यक्त की। अतः राज्यों ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपनी राजभाषाओं को प्रचलित करने के लिए अपने यहां भाषा विभागों की स्थापना की और कार्यालयी भाषा की शिक्षा देना प्रारंभ किया, भाषा प्रयोग की समीक्षा करने लगे तथा प्रशासनिक शब्दावली बनाने की प्रक्रिया प्रारंभ की। राज्य सरकारों ने उसी निर्धारित समय में अपनी भाषाओं को संवर्धित किया और आज नागालैंड के सिवाय सभी राज्यों ने अपनी राज्य भाषाओं में काम करना प्रारंभ कर दिया है। ऐसे में यह और भी आवश्यक हो गया है कि देश में राज्यों के बीच संपर्क भाषा के रूप में हिंदी को स्थापित किया जाए। लेकिन कार्यालयों में आज भी अंगेज़ी का प्रयोग उसी प्रकार व उतनी ही मात्रा में हो रहा है जितना कि 1965 से पहले हो रहा था। हिंदी प्रयोग के आंकड़े कितने सही और वास्तविक हैं यह तो राजभाषा कक्ष/अनुभाग/विभाग के प्रभारी ही जानते हैं।
2. हिंदी के प्रश्न को संविधान में अनंत काल तक के लिए टालने का फ़ैसला जनता द्वारा नहीं किया गया है और न ही किसी समित द्वारा सुझाया गया था। आज तक जितनी भीं समितियां, आयोग बने किसी ने भी हिंदी के प्रश्न को समय सीमा (पंद्रह साल)से परे रखने की सिफ़ारिश नहीं की है। राजभाषा आयोग, विश्व विद्यालय अनुदान आयोग, केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड, सभी ने हिंदी व क्षेत्रीय भाषाओं में ही शिक्षा दीक्षा देने की सिफ़ारिश की है। तब संविधान में हिंदी को अनिश्चित काल के लिए टालने की बात कहां से आई? यह निश्चित रूप से कोई सोची समझी चाल तथा प्रच्छन्न विद्वेष की भावना लगती है। इसे समझने और ग्रासरूट स्तर पर चेतना जागृत करने की आवश्यकता है।
3. हिंदी को वास्तविक रूप में कामकाज की भाषा बनाना हो तो देश में त्रिभाषा सूत्र सच्चे मन से तथा कड़ाई से लागू करना होगा। त्रिभाषा सूत्र के कार्यान्वयन की कठिनाइयों पर शिक्षा आयोग (1964-66) ने विस्तार से विचार किया है। व्यावहारिक रूप से त्रिभाषा सूत्र के कार्यान्वयन की कठिनाइयों में मुख्य है स्कूल पाठ्यक्रम में भाषा में भारी बोझ का सामान्य विरोध, हिंदी क्षेत्रों में अतिरिक्त आधुनिक भारतीय भाषा के अध्ययन के लिए अभिप्रेरण (मोटिवेशन) का अभाव, कुछ हिंदीतर भाषी क्षेत्रों में हिंदी के अध्ययन का विरोध तथा पांच से छह साल तक, कक्षा छठी से दसवीं तक दूसरी और तीसरी भाषा के लिए होने वाला भारी खर्च और प्रयत्न। शिक्षा आयोग ने कार्यान्वयन की कठिनाइयों का उल्लेख करते हुए कहा है कि गलत योजना बनाने और आध्ो दिल से सूत्र को कार्यान्वित करने से स्थिति और बिगड़ गई है। अब वह समय आ गया है कि सारी स्थिति पर पुनर्विचार कर स्कूल स्तर पर भाषाओं के अध्ययन के संबंध में नई नीति निर्धारित की जाए। अंग्रज़ी को अनिश्चित काल तक, भारत की सहचरी राजभाषा के रूप में स्वीकार किए जाने के कारण यह बात और भी आवश्यक हो गई है।
4. अतः ऐसी परिस्थिति में कार्यालयों में हिंदी को प्रचलित करने तथा स्टाफ़ सदस्यों को सक्षम बनाने के लिए सतत और सत्यनिष्ठा के साथ शिक्षण प्रशिक्षण का हर संभव प्रयास करना होगा एवं हिंदी की सेवा से जुड़े हर व्यक्ति को अपने अहम् को दूर रखकर प्रयास करना होगा। गुरु रवींद्र नाथ टैगोर की चार पंक्तियां उल्लेखनीय हैं –
सांध्य रवि बोला कि लेगा काम अब यह कौन,
सुन निरुत्तर छबि लिखित सा रह गया जग मौन,
मृत्तिका दीप बोला तब झुकाकर माथ,
शक्ति मुझमें है जहां तक मैं करूंगा नाथ।।
5. हर व्यक्ति को अपनी शक्ति के मुताबिक प्रयास करना होगा। ऐसे में हम यह चाहते हैं कि हर व्यक्ति अपने आप से यह प्रश्न करे कि यह बड़ा और दुष्कर कार्य कैसे होगा और उसका उत्तर भी स्वयं ढूंढे, कुछ इस प्रकार –
बड़ा काम कैसे होता है, पूछा मेरे मन ने,
बड़ा लक्ष्य हो, बड़ी तपस्या, बड़ा हृदय, मृदुवाणी,
किंतु अहम् छोटा हो जिससे सहज मिलें सहयोगी,
दोष हमारा श्रेय राम का, यह प्रवृत्ति कल्याणी।।
डॉ. दलसिंगार यादव
शनिवार, मार्च 27, 2010
मंगलवार, मार्च 16, 2010
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और सेक्सुअल हैरेसमेंट कार्यक्रम
