शनिवार, मार्च 17, 2012

राजभाषा कार्मिकों की समस्याएँ

भारत सरकार के कार्यालय, सरकारी क्षेत्र के उपक्रम, बैंक, केंद्र सरकार के नियंत्रण के निगम और आयोगों में हिंदी लागू करने के रास्ते में नीति संबंधी दस्तावेज़/प्रकाशनों का अनुवाद बहुत ही श्रमसाध्य और मुश्किल कार्य है। कार्यालयों में नीति संबंधी दस्तावेज़/परिपत्र/प्रकाशन आदि अंग्रेज़ी में तैयार किए जाते हैं और उनका हिंदी संस्करण बाद में तैयार कराने के प्रावधान के साथ उन्हें अंग्रेज़ी में ही जारी कर दिया जाता है। इसके पीछे यह मानसिकता काम करती है कि हिंदी अनुवाद कराने में समय लगेगा फलतः कार्रवाई में देर हो जाएगी। इसमें सच्चाई कितनी है यह तो कोई राजभाषा अधिकारी ही बता सकता है। परंतु इसके समाधान के लिए बहुत-सी सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं कंप्यूटर की सहायता से समस्या का हल निकालने में लगी हैं कि अनुवाद के लिए यदि मशीन और इसके लिए तैयार किए गए सॉफ़्टवेयरों की सहायता ली जाए तो किसी भी दस्तावेज़ का हिंदी रूपांतर साथ-साथ तैयार हो सकता है। यद्यपि बाज़ार में कई सॉल्यूशन उपलब्ध हैं परंतु \'गूगल ट्रांस्लेट\' के अलावा कोई और सॉल्यूशन कारगर नहीं है। अतः \'गूगल ट्रांस्लेट\' ऑनलाइन सॉफ़्टवेयर के साथ मिलाकर उसके द्वारा किसी भी अंग्रेज़ी दस्तावेज़ का हिंदी रूपांतर साथ-साथ तैयार किया जा सकता है। परंतु इसके लिए अनुवादकों को मशीन ट्रांस्लेशन के कार्य में प्रशिक्षित करना होगा तथा उन्हें टेक्नोलॉजी से सुसज्जित करना होगा। इसके लिए इंटरनेट तथा अनुवाद करने की सामग्री की सॉफ़्टकॉपी उपलब्ध कराना होगा। सरकारी कार्यालय और इनमें नियुक्त राजभाषा कर्मियों को सकारात्मक रुख अपनाते हुए संजीदा और कारगर प्रयास करना होगा।

