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राजभाषा हिंदी: सभी भारतीय भाषाओं के लिए एक ही लिपि की आवश्यकता और औचित्य

राजभाषा हिंदी: सभी भारतीय भाषाओं के लिए एक ही लिपि की आवश्यकता और औचित्य
Posted by डॉ. दलसिंगार यादव at 7:04:00 am
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डॉ. दलसिंगार यादव
जन्म आज़मगढ़ (उत्तर प्रदेश), प्रारंभिक शिक्षा गांव व आज़मगढ़ में, बी.ए. व एम.ए. बी.एच.यू. वाराणसी, एलएल. बी. व पीएच. डी. पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़, कंप्यूटर शिक्षा पुणे, कानपुर से। भारतीय रिज़र्व बैंक से उप महाप्रबंधक (राजभाषा)के पद से सेवा निवृत्त होकर राजभाषा विकास परिषद की स्थापना की और इसके संस्थापक निदेशक के रूप में कार्यरत। सेवा काल में 9 पुस्तकें, बैंकिंग व भाषा तथा पशुपालन पर लिखीं। एक पुस्तक इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार से सम्मानित। फ़िल हाल नागपुर हाई कोर्ट में कानून की प्रैक्टिस कर रहा हूं। बी.ए. की पढ़ाई के दौरान 1967 में हिंदी आंदोलन में भाग लिया। Initial Education from my village and Azamgarh, B.A., M.A. from B.H.U. Varanasi, LL. B. & Ph.D. from Panjab University, Chandigarh, Computer Education from Pune, Kanpur. Retired from the Reserve Bank of India as Deputy General Manager(Rajbhasha), founded Rajbhasha Vikas Parishad at Nagpur, Founder Director. Written 9 books on banking and Bhahsha. One book awarded Indira Gandhi Rajbhash Awrd. Practicing in Nagpur High Court.
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