यद्यपि संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1946 में 'महिलाओं के अधिकार' विषय पर विचार किया था और 'कॉमिशन ऑन स्टेटस ऑफ़ वीमेन' गठित किया था परंतु बहुत वर्षों तक इस पर गंभीरता से कार्रवाई नज़र नहीं आती है। लेकिन ह्यूमन राइट को विश्व के अनेक देशों में महत्वपूर्ण माना गया और इस पर गंभीरता से अमल जारी रखा। विशेष और गंभीर प्रयासों की शुरुआत 1975के बाद देखने में आती है। संय़ुक्त राष्ट्र संघ ने 1975 को अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष घोषित किया और 1975 (मैक्सिको), 1980कोपेनहेगेन), 1985 (नैरोबी) तथा 1995 (बीजिंग) में सम्मेलन आयोजित किए। इसमें लिंग के आधार पर भेदभाव समाप्त करने तथा महिलाओं के सशक्तीकरण के मामले पर वचनबद्धता को पूरा करने का संकल्प लिया गया था। भारत में भी महिलाओं के अधिकार और उनके प्रति होने वाले अनैतिक व्यवहारों से निपटने के लिए कई कानून बनाए गए परंतु महिलाओं के कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के निवारण के लिए अलग से अधिनियम अथवा कानूनी प्रावधान नहीं बनाए गए ।
2. वर्षों से इससे संबंधित अपराधों को भारतीय दंड संहिता (इंडियन पीनल कोड) के अंतर्गत किए गए प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई होती रही है। परंतु इस बारे में अलग से व्यवस्था की आवश्यकता और मामले की गंभीरत को महसूस करके उच्चतम न्यायालय ने 1997 में पहली बार 'विशाखा और अन्य बनाम राजस्थान सरकार' मामले में कुछ मार्गदर्शी सिद्धांत सुझाए और सरकार को निदेश दिया कि जब तक कि भारत के संसद द्वारा इस बारे में कोई उपयुक्त कानून नहीं बनाया जाता तब तक उच्चतम न्यायालय के इस मार्गदर्शी सिद्धांत को, संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार कानून माना जाए और किसी भी कार्यस्थल पर चाहे वह सरकरी या निजी हो, इसका अनुसरण किया जाए।
3. भारत सरकार ने 'सेक्सुअल हैरसमेंट ऑफ़ वीमेन ऐट वर्क प्लेस (प्रिवेंशन, प्रॉहिविशन ऐंड रिड्रेसल, 2006) नामक विधेयक तैयार किया था। उस बिल में पुनः संशोधन किया गया और उसे ''दि प्रोटेक्शन ऑफ़ वीमेन अगेंस्ट सेक्सुअल हैरसमेंट ऐट वर्क प्लेस बिल, 2007'' नाम से वेबसाइट के पब्लिक डोमेन में रखा और अनुरोध किया कि इसमें सुझाव दिया जाए। चूंकि वह बिल अभी भी संसद द्वारा पारित करने के लिए संसद के समक्ष लंबित है और इस बीच मीडिया में, हरियाण के भूतपूर्व डी. जी. पी. का मामला बहुत उछाला गया इसलिए सरकार ने इसमें कुछ और संशोधन करने के विचार से पुनः विचार आमंत्रित किया है तथा इस वर्ष इसे पास करने का मन बना लिया है। पहले वाले विधेयक में छह अध्याय, 40धाराएं और तीन अनुसूचियां थीं। परंतु नवीनतम विधेयक में पांच अध्याय, 22 धाराएं और एक अनुसूची है जिसमें विभिन्न कार्यस्थलों का विवरण दिया गया है। यह व्यापक व सरल भाषा में बनाया गया विधेयक है जो पास होने पर उपयोगी सिद्ध्ा होगा।
4. राजभाषा विकास परिषद ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस - 8 मार्च को, 'सेक्सुअल हैरसमेंट ऑफ़ वीमेन ऐट वर्क प्लेस' विषय के विवधि पहलुओं पर चर्चा करने के लिए दो दिवसीय कार्यक्रम की शुरुआत की और इसके विभिन्न पहलुओं पर कानून विदों के साथ व्यापक चर्चा की। इन विषयों पर चर्चा करने के लिए कानून के जानकार, शिक्षण और न्यायालयों में कानून की प्रैक्टिस करने वाले न्याय विदों को आमंत्रित किया गया था।
5. ''दि प्रोटेक्शन ऑफ़ वीमेन अगेंस्ट सेक्सुअल हैरसमेंट ऐट वर्क प्लेस बिल, 2007'' में सेक्सुअल हैरसमेंट की वही परिभाषा शामिल कर ली गई है जोकि सुप्रीम कोर्ट ने विशाखा के मामले में दी। इस विधेयक में पुरुषों के बारे में ध्यान नहीं रखा गया। अतः इस पर व्यापक चर्चा की आवश्यकता है।
2. वर्षों से इससे संबंधित अपराधों को भारतीय दंड संहिता (इंडियन पीनल कोड) के अंतर्गत किए गए प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई होती रही है। परंतु इस बारे में अलग से व्यवस्था की आवश्यकता और मामले की गंभीरत को महसूस करके उच्चतम न्यायालय ने 1997 में पहली बार 'विशाखा और अन्य बनाम राजस्थान सरकार' मामले में कुछ मार्गदर्शी सिद्धांत सुझाए और सरकार को निदेश दिया कि जब तक कि भारत के संसद द्वारा इस बारे में कोई उपयुक्त कानून नहीं बनाया जाता तब तक उच्चतम न्यायालय के इस मार्गदर्शी सिद्धांत को, संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार कानून माना जाए और किसी भी कार्यस्थल पर चाहे वह सरकरी या निजी हो, इसका अनुसरण किया जाए।
