मंगलवार, मई 17, 2011

हमें अंग्रेज़ी से नहीं अंग्रेज़ियत से लड़ना है



नीति निर्माताओं को तो लगता ही नहीं कि अपनी भाषा से प्रेम करना चाहिए है या इसकी कोई आवश्यकता है। राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने तो देश भर में पहली कक्षा से अंग्रेज़ी का बोझ लादने की योजना लागू कर दी है। हिंदी थोपने की बात करते हैं और अंग्रेज़ी थोपने से बाज़ नहीं आते हैं। हिंदी सेवी तो अपना कर्तव्य निभाने में लगें ही रहेंगे।
तथा कथित भारतीय अंग्रेज़ मैकाले की नीति के धर्मध्वजी बनकर भारत में अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ियत को बनाए रखने के लिए जीतोड़ कोशिश करते रहे हैं ताकि वे अपने को देश की जनता से अलग और श्रेष्ठ साबित कर सकें। तभी तो आम लोगों की भाषा के बदले पूरे हिंदुस्तानियों पर अंग्रेज़ी लाद दी गई और यह प्रचार किया गया कि हिंदी थोपी जा रही है। हमारे देश के चंद अंग्रेज़ीदां लोगों ने बहुत ही ज़ोरदार ढंग से हिंदी का विरोध किया और अंग्रेज़ी का समर्थन करते रहे ताकि उनका वर्चस्व बना रहे। उन लोगों को लगता है कि कार्यालयों में हिंदी आ जाएगी तो उनका अस्तित्व ही ख़तरे में पड़ जाएगा।
क्या उन्हें यह नहीं मालूम की असली हिंदी कार्यालयों में नहीं बल्कि जनता में बसती है? इसलिए सरकारी आँकड़ों के आधार पर ही हिंदी की उपयोगिता या इसकी शक्ति का परीक्षण नहीं किया जाना चाहिए। जिस प्रकार असली जनतंत्र की जड़ पंचायतों में है उसी प्रकार असली हिंदी की जड़ है जनता, गैर सरकारी स्वैच्छिक हिंदी सेवी संगठनों तथा लेखकों में है जोकि आज हजारों की संख्या में पत्र-पत्रिकाएं निकालने, हिंदी की साइटें चलाने और हिंदी ब्लॉगिंग में लगे हैं। हिंदी माध्यम से न केवल ललित साहित्य बल्कि प्रयोजनशील विषयों पर लेखन कर रहे हैं। ऐसे माध्यमों को सरकारी संरक्षण या सरकारी अनुदान भी नहीं मिलता है। लोग अपने-अपने संसाधनों में से थोड़ा-थोड़ा और नियमित योगदान द्वारा मिशनरी के रूप में कार्य कर रहे हैं।
कार्यालयों में कार्यरत हिंदी कर्मियों के मन में एक कुंठा घर कर गई है कि हिंदी का विकास नहीं हो रहा है। ये कार्यालयों में अल्पमत में हैं और बहुसंख्यक मुख्य धारा के लोगों की उपेक्षा एवं असहयोग का शिकार होते रहने के कारण ऐसी उक्तियाँ भी करने लग गए हैं कि "हिंदी तो हिंदी वालों और हिंदी भाषियों की ही उपेक्षा का शिकार है। अहिंदी भाषी हिंदी के ज़्यादा हितैषी हैं।" ऐसी प्रलय-प्रवाही टिप्पणी करना न तो हिंदी के पक्ष में है और न ही हिंदी के समर्थकों के हित में। हिंदी ब्लॉगरों में पी. एन. सुब्रमनियम, बाला सुब्रमणियम जैसे तमाम हिंदीतर भाषी लोग भी हैं जो हिंदी माध्यम से "सी" भाषा में प्रोग्रामिंग आदि भी सिखा रहे हैं। ऐसे लोगों की संख्या हिंदी भाषियों की तुलना में कम है फिर भी हिंदी भाषी ऐसे लोगों को अधिक सम्मान देते हैं और उनके योगदान के प्रति आभारी होते हैं तथा हिंदी भाषियों की सेवाओं को कोई महत्व ही नहीं देते। यही नहीं हिंदी का गहन ज्ञान भी नहीं अर्जित करना चाहते हैं बल्कि सीमित शब्द ज्ञान को बढ़ाने का प्रयास नहीं करते हैं और सरलता की मांग कर अपनी अक्षमता को छिपाने का ढोंग करते हैं।    
आजकल ऐसा माहौल अंग्रेज़ी के अधकचरा ज्ञान वाले अभिभावकों और मीडिया मालिकों ने तैयार कर दिया है और हिंग्लिश शब्द गढ़ लिया है तथा उसी के पक्षधर बन गए हैं। ये लोग शुद्ध या मानक हिंदी शब्दों पर लतीफ़े सुनाते रहते हैं। वे ही मीडिया में, अप्रचलित कठिन अँग्रेज़ी शब्दों के आ जाने पर अपने मातहतों और बच्चों को धीरजपूर्वक डिक्शनरी उठाकर अर्थ देखने की हिदायत देते है। परंतु हिंदी शब्दों के सरल पर्याय के उपयोग की सलाह देते हैं यानी कि अंग्रेज़ी शब्द ज्ञान को बढ़ाएं और हिंदी के अपने सीमित शब्द ज्ञान को सीमित ही रखने की साजिश में योगदान करते रहें या आलसी बने रहें। ऐसे में कालजयी साहित्य की रचना कैसे हो?
मैं यहाँ अपने एक ब्लॉगर मित्र का संस्मरण उद्धृत करना चाहता हूं जो अपनी भाषा से अनुराग रखने का अप्रतिम उदाहरण है -  