सोमवार, मार्च 05, 2012

अंग्रेज़ी मातृभाषाओं को पछाड़ रही है

राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन विश्वविद्यालय ने शिक्षा के लिए ज़िला सूचना प्रणाली के अंतर्गत जानकारी एकत्रित की है और पाया है कि पालकों द्वारा अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों में भर्ती कराने का क्रेज़ बढ़ा है। वर्ष 2010-11 में प्रवेश के लिए किए गए पंजीकरण के अनुसार पहली कक्षा से आठवीं तक के लिए अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ने के लिए विद्यार्थियों की संख्या दो करोड़ से ऊपर पहुँच गई। इस संख्या में 2003-04 के मुक़ाबले 274% की वृद्धि हुई है। अंग्रेज़ी पिछले चार सालों से पढ़ाई के लिए माध्यम के रूप में दूसरे नंबर पर बनी हुई है। यह बंगाली और मराठी जो कि पढ़ाई के लिए माध्यम के रूप में अपनाई जाने वाली भाषाएँ आगे हैं। हिंदी भाषा नंबर एक स्थान पर है। अंग्रेज़ी माध्यम को अपनाए जाने के साथ-साथ हिंदी, मराठी और बंगाली में भी वृद्धि हुई है।
यह सत्य है पर अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ने का क्रेज़ विद्यार्थियों में नहीं है। यह क्रेज़ पालकों में है जो यह मानने लगे हैं कि अंग्रेज़ी के सिवाय कोई भविष्य नहीं है और अनजाने में अपने बच्चों के साथ ज़्यादती करते हैं। बच्चे के सहज व स्वाभाविक विकास को अंग्रेज़ी भाषा के बोझ तले दबाकर कुंठित कर रहे हैं।
राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन विश्वविद्यालय के कुलपति आर. गोविंद का कहना है कि "बहुत भारी मात्रा में अनुसंधान यह साबित करते हैं कि बच्चे को विषय की आधारभूत अवधारणा की समझ बढ़ाने हेतु पढ़ाने के लिए सबसे अच्छा माध्यम उसकी मातृभाषा है। चूँकि लोग चाहते हैं कि उनके बच्चे अंग्रेज़ी पढें इसलिए अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों में डालते हैं। अंग्रेज़ी पढ़ाने के लिए अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल में भेजना कतई ज़रूरी नहीं है। यदि भारतीय भाषाओं के स्कूल अपने यहाँ अंग्रेज़ी की अच्छी पढ़ाई करा सकते हैं तो पालकों को इसके लिए अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल में भेजना कतई ज़रूरी नहीं है।" वे कहते हैं कि मैंने स्वयं कन्नड़ माध्यम के स्कूल से पढ़ाई की है और वहीं पर अंग्रेज़ी का ज्ञान भी प्राप्त किया। परंतु भेड़चाल चल पड़ी है और पालक बच्चों पर अनावश्यक रूप से अंग्रेज़ी भाषा का बोझ प्रारंभ से ही डाल रहे हैं।
दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग की डीन प्रोफ़ेसर अनीता नागपाल का कहना है कि बहुत व्यापक अनुसंधानों के ज़रिए यह सिद्ध किया जा चुका है कि अधिक वर्षों तक किसी भाषा की पढ़ाई करने मात्र से ही वह उस भाषा को फ़र्राटे से बोलने के योग्य हो जाएगा, यह ज़रूरी नहीं है। ऐसा ज्ञात हुआ है कि यदि आपको अपनी मातृ भाषा पर अच्छा अधिकार है तो कोई भी दूसरी भाषा आसानी से सीखी जा सकती है। मैंने 1985 में स्वयं एक अनुसंधान किया था और उसमें भी यही परिणाम सामने आए थे कि जिन लोगों को हिंदी अच्र्छी तरह आती है उन्हें अंग्रेज़ी का भी अच्छा ज्ञान है। परंतु भेड़चाल अब रुकने वाली नहीं है और हम सब अपने ही हाथों अपने बच्चों का भविष्य बिगाड़ने पर आमादा हैं। गंभीर चिंतन और सुधारात्मक उपाय ज़रूरी है।

शुक्रवार, मार्च 02, 2012

पृथ्वी के पर्यावरण में ऊष्मा की वृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) - कार्बन गैसों के उत्सर्जन के लिए सरोगेट देशों का उपयोग यानि कि कार्बन क्रेडिट का जन्म

आपके पास पैसे हों तो आप कुछ भी खरीद सकते हैं और कुछ भी कर सकते हैं। आप दूसरों की कमाई खरीदकर ऐश कर सकते हैं और धौंस भी जमा सकते हैं कि मैंने तो इसकी कीमत चुकाई है। कार्बन क्रेडिट भी ऐसी ही व्यवस्था है जिसे बड़े लोगों ने अपने ऐशो आराम के लिए किराए पर ऐसे लोगों से अधिकार खरीद रहे हैं कि विकासशील देश कम कार्बन गैसों का उत्सर्जन करें और उसके लिए उन्नत किस्म की मशीनें उन विकसित देशों से खरीदें जो ऐसी मशीनें बनाते हैं और ऐसी मशीनों के निर्माण के दौरान भारी मात्रा में कार्बन गैसों का उत्सर्जन करते हैं। ग्लोबल वार्मिंग के कारण विश्व में मचे हड़कंप को ध्यान में रखकर विकासित राष्ट्रों ने एक रास्ता निकाला कि कार्बन गैसों के उत्सर्जन के लिए सरोगेट देशों का उपयोग किया जाए। आज विकसित देशों के पास सब कुछ है। यहां तक की उनके स्लम्स एरिया (झुग्गी बस्ती) के मकानों में भी सेंटरलाइज़ एसी होते हैं। जो कि दिन दूनी रात चौगुनी ग्रीन हाउस गैस उगलती रहती हैं। लेकिन अब विकसित देशों को इस बात का डर है कि कहीं उनका ऐशो आराम, हराम में न बदल जाए और ये तभी होगा जब भारत और चीन जैसे देश विकसित बनने के लिए उनका रास्ता अपनाएंगे क्योंकि उन्होंने विकास के क्रम में ग्रीन हाउस गैसों और कार्बन डाइऑक्साइड गैसों, जैसे, जैसे आजोन, कार्बन डाईआक्साईड, नाईट्रस आक्साइड आदि के उत्सर्जन को रोकने के लिए कुछ नहीं किया था। आज विकसित देशों के पास सब कुछ है लेकिन गर्दन पर ग्लोबल वॉर्मिंग की तलवार भी लटक रही है।