3. भारत सरकार ने 'सेक्सुअल हैरसमेंट ऑफ़ वीमेन ऐट वर्क प्लेस (प्रिवेंशन, प्रॉहिविशन ऐंड रिड्रेसल, 2006) नामक विधेयक तैयार किया था। उस बिल में पुनः संशोधन किया गया और उसे ''दि प्रोटेक्शन ऑफ़ वीमेन अगेंस्ट सेक्सुअल हैरसमेंट ऐट वर्क प्लेस बिल, 2007'' नाम से वेबसाइट के पब्लिक डोमेन में रखा और अनुरोध किया कि इसमें सुझाव दिया जाए। चूंकि वह बिल अभी भी संसद द्वारा पारित करने के लिए संसद के समक्ष लंबित है और इस बीच मीडिया में, हरियाण के भूतपूर्व डी. जी. पी. का मामला बहुत उछाला गया इसलिए सरकार ने इसमें कुछ और संशोधन करने के विचार से पुनः विचार आमंत्रित किया है तथा इस वर्ष इसे पास करने का मन बना लिया है। पहले वाले विधेयक में छह अध्याय, 40धाराएं और तीन अनुसूचियां थीं। परंतु नवीनतम विधेयक में पांच अध्याय, 22 धाराएं और एक अनुसूची है जिसमें विभिन्न कार्यस्थलों का विवरण दिया गया है। यह व्यापक व सरल भाषा में बनाया गया विधेयक है जो पास होने पर उपयोगी सिद्ध्ा होगा।
4. राजभाषा विकास परिषद ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस - 8 मार्च को, 'सेक्सुअल हैरसमेंट ऑफ़ वीमेन ऐट वर्क प्लेस' विषय के विवधि पहलुओं पर चर्चा करने के लिए दो दिवसीय कार्यक्रम की शुरुआत की और इसके विभिन्न पहलुओं पर कानून विदों के साथ व्यापक चर्चा की। इन विषयों पर चर्चा करने के लिए कानून के जानकार, शिक्षण और न्यायालयों में कानून की प्रैक्टिस करने वाले न्याय विदों को आमंत्रित किया गया था।
5. ''दि प्रोटेक्शन ऑफ़ वीमेन अगेंस्ट सेक्सुअल हैरसमेंट ऐट वर्क प्लेस बिल, 2007'' में सेक्सुअल हैरसमेंट की वही परिभाषा शामिल कर ली गई है जोकि सुप्रीम कोर्ट ने विशाखा के मामले में दी। इस विधेयक में पुरुषों के बारे में ध्यान नहीं रखा गया। अतः इस पर व्यापक चर्चा की आवश्यकता है।
रविवार, मार्च 14, 2010
हिंदी में प्रशिक्षण - आम मानसिकता
आमतौर पर, प्रशिक्षण कार्यक्रम मुख्य धारा के कार्यों को अंजाम देने के लिए आयोजित किए जाते हैं जिनमें हिंदी का नामोनिशान नहीं होता है। परंतु भारत सरकार की ओर से निरंतर दबाव रहता है कि कार्यालयी कार्यों में हिंदी के प्रयोग के लिए समयबद्ध तरीके से नियत लक्ष्य प्राप्त किया जाए। इसी सिलसिले संसदीय राजभाषा समिति ने अपना आठवां प्रतिवेदन प्रस्तुत किया है जिसमें सिफ़ारिश की है कि सभी कंप्यूटर प्रणालियाँ द्विभाषिक हों और उनके माध्यम से यूनीकोड आधारित हिंदी में काम करने का प्रशिक्षण भी दिया जाए।
2. सभी संगठन/संस्थाएँ अपने हिसाब से कंप्यूटर द्वारा हिंदी में काम करने के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था कर रही हैं और अपने राजभाषा अधिकारी को, यूनीकोड को सिस्टम में सक्रिय करने का एक दो सत्रों का प्रशिक्षण देकर अपने दायित्व की इतिश्री मान लेती हैं। मुख्य धारा के स्टाफ़ सदस्यों को कंप्यूटर का सामान्य (जनरल) प्रशिक्षण दिलाया जाता है जिसमें हिंदी का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है। वह प्रशिक्षण कंप्यूटर की किसी बाहरी एजेंसी के माध्यम दिलाया जाता है जिनके पास जेनरल (सामान्य) किस्म का पाठ्यक्रम होता है जिसके माध्यम से सभी को प्रशिक्षित किया जाता है। संगठनों की कार्यप्रणाली के अनुसार प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है जिसकी वजह से जब प्रशिक्षणार्थी प्रशिक्षण के उपरांत अपने कार्यस्थल पर वापस जाता है तो उसके द्वारा सीखी गई बातों का उपयोग नहीं हो पाता है। अत: प्रशिक्षण पर लगाए गए समय व धन का वांछित प्रतिलाभ नहीं मिलता है। प्रशिक्षण का उद्देश्य स्टाफ़ सदस्यों को ऐसा कंप्यूटर कॉम्पीटेंट बनाना होना चाहिए जो यूनीकोड आधारित हिंदी माध्यम से दक्षतापूर्वक सारा काम कंप्यूटर द्वारा हिंदी में करने में सक्षम हों।