"हिंदी, अंग्रेज़ी और फ़्रांसीसी : पेरिस का अनुभव -  Posted: सितम्बर 14, 2008 by योगेन्द्र जोशी"   
"आज से करीब ढ़ाई दशक पहले की एक घटना की मुझे सदा याद आती है। उन दिनों मैं इंग्लैंड में उच्चाध्ययन के लिए गया हुआ था। मेरे साथ मेरा परिवार भी था जिसमें तीन-चार साल के दो बच्चे तथा पत्नी शामिल थे।
"एक बार ग्रीष्मकाल में हमने पेरिस देखने का कार्यक्रम बनाया। इस हेतु हमने पर्यटन संचालित करने वाली एक संस्था के छोटे जहाज (फेरी) की सेवा ली। हमारा जहाज रात्रि द्वितीय प्रहर इंग्लैंड के दक्षिण-पूर्वी तट पर अवस्थित पोर्ट्समथ शहर से रवाना हुआ और अगले सबेरे तड़के फ्रांस के कैलल्स पहुंचा। वहां से करीब तीन घंटे की बस-यात्रा द्वारा हम पेरिस पहुंच गए जहां पर्यटन संचालक ने हमें दिन भर घूमने-फिरने के लिए छोड़ दिया। संध्याकाल सूर्यास्त के समय हमारी वापसी यात्रा नियत की गयी थी। पेरिस में हमने मुख्य-मुख्य पर्यटक स्थलों का दर्शन किया जिनमें प्रमुख था विश्वप्रसिद्धएफ़िल टावरदेखना और नगर की सेननदी पर नौकाभ्रमण करना।
"उस दिन दोपहर के समय एफ़िल टावर के नजदीक किसी पार्क में हम लोगों ने थोड़ी देर आराम किया, क्योंकि हम सभी, खासकर बच्चे, काफ़ी थक चुके थे। वहीं हमने दोपहर का भोजन किया जो हम अपने साथ ले आये थे। कुछ देर घूमने-फिरने के बाद हम पार्क से निकल मुख्य मार्ग पर आने लगे। पार्क के प्रवेशद्वार पर मिले एक फ्रांसीसी नौजवान से हमने कुछ जानकारी लेनी चाही। जैसा अभी तक चलता आ रहा था, हमने अपना सवाल अंग्रेज़ी में उससे पूछा। उसने फ्रांसीसी में कुछ उत्तर दिया जो हमारी समझ से परे था। हमने उसे बताने की कोशिश की कि उसकी बात हम समझ नहीं सके और वह कृपया अंग्रेज़ी में जवाब दे दे। उसने फ्रांसीसी में फिर कुछ कहा। हमने अंग्रेज़ी में धन्यवाद दिया और पार्क से बाहर आ गए।
"मुख्य मार्ग पर फिर एक व्यक्ति से हमने वांछित जानकारी लेनी चाही। इस व्यक्ति का भी व्यवहार संयत और शिष्ट था, किंतु उसका भी उत्तर फ्रांसीसी में ही था। हमने इस बात का संकेत देना चाहा कि हम भारतीय पर्यटक हैं और फ्रांसीसी न जानने के कारण अंग्रेज़ी में उत्तर चाहते हैं। इस बार भी हमें निराशा ही हुई।
"बाद में हमारी समस्या का हल एक रेस्तरां में मिल सका जहां बैठकर हमने कुछ खाया-पिया। वहीं एक कर्मचारी से हमने वांछित जानकारी प्राप्त की। क्षमायाचना के साथ हमने उससे पूछा, “माफ़ कीजिएगा, आपके पेरिस में लोग अंग्रेज़ी नहीं जानते क्या? मैं सोचता था कि यहां अंग्रेज़ी का अच्छा-खासा चलन होगा।
"रेस्तरां के उस कर्मचारी ने मुस्कराते हुए (अंग्रेज़ी में) जवाब दिया, “नहीं, ऐसी बात नहीं है । यहां अंग्रेज़ी जानने वाले ढेरों मिल जायेंगे। हां, ऐसे कम लोग होंगे जिन्हें बढ़िया अंग्रेज़ी आती हो। पर काम लायक अंग्रेज़ीज्ञान तो कमोबेश बहुतों को होगा। क्यों कोई खास बात है क्या?”
दरअसल आपसे पहले हमने अन्य दो लोगों से बात की थी। वे दोनों व्यवहार से संभ्रांत लग रहे थे, किंतु हमें वांछित जानकारी नहीं दे पाए। हमें लगा कि कदाचित् उन्हें अंग्रेज़ी बिल्कुल नहीं आती है। संयोग ही कुछ ऐसा बन पड़ा होगा।
"उस व्यक्ति ने हमें समझाते हुए कहा, “आपका अनुमान शायद गलत हो। इसकी गुंजाइश कम ही है कि उन्हें अंग्रेज़ी न आती हो। फिर भी अंग्रेज़ी में उत्तर न देने के उनके कारण हैं। हम फ्रांसीसियों को अंग्रेज़ी स्वीकार्य नहीं है। आपस में हम न अंग्रेज़ी बोलते हैं और न ही किसी को बोलने की छूट देते हैं। मैं भी अंग्रेज़ी का प्रयोग यथासंभव नहीं करता। परंतु इस रेस्तरां में विदेशी पर्यटक आते रहते हैं जिनकी मदद के लिए मैं अंग्रेज़ी बोलता हूं। अंग्रेज़ी ही नहीं, मैं तो कामचलाऊ जर्मन तथा इतालवी भाषा भी बोलता हूं। यह हमारी व्यावसायिक विवशता है। अन्यथा अपनी भाषा या फिर संभव हो तो सामने खड़े मुसाफिर की भाषा का चुनाव हमारी नीति है ।
"जीवन में वह पहला क्षण था जब मुझे लगा कि हम भारतीयों के मन में भी उन लोगों की तरह अपनी देसी भाषाओं के प्रति आदर भाव होना ही चाहिए।"
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3 टिप्‍पणियां:

  1. वकील साहब आपका पुराना आलेख कानूनी अनुवाद पढा और वर्तमान आलेख भी ।भाषा की बात साथ साथ एक भ्रमण का संस्मरण भी होगया । अच्छा आलेख है । बिल्कुल देशी भाषाओं के प्रति आदर भाव होना चाहिये। लंेकिन आदर इतना कठोर भी नहीं होना चाहिये कि सामने वाले की भाषा जानते हुये भी उसकी मदद न कर सके।

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  2. ठीक ही कहा गया है- पापी से नहीं पाप से घृणा करो. आज हमारी लड़ाई अंग्रेजी से नहीं अंग्रेजियत से ही है क्‍योंकि लड़ाई किसी भाषा से नहीं, बल्कि भाषा के दुश्‍मनों से है. हमें सभी भाषाओं का सम्‍मान करना चाहिए लेकिन साथ ही हमारे संवैधानिक दायित्‍यों से मुह नहीं मोड़ना चाहिए. सुंदर आलेख हेतु डॉ. यादव को बधाई!

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  3. बड़े भाई यादव जी आप हमारे ब्लॉग पर आये और अपने विचार रखे, अत्यंत प्रसन्नता हुयी. क्या करे जिन बातो को हम विवाद कह कर किनारे कर देते हैं. उन पर चर्चा होनी चाहिए, ताकि विवाद ख़त्म हो, पर लोग ऐसी बात करने से घबराते हैं आखिर क्यों..? आज तक मेरी समझ में यह नहीं आया. आप हमारे इस सामुदायिक ब्लॉग पर आये और अपने विचार रखे. हो सके तो लेखक बनकर भी सहयोग दे.
    http://upkhabar.in/ भारतीय ब्लॉग लेखक मंच.
    यहाँ भी आये. http://vishvguru.blogspot.com/

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