बुधवार, सितंबर 12, 2012

हिंदी दिवस 2012


हिंदी दिवस हर वर्ष मनाया जाता है जोकि हिंदी को मंज़िल तक पहुँचाने के लिए किए जाने वाले प्रयास की याद दिलाता है। परंतु याद करने मात्र से मंज़िल मिलने वाली नहीं है। प्रयास तो मात्र याद करने की बात रह गई है। तो फिर प्रयास कैसे किया जा रहा है? विश्व हिंदी सम्मेलन द्वारा? विदेशों में हिंदी का प्रचार करके? हिंदी दिवस के अवसर पर नाटक अभिनीत करके, काव्य पाठ करके? या वास्तविक रूप व्यापक स्तर पर, कार्यालयों से लेकर राजनयिक स्तर पर इसका प्रयोगकरके?    
हिंदी दिवस, हिंदी प्रेमियों द्वारा हर वर्ष मानाया जाने वाला स्मारक दिन है। हर वर्ष हिंदी प्रेमी यह याद करते हैं कि आज ही के दिन हिंदी देश की राजभाषा बनी थी। यह निर्णय संविधान समिति की बैठक में किया गया था, यानि कि 14 सितंबर 1949 को। लेकिन पहला हिंदी दिवस 14 सितंबर 1954 को मनाया गया था, अर्थात् निर्णय के पाँच साल बाद। शायद हिंदी प्रेमियों को पहले लगा होगा कि सरकार संविधान के प्रावधानों का मान रखेगी और हिंदी को उचित राजभाषा की गरिमा प्रदान कर देगी। अतः ऐसा समझने में पाँच साल गुज़र गए। जब इच्छाशक्ति के अभाव का आभास हुआ तो हिंदी दिवस, हर वर्ष हिंदी मानाए जाने का प्रस्ताव किया गया और यथोचित इच्छाशक्ति के अभाव में हिंदी दिवस अनंत काल तक मनाए जाने के प्रयास की शुरुआत हुई। अब 62 साल बीत गए हैं। प्रयास जारी है।
अनंत काल तक हिंदी दिवस मनाए जाने का प्रयास कैसे? वह ऐसे कि देश कौन चला रहा है? चुने हुए नेता थोड़े ही देश का शासन चला रहे हैं। वास्तविक रूप से तो शासन ब्यूरोक्रेसी चलाती है। राजनेता तो उपकरण हैं। ब्यूरोक्रेसी राजनेताओं की इच्छा का सम्मान करते हुए उनको पूरा करने के लिए कानून बनाती है, किसी कानून को बनने नहीं देती है या फिर उसे ऐसे तोड़ मरोड़ देती है कि उसका पालन करना अनंत काल के लिए टाला जा सकता है, जैसे कि राष्ट्रपति का 1955 का आदेश, संविधान के अनुच्छेद 351 के निदेशी सिद्धांत का उल्लंघन करते हुए देश में अंग्रेज़ी के विकास का प्रयास करना, इत्यादि। इसे प्रयास कहते हैं और कारगर प्रयास। हमारी तरह केवल याद करने या याद दिलाने का प्रयास नहीं। अतः 14 सितंबर 1949 को याद करने का एक और प्रयास। 

1 टिप्पणी:

  1. यादव जी यह सही है कि हिन्दी के उत्थान के लिये वास्तविक कार्य कम नाटक ज्यादा होरहे हैं फिर भी कुछ तो प्रयास चल ही रहे है । मेरे विचार से यदि हम शिक्षा के अंग्रेजी माध्यम को महत्त्व देना बन्द करदें तो काफी कुछ अन्तर पडेगा । यह समझना जरूरी है कि शिक्षा किसी माध्यम पर निर्भर कैसे हो सकती है । बल्कि अपनी भाषा में पढना बहुत ही आसान ,इसलिये गहन व व्यापक होता है । निश्चित ही केवल दिवस मनाने से हिन्दी का उत्थान नही हो सकता ।

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