शनिवार, अगस्त 28, 2010

रुपए के प्रतीक का विवाद - चिंतनहीन विवाद

डी. उदय कुमार ने जब रुपए के प्रतीक की कल्पना की होगी तो उनके मन में भाषावाद, क्षेत्रीयतावाद, व्यक्तिवाद या संपूर्ण देश के सिवाय कोई अन्य संकीर्णतावाद की बात निश्चित ही नहीं आई होगी। परंतु देश के बुद्धिजीवियों में एक, दि टाइम्स ऑफ़ इंडिया के वरिष्ठ और अंग्रेज़ीदां जग सुरैया ने दूर की कौड़ी लाकर परोस दिया कि यह क्षेत्रीयतावाद और हिंदी भाषियों की संकीर्णतावादी नीति का परिचायक है(दि टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 27 अगस्त 2010, पृष्ठ 12)। अपनी बात के समर्थन में इन्होंने बंद पिंजड़े में सीमित रहकर, संकुचित दायरे में दहाड़ने वाले निस्तेज पड़ गए शेर बाल ठाकरे, आतंकित और सहमे हुए गुजरातियों के सामने केसरी बने मोदी, आउटडेटेड और दूसरे के कंधों का सहारा लेकर चलने वाले संकुचित विचार वाले करुणानिधि तथा निहित स्वार्थ से प्रेरित एवं अपने निजी स्वार्थ के आगे देश हित की बलि चढ़ा देने वाले राज नेताओं द्वारा किए गए प्रदर्शनों का उल्लेख किया है जिन्हें क्षेत्रीयतावाद, संकीर्णतावादी धर्मवाद, जातिवाद तथा व्यक्तिवाद की राजनीति करने का अवसर मिल गया।
स्वतंत्र भारत में सभी को अपना विचार व्यक्त करने की आज़ादी हमारा संविधान देता है, यह हमारा मौलिक अधिकार है। परंतु हम सिर्फ़ अधिकारों की ही बात करते हैं। कर्तव्य की नहीं। अतः मुख है तो कुछ तो बकना चाहिए(मुखस्ति किंचित् वक्तव्यम्)। इसलिए किसी के बकने पर तो प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है। लेकिन बुद्धिजीवियों को ऐसे लोगों के झांसे में नहीं आना चाहिए। तभी तो बंगलौर वासी कंप्यूटर इंजीनियर ने कुछ ही घंटों में 'रुपी फ़ोरेडियन' (Rupee Foradian) नाम से फ़ॉन्ट बनाकर मुफ़्त में बांट दिए। क्या यह का स्वनामधन्य नेताओं या जग सुरैया जी ने किया? रुपए के इस प्रतीक का सबसे पहले और आज भी सबसे ज़्यादा उपयोग टाइम्स समूह ही कर रहा है और पूरे विश्व में इस पहचान को लोकप्रिय बनाकर डॉलर, पौंड, यूरो के समकक्ष लाकर खड़ा कर दिया है। इसके लिए टाइम्स समूह बधाई व धन्यवाद का पात्र है।
डी. उदय कुमार व 'रुपी फ़ोरेडियन' के निर्माता न तो हिंदी भाषी हैं और न ही हिंदी की वकालत करने वाले हैं। फिर भी इन्होंने देश के लिए महान कार्य में बहुत बड़ा योगदान किया है। ये दोनों सज्जन सम्माननीय और सराहनीय हैं।
भारतीय रिज़र्व बैंक जिसने इस कार्य को कराकर देश का गौरव बढ़ाया है वह कोई मामूली संस्था नहीं है। यह देश की सर्वश्रेष्ठ, ईमानदार तथा देश हित में काम करने वाली सर्वोच्च संस्था है जो विवादों और माडिया से परे रहकर देश की सेवा में कार्यरत है। इसके ऊपर भाषावाद, क्षेत्रीयतावाद, व्यक्तिवाद और संकीर्णतावाद का आरोप नहीं लगाया जा सकता है। यह इन सबसे ऊपर देश की गौरवशाली संस्था है। अतः रुपए के प्रतीक को चिंतन विहीन विवाद का विषय न बनाया जाए।

3 टिप्‍पणियां:

  1. नमस्ते दलसिंगार जी. मैं निरुपम शर्मा कोलकाता से. लखनऊ में बर्ड की ट्रेनिंग में साथ थे. याद आया? सच रुपये की पहचान पर सभी भारतीयों को गर्व होना चाहिए. उसे किसी भी संकीर्णता से परे ही रखना चाहिए. रुपये के निशान को हमें वही मान देना चाहिए जो दिल्ली में आयोजित एशियन गेम्स के समय पं. रविशंकर द्वारा तैयार स्वागत गान - अथ स्वागतम शुभ स्वागतम को दिया तथा अब कामनवैल्थ गेम्स के लिए ए आर रहमान द्वारा तैयार स्वागत गान को दिया जा रहा है. हिन्दी संबंधी चिंतन को, चर्चा को सेवाकाल से परे ले जाने के लिए बधाई.

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  2. प्रिय निरुपम जी,
    मुझे बर्ड की ट्रेनिंग और आप अच्छी तरह याद हैं। रुपए के प्रतीक के विवाद के बारे में आपकी टिप्पणी सार्थक और सच्ची है। आपका ब्लॉग भी पढ़ा। बहुत पर्सनल लगा।
    धन्यवाद।

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  3. बहुत अच्छा लगा कि आपने मुझे याद रखा, मेरा ब्लॉग भी पढ़ा. जी हाँ पर्सनल सा तो है. मन की बातें हैं जो जब कभी मन होता है तो ब्रह्मांड में फेंक देता हूँ ब्लॉग के माध्यम से.

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क्या रुपए का नया प्रतीक क्षेत्रीयता का परिचायक है?