रविवार, अप्रैल 17, 2011

क्राउडसोर्सिंग – जुटाऊभीड़ या भाड़े की भीड़


ग्यारह से पंद्रह अप्रैल तक राजभाषा विकास कार्यक्रम में व्यस्त रहा अतः ब्लॉग पर नहीं आ सका। लिखने को कई विषय थे परंतु इस विषय पर लिखने की एक खास वजह यह है कि मेरे कार्यक्रम में रेलवे के एक सहभागी ने कहा कि "देशपांडे हॉल (नागपुर सिविल लाइंस जैसे पॉश क्षेत्र में स्थित) में एक कार्यक्रम था परंतु उसमें भाग लेने वाले एक दम ठेठ गाँव से आए लगे।"
ऐसा अक्सर हो रहा है कि नेताओं को जब अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना होता है तो गाँव-गाँव में सक्रिय अपने कार्यकर्ताओं को कुछ धन देकर निदेश देते हैं कि अमुक तारीख, समय और स्थान पर इतनी संख्या में व्यक्तियों की उपस्थिति सुनिश्चित करें। कार्यकर्ता अपने आकाओं के आदेश के अनुपालन में अपने संपर्क में आने वाले लोगों को शहर दिखाने, शहर तक ले जाने और शहर दिखाकर वापस गाँव तक छोड़ने का आश्वासन देते हैं तथा कुछ धन भी अग्रिम दे देते हैं। अतः भीड़ इकट्ठा हो जाती है। मीडिया के लोगों को भी कुछ समाचार मिल जाते हैं। नेताओं के बयान मीडिया में आ जाते हैं जिससे उनकी मंशा पूरी हो जाती है। हालाँकि सभी को मालूम होता है कि भीड़ जुटाई गई है। भीड़ जुटाने की इस प्रक्रिया को क्राउड आउटसोर्सिंग कहा जाता है, अर्थात्, क्राउड + सोर्सिंग = क्राउडसोर्सिंग। चूँकि ये दोनों शब्द सजातीय हैं इसलिए इन्हें एक साथ लिखा जा सकता है – क्राउडसोर्सिंग। इसे हिंदी में जुटाऊभीड़ या भाड़े की भीड़ कहा जा सकता है।

गुरुवार, अप्रैल 07, 2011

शब्द निर्माण – समास प्रक्रिया का उपयोग – सेल्स मानव/बिक्रीमानव


शब्द निर्माण, नामकरण की प्रक्रिया है। जब कोई नई अवधारणा या संकल्पना मूर्त रूप ले लेती है तो उसकी पहचान का प्रश्न उत्पन्न होता है। अतः उस मूर्त रूप को कोई न कोई नाम दिया जाता है जिससे उसे संबोधित किया जाता है। आमतौर, पर उदाहरण लें तो जन्म के 21 दिन उपरांत शिशु का नामकरण किया जाता है और फिर उसे उसी नाम से संबोधित किया जाता है। नामकरण का आधार उस संकल्पना या अवधारणा का गुण-धर्म होता है, अर्थात्, वह मूर्त वस्तु क्या काम करती है? उसका क्या प्रभाव होता है? आदि। शिशु के नामकरण में हम उन गुणों को आरोपित करके कोई सार्थक शब्द या शब्द युग्मों का उपयोग करते हैं। कभी अति अप्रचलित शब्दों का उपयोग किया जाता है तो कभी प्रचलित। कभी एक ही भाषा के एक शब्द का उपयोग किया जाता है तो कभी एक ही भाषा के दो शब्दों का उपयोग किया जाता है तो कभी दो अलग अलग भाषाओं के शब्दों का। जब दो शब्दों का उपयोग करके एक नाम (संज्ञा) दिया जाता है तो उस नामकरण की प्रक्रिया को समास प्रक्रिया कहा जाता है। कामता प्रसाद गुरु के अनुसार दो या अधिक शब्दों का परस्पर संबंध बताने वाले शब्दों से बनने वाले स्वतंत्र शब्द को "सामासिक" शब्द और उस प्रक्रिया को "समास" कहते हैं।  

