शुक्रवार, अप्रैल 01, 2011

ऐंग्लो इंडियन और अंग्रेज़ी का शूल


भारत में निवासी ऐसा व्यक्ति जो यूरोपीय वंश के पुरुष की भारत क्षेत्र में जन्मी संतान हो अथवा किसी ऐसे क्षेत्र में जन्मी हो जहाँ पर कि वह अस्थायी तौर पर न रहता रहा हो, ऐंग्लो इंडियन कहलाएगा। पंद्रह अगस्त 1947 को नए राष्ट्र के उदय के साथ ही ऐंग्लो इंडियन का संसार लुप्त हो गया। जहाँ एक तरफ, भारत ने 300 साल पुराने उपनिवेशवाद का चोला उतार फेंका था और भारत के स्वतंत्र नागरिक अपने भविष्य के सपने बुनने लग गए थे वहीं दूसरी तरफ़, ब्रिटिश अपने बिस्तर गोल कर रहे थे, अपनी गोल्फ़ की छड़ियाँ, अपनी फ़ौजी पोशाक तथा अपनी स्मृतियों को समेटकर अपने घर लौट रहे थे। जहाँ अन्य भारतवासी उनके जाने पर खुश हो रहे थे वहीं देश में एक ऐसा तबका भी था जो खुश होने के बजाय दुखी था। ये कौन लोग थे? ये वे लोग थे जो यूरोपीय मूल के अंग्रेज़, डच, फ़्रांसीसी और पुर्तगाली अफ़सरों, हुक़्मरान और व्यापारियों की वर्ण संकर संतानें थीं तथा अंग्रेज़, डच, फ़्रांसीसी और पुर्तगाली की संतानें होनो पर गर्वित थीं। ऐसे अंग्रेज़ पिता जब भारत छोड़कर जाने लगे तो अपनी अनचाही ऐंग्लो इंडियन औलादों को यहीं छोड़ गए। उन औलादों को उम्मीद थी कि वे भी उनके साथ लंदन जाएंगे जबकि अंग्रेज़ उन्हें छोड़ गए और अपनी जीवन शैली, समाज के आम आदमी से दूरी बनाए रखने की परंपरा और अंग्रेज़ी भाषा का तुर्रा दे गए। ये उन परंपराओं और खोखली तहज़ीब के बल पर कब तक यहाँ रह सकते थे? अतः इन लोगों ने भी कुछ दिनों बाद यहाँ से पलायन शुरू किया और धीरे धीरे, यहाँ से कनाडा, अमरीका, दक्षिण अफ़्रीका, यूरोप की राह पकड़ी। 1947 में ऐसे लोगों की संख्या लगभग 3,00,000 थी। परंतु अब यह संख्या घटकर लगभग1,00,000 रह गई है।
सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना आधिपत्य जमा लिया था और व्यापार तथा नौकरी के लिए भारी संख्या में अंग्रेज़ और यूरोपीय भारत आने लगे थे। परंतु उनकी पत्नियाँ लंबी समुद्री यात्रा को नहीं झेल पाती थीं इसलिए वे भारत नहीं आना चाहती थीं। ऐसे में अंग्रेज़, डच, फ़्रांसीसी और पुर्तगाली फ़ौजी अफ़सर, हुक़्मरान और व्यापारी यहीं पर भारतीय महिलाओं से शादी करने लग गए थे। शादी के बाद इन शादियों से उत्पन्न अपनी संतानों और पत्नी को भारत की देशी संस्कृति से अलग रखकर उन्हें वही संस्कार देने लग गए थे जो ब्रिटेन में प्रचलित थे। उनकी वर्ण उन संकर संतानों को वर्ण संकर होने पर कोई अमर्श नहीं था बल्कि वे लोग अपने आपको देशी लोगों श्रेष्टतर समझते थे।
