गुरुवार, अक्टूबर 13, 2011

एटीएम से रुपए न निकलें और खाते में से रकम चली जाए तो?


आजकल बाज़ार में जाएँ और ध्यान दें तो पाएँगे कि ग्राहक खरीदारी करके भुगतान के लिए पाँच सौ और हज़ार रुपए के नोट देते हैं और कम की खरीदारी करने पर दुकानदार छोटा नोट माँगता है। परंतु ग्राहक कहता है कि छोटा नोट नहीं है। छोटे नोट लोगों के पास कम हो गए हैं। क्या कारण है कि छोटे नोटों की कमी हो गई है? मेरी समझ से इसका कारण है एटीएम क्योंकि आजकल लोग बैंक जाकर मन मुताबिक़ नोटों में पैसे निकालने के बजाय एटीएम से रुपए निकालते हैं और जहाँ से छोटे नोट नहीं निकलते हैं। आईसीआईसीआई के एटीएम से     तो अक्सर हज़ार रुपए तथा सौ रुपए के नोट ही मिलते हैं। अब एटीएम का उपयोग करेंगे तो कभी ऐसा भी होगा कि मशीन रुपए तो नहीं उगलेगी परंतु आपके खाते में से रुपए घटा दिए जाएँगे। ऐसे में ये कुछ सवाल हैं जिनके जवाब सभी को नहीं मालूम होते हैं और एटीएम आपके बैंक के बजाय किसी और बैंक का हो तो यह और चिंता की बात हो सकती है। ये सवाल इस प्रकार हैं -        

एटीएम से रुपए निकालते समय यदि रुपए न निकलें और खाता में नामे हो जाए तो क्या करना चाहिए?
शिकायत कहां की जाए? ज़िम्मेदारी एटीएम जारी करने वाले बैंक की होती है या एटीएम चलाने वाले बैंक की?
कितने दिन बाद बैंक द्वारा पेनाल्टी देनी होती है? पेनाल्टी की रकम कौन देता है? पेनाल्टी की रकम के लिए दावा कहाँ और कब करना होता है? मैंने इन बातों के स्पष्टीकरण के लिए रिज़र्व बैंक के अपने मित्र से एक पोस्ट लिखने के लिए अनुरोध किया ते उन्होंने अंग्रेज़ी में जवाब दिया और कहा कि मैं अपने ब्लॉग पर हिंदी मे पोस्ट कर दूँ। अतः उनके पत्र में लिखी बातें इस प्रकार हैं –

कानून और बैंकिंग के नियमों के अनुसार आपका संबंध आपके बैंक के ही साथ होता है। किसी और बैंक के एटीएम से रुपए निकालते समय भी आप अपने बैंक के ही ग्राहक होते हैं। अतः सारी ज़िम्मेदारी आपके बैंक की ही है। यदि आपको ऐसी स्थिति से सामना हो तो आप तुरंत अपने बैंक में जाएँ और रिपोर्ट करें। यदि ब्रैंक में न जा सकें तो ट्रांजैक्शन के विवरण के साथ अपने बैंक के कॉल सेंटर से संपर्क करें। ट्रांजैक्शन के 30 दिन के भीतर दावा किया जा सकता है। यदि उसके बाद दावा किया जाता है तो हर्ज़ाने के लिए हकदारी समाप्त हो जाती है।

रिज़र्व बैंक के अनुदेशों के अनुसार रिपोर्ट करने के सात कार्य दिवस के अंदर वह रकम आपके खाते में जमा हो जानी चाहिए। आपका बैंक एटीएम वाले बैंक से उस धन की माँग करेगा। यदि नियत दिन के भीतर आपके खाते में रकम जमा नहीं होती है तो आपका बैंक 100/- रुपए प्रतिदिन की दर से हर्ज़ाने का देनदार होगा। इस हर्ज़ाने की रकम की माँग आपको नहीं करनी पड़ेगी। बैंक को स्वयं ही वह रकम आपके खाते में जमा करना होता है। यदि बैंक हर्ज़ाने की रकम आपके खाते में नहीं जमा करता है तो बैंक के प्रधान कार्यालय को शिकायत भेजें। यदि वहाँ से कोई मदद नहीं मिले तो अपने क्षेत्र के बैंकिंग लोकपाल के पास, ट्रांजैक्शन के पूरे विवरण और अपनी शिकायत के संबंध में किए गए पत्र व्यवहार की प्रतियों के साथ शिकायत करें।
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शनिवार, अक्टूबर 08, 2011

संघीय भारत की कल्पना


सिलिकॉन इंडिया में मिथ ऑफ़ यूनाइटेड इंडिया शीर्षक से एक लेख लिखा गया है जिसमें कई बातें विरोधात्मक हैं और नकारात्मक प्रभाव वाली हैं क्योंकि इसमें जिन राज्यों और आंदोलनों का ज़िक्र किया गया है उनका आधार केंद्र सरकार को निर्दयी, अत्याचारी और अन्यायी बताना है जो कि अखिल भारतीय स्वरूप की होती है जो भारत के सभी राज्यों के चुने हुए प्रतिनिधियों से या उनके सहयोग से बनी है। अब जो सत्ता से बाहर है, सत्ता में आना चाहता है परंतु उसकी इतनी फ़ॉलोइंग नहीं है कि वह सरकार बना सके तो वह देश में विघटन वाली गतिविधियों में लगा गया है तथा षडयंत्र में लगा हुआ है वह बुद्धिजीवी लोगों को उकसाकर अपने उद्देश्य के मुताबिक लोकमत तैयार करने के लिए ऐसे ही लेख लिखवा रहा है। वे लोग कभी भाषा का प्रश्न उठाते हैं, कभी धर्म का मुद्दा उछालते हैं, कभी क्षेत्रवाद का, कभी जाति का, कभी भ्रष्टाचार का। मतलब यह कि आम आदमी को जो मुद्दा अपील कर जाए उसे ही उछाल दिया जाए और लोगों को भड़काया जाए।
देश के चार पुराने राज्य स्वयंप्रभु देश बनने के लिए बेताब हैं और अपने वाग्जाल में उल्झाकर आम जनता को उस क्षेत्र से बाहर जाने के लिए सक्षम ही नहीं होने दे रहे हैं। इन राज्यों में से दो तो धर्म और मजहब या क़ौम के नाम पर और दो राज्य भाषा के नाम पर। वे राज्य हैं - पंजाब, कश्मीर और तमिलनाडु तथा नागालैंड। पंजाब और कश्मीर के लोग तो भाषा के मामले में देश के अन्य क्षेत्रों से जुड़ने में सक्षम हैं  क्योंकि वे लोग अपनी भाषा के अलावा देश की बहु प्रचलित भाषा हिंदी भी जानते हैं। परंतु तमिलनाडु और नागालैंड के लोग तो भाषा के नाम पर लोगों को बरगलाए हुए हैं। लेकिन आम जनता अब इस बात को समझने लग गई है और आम धारा एवं पूरे देश से जुड़ने के लिए हिंदी भाषा सीख रहे हैं। तमिलनाडु सरकार तो 1962 में ही रेज़ालूशन पास करके वह माँग छोड़ चुकी है और नागालैंड का सपना भी साकार होता नहीं दिखता है। इसने तो अब तक अपनी कोई भाषा ही नहीं घोषित की। क्या राज्य में कोई भाषा ही नहीं है? नागामी आम भाषा है जिसे राज्य की राजभाषा घोषित किया जा सकता है। परंतु मुट्ठीभर लोग राज्य पर कब्ज़ा जमाकर लोगों को बरगालाए हुए हैं। पंजाब तो प्रगतिशील राज्य है और वह भी संकुचित विचार छोड़ ही चुका है। अतः सिलिकॉन इंडिया के लेख में दर्शाया गया चित्र पूरे देश या राज्य का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। ऐसे लेखों को पढ़ा जाना चाहिए और अपने ज्ञान में वृद्धि करना चाहिए। परंतु उन लेखों को दूसरों को भेजकर उसपर सहमति प्राप्त करने का प्रयास करना सोद्देश्यपूर्ण षडयंत्र लगता है। यह सोचना कि दूसरे अनभिज्ञ हैं और उन्हें दिशा दिखाने की ज़रूरत है, मुझे तो नासमझी लगती है। उसके बारे में कुछ लोगों ने न केवल सहमति जताई बल्कि उन विघटनकारी लोगों को ही जायज़ ठहरा दिया। मुझे यह जानकर और भी अफ़सोस हुआ कि रिज़र्व बैंक में वरिष्ठ अधिकारी, हमारे एक मित्र की आँखों पर अंग्रेज़ी का इतना रंगीन चश्मा चढ़ा है कि इसे भारत को सबसे बड़ा अंग्रेज़ी बोलने वाला देश बता दिया है। वे अंग्रेज़ी के विरुदगान में लगे रहते हैं और हिंदी के लेखों या कविताओं को अंग्रेज़ी में अनुवाद करके पढ़ने की सिफ़ारिश भी करते हैं। मैं उनसे जानना चाहूंगा कि क्या हमारे देश की 121 करोड़ जनता अंग्रेज़ी बोलने, लिखने और समझने लग गई है और उन्हें हिंदी आती ही नहीं? उन्होंने यह भी कह दिया है कि एक भाषा अपनाने वाले देश, जैसे, पाकिस्तान, नेपाल आदि इसीलिए प्रगतिशील नहीं हैं क्योंकि वहाँ एक ही भाषा का प्रयोग होता है। क्या उन्हें इज़रायल, अमरीका, फ़्रांस, रूस, चीन आदि की प्रगति के पीछे अनेक भाषाएँ दिखती हैं? इन देशों में एक ही राजभाषा है और उन्हें अपनी भाषाओं पर गर्व है। एक तरफ़ तो हम यह कहते हैं कि भाषा नहीं थोपी जानी चाहिए और दूसरी तरफ़ अंग्रेज़ी को थोप दिया गया है। रिज़र्व बैंक जैसी शीर्ष राष्ट्रवादी संस्था में काम करने वाले व्यक्ति की सोच इतनी संकुचित और कुंठाग्रस्त कैसे हो सकती है। शायद उन्हें आत्मप्रेक्षण की आवश्यकता है।                         