आधुनिक हिंदी और कार्यालयी हिंदी में समास प्रक्रिया केवल हिंदी शब्दों तक ही सीमित नहीं है। दो विभिन्न भाषाओं के शब्दों को मिलाकर भी सामासिक शब्द की रचना की जा सकती है, जैसे, "सेल्स मानव"। यह शब्द प्रवीण पांडेय के ब्लॉग पर अभी हाल ही में मोबाइल फ़ोन में हिंदी की सुविधा का उल्लेख करते हुए गढ़ा गया नवीनतम शब्द है। इसकी प्रतिक्रिया में 88 लोगों ने प्रतिक्रिया व्यक्त की। बाकी सभी ने तो फ़ोन की अच्छाई, कीबोर्ड की सुविधा असुविधा, कीमत आदि पर राय व्यक्त की परंतु सतीश सक्सेना (सेल्स मानव), निशांत मिश्र (सेल्समानव), पद्म सिंह (सेल्स मानव) और गिरधारी खंकरियाल (सेल्समानव/बिक्रीमानव) ने प्रवीण पांडेय द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्द "सेल्समानव" को सराहा। खंकरियाल ने दूसरा विकल्प "बिक्रीमानव" सुझाया।

इन लोगों ने शब्द को तो सराहा परंतु जाने अनजाने लेखन के तरीके में थोड़ा अंतर दिखाया। किसी ने दोनों शब्द खंडों को अलग अलग लिखा तो किसी ने दोनों को साथ मिलाकर। सामासीकृत शब्दों के लेखन का व्याकरणिक नियम है कि जब दोनों पद सजातीय हों (एक ही भाषा या मूल के) तो उन्हें मिलाकर लिखा जाए अन्यथा अलग-अलग बिना योजक चिह्न (-) लगाए लिखा जाए। यहाँ पर "सेल्स" और "मानव" दो विजातीय शब्द या पद हैं इसलिए इन्हें "सेल्स मानव" लिखा जाना चाहिए। यदि खंकरियाल के दूसरे विकल्प को लिया जाए तो इसे "बिक्रीमानव" लिखा जाना चाहिए।

राजभाषा बन जाने और प्रौद्योगिकी का समर्थन मिल जाने के कारण हिंदी का क्षेत्र बहुत व्यापक हो गया है। सार्वभौमिक स्तर पर एकरूपता हो और मानकता भी बनी रहे इसलिए व्याकरणिक नियमों का पालन आवश्यक है।  

