शनिवार, जून 12, 2010

माननीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जी को पत्र

दिनांक 12 जून 2010 22 ज्येष्ठ 1932 (शक)
माननीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जी,

राजभाषा हिंदी की सांविधिक स्थिति और वास्तविक दुर्दशा

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में स्थायी समिति के रूप में केंद्रीय हिंदी समिति वर्ष 1967 में गठित हुई थी। यह शीर्ष समिति है जो संघ की राजभाषा के रूप में हिंदी के प्रगामी प्रयोग के लिए दिशानिदेश व नीति निर्धारित करती है। आप इसके वर्तमान अध्यक्ष हैं। संभवतः आपने अपने कार्यकाल में किसी बैठक की अध्यक्षता भी की होगी। परंतु मुझे नहीं लगता है कि आपके सामने राजभाषा हिंदी का असली मुद्दा रखा गया होगा। मैं उस असली मुद्दे की बात कर रहा हूं जिसे राजभाषा अधिनियम, 1963 द्वारा अनंत काल के लिए टाल दिया गया था और अब वह समय बीतने के साथ भुला दिया गया है। राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 3(5) ने राजभाषा हिंदी की स्थिति को वास्तविक रूप में, देश की राजभाषा के दर्जे को अनंत काल तक के लिए टाल दिया है और अनंत काल काल का मतलब राजभाषा के रूप में हिंदी को नकारना है।

2. हिंदी के प्रश्न को संवविधान में अनंत काल तक के लिए टालने का फ़ैसला जनता द्वारा नहीं किया गया है और न ही किसी समिति द्वारा सुझाया गया था। आज तक जितनी भीं समितियां, आयोग बने किसी ने भी हिंदी के प्रश्न को समय सीमा (पंद्रह साल) से परे रखने की सिफ़ारि‍श नहीं की है। राजभाषा आयोग, विश्व विद्यालय अनुदान आयोग, केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड, सभी ने हिंदी व क्षेत्रीय भाषाओं में ही शिक्षा दीक्षा देने की सिफ़ारिश की है। तब संविधान में हिंदी को अनिश्चित काल के लिए टालने की बात कहां से आई? यह निश्चित रूप से कोई सोची समझी चाल तथा प्रच्छन्न विद्वेष की भावना लगती है। इसे समझने और गलती को सुधारने की आवश्यसकता है।

3. कार्यालयों में हिंदी को प्रचलित करने तथा स्टाकफ़ सदस्यों को सक्षम बनाने के लिए सारी व्यवस्था में सत्यनिष्ठा का अभाव है। राजभाषा संसदीय समिति व राजभाषा विभाग के निरीक्षण, बैठकों के आयोजन सब महज खाना पूर्ति लगते हैं। यदि ऐसा नहीं है तो राजभाषा संसदीय समिति ने अब तक नागालैंड सरकार द्वारा राज्य की राजभाषा के बारे में कोई निर्णय करने की सिफ़ारिश क्यों नहीं की जोकि राजभाषा के रास्ते में रुकावट है? अब तक राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 3(5) के प्रवधान में संशोधन की सिफ़रिश क्यों नहीं की? अतः राजभाषा संसदीय समिति की भूमिका और राजभाषा विभाग की कार्यपद्धति पर पुनर्विचार की ज़रूरत है।

4. आशा है आप जैसे विद्वान, निष्पक्ष और देशप्रेमी व्यक्ति से इस विषय में पहल की उम्मीद की जा सकती है जिससे अंग्रेज़ी की वजह से करोड़ों लोगों को होने वाली क्षति और असुविधा को दूर किया जाएगा। अंग्रेज़ी से केवल हिंदी भाषी ही नहीं नुकसान उठा रहे हैं बल्कि इसकी वजह से देश का दक्षिण, पूर्व और पश्चिम भाग भी नुकसान उठा रहा है।

5. इस बारे में सभी सोचते हैं परंतु आप को लिखने में हिचकते हैं। अनुरोध है कि आप इस बारे में सार्थक पहल करेंगे और परिषद के इस पत्र की पावती देने का आदेश करेंगे।

सादर और सविनय,

भवदीय,
दलसिंगार यादव)

डॉ. मनमोहन सिंह
प्रधान मंत्री
भारत सरकार
प्रधान मंत्री का कार्यालय
साउथ ब्लॉक, रायसीना हिल्स
नई दिल्ली-110 101

4 टिप्‍पणियां:

  1. हर देश की अपनी भाषा है,
    क्यों भारत में ही निराशा है?
    एक जुबाँ के लिए तरसते हैं,
    बाहर तो खूब गरजते हैं.

    जब सदन में चर्चा उठती है,
    हिंदी की लुटिया डूबती है.
    हाउस में वो शर्माते हैं,
    जो हिंदी की ही खाते हैं.

    चुप बैठे वे क्यों रहते हैं?
    जो बाहर खूब गरजते हैं.
    क्या भय है अन्दर उनके,
    जो घुट-घुट कर वे सहते हैं?

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  2. तिवारी जी धन्यवाद। परंतु मुझे जनमत चाहिए। आप संविधान संशोधन पर मुहिम चलाएं।

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  3. श्री यादव जी, आपने माननीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी को संबोधित अपने पत्र में हिंदी की दशा और दिशा के बारे में अवगत कराया है। यह बात बिल्कुल सत्य है कि जब तक ऊपर बैठे सत्ताधारी हिंदी में हस्तक्षेप नहीं करेंगे तबतक हिंदी का भला नहीं होगा। लोग अपनी जीविकोपार्जन हिंदी की वजह से कर रहे हैं लेकिन गुणगान अंग्रेजी का ही कर रहे हैं लगता है अब वो दिन दूर नहीं जब हिंदी को लेकर क्रांति आए। हम जैसे लोग हिंदी को बढ़ाने के लिए तड़प रहे हैं पर न सही मंच मिला और न मौका । सरकारी दप्तरों में हिंदी अधिकारी को समस्त हिंदी के कार्यों के लिए जाना जाता है। यदि कोई भी हिंदी से संबंधित कार्य आता है तो सभी हाथ खड़े कर देते हैं और उसको हिंदी अधिकारी पर छोड़ देते हैं। क्या ऐसे ही हिंदी का विस्तार होगा ? क्या हिंदी को बढ़ाने में हरेक की जिम्मेदारी नहीं है ? जिस उम्मीद के साथ हमें आजादी मिली थी उसका क्या हुआ? है किसी के पास जवाब.... ?

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  4. विजय प्रभाकर कांबले ने कहा…
    बहुत सटिक पत्र है। धन्यवाद। जब हिंदी की अवहेलना उच्च स्तर पर होगी तो उसे कौन बचाएगा।

    १९ जुलाई २०१० १२:१५ AM

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