रविवार, सितंबर 25, 2011

ब्यूरोक्रैट कानून को कैसे मरोड़ते हैं – एक अध्ययन


राजनीतिज्ञों के साथ मिलकर ब्यूरोक्रैटों ने संविधान में किए गए राजभाषा संबंधी प्रावधानों को कैसे असफल बनाया है यह अध्ययन का विषय है। इस बारे में राष्ट्रपति द्वारा जारी 1955 के सांविधिक आदेश का अध्ययन प्रस्तुत है। विश्लेषण को ध्यान से पढ़ने और नए सिरे से सुधारात्मक कार्रवाई की जाने की आवश्यकता है।
राजभाषा अधिनियम, 1963 हिंदी को केवल भारत सरकार के कार्यालयों में उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए नहीं बल्कि भारत संघ की राजभाषा के रूप में, जिस प्रकार हमारा राष्ट्रीय ध्वज है, राष्ट्रीय गान है, उसी प्रकार भारत की अस्मिता की पहचान तथा पूरे भारत के विभिन्न भाषा-भाषी लोगों व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दस्तावेज़ की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए सहायक के रूप में बनाया गया था। लेकिन आज ऐसा लगने लगा है कि हमारा सारा ध्यान एकांगी हो गया है और हम राज्यों में हिंदी के प्रयोग, इसकी शिक्षा, शिक्षा के माध्यम के रूप में इसे विकसित करने की बात ही नहीं करते हैं।    
हम जानते हैं कि हिंदी को राजभाषा घोषित करते समय और संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों में इसके बारे में प्रावधान करते समय संविधान के निर्माताओं के मन में कोई संकुचित भावना नहीं थी। तभी तो संविधान अनुच्छेद 351 में संघ सरकार को विशेष निदेश दिया गया है कि "हिंदी भाषा की प्रसारवृद्धि करना, उसकी विकास करना ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सब तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम हो सके तथा उसका आत्मीयता में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्तानी और अष्टम् अनुसूची में उल्लिखित अन्य भाषाओं के रूप, शैली और पदावली को आत्मसात करते हुए तथा जहाँ तक आवश्यक और वांछनीय हो वहाँ उसके भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से तथा गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करना संघ का कर्तव्य होगा।"
संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। स्वतंत्र भारत द्वारा चुनी गई पहली लोक सभा ने 17 अप्रैल 1952 को अपना कार्यभार ग्रहण किया। इससे पूर्व 25 अक्तूबर 1951 से 21 फ़रवरी 1952 के बीच देश पहले चुनाव में व्यस्त था। महात्मा गांधी ने 1917 में भरूच में गुजरात शैक्षिक सम्मेलन में अपने अध्यक्षीय भाषण में राष्ट्रभाषा की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा था कि भारतीय भाषाओं में केवल हिंदी ही एक ऐसी भाषा है जिसे राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाया जा सकता है क्योंकि यह अधिकांश भारतीयों द्वारा बोली जाती है, यह समस्त भारत में आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक सम्पर्क माध्यम के रूप में प्रयोग के लिए सक्षम है तथा इसे सारे देश के लिए सीखना आवश्यक है। संविधान निर्माताओं ने संविधान के निर्माण के समय राजभाषा विषय पर विचार-विमर्श किया था और यह निर्णय लिया कि देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में अंगीकृत किया जाए। इसी आधार पर संविधान के अनुच्छेद 343(1) में देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया।  किन्तु, संविधान के निर्माण तथा अंगीकरण के समय यह परिकल्पना की गई थी कि संघ के कार्यकारी, न्यायिक और वैधानिक प्रयोजनों के लिए प्रारम्भिक 15 वर्षों तक अर्थात 1965 तक अंग्रेज़ी का प्रयोग जारी रहे । तथापि यह प्रावधान किया गया था कि उक्त अवधि के दौरान भी राष्ट्रपति कतिपय विशिष्ट प्रयोजनों के लिए हिंदी के प्रयोग का प्राधिकार दे सकते हैं। अतः राष्ट्रपति ने पहली संघ सरकार के गठन के बाद अगले ही महीने, 27 मई 1952 को, राजभाषा के प्रयोग के बारे में अपना पहला आदेश जारी करके, राज्यों के राज्यपालों, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के नियुक्ति पत्र अंग्रेज़ी भाषा के अलावा हिंदी भाषा में भी जारी करने के लिए निदेश दिया। ये सारे आदेश केंद्र सरकार द्वारा जारी किए जाते हैं परंतु इन पर अनुवर्ती कार्रवाई राज्य सरकारों को भी करनी होती है। अतः अपने इस आदेश द्वारा केंद्र सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया था कि हम राजभाषा के कार्यान्वयन के मामले में गंभीर और सचेत हैं।
इस संदर्भ में राष्ट्रपति ने दूसरा आदेश 3 दिसंबर 1955 को जारी किया जिसे गृह मंत्रालय ने 8 दिसंबर 1955 को कार्यालय ज्ञापन संख्या 59/2/54 पीयूबी-1 के अंतर्गत आम जानकारी और कार्रवाई के लिए प्रकाशित किया। 
हिंदी को पीछे रखने और अंग्रेज़ी को आगे बढ़ाने का खेल यहाँ से प्रारंभ हुआ। जानकारी और विश्लेषण के लिए राष्ट्रपति के आदेश और गृह मंत्रालय के आदेश की भाषा उद्धृत कर रहा हूं।
 