शुक्रवार, अप्रैल 01, 2011

ऐंग्लो इंडियन और अंग्रेज़ी का शूल


भारत में निवासी ऐसा व्यक्ति जो यूरोपीय वंश के पुरुष की भारत क्षेत्र में जन्मी संतान हो अथवा किसी ऐसे क्षेत्र में जन्मी हो जहाँ पर कि वह अस्थायी तौर पर न रहता रहा हो, ऐंग्लो इंडियन कहलाएगा। पंद्रह अगस्त 1947 को नए राष्ट्र के उदय के साथ ही ऐंग्लो इंडियन का संसार लुप्त हो गया। जहाँ एक तरफ, भारत ने 300 साल पुराने उपनिवेशवाद का चोला उतार फेंका था और भारत के स्वतंत्र नागरिक अपने भविष्य के सपने बुनने लग गए थे वहीं दूसरी तरफ़, ब्रिटिश अपने बिस्तर गोल कर रहे थे, अपनी गोल्फ़ की छड़ियाँ, अपनी फ़ौजी पोशाक तथा अपनी स्मृतियों को समेटकर अपने घर लौट रहे थे। जहाँ अन्य भारतवासी उनके जाने पर खुश हो रहे थे वहीं देश में एक ऐसा तबका भी था जो खुश होने के बजाय दुखी था। ये कौन लोग थे? ये वे लोग थे जो यूरोपीय मूल के अंग्रेज़, डच, फ़्रांसीसी और पुर्तगाली अफ़सरों, हुक़्मरान और व्यापारियों की वर्ण संकर संतानें थीं तथा अंग्रेज़, डच, फ़्रांसीसी और पुर्तगाली की संतानें होनो पर गर्वित थीं। ऐसे अंग्रेज़ पिता जब भारत छोड़कर जाने लगे तो अपनी अनचाही ऐंग्लो इंडियन औलादों को यहीं छोड़ गए। उन औलादों को उम्मीद थी कि वे भी उनके साथ लंदन जाएंगे जबकि अंग्रेज़ उन्हें छोड़ गए और अपनी जीवन शैली, समाज के आम आदमी से दूरी बनाए रखने की परंपरा और अंग्रेज़ी भाषा का तुर्रा दे गए। ये उन परंपराओं और खोखली तहज़ीब के बल पर कब तक यहाँ रह सकते थे? अतः इन लोगों ने भी कुछ दिनों बाद यहाँ से पलायन शुरू किया और धीरे धीरे, यहाँ से कनाडा, अमरीका, दक्षिण अफ़्रीका, यूरोप की राह पकड़ी। 1947 में ऐसे लोगों की संख्या लगभग 3,00,000 थी। परंतु अब यह संख्या घटकर लगभग1,00,000 रह गई है।
सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना आधिपत्य जमा लिया था और व्यापार तथा नौकरी के लिए भारी संख्या में अंग्रेज़ और यूरोपीय भारत आने लगे थे। परंतु उनकी पत्नियाँ लंबी समुद्री यात्रा को नहीं झेल पाती थीं इसलिए वे भारत नहीं आना चाहती थीं। ऐसे में अंग्रेज़, डच, फ़्रांसीसी और पुर्तगाली फ़ौजी अफ़सर, हुक़्मरान और व्यापारी यहीं पर भारतीय महिलाओं से शादी करने लग गए थे। शादी के बाद इन शादियों से उत्पन्न अपनी संतानों और पत्नी को भारत की देशी संस्कृति से अलग रखकर उन्हें वही संस्कार देने लग गए थे जो ब्रिटेन में प्रचलित थे। उनकी वर्ण उन संकर संतानों को वर्ण संकर होने पर कोई अमर्श नहीं था बल्कि वे लोग अपने आपको देशी लोगों श्रेष्टतर समझते थे।