3. राजभाषा विकास परिषद (परिषद) द्वारा यह पाठ्यक्रम कार्यालय के समस्त दैनिक कार्यों में कंप्यूटर की अधिकाधिक सहायता लेने के लिए सहभागी को सक्षम बनाने हेतु बनाया गया है और सर्वाधिक समय कंप्यूटर पर काम करने के लिए दिया गया है। पाठ्य सामग्री इसी बात को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। इसे मैनुअल के रूप में उपयोग में लाया जाए। इसमें शब्द संसाधन, अंक संसाधन, पावर प्वाइंट, आँकड़ा संसाधन तथा नेटवर्किंग के अलावा कार्यालय के अन्य कार्यों से संबंधित जानकारी देने वाली समाग्री का शुमार किया गया है। कार्यालयी पत्र व्यवहार, पतों का डाटाबेस रखना, उनके आधार पर पूरी परिशुद्धता के साथ अनेक पत्र थोड़े से समय में ही तैयार करना, अपने डेस्क के काम का डाटाबेस तैयार करना, अनेक प्रकार से छवि का संसाधन, उनके उपयोग द्वारा अपने टेक्स्ट को आकर्षक और प्रभावोत्पादक बनाना, प्रकाशन तैयार करना और संचित जानकारी की शीघ्रता से प्राप्ति और उसके आधार पर निर्णय लेने में सहूलियत आदि के लिए दिशा निदेश देने वाली सामग्री का शुमार है। इस कार्यक्रम से प्रशिक्षणोपरांत वापस जाने पर इसका उपयोग करके प्रशिक्षणार्थी अपना काम समस्त काम हिंदी में, समय पर, चुस्ती तथा परिशुद्धता से कर सकेंगे।
4. राजभाषा विकास परिषद गैर सरकारी स्वैच्छिक संस्था है जिसकी स्थापना एक विशेष उद्देश्य से की गई है। इसने ऐसा विशेषीकृत कंप्यूटर लैब बनाया है जिसमें हिंदी में काम करने के संबंध में सॉफ़्टवेयर उपलब्ध हैं। इस प्रशिक्षण में दो नए उपकरण - श्रुतलेखन सॉफ़्टवेयर व मशीन ट्रांस्लेशन सॉफ़्टवेयर शामिल किए गए हैं जिनकी सहायता से हिंदी में काम करना सुकर होगा। अभी तक किसी संस्था ने ऐसा विशेषीकृत लैब बनाना व्यवहार्य नहीं पाया है। परिषद के उद्देश्य इस प्रकार हैं-
1. हिंदी के प्रयोग से संबंधित किसी भी प्रकार का और किसी भी माध्यम से ज्ञान का विस्तार करना या प्रशिक्षण देना,
2. हिंदी के विकास के लिए सामाजिक, सांस्कृतिक और बुद्धिवादी कार्यकलापों का संवर्द्धन,
3. हिंदीं के प्रयोग में सहायक किसी भी प्रकार के साहित्य का सृजन, चाहे वह मौलिक लेखन द्वारा हो, अनुवाद द्वारा हो अथवा संकलन संपादन द्वारा हो,
4. परिषद के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक या सामान्यतया उसमें सहायक कोई गतिविधि शुरू करना।
5. राजभाषा के विकास के लिए कोई संस्था स्थापित करना।
5. लैब में उपर्युक्त सॉफ़्टवेयरों, वाई फ़ाई नेटवर्किंग तथा इंटरनेट से युक्त आधुनिकतम कंप्यूटर हैं तथा विशेषज्ञ संकाय की व्यवस्था है। इन सुविधाओं का उपयोग करके, बैंक व अन्य संगठन अपने मुख्य धारा के स्टाफ़ सदस्यों तथा राजभाषा अधिकारियों को प्रशिक्षित कराने व राजभाषा के कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए कम खर्च पर प्रशिक्षण दिला सकते हैं। संगत जानकारी व संपर्क के लिए परिषद की वेबसाइट देखी जाए। वेबसाइट का पता : http://www.rvparishad.org
2. सभी संगठन/संस्थाएँ अपने हिसाब से कंप्यूटर द्वारा हिंदी में काम करने के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था कर रही हैं और अपने राजभाषा अधिकारी को, यूनीकोड को सिस्टम में सक्रिय करने का एक दो सत्रों का प्रशिक्षण देकर अपने दायित्व की इतिश्री मान लेती हैं। मुख्य धारा के स्टाफ़ सदस्यों को कंप्यूटर का सामान्य (जनरल) प्रशिक्षण दिलाया जाता है जिसमें हिंदी का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है। वह प्रशिक्षण कंप्यूटर की किसी बाहरी एजेंसी के माध्यम दिलाया जाता है जिनके पास जेनरल (सामान्य) किस्म का पाठ्यक्रम होता है जिसके माध्यम से सभी को प्रशिक्षित किया जाता है। संगठनों की कार्यप्रणाली के अनुसार प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है जिसकी वजह से जब प्रशिक्षणार्थी प्रशिक्षण के उपरांत अपने कार्यस्थल पर वापस जाता है तो उसके द्वारा सीखी गई बातों का उपयोग नहीं हो पाता है। अत: प्रशिक्षण पर लगाए गए समय व धन का वांछित प्रतिलाभ नहीं मिलता है। प्रशिक्षण का उद्देश्य स्टाफ़ सदस्यों को ऐसा कंप्यूटर कॉम्पीटेंट बनाना होना चाहिए जो यूनीकोड आधारित हिंदी माध्यम से दक्षतापूर्वक सारा काम कंप्यूटर द्वारा हिंदी में करने में सक्षम हों।