राष्ट्रपति के आदेश का मूल पाठ
गृह मंत्रालय द्वारा जारी किया गया पाठ
भारत के संविधान के अनुच्छेद 343 के खंड (2) के परंतुक द्वारा दी गई शक्तियों का प्रयोग करते हुए राष्ट्रपति ने निम्नलिखित आदेश दिया है –
  1. यह आदेश संविधान (राजकीय प्रयोजनों के लिए हिंदी भाषा) आदेश, 1955 कहलाएगा-
  2. संघ के जिन राजकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेज़ी भाषा के अतिरिक्त हिंदी भाषा का प्रयोग किया जाएगा, वे इससे संलग्न सूची में दिए गए हैं।
अनुसूची
मुझे यह कहने का निदेश हुआ है कि संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार अंग्रेज़ी भाषा के स्थान पर धीरे-धीरे हिंदी भाषा का प्रयोग करने के लिए जो सुझाव दे गए थे उन पर अप्रैल 1954 में एक अंतरविभागीय बैठक में विचार किया गया। भारत सरकार के मंत्रालयों में हिंदी में काम शुरू करने के लिए जो प्रबंध तत्काल करने का विचार है उसका ब्योरा संक्षेप में इस प्रकार है –
 
(1)   जनता के साथ पत्र-व्यवहार,
1.         जनता से हिंदी में जो भी पत्रादि मिले उनके उत्तर भरसक हिंदी में ही दिए जाने चाहिए।
टिप्पणी – (क) राष्ट्रपति के 3 दिसंबर 1955 के आदेश को तोड़मरोड़ कर, विभागों को भेजा गया और यह संदेश दिया गया कि केवल हिंदी में प्राप्त पत्रों के ही उत्तर भरसक हिंदी में दिए जाने चाहिए और वह भी यदि आप चाहें।
(ख) राष्ट्रपति के आदेश में विनिर्दिष्ट रूप से संविधान के अनुच्छेद 343 (2) का उल्लेख किया गया है जिसमें (2) खंड (1) में किसी बात के होते हुए इस संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की कालावधि के लिए संघ के उन सब राजकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेज़ी भाषा प्रयोग की जाती रहेगी जिनके लिए ऐसे प्रारंभ के ठीक पहले वह प्रयोग की जाती थी,
परंतु राष्ट्रपति उस कालावधि में, आदेश द्वारा, संघ के राजकीय प्रयोजनों में से किसी के लिए अंग्रेज़ी भाषा के साथ-साथ हिंदी भाषा का तथा भारतीय अंकों के अंतरराष्ट्रीय रूप के साथ-साथ देवनागरी रूप का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगा।
(ग) राष्ट्रपति के आदेश में "राजकीय प्रयोजनों में से किसी के लिए" में से जनता के साथ, चाहे वह कहीं से भी हो, पत्रव्यवहार हिंदी में करने का निदेश दिया गया है न कि हिंदी में प्राप्त और वह भी भरसक उत्तर देने का विकल्प हो।
(घ) "ये उत्तर सरल हिंदी में दिए जाने चाहिए" – मतलब हिंदी लिखा जाना शुरू करने से पहले ही भ्रम फैलाना कि हिंदी कठिन होगी।              
  1. प्रशासनिक रिपोर्टें, राजकीय पत्रिकाएँ और संसद को दी जाने वाली रिपोर्टें।
  1. प्रशासनिक रिपोर्टें, राजकीय पत्रिकाएँ और संसद को दी जाने वाली रिपोर्टें, आदि जहाँ तक संभव हो अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिंदी में भी प्रकाशित की जानी चाहिए।
टिप्पणी – (क) राष्ट्रपति के 3 दिसंबर 1955 के आदेश में "जहाँ तक संभव हो अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिंदी में भी प्रकाशित की जानी चाहिए"। का उल्लेख नहीं है बल्कि वह अनिवार्य है क्योंकि अंग्रेज़ी में "shall be" का उपयोग किया गया जो अनिवार्य के लिए प्रयुक्त होता है। अतः यहाँ भी  राष्ट्रपति के आदेश को तोड़मरोड़ कर पेश किया गया है।
  1. सरकारी संकल्प और विधायी अधिनियमितियाँ।
  1. सरकारी संकल्पों और विधायी अधिनियमों में धीर-धीरे अंग्रेज़ी के स्थान पर हिंदी का प्रयोग करने और जनता की सहायता करने के विचार से जहाँ तक संभव हो उन्हें अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिंदी में भी निकाला जाए किंतु इन पर स्पष्ट रूप से लिख दिया जाना चाहिए कि अंग्रेज़ी पाठ ही प्रामाणिक माना जाएगा।
टिप्पणी – (क) सरकारी संकल्प और विधायी अधिनियमितियाँ के हिंदी संस्करण स्थान पर संकल्प और अधिनियम "जहाँ तक संभव हो उन्हें अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिंदी में भी निकाला जाए किंतु इन पर स्पष्ट रूप से लिख दिया जाना चाहिए कि अंग्रेज़ी पाठ ही प्रामाणिक माना जाएगा।" जबकि राष्ट्रपति के आदेश में ऐसा उल्लिखित नहीं है और न ही जनता के लिए सुविधा की बात की गई थी। अधिनियमों व कानून का उपयोग न्यायालय तथा न्याय प्रशासन से जुड़े लोगों द्वारा किया जाता है और न्यायालयों में हिंदी का प्रयोग सुनिश्चित करने के लिए हिंदी में कानून उपलब्ध होना चाहिए।
(ख) कानून का अंग्रेज़ी संस्करण को प्रामाणिक माना जाएगा यह लिखकर हिंदी में काम करने का विश्वास ही समाप्त कर दिया गया।   
  1. जिन राज्य सरकारों ने अपनी भाषा के रूप में हिंदी को अपना लिया है उनसे पत्र-व्यवहार - अंग्रेज़ी भाषा के अतिरिक्त हिंदी भाषा का प्रयोग किया जाएगा।
  1. जिन राज्य सरकारों ने हिंदी को अपनी राज भाषा के रूप में अपना लिया है उनके साथ पत्र-व्यवहार अंग्रेज़ी में होना चाहिए किंतु यदि हो सके तो भारत सरकार द्वारा भेजे गए सभी पत्रादि के साथ उनका हिंदी अनुवाद भी भेजा जाना चाहिए ताकि सांविधानिक कठिनाइयों और का सामना न करना पड़े।
टिप्पणी – (क) राष्ट्रपति का आदेश हिंदी को अंग्रेज़ी का स्थान लेने के लिए इसको विकसित करना था और उसके लिए प्रयास करना था। परंतु यह तो एकदम उलटी बात कर दी गई।
(ख) अंग्रेज़ी भाषा के अतिरिक्त हिंदी भाषा का प्रयोग किया जाना था परंतु यहाँ स्पष्ट रूप से लिखा गया कि पत्र-व्यवहार अंग्रेज़ी में होना चाहिए किंतु यदि हो सके तो भारत सरकार द्वारा भेजे गए सभी पत्रादि के साथ उनका हिंदी अनुवाद भी भेजा जाना चाहिए ताकि सांविधानिक कठिनाइयों और का सामना न करना पड़े। सांविधानिक कठिनाइयों के नाम पर हिंदी का प्रयोग ही रोक दिया गया।       
  1. संधियाँ और करार। (6) अन्य देशों की सरकारों और उनके दूतों तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों से पत्र-व्यवहार, (7) राजनयिक और कौंसलीय प्राधिकारियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भारतीय प्रतिनिधियों के नाम जारी के जाने वाले औपचारिक दस्तावेज़ - अंग्रेज़ी भाषा के अतिरिक्त हिंदी भाषा का प्रयोग किया जाएगा।      
  1. संविधान के उपबंधों का पालन करने के लिए ऊपर बताए गए तरीके के अनुसार काम शुरू करने से पहले राष्ट्रपति का आदेश लेना उचित होगा।
टिप्पणी – (क) इन प्रावधानों को लागू करने से पहले राष्ट्रपति से दुबारा आदेश क्यों प्राप्त करना चाहिए।
(ख) दिनांक 3 दिसंबर 1955 को जारी आदेश पर भारत सरकार के विभिन्न विभागों द्वारा पुनर्विचार करने के लिए अंतरविभागीय बैठक की बात की गई है और उस बैठक में किए गए निर्णयों के अनुसार गृह मंत्रालय ने 8 दिसंबर 1955 को कार्यालय ज्ञापन भी जारी कर दिया। मात्र पाँच दिन में बैठक की नोटिस भेजने, बैठक आयोजित करने और उसका कार्यवृत्त तैयार करने, कार्यवृत्त के अनुमोदित होने और उसके बाद कार्यालय ज्ञापन तैयार करने और जारी करने की संपूर्ण कार्रवाई पूरी कर ली गई। यह इतने कम समय में संभव नहीं लगता है। 3 दिसंबर 1955 को शनिवार था। उसके बाद अगले दिन रविवार। आगे मात्र तीन दिन में अंतरविभागीय बैठक की नोटिस भेजी गई, बैठक भी हो गई। यह तो भारतीय ब्यूरोक्रेसी के लिए प्रशंसनीय कार्य होगा।       