अतः इसके लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच का इस्तेमाल किया गया। ग्लोबल वॉर्मिंग के खतरे से बचने के लिए 1997 में जापान के क्योटो शहर में हुए वर्ल्ड अर्थ समिट में से क्योटो प्रोटोकॉल निकलकर सामने आया। आज इसके 150 से ज़्यादा देश सदस्य हैं। इन देशों ने मिलकर 2012 तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को 1990 के स्तर से 5.2 फीसदी नीचे लाने का लक्ष्य रखा है। इसी क्योटो प्रोटकॉल में कार्बन क्रेडिट का जन्म हुआ यानि कि विकसित देश पर्यावरण को खराब करें और उसे बचाने का उद्यम करें विकासशील देश। इसके बदले उन्हें धन का लालच देकर काम में लगाए रखा जाए और विकसित देशों की ऐशो आराम वाली ज़िंदगी बनी रहे।

कार्बन क्रेडिट है क्या?

अगर आप कार्बन डाइऑक्साइड का कम उत्सर्जन करेंगे तो आपको इसके बदले कार्बन क्रेडिट दिए जाएंगे जिसे बेचकर आप पैसे कमा सकते हैं। कार्बन क्रेडिट कार्बन उत्सर्जन कम करने पर मिलने वाले वो रिवार्ड प्वाइंट हैं जिन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजार में भुनाया जा सकता है यानी कि अगर आपकी कपंनी ने निर्धारित सीमा से कम कार्बन उत्सर्जन किया है तो उसे कार्बन क्रेडिट मिलेंगे। यह एक प्रकार की प्रोत्साहन योजना है। बाज़ार में इनकी वाजिब कीमत होगी और कंपनी उन्हें बेच सकती है। संयुक्त राष्ट्र संघ की देखरेख में सदस्य देशों और उनके संस्थानों को कार्बन क्रेडिट इश्यू किया जाता है। ये क्रेडिट क्लीन डेवलपमेंट मैकेनिज्म (CMD) के जरिए तय किया जाता है। अगर किसी कंपनी ने कार्बन डाइऑक्साइड घटाने के लिए अच्छी तकनीक का सहारा लिया है। तो उसके बदले उसे कितना कार्बन क्रेडिट मिलना चाहिए ये फैसला सीएमडी के जरिए ही होता है। साथ ही सीएमडी के तहत ही ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन करने वाली कंपनियां भी कार्बन क्रेडिट खरीदकर अपना उत्पादन जारी रख सकती हैं। स्टील, चीनी, सीमेंट और फर्टिलाइजर बनाने वाली कंपनियां ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करती हैं। अगर कोई कंपनी एक टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कम कर रही है तो उसे एक कार्बन क्रेडिट मिलेगा और एक कार्बन क्रेडिट की कीमत इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में करीब 20 डॉलर चल रहा है।