3. राजभाषा विकास परिषद (परिषद) द्वारा यह पाठ्यक्रम कार्यालय के समस्त दैनिक कार्यों में कंप्यूटर की अधिकाधिक सहायता लेने के लिए सहभागी को सक्षम बनाने हेतु बनाया गया है और सर्वाधिक समय कंप्यूटर पर काम करने के लिए दिया गया है। पाठ्य सामग्री इसी बात को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। इसे मैनुअल के रूप में उपयोग में लाया जाए। इसमें शब्द संसाधन, अंक संसाधन, पावर प्वाइंट, आँकड़ा संसाधन तथा नेटवर्किंग के अलावा कार्यालय के अन्य कार्यों से संबंधित जानकारी देने वाली समाग्री का शुमार किया गया है। कार्यालयी पत्र व्यवहार, पतों का डाटाबेस रखना, उनके आधार पर पूरी परिशुद्धता के साथ अनेक पत्र थोड़े से समय में ही तैयार करना, अपने डेस्क के काम का डाटाबेस तैयार करना, अनेक प्रकार से छवि का संसाधन, उनके उपयोग द्वारा अपने टेक्स्ट को आकर्षक और प्रभावोत्पादक बनाना, प्रकाशन तैयार करना और संचित जानकारी की शीघ्रता से प्राप्ति और उसके आधार पर निर्णय लेने में सहूलियत आदि के लिए दिशा निदेश देने वाली सामग्री का शुमार है। इस कार्यक्रम से प्रशिक्षणोपरांत वापस जाने पर इसका उपयोग करके प्रशिक्षणार्थी अपना काम समस्त काम हिंदी में, समय पर, चुस्ती तथा परिशुद्धता से कर सकेंगे।
4. राजभाषा विकास परिषद गैर सरकारी स्वैच्छिक संस्था है जिसकी स्थापना एक विशेष उद्देश्य से की गई है। इसने ऐसा विशेषीकृत कंप्यूटर लैब बनाया है जिसमें हिंदी में काम करने के संबंध में सॉफ़्टवेयर उपलब्ध हैं। इस प्रशिक्षण में दो नए उपकरण - श्रुतलेखन सॉफ़्टवेयर व मशीन ट्रांस्लेशन सॉफ़्टवेयर शामिल किए गए हैं जिनकी सहायता से हिंदी में काम करना सुकर होगा। अभी तक किसी संस्था ने ऐसा विशेषीकृत लैब बनाना व्यवहार्य नहीं पाया है। परिषद के उद्देश्य इस प्रकार हैं-
1. हिंदी के प्रयोग से संबंधित किसी भी प्रकार का और किसी भी माध्यम से ज्ञान का विस्तार करना या प्रशिक्षण देना,
2. हिंदी के विकास के लिए सामाजिक, सांस्कृतिक और बुद्धिवादी कार्यकलापों का संवर्द्धन,
3. हिंदीं के प्रयोग में सहायक किसी भी प्रकार के साहित्य का सृजन, चाहे वह मौलिक लेखन द्वारा हो, अनुवाद द्वारा हो अथवा संकलन संपादन द्वारा हो,
4. परिषद के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक या सामान्यतया उसमें सहायक कोई गतिविधि शुरू करना।
5. राजभाषा के विकास के लिए कोई संस्था स्थापित करना।
5. लैब में उपर्युक्त सॉफ़्टवेयरों, वाई फ़ाई नेटवर्किंग तथा इंटरनेट से युक्त आधुनिकतम कंप्यूटर हैं तथा विशेषज्ञ संकाय की व्यवस्था है। इन सुविधाओं का उपयोग करके, बैंक व अन्य संगठन अपने मुख्य धारा के स्टाफ़ सदस्यों तथा राजभाषा अधिकारियों को प्रशिक्षित कराने व राजभाषा के कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए कम खर्च पर प्रशिक्षण दिला सकते हैं। संगत जानकारी व संपर्क के लिए परिषद की वेबसाइट देखी जाए। वेबसाइट का पता : http://www.rvparishad.org
बुधवार, मार्च 03, 2010
कनिष्ठ/नव नियुक्त राजभाषा अधिकारियों के लिए एकीकृत गहन विकास कार्यक्रम प्रशिक्षण कार्यक्रम
राजभाषा विकास परिषद, नवंबर 2007 से बैंकों/पीएसयू/सरकारी कार्यालयों में कार्यरत अधिकारियों के लिए विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करती आ रही है। परिषद का उद्देश्य समस्त कार्यालयी कार्यों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने व विशेष रूप से कंप्यूंटर द्वारा हिंदी में करने के लिए प्रशिक्षण देना है। प्रथम चरण में मुख्य धारा के अधिकारियों तथा राजभाषा अधिकारियों के लिए अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित किए गए। कार्यक्रमों के दौरान सुझाव प्राप्त हुए हैं कि राजभाषा अधिकारियों के लिए ऐसे एकीकृत गहन विकास कार्यक्रम की आवश्यकता है जिसमें राजभाषा अधिकारियों को, राजभाषा अधिकारियों के कार्य (ड्यूटी) व राजभाषा के कार्यान्वयन से जुड़े समस्त पहलुओं को शामिल करते हुए पूर्ण रूप से कंप्यूटरीकृत महौल में काम करने का गहन प्रशिक्षण दिया जाए। इसके लिए एकीकृत गहन विकास कार्यक्रम (इंडक्शान) कार्यक्रम आयोजित करने की आवश्यकता है।
