रविवार, अगस्त 07, 2011

बैंकों की प्रशिक्षण संस्थाओं में हिंदी का प्रवेश और अब तक तय की गई दूरी

राजभाषा संसदीय समिति का गठन राजभाषा अधिनियम की धारा 4 के तहत वर्ष 1976 में किया गया। इस समिति में संसद के 30 सदस्य होने का प्रावधान है 20 लोकसभा से और 10 राज्यसभा से। बाद में 1977, 1980, 1984, 1989, 1991, 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों के पश्चात् समिति का पुनर्गठन हुआ है।
इस समिति का कर्तव्य है कि संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए हिंदी के प्रयोग में की गई प्रगति का पुनरावलोकन करे और उस पर सिफ़ारिश करते हुए राष्ट्रपति को प्रतिवेदन प्रस्तुत करे। राष्ट्रपति उस प्रतिवेदन को संसद के हर सदन के समक्ष रखने के लिए आदेश जारी करेंगे और सदन के अनुमोदन के बाद उसे सभी राज्य सरकारों, संघ शासित क्षेत्रों की सरकारों, केंद्रीय सरकार के सभी मंत्रालयों, कार्यालयों, निगमों, कमीशनों, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को भेजा जाता है।
अपने प्रेक्षण के आधार पर केंद्रीय सरकार के कार्यालयों में हिंदी के प्रयोग से संबंधित स्थिति की समीक्षा करते हुए समिति द्वारा अपना प्रतिवेदन सिफारिशों सहित राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाता है ताकि केंद्र सरकार के कार्यालयों को हिंदी का अधिकतम प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके जिससे संवैधानिक उपबंधों के लक्ष्य प्राप्त हो सकें। वस्तुस्थिति का मूल्यांकन करने के लिए समिति ने अन्य तरीकों के साथ-साथ केंद्रीय सरकार के विभिन्न कार्यकलापों का निरीक्षण करने का भी निर्णय लिया था।
समिति ने 1987 में पुणे में कार्यालयों का दौरा किया और उसमें भारतीय रिज़र्व बैंक के कृषि बैंकिंग महाविद्यालय के प्रधानाचार्य व तत्कालीन कार्यपालक निदेशक सत्यानंद बगाई के साथ चर्चा की और कहा कि सरकारी क्षेत्र के बैंकों की प्रशिक्षण संस्थाओं में हिंदी माध्यम से प्रशिक्षण देने की शुरुआत की जाए और प्रथम चरण में, बैंकों के विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों में इस्तेमाल होने वाली पाठ्य सामग्री का हिंदी अनुवाद छह महीने में पूरा कर लिया जाए तथा उसके बाद प्रशिक्षण कार्यकेरम हिंदी माद्यम से आयोजित किए जाएँ।
कृषि बैंकिंग महाविद्यालय के प्रधानाचार्य ने सभी बैंकों की शीर्ष प्रशिक्षण संस्थाओं के प्रधानाचार्यों, मानव संसाधन विकास विभाग के प्रमुखों की बैठक बुलाई और पाठ्य सामग्री के हिंदी अनुवाद का काम प्रारंभ कराया। परंतु वह काम आगे नहीं बढ़ पाया क्योंकि समन्वय कार्य के लिए कोई उपयुक्त और पूर्णकालिक राजभाषा अधिकारी नहीं नियुक्त किया गया था। अतः काम आगे बढ़ता न देख भारतीय रिज़र्व बैंक नो कृषि बैंकिंग महाविद्यालय के प्रधानाचार्य के पास एक प्रबंधक (राजभाषा) नियुक्त कर दिया और पाठ्य सामग्री का हिंदी अनुवाद छह महीने में पूरा करने का लक्ष्य रखा। बैंक ने उसे तो पूरा किया ही उसके साथ ही सभी बैंकों की पाठ्य सामग्री का भी हिंदी अनुवाद छह महीने में पूरा करा लिया। वह गुरुतर काम था जिसे रिज़र्व बैंक ने कराया था। उसके बाद अगले चरण की शुरुआत होनी थी और वह भी शुरू किया गया और लक्ष्य रखा गया कि बैंक अपने क क्षेत्र और ख क्षेत्र में स्थित प्रशिक्षण संस्थाओं में हिंदी माध्यम से प्रशिक्षण शुरू कराएँ तथा समयबद्ध तरीके से उनकी संख्या में वृद्धि की जाए। इस प्रकार बैंकों की प्रशिक्षण संस्थाओं में हिंदी का प्रयोग शुरू हुआ परंतु बाद में आँकड़ों का खेल शुरू हो गया और आज वैश्विकता और लाभप्रदता के नाम पर हिंदी प्रशिक्षण संस्थाओं में हाशिए पर आ गई है।
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4 टिप्‍पणियां:

  1. मैंने भी अपने अनुभवों से नोट किया है कि बैंक में अन्य सरकारी कार्यालय और उपक्रमों की तुलना में राजभाषा कार्यान्वयन की दिशा में अच्छा काम हुआ है।

    हां उनके वेब साइट द्विभाषी नहीं दिखते। अगर आपकी पहुंच हो तो इस ओर ध्यान आकर्षित करवाएं।

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  2. भाई यादव जी , हिन्दी के प्रति आपका लगाव अच्छा लगा और उसके प्रचार-प्रसार में सत्यनिष्ठा से लगे रहना और भी प्रशंसनीय है। यह भी आत्मीय लगा कि आप आजमगढ़ के हैं ,मैं भी वहीं का हूँ, इसीलिए।
    हरिशंकर राढ़ी
    सहसंपादक- समकालीन अभिव्यक्ति

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  3. अच्छा तो शुरूआत तो हुई लेकिन नौटंकी शुरू हो ही गई। बैंकों में तो आज नौकरी के लिए अंग्रेजी अत्यंत आवश्यक कर दी गयी है। यह कैसी हिन्दी की सेवा है? यही नहीं चेक-ड्राफ़्ट आदि तो कहीं हिन्दी में देखे भी नहीं आज तक। सब को पता नहीं अंग्रेजी-हिन्दी में यानि दोनों भाषाओं में कर के, क्यों पैसा, स्याही और कागज बरबाद करते हैं ये लोग? आखिर किसी इलाके के लोग जानते तो एक ही भाषा हैं, हिन्दी चाहे अंग्रेजी? और सबका खयाल रखने के लिए हिन्दी नहीं है जो अंग्रेजी की सेवा जारी है?

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