बाद में, 19वीं शताब्दी में जब स्वेज़ नहर बन गई तब ब्रिटेन से भारत आने में लगने वाला समय बहुत कम हो गया और अंग्रेज़ महिलाएं भारत आने लगीं तथा भारत में कार्यरत या निवासी अंग्रेज़ों के साथ शादी करके यहीं पर रहने लगीं। ऐसी स्त्रियाँ अपने साथ अपनी श्रेष्ठता वाली और सफेद चमड़ी की अकड़पन के साथ-साथ वे सारे आचार-विचार, शिक्षा और व्यवहार भी लाईं। वे महिलाएं अपने आपको विक्टोरिया युग की वाहिका मानती थीं एवं भारत में रहने वाली संकर संतानों को हेय दृष्टि से देखती थीं। वे उन्हें ऐंग्लो नहीं बल्कि भारतीय से ज़्यादा कुछ नहीं समझती थीं। लेकिन भारत में रहने वाले वर्ण संकर लोग अपने आप को भारतीयों से श्रेष्ठ समझते थे क्योंकि वे अपनी मातृभाषा अंग्रेज़ी मानते थे और धार्मिक संस्कारों तथा लालन-पालन में अंग्रेज़ों की नकल करते थे। वे अपनी शादियाँ भी उन्हीं ऐंग्लों इंडियनों के बीच करते थे। वे अक्सर, ब्रिटेन से आए लोगों से ही शादियाँ करना पसंद करते थे। ऐसे लोग बहुत कम और नगण्य संख्या में थे जो भारतीयों से शादी करना चाहते थे। अंग्रेज़ों ने अपने और ऐंग्लो इंडियनों के बीच जो संकुचित, कठोर अनुशासन की खाईं, वर्जनाएं एवं अलगावपन बना रखे थे वही खाईं वर्ण संकर अंग्रेज़ों और अन्य भारतीयों के बीच बरकरार रहीं। न तो अंग्रेज़ और न ही भारतीय वर्ण संकर ऐंग्लो इंडियन भारतीय संगीत, नृत्य, रंगमंच या किसी कलात्मक बातों में रुचि लेते थे। ये लोग भारतीयों को मूर्ति पूजक, गंदे, ज़मीन पर बैठकर खाना खाकर उंगली चाटने वाले असभ्य मानते थे जो लोग खुले में नाक साफ करते थे, खुले में शौच करते थे और रास्ते पर थूकते थे। परंतु इन ऐंग्लों इंडियनों को यह मलाल था कि अंग्रेज़ों ने उनके साथ छल किया है। ये लोग अंग्रेज़ों के इस व्यवहार पर आश्चर्यचकित भी थे कि उन्होंने इन्हें इनके पुरखों की ज़मीन पर बुलाने और कुछ शिष्टाचार दिखाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया।
अंग्रेज़ों के जाने के बाद ये ऐंग्लों इंडियन मैकाले की नाति के धर्म ध्वजी बने और भारत में अंग्रेज़ी तथा अंग्रेज़ियत को बनाए रखने के लिए जीतोड़ कोशिश करते रहे ताकि अपने को देशी जनता से अलग और श्रेष्ठतर साबित कर सकें। तभी तो संविधान समिति में शामिल होकर न केवल अंग्रेज़ी भाषा को देश में रोकने में सफल रहे बल्कि ऐंग्लो इंडियनों के लिए विशेष स्थान भी सुरक्षित कर लिया। इतना ही नहीं 1963 में, ऐंग्लो इंडियन नेता फ़्रैंक एंथोनी ने नेहरू जी को प्रभावित करके देश की छाती में अनंतकाल तक अंग्रेज़ी का शूल गाड़ दिया जिसे निकालने की क्षमता तथाकथित स्वदेशी और हिंदुस्तानी के पोषकों में भी नहीं है।   