2. अतः राजभाषा विकास परिषद ने कार्यक्रम विकसित किया है और इसकी सूचना बैंकों/पीएसयू/सरकारी कार्यालयों को दी है। चूंकि यह कार्यक्रम अन्यू कार्यक्रमों की अपेक्षा अधिक समयावधि वाला होगा और उसमें विभिन्नक क्षेत्रों के विषय विशेषज्ञ सत्रों का संचालन करेंगे इसलिए इसकी पूर्व योजना और परिषद को पूर्व सूचना आवश्यक होगी। हमारे अन्य कार्यक्रम पांच दिवसीय होते हैं। आपसे अनुरोध है कि यदि आपके नव नियुक्तव राजभाषा अधिकारी हों और उन्हें एकीकृत गहन विकास कार्यक्रम (इंडक्शनन) में शामिल कराना चाहते हों तो 31 मई 2010 तक देने की कृपा करें ताकि व्यकवस्था की जा सके। इस कार्यक्रम में, सहभागी संस्था के विशेष के कार्यों के अनुसार विशिष्ट विषयों को भी शामिल किया जा सकता है।
3. चूंकि यह कार्यक्रम यूनीकोड आधारित हिंदी माध्यतम से पूर्णतः पेपरलेस ऑफ़िस की संकल्पना को ध्यान में रखकर बनाया गया है इसलिए सभी सत्रों में कंप्यू्टर पर ही कार्य व प्रशिक्षण होंगे। इसलिए यह आवश्यक होगा कि इसमें भाग लेने वाले अधिकारी को टाइपिंग का आधारभूत ज्ञान हो। शब्दावली सर्च व निर्माण में कंप्यूपटर के उपयोग, सॉफ़्टवेयरों की डाउनलोडिंग, यूनीकोड की सेटिंग, अन्य नॉन स्टैंडर्ड कोडों में तैयार की गई टेक्सट फ़ाइलों को यूनीकोड में परिवर्तित करने और उसके उपरांत बिना किसी थर्ड पार्टी सॉफ़्टवेयर के बिना हिंदी में संपूर्ण कार्य करने का ऑन कंप्यूयटर प्रशिक्षण इस कार्यक्रम की अनोखी विशेषताएं होंगी। इस प्रशिक्षण के उपरांत कोई भी राजभाषा अधिकारी कंप्यूटर कॉम्पीटेंट बन कर जाएगा जो अपना सारा काम कंप्यूटर पर करने में न केवल सक्षम होगा बल्कि अन्य लोगों को भी प्रशिक्षण देने में कुशल होगा। यह समग्र विकास कार्यक्रम होगा जिसे 23 अगस्त से 03 सितंबर 2010 तक आयोजित करने का प्रस्ताव है।
4. अनुरोध है कि राजभाषा विभाग/अनुभाग/कक्ष के प्रभारी इस बारे में अपनी संस्था से संपर्क करके कार्यक्रम का पूरा लाभ लें।
(डॉ. दलसिंगार यादव)
निदेशक
2. अतः राजभाषा विकास परिषद ने कार्यक्रम विकसित किया है और इसकी सूचना बैंकों/पीएसयू/सरकारी कार्यालयों को दी है। चूंकि यह कार्यक्रम अन्यू कार्यक्रमों की अपेक्षा अधिक समयावधि वाला होगा और उसमें विभिन्नक क्षेत्रों के विषय विशेषज्ञ सत्रों का संचालन करेंगे इसलिए इसकी पूर्व योजना और परिषद को पूर्व सूचना आवश्यक होगी। हमारे अन्य कार्यक्रम पांच दिवसीय होते हैं। आपसे अनुरोध है कि यदि आपके नव नियुक्तव राजभाषा अधिकारी हों और उन्हें एकीकृत गहन विकास कार्यक्रम (इंडक्शनन) में शामिल कराना चाहते हों तो 31 मई 2010 तक देने की कृपा करें ताकि व्यकवस्था की जा सके। इस कार्यक्रम में, सहभागी संस्था के विशेष के कार्यों के अनुसार विशिष्ट विषयों को भी शामिल किया जा सकता है।
3. चूंकि यह कार्यक्रम यूनीकोड आधारित हिंदी माध्यतम से पूर्णतः पेपरलेस ऑफ़िस की संकल्पना को ध्यान में रखकर बनाया गया है इसलिए सभी सत्रों में कंप्यू्टर पर ही कार्य व प्रशिक्षण होंगे। इसलिए यह आवश्यक होगा कि इसमें भाग लेने वाले अधिकारी को टाइपिंग का आधारभूत ज्ञान हो। शब्दावली सर्च व निर्माण में कंप्यूपटर के उपयोग, सॉफ़्टवेयरों की डाउनलोडिंग, यूनीकोड की सेटिंग, अन्य नॉन स्टैंडर्ड कोडों में तैयार की गई टेक्सट फ़ाइलों को यूनीकोड में परिवर्तित करने और उसके उपरांत बिना किसी थर्ड पार्टी सॉफ़्टवेयर के बिना हिंदी में संपूर्ण कार्य करने का ऑन कंप्यूयटर प्रशिक्षण इस कार्यक्रम की अनोखी विशेषताएं होंगी। इस प्रशिक्षण के उपरांत कोई भी राजभाषा अधिकारी कंप्यूटर कॉम्पीटेंट बन कर जाएगा जो अपना सारा काम कंप्यूटर पर करने में न केवल सक्षम होगा बल्कि अन्य लोगों को भी प्रशिक्षण देने में कुशल होगा। यह समग्र विकास कार्यक्रम होगा जिसे 23 अगस्त से 03 सितंबर 2010 तक आयोजित करने का प्रस्ताव है।
4. अनुरोध है कि राजभाषा विभाग/अनुभाग/कक्ष के प्रभारी इस बारे में अपनी संस्था से संपर्क करके कार्यक्रम का पूरा लाभ लें।