2.      ऊपर के पैरा 1(5) में बताए गए निर्णय के अनुसार राष्ट्रपति ने एक संविधान (राजकीय प्रयोजनों के लिए हिंदी भाषा) आदेश जारी किया है। जानकारी के लिए इस आदेश की प्रतिलिपि संलग्न है।  

3.      विदेश मंत्रालय की वांछानुसार इस आदेश में संधियों और करारों में तथा दूसरे देशों की सरकारों आदि तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ पत्र-व्यवहार में तथा राजनयिक अधिकारियों आदि को भेजे जाने वाले औपचारिक काग़ज़ पत्रों में हिंदी का प्रयोग करने के लिए कहा गया है।
टिप्पणी – राष्ट्रपति के आदेश में यह प्रमुख मद के रूप में लिखा गया है। परंतु यहाँ गृह मंत्रालय ने इसकी गंभीरता समाप्त कर दी।      

राजनीतिज्ञों के साथ मिलकर ब्यूरोक्रैटों ने हिंदी के प्रश्न को संवविधान में अनंत काल तक के लिए टालने की साजिश की है क्योंकि इसे अनंत काल तक के लिए टालने का फ़ैसला जनता द्वारा नहीं किया गया है और न ही किसी समित द्वारा सुझाया गया था। आज तक जितनी भी समितियां, आयोग बने किसी ने भी हिंदी के प्रश्न को समय सीमा (पंद्रह साल) से परे रखने की सिफ़ारि‍श नहीं की है। राजभाषा आयोग, विश्‍व विद्यालय अनुदान आयोग, केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड, सभी ने हिंदी व क्षेत्रीय भाषाओं में ही शिक्षा-दीक्षा देने की सिफ़ारिश की है। तब संविधान में हिंदी को अनिश्चित काल के लिए टालने की बात कहां से आई? इसे धीरे-धीरे लागू किया जाए यह बात भी किसी आदेश में नहीं कही गई है। यह निश्चित रूप से कोई सोची समझी चाल तथा प्रच्छन्न विद्वेष की भावना लगती है। इसे समझने और गलती को सुधारने की आवश्‍यकता है।
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शुक्रवार, सितंबर 23, 2011

अनुश्रवण शब्द का अर्थ अंग्रेज़ी शब्द मॉनीटरिंग का पर्याय ग़लत और भ्रामक

भारत सरकार के राजभाषा विभाग की साइट http://rajbhasha.nic "राजभाषा नीति संबंधी मार्गदर्शन एवं अनुश्रवण के लिए गठित समितियॉं" शीर्षक देखकर मैं चौंक गया कि "अनुश्रवण" शब्द का क्या मतलब है यहाँ? अपने पास उपलब्ध लगभग एक दर्जन शब्द कोशों को तलाशा परंतु सभी में एक ही अर्थ मिला – सुनने से संबंधित क्रिया। राजभाषा विभाग की साइट में जिन समितियों का उल्लेख किया गया है वे सभी राजभाषा हिंदी का प्रयोग और प्रचार-प्रसार सुनिश्चित करने के लिए निगरानी हेतु गठित की गई हैं। अतः निष्कर्ष निकला कि "अनुश्रवण" शब्द को अंग्रेज़ी शब्द "मॉनीटरिंग" के पर्याय रूप में प्रयोग में लाया गया है। "अनुश्रवण" शब्द का निर्माण अनु- उपसर्ग, श्रु धातु और ल्युट् प्रत्यय के योग से हुआ है जिसका मतलब वेदों की ऋचाओं को गुरु द्वारा उच्चरित करने के बाद उसी रूप से उच्चरित करके याद करना है ताकि शुद्ध रूप में उनका उच्चारण करना सीखा जा सके तथा अनुश्रवण की क्रिया द्वारा उसकी परंपरा आगे बढ़ाई जा सके।
मेरी जानकारी के अनुसार इसके अलावा इसका कोई और प्रयोग नहीं हुआ है और न ही इसका कोई अर्थ विस्तार या संकोच हुआ है। अतः अनुश्रवण शब्द का अर्थ अंग्रेज़ी शब्द मॉनीटरिंग का पर्याय ग़लत और भ्रामक है। इसका सही प्रयोग किया जाना चाहिए और जहाँ कहीं ग़लत प्रयोग हो गया है उसे बदल कर "निगरानी" या "अनुप्रवर्तन" शब्द का उपयोग किया जाना चाहिए। वैसे निगरानी शब्द अच्छा नहीं ध्वनित होता है क्योंकि इसे आपराधिक कृत्यों के संदर्भ में उपयोग में लाया जाता है। इसलिए "अनुप्रवर्तन" शब्द का उपयोग किया जाना बेहतर होगा।
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गुरुवार, सितंबर 22, 2011

एक सच्चाई भरा सवाल

चिकित्सकों द्वारा चलाए जा रहे यहू ग्रुप में एक मेडिकल प्रोफ़ेशनल ने यह प्रश्न पूछा है। इसके बारे में आपकी राय चाहिए – डॉ. दलसिंगार यादव ।

Re: Common medical test from 2012
Posted by: "Bruno-Mascarenhas JMA" spine.brain.surgeon@gmail.com
Sat Sep 17, 2011 9:31 am (PDT)
If the Common Test is conducted only in Hindi and English, it will be a
biased one, as it is inherently against those who studied in Malayalam or
Kannada Medium.
If the Common Test is conducted based on CBSE Syllabus, it is biased against those who studied in State Board.
Why these apprehensions are not taken care of ?

रविवार, सितंबर 18, 2011

दे रहा तम को चुनौती, एक नन्हाँ सा दिया

अँधेरा कितना कमज़ोर होता है इसका पता इस बात से चल जाता है कि जैसे ही छोटे से छोटा दिया जल उठता है तो उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। यह दिया हमारे किसी भी प्रयास का प्रतीक है चाहे वह छोटा हो या बड़ा। वैसे प्रयास को छोटे या बड़े के मानदंड में रखना उचित नहीं है क्योंकि हर व्यक्ति आवश्यकतानुसार और अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुसार प्रयास करता है। जैसा कि टैगोर ने अपनी एक चतुष्पदी में व्यक्त किया है ".... शक्ति मुझमें है जहाँ तक मैं करूँगा नाथ।" यह भी तिमिर को दूर करके प्रकाश करने के संदर्भ में ही कहा गया है।
हिंदी दिवस के अवसर पर प्रत्येक कार्यालय में एक हिंदी सेवी चाहे नियमित हिंदी अधिकारी हो या नामित, हिंदी का दिया जलाकर अंग्रेज़ी के कारण फैले तिमिर को दूर करने का प्रयास करता है। उसका यह प्रयास सराहनीय है और उसका अनुसरण किया जाने योग्य है। यह व्यक्ति नन्हें दिए की भाँति तम के अस्तित्व को चुनौती दे रहा है। उसका हौसला बढ़ाने के लिए हर दिन राजभाषा दिवस माना जाए।
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बुधवार, सितंबर 14, 2011