रविवार, फ़रवरी 26, 2012

सरकारी हिंदी का स्वरूप

पंद्रह फ़रवरी की हमारी पोस्ट “हिंदी भाषा को कार्यालयों में लागू कराने में सरकारों को कोई रुचि नहीं है” पर श्रीमती गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने 22 फ़रवरी 2012 को अपनी टिप्पणी लिखी कि “सरकार का हिंदी के प्रति क्या रवैया है इसका एक और उदाहरण मैंने आज ही अखबार में पढ़ा उसी की प्रतिक्रिया में मैंने भी आज ही कुछ लिखा है। वास्तव में यह विडम्बना है कि नीति वे बना रहे हैं जो उसे जानते नहीं या उसका दुरुपयोग करते हैं।” श्रीमती कुलश्रेष्ठ की पोस्ट साभार उद्धृत कर रहा हूँ अपने मित्रों से इस बारे में प्रतिक्रिया चाहता हूँ कि आखिर हिंदी भाषा पर ही शनि की कुदृष्टि क्यों है। कुछ ऐसे ही सुझाव सरकारी कार्यालयों के अध्यक्षों से भी हिंदी दिवस के अवसर पर या ऐसे ही किन्हीं अवसरों पर सुझाव प्राप्त होते रहते हैं कि शुद्ध हिंदी लिखने पर ज़ोर देने के बजाय सरल, सुबोध और आम हिंदी लिखने पर बल दिया जाए ताकि हिंदी का प्रचलन हो। क्या अंग्रेज़ी के बारे में ऐसी ही छूट मिलेगी?
“Wednesday, February 22, 2012
चिता या चीता
आज ही अखबार में पढ़ा कि परीक्षा परिणाम को अच्छा बना कर अपनी साख को बचाने के लिये विभाग के आला अफसरों ने एक नया किन्तु विचित्र सुझाव दिया है कि उत्तर-पुस्तिकाओं के परीक्षण में छोटी--मोटी भूलों(??) जैसे छात्र ने पवन की जगह पबन लिखा हो या छोटी बड़ी मात्राओं की गलती हो तो उसके अंक न काटे जाएं।
आहा, ऐसी उदारता पर कौन न मर जाए!! छात्र सूरदास को सुरदास या रमानाथ को रामनाथ लिखदे तो कोई गलती नही मानी जाएगी। फिर तो गजवदन गजबदन भी हो सकते हैं और कृष्ण, कृष्णा(द्रौपदी)(अंग्रेजी की कृपा से कृष्ण को कृष्णा बोला भी जारहा है)। लुट गया व लूट गया तथा पिट गया व पीट गया में कोई फर्क नही होगा। अब जरा समान लगने वाले वर्ण,अनुस्वर व मात्राओं के हेर-फेर वाले कुछ और शब्दों पर भी ध्यान दें---सुत-सूत, कल-कलि-कली, अंश-अंस, सुरभि-सुरभी, अशित-असित, चिता-चीता,कुच-कूच,सुधि--सुधी, शिरा-सिरा,चिर--चीर, कहा-कहाँ, लिखे-लिखें, गई--गईं, तन-तना-तान-ताना, तरनि-तरनी, मास--मांस, रवि-रबी, जित-जीत, शोक--शौक, पिसा-पीसा, आमरण--आभरण, पिला--पीला, सुना-सूना, गबन-गवन, अजित-अजीत, पुरुष-परुष, शन्तनु-शान्तनु, वसुदेव-वासुदेव आदि। विराम चिह्नों की तो बात पीछे आती है किन्तु वह क्या कम महत्त्वपूर्ण है?--रुको, मत जाओ। तथा रुको मत, जाओ। इसी तरह --वह गया।, वह गया!, तथा वह गया? में विराम चिह्न का ही चमत्कार है।
ये तो बहुत छोटे-मोटे उदाहरण हैं। अखबारों,टेलीविजन,व सस्ती पत्रिकाओं और जगह--जगह अशिक्षित पेंटरों द्वारा बनाए गए बोर्ड व पोस्टरों ने वैसे ही हिन्दी की हालत खराब कर रखी है। पाठ्य-पुस्तक निगम की पुस्तकों में भी हिन्दी के साथ कम छेडछाड नही की। ऊपर से इस तरह के प्रस्ताव भाषा पर क्या प्रभाव छोडने वाले हैं उसका कथित विद्वानों को अनुमान तक न होगा। प्रश्न यह है कि क्यों परीक्षा परिणाम ही शिक्षा का एकमात्र लक्ष्य रह गया है? क्या अध्ययन की उपेक्षा करके परीक्षा को ही लक्ष्य बनाना उचित है? बार-बार परीक्षा लेने से और किसी भी तरीके से परिणाम के आँकडे इकट्ठे करने से शिक्षा का स्तर क्या उठ पाएगा? ऐसे परीक्षा प्रमाण पत्र का क्या अर्थ व औचित्य है जिसमें छात्र शुद्ध पढना व लिखना तक न जान पाए। अर्थ की समझ तो बहुत बाद की बात है। भाषा की इस दशा पर विचार करने की अत्यन्त आवश्यकता है। गलत तरीके से गलत परिणाम देकर शिक्षा का ढिंढोरा पीटने से बेहतर है कि परीक्षा ली ही न जाए। परीक्षा हो तो सही हो वरना नहीं। Posted by गिरिजा कुलश्रेष्ठ at 11:53 AM”