   

 

         



शनिवार, मार्च 26, 2011

हिंदी के अंतरराष्ट्रीय स्वरूप और यूनीकोड प्रणाली पर संगोष्ठी – पर एकरूपता का अभाव


विश्वेश्वरैया राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, नागपुर ने 25 मार्च को अपने परिसर में हिंदी के अंतरराष्ट्रीय स्वरूप और यूनीकोड प्रणाली पर संगोष्ठी आयोजित की थी और मुझे उसमें यूनीकोड पर जानकारी देने के लिए आमंत्रित किया था। उन्होंने इसी विषय पर चर्चा के लिए भारतीय स्टेट बैंक के मुख्य अधिकारी श्री मनमोहन सोलंकी को भी आमंत्रित किया था जिसके बारे में कार्यक्रम में उल्लेख नहीं था। बाद में पता चला कि  श्री सोलंकी भी चर्चा करेंगे। मुझे क्या ऐतराज हो सकता था? परंतु बाद में एहसास हुआ कि बिना गहन अध्ययन और पल्लव ज्ञान में क्या फ़र्क़ होता है?

 

संगोष्ठी का उद्घाटन दत्ता और मेघे चिकित्सा संस्थान, वर्धा के कुलगुरु डॉ. वेदप्रकाश मिश्र ने किया और अपने धारा प्रवाह, मंत्रमुग्ध कर देने वाले भाषण में कहा कि हिंदी राष्ट्रीय एकता की, सभी भाषाओं  में संवाद और सहचारिता की भाषा है। उन्होंने बताया कि हिंदी विश्व के 26 देशों में पढ़ाई जाती है और उन देशों में हिंदी बोलने वालों की संख्या एक-एक लाख से भी अधिक है। दुनिया के छह ऐसे देश हैं जहाँ हिंदी प्रमुख भाषा है। नवीनतम जन गणना के अनुसार देश में 65.9 करोड़ लोग हिंदी का प्रयोग करते हैं। विश्व में इसका स्थान तीसरे से उठकर दूसरा हो गया है। तो क्या अब भी बताने की ज़रूरत है कि हिंदी का क्या महत्व है? मेरे विचार से हिंदी का मूल्यांकन संख्या से नहीं बल्कि इसके विस्तार और इसकी उपयोगिता के मानदंड से करना चाहिए। आज विदेशों में रह रहे भारतीयों की समस्या यह हो गई है कि अपनी अगली पीढ़ी को अपनी संस्कृति की वाहिका हिंदी कैसे सिखाई जाए? लोग उन्हें हिंदी सिखाना चाहते हैं परंतु सुविधा की कितनी कमी है।  

 

इस संबंध में दि नांक 11,12,और 13 मार्च को क्रमश: बर्मिंघम ,नॉटिंघम और लंदन में आयोजित किए गए  अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मलेन का उल्लेख करना चाहता हूं। सम्मलेन में, हिंदी के अंतरराष्ट्रीय स्वरूप और उसके शिक्षण की कार्य प्रणाली और और उसके मकसद को लेकर सार्थक  सवाल उठाए गए, जैसे, विदेशों में हिंदी किस मकसद से पढ़ाई जा रही है? उसका मकसद सिर्फ अपनी जड़ों से जुड़े रहने के लिइ थोड़ा बहुत बोल समझ लेना है या उससे आगे भी कुछ है? क्या हिंदी को देवनागरी छोड़कर सुविधा के लिए रोमन के माध्यम से सिखाना चाहिए? नए मानकों के साथ  हिंदी पढ़ाने का तरीका क्या होना चाहिए क्योंकि विदेशों में हिंदी के अध्यापन का कार्य ज़्यादातर अनट्रेंड अध्यापकों द्वारा स्वयंसेवक के तौर पर किया जाता है।

 

इसका उल्लेख करने का मक़्सद यह है कि विदेशों में रह रहे छात्रों को हिंदी भाषा सिखाने के लिए किन कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, जैसे, बदलते हिंदी के मानकों को सुलझाने का प्रयास करना, हिंदी किताबों में ही इन मानकों को लेकर विरोधाभास को समाप्त करना। वहाँ पर, छात्रों में व्याप्त भ्रम को दूर करने के लिए हिंदी की वर्तनी के मानकीकृत रूप को प्रचलित करने की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है और यहाँ, कैसा विरोधाभास है कि जिन बातों के बारे में विदेशों में लोग चिंतित हैं हम उन्हीं को बढ़ाने में लगे हैं। इस संगोष्ठी में, हिंदी की वर्तनी के मानकीकृत रूप को ताक पर रखकर व्यक्तिगत पसंद को लागू रखने की सिफ़ारिश की जा रही थी। इतना ही नहीं, कंप्यूटर पर यूनीकोड (यूनीवर्सल) में टाइपिंग की बात की जाती है परंतु यूनीफ़ॉर्म कीबोर्ड की बात को नज़र अंदाज़ किया जा रहा था। मुझे तो बड़ा आश्चर्य होता है जब हिंदी अधिकारी भी ट्रांसलिटरेशन पद्धति द्वारा हिंदी टाइप करने की सलाह देते हैं। वे यह भलीभाँति जानते हैं कि ट्रांसलिटरेशन पद्धति द्वारा हिंदी टाइप करने में 50 % तक अधिक स्ट्रोक मारने पड़ते हैं जिससे टाइपिंग की गति कितनी बाधित होती है। अतः ऐसी भ्रम सर्जक संगोष्ठियाँ आयोजित करने से तो अच्छा है कि संगोष्ठी न ही आयोजित की जाए। यह महज औपचारिकता है। इससे हिंदी का भला होने के बजाय अहित हो रहा है। हिंदी लिखने  के लिए देवनागरी लिपि के बजाय रोमन लिपि के दुष्प्रभाव के बारे में मेरा विचार है कि रोमन वर्णमाला और रोमन लिपि अत्यंत दोषपूर्ण हैं। जिन ध्वनियों का हम उपयोग कर सकते हैं उन्हें लिखने में नितांत असमर्थ है। जो लोग रोमन लिपि का इस्तेमाल करके हिंदी लिख रहे हैं या हिंदी लिखने के लिए रोमन प्रणाली का उपयोग करने की सलाह देते हैं वे जाने अनजाने हिंदी भाषा व संस्कृति का अहित कर रहे हैं। मैं इस बात का सख्त हिमायती हूं कि हिंदी की लिपि और लेखन में एकरूपता होनी ही चाहिए। इस विषय पर व्यापक और गंभीरता से वैज्ञानिक चर्चा की ज़रूरत है। कंप्यूटर पर हिंदी टाइपिंग के लिए केवल एक ही लेआउट का उपयोग किया जाए और इसीका प्रशिक्षण दिया जाए। इससे इस लेआउट में भी सुधार के सुझाव मिलेंगे और विश्व स्तर पर एकरूपता का सृजन होगा। 