आज तो हिंदी होगी

आज हिंदी के साथ-साथ भारत की अनेक भाषाएँ भाषायी साम्राज्यवाद (रोज़गार व बहुभाषिक आवश्यकता के कारण अंग्रेज़ी की अनिवार्यता) का शिकार हो रही हैं। दुनियाभर में अंग्रेज़ी के वर्चस्व और संरक्षण न पाने के कारण सैकड़ों भाषाएँ समाप्ति की कगार पर हैं और भारत की स्थिति सर्वाधिक चिंताजनक है। 196 भाषाएँ समाप्ति के कगार पर हैं।(संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21 फ़रवरी 2009 को, मातृभाषा दिवस के अवसर पर अपनी रिपोर्ट जारी की थी।)
सितंबर माह दिवस से लेकर पखवाड़ा तक हिंदी के हित में समर्पित है। आज हिंदी दिवस है जिसे समारोह के रूप मनाने की शुरुआत 14 सितंबर 1954 से हुई थी। 10 और 11 नवंबर 1953 को काका साहब एन. वी. गाडगिल की अध्यक्षता में नागपुर में 'अखिल भारतीय राष्ट्रभाषा प्रचार सम्मे़लन' का पांचवां अधिवेशन हुआ था। उस अधिवेशन में विचार सामने आया था कि कि जब तक हिंदी को अंग्रेज़ी के स्थान पर पूर्ण रूप से 'राजभाषा' का स्थान नहीं प्राप्त हो जाता तब तक '14 सितंबर' को 'हिंदी दिवस' के रूप में स्मरण करते रहेंगे और औपचारिक रूप से प्रस्ताव पारित हुआ। प्रस्ताव की भाषा थी कि ''यह सम्मेलन निश्चय करता है कि स्वतंत्र भारत के संवि‍धान ने जिस दिन हिंदी को 'राजभाषा' तथा 'देवनागरी' को राष्ट्रलिपि स्वीकार किया है उस दिन अर्थात्, 14 सितंबर को संपूर्ण भारत में 'हिंदी दिवस' मानाया जाएगा।'' इस प्रस्ताव के प्रस्तावक श्री जेठामल जोशी तथा अनुमोदक श्रीमती मैना गाडगिल थे। प्रस्ताव के समर्थक थे श्रीमती राधा देवी गोयनका तथा श्री बी. जी. जोगलेकर। इसी प्रस्ताव के आधार पर राष्ट्रभाषा प्रचार सभा, वर्धा के तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री मोहन लाल भट्ट ने 30 नवंबर 1953 को कांग्रेस की सभी प्रांतीय समितियों, ज़िला समितियों, नगर समितियों, हिंदी के कार्य से जुड़े देश के तमाम कार्यालयों और विशि‍ष्ट व्यक्तियों को पत्र भेजा। उस पत्र द्वारा आगामी 14 सितंबर 1954 को 'हिंदी दिवस' मनाने का विनम्र आग्रह किया गया। इस प्रकार 14 सितंबर 1954 को 'हिंदी दिवस' मनाने का सिलसिला प्रारंभ हुआ। इसमें न कोई हिंदी वाला था और न ही कोई हिंदी भाषी था और न ही कोई सरकारी अफ़सर। लेकिन आज हिंदी दिवस समारोह सरकारी रूप ले चुका है फिर भी कार्यालयों में हिंदी का प्रचलन अमर्श योग्य है।

शरद जोशी, प्रख्यात व्यंग्य लेखक, ने लिखा था कि आज हिंदी दिवस है। आज तो हिंदी होगी। बाकी दिन? इसे एक उदाहरण से स्पष्ट करना चाहूँगा। जब मैं रिज़र्व बैंक में नियुक्त होकर चंडीगढ़ में कार्यरत हुआ तो पब्लिक सेक्टर में मेरा पहला अनुभव था। जब भी किसी से हिंदी में काम करने की बात करता तो वह यही कहता कि हिंदी में काम करना कठिन है। परंतु वह कठिनाई क्या है? कोई नहीं बताता था। अतः मैंने मनोवृत्ति तथा हिंदी की बैंकिंग शब्दावली की संरचना के अध्ययन की योजना बनाई। उसका उद्देश्य यह जानना था कि बैंकिंग के लिए जो शब्दावली बनाई गई है वह कठिन है या जहाँ हिंदी में काम करने की शुरुआत ही नहीं हुई है तो कठिनाई कैसी? अतः 1983-84 में आँकड़े इकट्ठा किए और 1985 में अपनी थीसिस प्रस्तुत की। मनोवृत्ति के बारे में आँकड़ इस प्रकार मिले थे -

हिंदी के समर्थन में (16.93 %) हिंदी के विरोध में(16.13 %) कार्यान्वयन से उदासीन (66.94)।

अनुसंधान के दौरान लोगों से कारण जानने के लिए जो प्रश्न पूछे गए थे उन प्रश्नों के उत्तर जो मिले उनमें दो बातें मुझे खास लगीं -
1. जब सख़्ती होगी तो कर लेंगे,(स्वतंत्र भारत में ग़ुलाम मानसिकता)?
2. इतनी मुश्किल से अंग्रेज़ी सीखी है इसका प्रयोग छोड़ कर हिंदी में काम करने लगेंगे तो अंग्रेज़ी भूल जाएंगे। (कार्यालय के अलावा और कहाँ उपयोग करते हैं?)

मैं हाई कोर्ट में प्रैक्टिस भी करता हूँ। आप जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्टों की सरकारी भाषा अंग्रेज़ी है। परंतु हाई कोर्ट परिसर में जाकर देखें तो कोर्ट रूम के बाहर अंग्रेज़ी का नामो निशान नहीं है। सभी वकील, सभी जज, सभी अधिकारी/कर्मचारी मराठी और हिंदी में ही आपसी विचार विमर्श करते हैं। इसका क्या मतलब?
वहाँ कोई नहीं कहता कि मुझे हिंदी नहीं आती है अंग्रेज़ी में ही बात करें। यहाँ तक कि प्रमाण स्वरूप दाखिल किए गए दस्तावेज़ यदि मराठी या हिंदी में हों तो उनका अंग्रेज़ी अनुवाद देना अनिवार्य है लेकिन बहस के दौरान उसे वर्नाक्युलर भाषा में ही पढ़कर जज को सुनाया जाता है। जज उसे ही सुनता है। इसका क्या मतलब?
आज कुछ लोग बड़े ही फ़ख़्र से कह देते हैं कि हमें अंग्रेज़ी तो आती है हिंदी नहीं आती। हिंदी आना किसे कहते हैं? नागपुर में केंद्र सरकार के 153 कार्यालय हैं। इसमें 90 % से अधिक अधिकारी हिंदी/मराठी भाषी होंगे। ऐसा मेरा अनुमान है। इनमें से लगभग एक दर्जन कार्यालयों में मैं जा चुका हूं। जिस अधिकारी और कर्मचारी से मिला उसने हिंदी में ही बात की। न तो अंग्रेज़ी का उपयोग किया और न ही अपनी मातृभाषा का। इसका क्या मतलब? फिर वे कौन लोग हैं जिन्हें हिंदी नहीं आती? हिंदी दिवस पर गृह मंत्री उपदेशक संदेश देंगे कि हिंदी में काम करना चाहिए। कार्यालय के प्रभारी भाषण देंगे कि हिंदी राजभाषा है, इसका उपयोग होना चाहिए। किससे कहते हैं कि हिंदी का उपयोग होना चाहिए? क्या अपने आपको इसके दायरे से बाहर रखने का संकेत दे रहे हैं? फिर तो कार्यालयों में हिंदी कभी नहीं आएगी।
उत्तम उपदेशक, उत्तम अनुदेशक, उत्तम सलाहकार वही होता है जो वह स्वयं अपनी ज़िंदगी में उस बात को अपनाता है जिसका कि उपदेश देता है। यदि वह कहता कुछ है और करता कुछ है तो लोग उसे दोगला (यानि दोहरी ज़ुबान वाला) कहते हैं और उसके उपदेश और अनुदेश को यह कह कर नकार देते हैं कि खुद मियाँ फ़ज़ीहत, दीगरे नसीहत। मैं आपसे कहूँ कि हिंदी में काम करें और खुद अंग्रेज़ी में काम करूँ तो क्या आप मुझे दोगला नहीं कहेंगे? आप जिस संस्था में काम करते हैं क्या आप अपनी संस्था के मूल उद्देश्य का हनन कर सकते हैं? नहीं। क्या आप नियम, कानून का उल्लंघन कर सकते हैं? नहीं। तो फिर क्या राजभाषा अधिनियम, राजभाषा नियमों का उल्लंघन करना हमारे प्रोफ़ेशनल कैरियर के लिए सही है? नहीं। यदि कोई अधिकारी स्वयं अंग्रेज़ी में काम करे और अपने सहयोगियों से कहे कि हिंदी में काम कीजिए तो लोग उस सलाह को महत्व देंगे? नहीं। माननीय गृह मंत्री कभी हिंदी नहीं बोलते, लिखते क्या होंगे? वे भी हिंदी दिवस के अवसर पर हिंदी में काम करने का उपदेश देते हैं। उसका क्या प्रभाव होगा? आप स्वयं आकलन करें। बाबा रामदेव क्यों लोकप्रिय हुए? क्योंकि वे स्वयं योग करके उदाहरण देते थे वरना उनसे पहले भी योग गुरु हुए। वे क्यों नहीं लोक प्रिय हुए? अतः हिंदी दिवस पर ही सही शुरुआत तो करें। प्रयोग करके उदाहरण दें, उपदेश देकर नहीं।
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मंगलवार, सितंबर 13, 2011