(डॉ. दलसिंगार यादव)
निदेशक
मंगलवार, फ़रवरी 23, 2010
हिंदी कार्यान्वयन के लिए समितियां
1. प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय हिंदी समिति वर्ष 1967 में गठित हुई. यह शीर्ष समिति है जो संघ की राजभाषा के रूप में हिंदी के प्रगामी प्रयोग के लिए दिशानिदेश नीति निर्धारित करती है।
2. राजभाषा अधिनियम 1963 की धारा 4(4) के तहत गृह मंत्री की अध्यक्षता में राजभाषा संसदीय समिति का गठन 1976 में किया गया था। उसके बाद हर लोक सभा के आम चुनाव के बाद इस समिति का पुनर्गठन किया जाता है। इसमें 20 लोक सभा के सांसद होते हैं तथा 10 राज्य सभा के। इसकी अलग अलग उप समितियां होती हैं जिसका उपाध्यक्ष उप समिति के सदस्यों में से वरिष्ठतम सदस्य होता है। यह समिति विभिन्न कार्यालयों में जाती है और निरीक्षण के बाद अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपती है। राष्ट्रपति उसे सदन के पटल पर रखवाते हैं और उसपर अपनी सहमति देकर सभी विभागों/मंत्रालयों में भेजवाते हैं।
3. सभी मंत्रालयों में, प्रभारी मंत्री की अध्यक्षता में हिंदी सलाहकार समितियों का गठत किया गया है। इन समितियों की बैठकों में,समय समय पर अपने संबंधित मंत्रालयों में हिंदी के प्रयोग की प्रगति की समीक्षा करती है। विभागों और कार्यालयों / उपक्रमों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए और उपायों का सुझाव देती है।
4. केंद्रीय राजभाषा कार्यान्वयन समिति का गठन सभी कार्यालयों / विभागों में किया गया है। इसका अध्यक्ष कैबिनेट सचिव(राजभाषा) होता है।
5. हर विभाग में राजभाषा कार्यान्वयन समिति गठित की गई है जिसका अध्यक्ष विभाग का संयुक्त सचिव होता है। विभाग में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए प्रगति की समीक्षा करती है और समयबद्ध कार्यक्रमों के अनुसार नियत लक्ष्यों की प्राप्ति के उपायों का सुझाव देती है।
2. राजभाषा अधिनियम 1963 की धारा 4(4) के तहत गृह मंत्री की अध्यक्षता में राजभाषा संसदीय समिति का गठन 1976 में किया गया था। उसके बाद हर लोक सभा के आम चुनाव के बाद इस समिति का पुनर्गठन किया जाता है। इसमें 20 लोक सभा के सांसद होते हैं तथा 10 राज्य सभा के। इसकी अलग अलग उप समितियां होती हैं जिसका उपाध्यक्ष उप समिति के सदस्यों में से वरिष्ठतम सदस्य होता है। यह समिति विभिन्न कार्यालयों में जाती है और निरीक्षण के बाद अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपती है। राष्ट्रपति उसे सदन के पटल पर रखवाते हैं और उसपर अपनी सहमति देकर सभी विभागों/मंत्रालयों में भेजवाते हैं।
3. सभी मंत्रालयों में, प्रभारी मंत्री की अध्यक्षता में हिंदी सलाहकार समितियों का गठत किया गया है। इन समितियों की बैठकों में,समय समय पर अपने संबंधित मंत्रालयों में हिंदी के प्रयोग की प्रगति की समीक्षा करती है। विभागों और कार्यालयों / उपक्रमों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए और उपायों का सुझाव देती है।
4. केंद्रीय राजभाषा कार्यान्वयन समिति का गठन सभी कार्यालयों / विभागों में किया गया है। इसका अध्यक्ष कैबिनेट सचिव(राजभाषा) होता है।
5. हर विभाग में राजभाषा कार्यान्वयन समिति गठित की गई है जिसका अध्यक्ष विभाग का संयुक्त सचिव होता है। विभाग में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए प्रगति की समीक्षा करती है और समयबद्ध कार्यक्रमों के अनुसार नियत लक्ष्यों की प्राप्ति के उपायों का सुझाव देती है।
शनिवार, फ़रवरी 20, 2010
हिंदी दिवस समारोह मनाने की शुरुआत
हिंदी दिवस समारोह मनाने की शुरुआत 14 सितंबर 1954 से हुई । 10 और 11 नवंबर 1953 को काका साहब न. वि. गाडगिल की अध्यक्षता में नागपुर में 'अखिल भारतीय राष्ट्रभाषा प्रचार सम्मेलन' का पांचवां अधिवेशन हुआ था। उस अधिवेशन में, जब तक हिंदी को अंग्रेज़ी के स्थान पर पूर्ण रूप से 'राजभाषा' का स्थान नहीं प्राप्त हो जाता तब तक '14 सितंबर' को 'हिंदी दिवस' के रूप में स्मरण करते रहने का विचार सामने आया और औपचारिक रूप से प्रस्ताव पारित हुआ कि ''यह सम्मेलन निश्चय करता है कि स्वतंत्र भारत के संविधान ने जिस दिन हिंदी को 'राजभाषा' तथा 'देवनागरी' को राष्ट्रलिपि स्वीकार किया है उस दिन अर्थात्, 14 सितंबर को संपूर्ण भारत में 'हिंदी दिवस' मानाया जाएगा।''