 

इस पर चिंतन और इसका अनुशीलन किया जाना चाहिए।

बुधवार, मार्च 23, 2011

नई शब्दावली - पोमैटो – एक ही पौधे से आलू और टमाटर दोनों पाएं


आपने वह चुटकुला तो सुना होगा कि विज्ञान ने क्या चमत्कार कर दिया है कि रेल की ऊपरी बर्थ अमृतसर जा रही है और निचली बर्थ चेन्नै। परंतु कृषि वैज्ञानिकों ने इसे सही साबित कर दिया है। यदि विश्वास न होतो इस लिंक पर क्लिक करें - http://www.ehow.com/how_2308286_grow-pomato-plant.html  । अब आप एक ही पौधे से आलू और टमाटर दोनों पा सकते हैं। इस पौधे का नाम है – "पोमैटो" (Pomato).  यह नाम "Potato" से  "Po" लेकर तथा "Tomato"  से "amto" लेकर "Pomato" रखा गया। इस पौधे का वानस्पतिक चित्रण इस प्रकार है – 
एक ही पौधे में ऊपर टमाटर और नीचे आलू
वानस्पतिक विवरण

 

नई शब्दावली - जीप व किमीर (Geep, Chimera)


सन् 1978 में ऑस्ट्रेलिया के एक वैज्ञानिक, डॉ. आर. एस. ह्वाइट ने बकरी और भेड़ के भ्रणों (embryo) को एकसाथ मिलाकर एक संकर नस्ल की जीव बनाया जिसमें बकरी और भेड़ दोनों के गुण थे। गर्भावस्था में तीसरे माह के भ्रूण को लैटिन भाषा में एम्ब्रियो (embryo) कहा जाता है। उनकी शक्ल सूरत इन दोनों जानवरों से भिन्न थी और परंतु दोनों का मिश्रण थी। चूंकि किमीर दो अलग-अलग जातियों के भ्रणों को लेकर बनाया गया था इसलिए इसमें चार पितृ का समावेश था, नर-मादा दो भेड़ तथा नर-मादा दो बकरी। ये दोनों भ्रूण प्राकृतिक रूप से क्रमशः नर-मादाओं के संभोग से बने थे। इसलिए ये दो भिन्न जाति के जानवरों, अर्थात्, भेड़ और बकरी के प्रकृतिक संभोग से उत्पन्न संकर संतान ते भिन्न थे। प्रारंभ में इसका नाम "goat" से  "g" लेकर तथा "sheep"तथा "sheep" से "eep" लेकर "geep"रखा गया। परंतु बाद में इसका नाम किमीर (chimera) रख दिया गया। लैटिन में किमीर का मतलब होता है, शेर के सिर, बकरे के धड़ और साँप की पूंछ वाला कल्पित शैतान या राक्षस। geep का चित्र निम्नप्रकार है।



क्या रुपए का नया प्रतीक क्षेत्रीयता का परिचायक है?