दुनिया से कह दो कि गांधी अंग्रेज़ी नहीं जानता

पंद्रह अगस्त 1947 को गांधी जी ने बी.बी.सी. लंदन को संदेश दिया था कि दुनिया से कह दो कि गांधी अंग्रेज़ी नहीं जानता। चंदन कुमार मिश्र के ब्लॉग "भारत के भावी प्रधान मंत्री की जबानी" पर यह संदेश देखने को मिला।
संभवतः इस संदेश का प्रचार नहीं हुआ और न ही इसकी व्याख्या की गई। क्या यह जानबूझकर नहीं किया गया? संभवतः हाँ। अतः "हिंदी दिवस, 2011" के अवसर पर इस पर विचार किया जाना और अमल किया जाना चाहिए। वैसे मैं इस "चाहिए" शब्द का प्रयोग करने के बजाय "मैं कर रहा हूँ", "मैं करता हूँ" जैसी अभिव्यक्तियों में विश्वास रखता हूँ और अमल करने की ईमानदार कोशिस करता हूँ। "कोशिश करता हूँ" इसलिए कि कोशिस ही तो कामयाबी की पहली सीढ़ी है।
गांधी जी बैरिस्टर थे। उन दिनों बैरिस्टरी की पढ़ाई इंग्लैंड में होती थी। पढ़ाई का माध्यम स्वाभाविक है कि अंग्रेज़ी रहा होगा। उन्होंने दक्षिण अफ़्रीका में वकालत की थी। वहाँ भी अंग्रेज़ी माध्यम से ही बहस की होगी। फिर गांधी ने ऐसा क्यों संदेश दिया कि दुनिया से कह दो कि "गांधी अंग्रेज़ी नहीं जानता" जबकि आजकल लोग बड़े फ़ख़्र से कह देते हैं कि मुझे हिंदी नहीं आती। अंग्रेज़ी तो आती है। हिंदी तो बड़ी कठिन है। क्या हम गांधी जी के संदेश को समझ पाए?
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मंगलवार, अगस्त 30, 2011

कथनी और करनी में भेद – अन्ना टोपी और भ्रष्टाचार

अन्ना जी का आंदोलन चल ही रहा था कि अन्ना के समर्थन में "मी अन्ना आहे" की इबारत वाली टोपी पहने एक युवक सिग्नल पर लाल बत्ती की उपेक्षा कर आगे निकलना चाह रहा था। ट्रैफ़िक पुलिस ने उसे रोक लिया और लाइसेंस मांगने लगा। युवक लाइसेंस नहीं देना चाहता था क्योंकि एक बार पुलिस वाले के हाथ में लाइसेंस आ गया तो वह बेबस हो जाएगा और चालान भी कट सकती थी। अतः उसने रिज़र्व बैंक चौक पर आयोजित अन्ना की रैली में शामिल होने जा रहा हूं देर हो रही है की दलील देकर जाने देने के लिए पुलिस वाले से अनुरोध किया। भला पुलिस वाला हाथ आया बकरा कैसे जाने देता? उसने लाइसेंस दिखाने पर पुनः ज़ोर दिया और कहा कि अन्ना टोपी पहन कर नियम तोड़ते हैं और मुझे भी दोषी बनाना चाहते हैं। आपको ज़ुर्माना तो भरना ही होगा। अन्ना टोपी को आड़े आते देख युवक ने टोपी उतारी और उसे मोड़ कर ज़ेब में रखी तथा पर्स में से सौ रुपए का नोट निकाल कर पुलिस वाले से अनुरोध किया कि अब जाने दें। पुलिस वाला फिर अन्ना टोपी का वास्ता देते हुए चालान कटवाने का आग्रह करने लगा।
यदि पुलिस वाला इतना ही ई मानदार और अन्ना भक्त था तो उसे तुरंत चालान काटनी चाहिए थी। यदि वह युवक भ्रष्टाचार की लड़ाई के प्रति गंभीर था और अन्ना के आंदोलन का सच्चे मन से समर्थन करता था तो उसे पहले तो लाल बत्ती का उल्लंघन नहीं करना चाहिए था, यदि गलती कर ही दी थी तो ज़ुर्माना भर देना चाहिए था। परंतु युवक ने पुलिस वाले के हाथ में 200 रुपए रख दिए। इस बार पुलिस वाले ने कुछ नहीं कहा और अपना हाथ अपनी जेब में डाल दिया। युवक चला गया।
इसका विश्लेषण आप करें कि जन लोकपाल कानून क्या करेगा?
यह सच्ची घटना टाइम्स ऑफ़ इंडिया के नगर संवाददाता की 29/08/2011 की नागपुर शहर की डायरी में छपी है। क्या यह अंध प्रदर्शन नहीं है? कहीं इसका उद्देश्य जे.पी. और वी.पी. द्वारा चलाए गए संघ संचालित सोद्देश्य आंदोलन तो नहीं?
जो भी हो ऐसी ही स्थिति हिंदी के समर्थन में, सितंबर के महीने में आयोजित समारोहों की होती है।
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रविवार, अगस्त 28, 2011

