रविवार, मई 29, 2011

प्रयोजनशील भाषा और नई शब्दावली

अपने शब्द भंडार की कमी या शब्द की जटिलता

हम जब किसी लेख में नए शब्द पाते हैं जिनका अर्थ नहीं जानते हैं तब उनका अर्थ सीखने के बजाय यह कोशिश करते हैं कि अपने पुराने और सीमित शब्द भंडार से ही काम चला लें। अतः हम लेखक पर ही जटिल शब्दों के प्रयोग का आरोप लगाकर अपनी अज्ञानता प्रकट तो करते ही हैं साथ ही यह भी संदेश देते हैं कि हमें व्यंजना शब्द शक्ति के प्रयोग का ज्ञान ही नहीं होता है।

नए शब्द सीखने की परंपरा

जब हम बच्चे होते हैं तो हमारे अंदर सीखने की प्रबल इच्छा होती है। शैक्षणिक अनुसंधानों से ज्ञात होता है कि एक पढ़े लिखे के बच्चे दस वर्ष की उम्र तक सामान्यतया बीस हज़ार शब्द सीख लेते हैं और चार साल की आयु के बाद हर साल कई सौ नए शब्द की दर से शब्द भंडार में वृद्धि करते रहते हैं। यह एक चौंकाने वाला तथ्य है सामने आया है कि प्रौढ़ लोग जो स्कूल नहीं जाते हैं उनके शब्द भंडार में बीस-पचीस शब्दों की वृद्धि होती है जब कि स्कूल जाने वाले प्रौढ़ लोगों के शब्द भंडार में सौ से ज़्यादा की दर से शब्दों की वृद्धि होती है। यदि बड़े होने पर पढ़ने की आदत छोड़ दें और कुछ नए शब्दों से परहेज़ करते हुए पुराने और अपने सीमित भंडार से ही काम चलाने का प्रयास करते रहें तो शब्द ज्ञान नहीं बढ़ेगा और ज्ञान विज्ञान के नए ज्ञान से अपरिचित रह जाएंगे। अतः नए शब्दों के प्रति उत्सुकता बनाए रखें और उनके अर्थ एवं प्रयोग को ज़िंदगी का हिस्सा बनाने की आदत डाली जाए।

हिंदी में भाषा सिखाने के साहित्य का अभाव

अंग्रेज़ी में तो अनेक पुस्तकें और अभ्यास पुस्तिकाएं उपलब्ध हैं जिनके उपयोग से लोग अंग्रेज़ी के नए शब्द सीख सकते हैं और उनका अभ्यास कर सकते हैं। साथ ही अंग्रेज़ी सीखने में समय भी लगाते हैं परंतु हिंदी या भारतीय भाषाओं में कुछ लिखा जाता है तो उसे पढ़ने में रुचि दिखाने के बजाय शब्दों की जटिलता का आरोप लगाकर पढ़ने से विमुख हो जाते हैं।
प्रयोजनशील विषयों पर लेखन की आवश्यकता

हिंदी में ज्ञान विज्ञान के विषयों पर अनुसंधान के प्रपत्र लिखने की परंपरा नहीं बन पाई है। हिंदी भाषा सशक्त तभी बनेगी जब इसमें हर विषय के साहित्य और शब्दावली प्रयोग में आएगी। 28 मई 2011 को नागपुर में ऑथर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया की संगोष्ठी में डॉ. बाला सुब्रमन्यम में अपने संबोधन में कहा कि आज के लेखक केवल कविता और उपन्यास तक ही सीमित न रहें बल्कि समाज से सरोकार रखने वाले विषयों पर अपनी लेखनी चलाएं।
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3 टिप्‍पणियां:

  1. कहां कोई सीखने की कोशिश करता है सर जी । जो हमारे पास है बस उन्ही का उपयोग करना सहज लगता है

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  2. यही बात है और यहाँ सब जन शब्दों की क्लिष्टता पर दिन रात गाए जा रहे हैं।

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  3. और साहित्य-कविता-कहानी बहुत हैं, आवश्यकता हिन्दी को अन्य सभी क्षेत्रों से जोड़ने की है।

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