2. इस प्रस्ताव के प्रस्तावक श्री जेठामल जोशी तथा अनुमोदक श्रीमती मैना गाडगिल थे। प्रस्ताव के समर्थक थे श्रीमती राधा देवी गोयनका तथा श्री भा. ग. जोगलेकर। इसी प्रस्ताव के आधार पर राष्ट्र भाषा प्रचार सभा, वर्धा के तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री मोहन लाल भट्ट ने 30 नवंबर 1953 को सभी प्रांतीय समितियों, ज़िला समतियों, नगर समितियों, हिंदी के कार्य से जुड़े, देश के तमाम कार्यालयों और विशिष्ट व्यक्तियों को पत्र भेजा। उस पत्र द्वारा आगामी 14 सितंबर 1954 को ''हिंदी दिवस' मनाने का विनम्र आग्रह किया गया। इस प्रकार 14 सितंबर 1954 को 'हिंदी दिवस' मनाने का सिलसिला प्रारंभ हुआ।
3. हिंदी सेवियों और हिंदी के वेतनभोगियों से विनम्र अनुरोध है कि हिंदी के रास्ते में सहायक बनें रोड़ा न बनें और अधिकारी का भाव न रखकर मशिनरी की भावना से हिंदी का प्रचार प्रसार करें।
2. इस प्रस्ताव के प्रस्तावक श्री जेठामल जोशी तथा अनुमोदक श्रीमती मैना गाडगिल थे। प्रस्ताव के समर्थक थे श्रीमती राधा देवी गोयनका तथा श्री भा. ग. जोगलेकर। इसी प्रस्ताव के आधार पर राष्ट्र भाषा प्रचार सभा, वर्धा के तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री मोहन लाल भट्ट ने 30 नवंबर 1953 को सभी प्रांतीय समितियों, ज़िला समतियों, नगर समितियों, हिंदी के कार्य से जुड़े, देश के तमाम कार्यालयों और विशिष्ट व्यक्तियों को पत्र भेजा। उस पत्र द्वारा आगामी 14 सितंबर 1954 को ''हिंदी दिवस' मनाने का विनम्र आग्रह किया गया। इस प्रकार 14 सितंबर 1954 को 'हिंदी दिवस' मनाने का सिलसिला प्रारंभ हुआ।
3. हिंदी सेवियों और हिंदी के वेतनभोगियों से विनम्र अनुरोध है कि हिंदी के रास्ते में सहायक बनें रोड़ा न बनें और अधिकारी का भाव न रखकर मशिनरी की भावना से हिंदी का प्रचार प्रसार करें।
बुधवार, फ़रवरी 17, 2010
राजभाषा हिंदी - सांविधिक स्थिति
देश की स्वतंत्रता के निर्णय के साथ ही भारत के नेताओं ने हिंदी को देश की राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार कर लिया था परंतु संविधान में इसे राष्ट्रभाषा न कहकर राजभाषा नाम दे दिया गया और आज यह दुष्प्रचार किया जा रहा है कि हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं है बल्कि यह अन्य भारतीय भाषाओं की ही भांति एक भाषा है और यह केंद्र सरकार के राजकाज की भाषा है।
2. भारत सरकार ने भी इसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया और 1967 में भारत के संविधान में संशोधन करके हिंदी को 1965 के बाद अंग्रेज़ी का पर्याय बनने से रोक दिया और ऐसी परिस्थिति का निर्माण कर दिया है कि हिंदी वास्तविक रूप में राष्ट्रभाषा बन ही नहीं सकती है।
3. सांविधानिक प्रावधानों के अनुसार जब तक देश के सभी राज्यों के दोनों सदनों में इस आशय का संकल्प न पारित कर दिया जाए कि हिंदी भारत संघ की राजभाषा होगी और उसके बाद भारतीय संसद के दोनों सदनों में भी ऐसा ही संकल्प नहीं पारित कर दिया जाता तब तक देश के काम काज से अंग्रेज़ी का संपूर्ण रूप से समापन नहीं हो पाएगा। चूंकि संविधान का अनुच्छेद 345 अभी नागालैंड को अंग्रेज़ी के उपयोग की शक्ति देता है इसलिए नागालैंड हिंदी को नहीं स्वीकार कर पाएगा। अतः यह असंभव जैसी स्थिति बन गई है। हम संसदीय समिति और समयबद्ध कार्यक्रमों के माध्यम से अनंत काल तक प्रयास करने और हिंदी के प्रगामी प्रयोग का दिखावा करते रहेंगे और हरसाल करोड़ों रुपए खर्च करते रहेंगे लेकिन हिंदी को राष्ट्रभाषा नहीं बना पाएंगे।
4. राजभाषा विकास परिषद ने इसके लिए संवैधानिक लड़ाई प्रारंभ की है। नागपुर हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। इसमें हिंदी सेवकों तथा संगठनों का सहयोग आवश्यक और वांछनीय है।
डॉ. दलसिंगार यादव
निदेशक
राजभाषा विकास परिषद
नागपुर
17.02.2010
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