भाषा नीति या प्रेरणा (अनुरोध) और पुरस्कारों की तुष्टीकरण नीति

श्री गोपाल व्यास, सांसद राज्य सभा ने 3 अगस्त 2011 को सदन में प्रश्न पूछा कि क्या यह सच है कि राजभाषा नियम 1976 के उल्लंघन के बारे में शिकायत मिली है? यदि ऐसा हुआ है तो उन कार्यालयों का विवरण दिया जाए जहाँ उसकी जाँच की गई है और जहाँ जाँच चल रही है। जहाँ जाँच पूरी हो गई है उन कार्यालयों के खिलाफ़ की गई कार्रवाई का विवरण दिया जाए।
यह प्रश्न गृह मंत्रालय से पूछा गया था क्योंकि राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय के अधीन काम करता है और राजभाषा विभाग ही राजभाषा हिंदी के कार्यान्वयन के काम की निगरानी करता है। अतः इस प्रश्न का उत्तर भी राजभाषा विभाग ने ही तैयार किया है।
राजभाषा विभाग की अपनी सीमा है और वह सीमा प्रणाली संबंधी है। उसके पास इतनी शक्ति, इतना संसाधन, इतना मानव संसाधन नहीं है कि भारत के सभी कार्यालयों में पहुँच सके। अतः प्रणाली बनाई गई है। विभिन्न कार्यालयों में हिंदी के कार्यान्वयन के लिए एक कक्ष बनाया गया है, उसमें एक निम्न श्रेणी का कर्मचारी नियुक्त किया गया है जो कार्यालय के किसी अधिकारी के अनुदेशानुसार कार्य करता है। अब उस निरीह निम्न श्रेणी के कर्मचारी की क्या मजाल की कार्यालय के अन्य सशक्त, हिंदी में काम करने के अनिच्छुक अधिकारियों के पास कोई ऐसा प्रस्ताव लेकर जाए जिससे हिंदी का प्रयोग बढ़ सके। इसलिए वह अपनी नौकरी की फ़िक्र में वह सब काम करने के लिए बाध्य होता है जिससे हिंदी का सरोकार नहीं होता है और कार्यालय को भी एक ऐसा जीव मिल जाता है जो हिंदी में काम करने या न करने को उचित ठहराता रहता है।
यही स्थिति राजभाषा विभाग की है। इसलिए वह वही लिखता और बोलता है जो हिंदी में काम करने के अनिच्छुक अधिकारी और मंत्री चाहते हैं। अब आई. डी. स्वामी और चिदंबरम या अंग्रेज़ी समर्थक आई.ए.एस. अधिकारी हिंदी में क्यों काम करना चाहेंगे। उनकी इसी अभिवृत्ति के कारण ही तो यह बात प्रचलित कर दी गई है कि भारत की भाषा नीति प्रेरणा (अनुरोध) और पुरस्कारों की तुष्टीकरण नीति पर आधारित है और इसमें नियम/अधिनियमों का उल्लंघन करने पर किसी दंड का प्रावधान न होने के कारण कोई कार्रवाई करना संभव नहीं है। अतः न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी। उस दिन का इंतज़ार करना होगा और हिंदी दिवस मनाते रहना होगा क्योंकि मंत्री ने जो जवाब दिया उससे तो यही साबित होता है। उनका जवाब था कि भारत संघ की राजभाषा नीति प्रेरणा (मोटिवेशन-अनुरोध) और पुरस्कारों (इन्सेंटिव) की तुष्टीकरण नीति पर आधारित है। अतः किसी के विरुद्ध कोई कार्रवाई करना ज़रूरी नहीं है। इस लिंक पर इसे पढ़ा जा सकता है http://rajbhasha.nic.in/396engrs.pdf ।.
आपकी जानकारी के लिए यह बता दूँ कि राजभाषा अधिनियम, 1963 व राजभाषा नियम 1976 में कहीं ऐसा उल्लेख नहीं किया गया है कि इनका उल्लंघन किया जा सकता है।
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सोमवार, अगस्त 15, 2011

धर्मो रक्षति रक्षितः

मैं धर्म जैसे विवाद ग्रस्त बन गए विषय पर नहीं लिखना चाहता था क्योंकि धर्म बेहद निजी मामला है। हर व्यक्ति स्वतंत्र है कि वह धर्म माने या न माने या किस धर्म को माने? मेरा अपना विचार है। परंतु अपने ब्लॉगर साथी संदीप पँवार (जाट देवता) के सुझावानुसार विवादित विषय पर अपने विचार व्यक्त कर रहा हूँ।
मैं दर्शन शास्त्र का विद्यार्थी रहा हूँ। साथ ही साहित्य का भी। साहित्य और दर्शन का अटूट संबंध है, गिरा अर्थ जल बीचि सम, कहियत भिन्न न भिन्न (वागार्थाविव संपृक्तौ वंदे वाणी विनायकौ)। अर्थात्, जैसे वाणि का अर्थ के साथ और लहर का जल के साथ अभिन्न संबंध होता है। साहित्य सच्चा इतिहास बताता है, साहित्य समाज का सच्चा दर्पण है बशर्ते कि उसका ढंग से अध्ययन किया जाए। साहित्य में व्यक्त दर्शन जीवन दर्शन होता है। जीवन दर्शन जो धर्म सिखाता है वही सच्चा धर्म है। धर्म अनुष्ठान और पूजा स्थलों में जाकर प्रदर्शन धर्म नहीं है।
दर्शन शास्त्र में सदैव सुपर पावर, सुपर नेचुरल पावर, उसके अस्तित्व, उसकी व्यवस्था और उसके नैसर्गिक न्याय (नेचुरल जस्टिस) के बारे में तार्किक चर्चा की जाती है। वहाँ आस्था और श्रद्धा की बात नहीं की जाती है। वहाँ तर्क शास्त्र के सिद्धातों के आधार पर सत्य और असत्य की खोज की जाती है। उसी सत्य असत्य की खोज में ऋषि मुनि अपना जीवन अर्पण कर देते थे और पूरे जीवन के सत्व को कुछ सूत्रों और नियमों के रूप में हमें दे जाते थे। अतः उन नियमों को हमने अपने जीवन में उतारने के लिए कुछ संकल्प (रिज़ालूशन) पारित किए – सामाजिक संसद में और उन्हें मानना या उनका पालन करना अपना धर्म माना। इस प्रकार ऋषि मुनियों या निःस्वार्थ भाव से मानव की भलाई के लिए जीवन उत्सर्ग करने वाले लोगों द्वारा किए जाने वाले अनुसंधानों से नए संकल्प (रिज़ालूशन) पारित होते रहे और धर्म का दायरा बढ़ता गया। मनुस्मृति की रचना करने वाले मनु देव ने कहीं भी मंदिर की, टेस्टमेंट की रचना करने वाले ने किसी चर्च की, कुरान-ए-पाक में कहीं पर अंध सिद्धांत, गुरुवाणी के रचयिता ने सस्वर पाठ मात्र कर देने से कर्तव्य की इतिश्री नहीं मानी है। सभी ने उन सिद्धांतों को जीवन में उतारने का ही उपदेश दिया है। इसका मतलब है कि सत्य निष्ठा से लोक हित में सही कर्तव्य (राइट ड्यूटी) करना ही धर्म माना गया है। उसमें सामाजिक समरसता और सौहार्द्र के अलावा कहीं पर भी वैमनस्य की बात नहीं कही गई है। फिर धार्मिक (आजका) उन्माद, खून ख़राबा किस लिए?
दर्शन में सदैव व्यक्ति (इंडिविजुअल) के जीवन का विश्लेषण किया जाता है और उसी के उन्नयन की बात की जाती है क्योंकि व्यक्ति (इंडिविजुअल) के उन्नयन से ही समाज का उन्नयन होगा। व्यक्ति (इंडिविजुअल) के पतन से समाज का पतन होगा। यह बात भारतीय और पाश्चात्य दोनों दर्शनों में समान है। शायद यही कारण है कि पूरे विश्व में मानव की सोच एक जौसी है। फ़र्क सिर्फ़ देशकाल की परिस्थितियों, भाषा और संस्कारों के कारण है। इसीलिए धर्म के अंगों में – धृति, क्षमा, बुरी भावना का दमन, शुचिता, इंद्रियों का निग्रह, धैर्य, विद्या आदि को माना गया है और यह बात सार्वजनीन (यूनीवर्सल) है। इनकी प्राप्ति के लिए यम, नियम, योग, नमाज़, आसन आदि बनाए गए। इनके अपभ्रंश की वजह से अनेक संप्रदाय (सेक्ट, रिलिजन) अस्तित्व में आए और धर्म की सच्ची भावना व उद्देश्य से भटक कर कर्म कांड, मंदिर, मस्जिद, गुरद्वारा, चर्च और चैत्य गृहों के माया जाल में उलझ गए। ये पूजा स्थल प्रारंभ में सामूहिक रूप से इकत्रित होकर नियमों का श्रवण करने के लिए बनाए गए होंगे। ये अपना लक्ष्य खो चुके हैं। ये अब आमदनी और लोगों की भावनाओं को आधार बना कर धन का दोहन करने का ज़रिया बन गए हैं, यह बात जग जाहिर हो चुकी है। अब मूल भावना का वापस आना असंभव नहीं तो मुश्किल ज़रूर है। आज का व्यक्ति जितना अधिक शिक्षित हो रहा है उतना ही अधिक अंधविश्वासी होता जा रहा है। शायद असुरक्षित महसूस कर रहा है जिसकी वजह से अंधविश्वास के दलदल में धँसता जा रहा है और धर्म की भावना उसका सच्चा अर्थ भूल कर कर्मकांडों में फँसता जा रहा है। इसलिए धर्मो रक्षति रक्षितः की भावना का सच्चा अर्थ समझकर सामाजिक सौहार्द्र को कायम करने के लिए समाज अनुमोदित कर्म करना ही धर्म है।
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रविवार, अगस्त 14, 2011