बाद में, 19वीं शताब्दी में जब स्वेज़ नहर बन गई तब ब्रिटेन से भारत आने में लगने वाला समय बहुत कम हो गया और अंग्रेज़ महिलाएं भारत आने लगीं तथा भारत में कार्यरत या निवासी अंग्रेज़ों के साथ शादी करके यहीं पर रहने लगीं। ऐसी स्त्रियाँ अपने साथ अपनी श्रेष्ठता वाली और सफेद चमड़ी की अकड़पन के साथ-साथ वे सारे आचार-विचार, शिक्षा और व्यवहार भी लाईं। वे महिलाएं अपने आपको विक्टोरिया युग की वाहिका मानती थीं एवं भारत में रहने वाली संकर संतानों को हेय दृष्टि से देखती थीं। वे उन्हें ऐंग्लो नहीं बल्कि भारतीय से ज़्यादा कुछ नहीं समझती थीं। लेकिन भारत में रहने वाले वर्ण संकर लोग अपने आप को भारतीयों से श्रेष्ठ समझते थे क्योंकि वे अपनी मातृभाषा अंग्रेज़ी मानते थे और धार्मिक संस्कारों तथा लालन-पालन में अंग्रेज़ों की नकल करते थे। वे अपनी शादियाँ भी उन्हीं ऐंग्लों इंडियनों के बीच करते थे। वे अक्सर, ब्रिटेन से आए लोगों से ही शादियाँ करना पसंद करते थे। ऐसे लोग बहुत कम और नगण्य संख्या में थे जो भारतीयों से शादी करना चाहते थे। अंग्रेज़ों ने अपने और ऐंग्लो इंडियनों के बीच जो संकुचित, कठोर अनुशासन की खाईं, वर्जनाएं एवं अलगावपन बना रखे थे वही खाईं वर्ण संकर अंग्रेज़ों और अन्य भारतीयों के बीच बरकरार रहीं। न तो अंग्रेज़ और न ही भारतीय वर्ण संकर ऐंग्लो इंडियन भारतीय संगीत, नृत्य, रंगमंच या किसी कलात्मक बातों में रुचि लेते थे। ये लोग भारतीयों को मूर्ति पूजक, गंदे, ज़मीन पर बैठकर खाना खाकर उंगली चाटने वाले असभ्य मानते थे जो लोग खुले में नाक साफ करते थे, खुले में शौच करते थे और रास्ते पर थूकते थे। परंतु इन ऐंग्लों इंडियनों को यह मलाल था कि अंग्रेज़ों ने उनके साथ छल किया है। ये लोग अंग्रेज़ों के इस व्यवहार पर आश्चर्यचकित भी थे कि उन्होंने इन्हें इनके पुरखों की ज़मीन पर बुलाने और कुछ शिष्टाचार दिखाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया।
अंग्रेज़ों के जाने के बाद ये ऐंग्लों इंडियन मैकाले की नाति के धर्म ध्वजी बने और भारत में अंग्रेज़ी तथा अंग्रेज़ियत को बनाए रखने के लिए जीतोड़ कोशिश करते रहे ताकि अपने को देशी जनता से अलग और श्रेष्ठतर साबित कर सकें। तभी तो संविधान समिति में शामिल होकर न केवल अंग्रेज़ी भाषा को देश में रोकने में सफल रहे बल्कि ऐंग्लो इंडियनों के लिए विशेष स्थान भी सुरक्षित कर लिया। इतना ही नहीं 1963 में, ऐंग्लो इंडियन नेता फ़्रैंक एंथोनी ने नेहरू जी को प्रभावित करके देश की छाती में अनंतकाल तक अंग्रेज़ी का शूल गाड़ दिया जिसे निकालने की क्षमता तथाकथित स्वदेशी और हिंदुस्तानी के पोषकों में भी नहीं है।   

   

 

         



3 टिप्‍पणियां:

  1. बिलकुल सही लिखा है आपने , इस शूल को निकालना संभव नहीं है । जीना होगा अब शायद इसी के साथ।

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  2. आपने बिलकुल सही लिखा है|
    नवसंवत्सर की हार्दिक शुभकामनाएँ|

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