जाति सूचक सरनेम - जातिवादी मानसिकता और जातिगत राजनीति

क्या जाति सूचक सरनेम समाप्त हो जाने से कोई ब्राह्मण अपना सर्वश्रेष्ठ होने का दंभ नहीं भरेगा? क्या कोई राजपूत अपनी हेकड़ी नहीं दिखाएगा? क्या कोई यादव अपने आपको क्षत्रियों से होड़ छोड़ देगा? कोई जाटव ब्राह्मणों की पाँत में बैठकर खाना खा लेगा? मेरा विचार है कि बिलकुल भी नहीं। बीमारी सरनेम में नहीं बल्कि मानसिकता में है। कुछ लोग खुद जातिवाद करेंगे परंतु दूसरों पर उँगली उठाएँगे। एक मंच पर पाँच ब्राह्मण होंगे तो किसी का ध्यान नहीं जाएगा लेकिन किसी अन्य जाति के पाँच लोग एकत्र हो जाएँगे तो लोगों का ध्यान तुरंत इस ओर जाएगा कि यह तो जातिविशेष का सम्मेलन है। कोई जाट नेतृत्व करता है तो उसे जाट नेता कहा जाता है। सुशील कुमार शिंदे अनुसूचित जाति के नेता हैं परंतु ममता बनर्जी बंगाली नेता होते हुए भी राष्ट्रीय नेता हैं। राहुल गांधी तो पैदायशी राष्ट्रीय नेता है। मुलायम सिंह, लालू प्रसाद, मायावती, अजित सिंह, चौटाला कभी राष्ट्रीय नेता नहीं बन पाएँगे। कोई मुसलमान नेता होगा तो उस पर कौमी नेता का लेबल चस्पा हो हो जाएगा। क्यों? जाति सूचक सरनेम के कारण या जातिवादी मानसिकता और जातिगत राजनीति के कारण।
यह मानसिकता कुछ लोगों को उत्तर प्रदेश और बिहार में ज्यादा दिखती है। परंतु यह समस्या तो महाराष्ट्र में इससे भी ज़्यादा है। वहाँ पर तो जाति सूचक सरनेम नहीं लगाया जाता है। वहाँ पर भी सरनेम कोई हो परंतु दूसरों को यह पता लग ही जाता है कि यह कुनबी (कुर्मी) जाति का है, वह तेली समाज का है, वह अकोलकर है तो ब्राह्मण होगा, शिंदे लिखता है परंतु अनुसूचित जाति का है। महाराष्ट्र में 1,25,000 से भी अधिक सरनेम हैं जिनका जाति से कोई संबंध नहीं है फिर भी चुनाव के समय सभी को पता चल जाता है कि वह किस जाति का है और उसे उसी ढंग से वोट मिलते हैं। अतः खामी सरनेम में नहीं बल्कि मानसिकता में है और वह बदलना असंभव नहीं तो दुष्कर ज़रूर है।
मैं उत्तर प्रदेश का हूँ और एम.ए. तक की पढ़ाई तक का समय वहीं बीता। बाद में केंद्र सरकार की सेवा में आया और पहली पोस्टिंग करनाल (हरियाणा) में हुई। जाट बहुल क्षेत्र। वहाँ पर कॉमन टाइटिल सिंह होती है। क्षेत्रों के आधार पर कोई बेनीवाल, अहलावत, कोई महिवाल, सोनवाल, बागड़ी आदि लिखता है। फिर भी लोगों को पता चल ही जाता है कि जाट है और वह अनुसूचित जाति का है। मेरे कई परिचित हरियाणे से हैं जो अच्छे पढ़े लिखे, बुद्धिमान, सुंदर, सुशील हैं और कोई कुमार लिखता है, कोई बागड़ी लिखता है। हम सब साथ खाना खाते हैं, काम करते हैं परंतु कभी सामाजिक रस्मो रिवाज़ की बात आती है तो लोग उन्हें अलगा ही देते हैं और तथा कथित ऊँची किनबड़ी धूम धाम से मनाते हैं परंतु धार्मिक अनुष्ठानों में स्वजातीय को ही शामिल करते हैं।
उत्तर भारत में आप अच्छे कपड़े पहने हों और सहयात्री आपसे नाम पूछे और आप अपना नाम सुरेंद्र कुमार बता दें तो पूछेगा कि पूरा नाम क्या है? यानी आपकी जाति क्या है? यदि आपने कहा कि मेरा पूरा नाम यही है तो उसे तसल्ली नहीं होगी। आपके पिता जी का नाम पूछ लेगा। मतलब यह कि आपकी जाति पूछ कर ही दम लेगा। उसे आपकी जाति से क्या लेना देना? परंतु यहाँ की मानसिकता ऐसी है कि आपकी जाति पूछने के बाद दलगत, जातिगत और धर्मगत उधेड़ बुन शुरू होगा। यदि आप उसके पक्ष के न हुए तो आपसे अपने जातिगत प्रछन्न विद्वेष के कारण आपकी जाति के नेता की बुराई करेगा, चाहे आप उस नेता के समर्थक हों या न हों।
एक बार मैं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्व विद्यालय के कुलपति त्रिभुवन नारायण सिंह के पास प्रस्ताव लेकर गया था कि मैं राजभाषा विकास परिषद के तत्वावधान में, "हिंदी की सांविधिक स्थिति और सरकार की उदासीनता" विषय पर अखिल भारतीय संगोष्ठी करना चाहता हूं। इस काम में विश्व विद्यालय से कुछ सहायता करा दें क्योंकि परिषद के पास धन नहीं है। उन्होंने तुरंत कहा विश्व विद्यालय के पास निधि तो नहीं है कोई और मदद चाहें तो हम हाज़िर हैं, मतलब यह कि उद्घादटन के लिए या भाषण के लिए आ सकते हैं। बातचीत के दौरान मैंने कहा कि केंद्र सरकार की उदासीनता के कारण कार्यालयों में हिंदी की दुरवस्था के बारे में कुछ कहना शुरू किया तो उन्होंने तुरंत मुलायम सिंह का नाम लेकर सारा दोष उनके सिर पर मढ़ दिया और मुझे एहसास दिला दिया कि आप यादव हैं और आप भी बराबर के दोषी हैं। आई.ए.एस., आई.पी.एस. परीक्षाओं के माध्यम की दुहाई देने लगे। क्या उन्हें मालूम नहीं है कि यू.पी.एस. की सभी परीक्षाओं के लिए हिंदी माध्यम उपलब्ध है? विश्व विद्यालयों में भी उच्च शिक्षा हिंदी या क्षेत्रीय भाषओं में दी जाती है। परंतु अंग्रेज़ी मानसिकता के पोषक प्राध्यापकों को अंग्रेज़ी में लिखित ग्रंथों को पढ़कर पढ़ाना आसान लगता है। वे हिंदी में पुस्तकें नहीं लिखते हैं और न ही पढ़ने के लिए सिफ़ारिश करते हैं इसीलिए हिंदी में लिखी गई स्तरीय पुस्तकें नहीं मिलती हैं। अब अच्छी पुस्तकें नहीं मिलेंगी तो खरीदने वाले भी कम ही होंगे। क्या इसके लिए जातिवादी सरनेम दोषी है? अतः जातिवादी सरनेम समाप्त हो जाने पर भी जातिवाद समाप्त नहीं होगा जब तक कि मानसिकता और जातिगत राजनीति नहीं समाप्त होगी।
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क्या रुपए का नया प्रतीक क्षेत्रीयता का परिचायक है?