बुधवार, फ़रवरी 15, 2012

हिंदी भाषा को कार्यालयों में लागू कराने में सरकारों को कोई रुचि नहीं है

हिंदी भाषा को कार्यालयों में लागू कराने में सरकारों को कोई रुचि नहीं है इसलिए सरकारी स्तर पर उतना कार्य नहीं हो रहा है जितना गैर सरकारी स्तर पर हो रहा है। इस संबंध में हमें गंभीरता से विचार करना होगा। यह सत्य है कि अंग्रेज़ी एक शताब्दी से भी पहले से हमारे शिक्षा व्यवस्था का अंग रही है, इसके बावज़ूद अंग्रेज़ी हमारे अधिकतर बच्चों की पहुँच से बाहर है, जिसके कारण सुविधाओं और अवसरों की सुलभता में बहुत अधिक असमानता है। आज भी करीब एक प्रतिशत लोग ही अंग्रेज़ी को पहली भाषा तो क्या दूसरी भाषा के रूप में इस्तेमाल करते हैं। फिर भी कार्यालयों में अंग्रेज़ी का ही वर्चस्व है। इन सच्चाइयों को रातोंरात नहीं बदला जा सकता।

"परंतु राष्ट्रीय ज्ञान आयोग का मानना है कि अब समय आ गया है कि हम देश के लोगों, आम लोगों को स्कूलों में भाषा के रूप में अंग्रेज़ी पढ़ाएँ। इसलिए एक केंद्र प्रायोजित योजना चलाई जानी चाहिए, जो अंग्रेज़ी भाषा सिखाने के लिए ज़रूरी शिक्षकों और सामग्री के विकास के लिए वित्तीय सहायता दे सके। राज्य सरकारों को इस योजना पर अमल के काम में बराबर की साझीदारी करनी होगी। अतः राष्ट्रीय ज्ञान आयोग का सुझाव है कि प्रधानमंत्री राष्ट्रीय विकास परिषद की अगली बैठक में सभी मुख्यमंत्रियों के साथ इस मामले पर चर्चा करें और अंग्रेज़ी को पहली कक्षा से क्षेत्रीय भाषा के अलावा एक दूसरी भाषा के रूप में सिखाने के लिए राष्ट्रीय योजना तैयार करें। इससे यह तय हो सकेगा कि स्कूल में बारह वर्ष की पढ़ाई पूरी करने के बाद हर विद्यार्थी कम-से-कम दो भाषाओं में प्रवीण हो जाएगा।"

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग प्रधान मंत्री द्वारा गठित उच्च स्तरीय आयोग था जिसमें शामिल लोगों में से कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं था जो संविधान के अनुच्छेद 351 के बारे में जानकारी देते हुए बता सके कि हमें हिंदी के विकास के लिए काम करना है और अंग्रेज़ी को शीघ्रातिशीघ्र विदा करना है न कि अंग्रेज़ी की जड़ मज़बूत करना है। जिसको विदेशों में नौकरी करना है या विदेश सेवा में जाना है वह तो अंग्रेज़ी पढ़ेगा ही और अच्छी तरह पढ़ेगा। अतः बेगानी शादी में अब्दुल्ला दिवाना क्यों बन रहा है। किसी ने भी हमारी राजभाषा हिंदी के बारे में भी चिंता नहीं जताई और न ही प्रयास किया कि देश में त्रिभाषा सूत्र लागू कराकर कश्मीर से कन्याकुमारी तथा गुजरात से पूर्वोत्तर राज्यों को एक देश मानकर राजभाषा हिंदी को उच्च शिक्षा के लिए सशक्त बनाया जा सके। आवश्यकता इस बात की है कि राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में सभी मुख्यमंत्रियों के साथ हिंदी को लागू कराने पर चर्चा की जाए और हिंदी को पहली कक्षा से क्षेत्रीय भाषा के अलावा एक दूसरी भाषा के रूप में सिखाने के लिए राष्ट्रीय योजना तैयार की जाए।

बुधवार, जनवरी 25, 2012

संविधान और राजभाषा अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन

जिस तरह अन्ना हज़ारे ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया है उसी प्रकार हिंदी सेवी संस्थाओं को केंद्र सरकार और जन प्रतिनिधयों के खिलाफ़ आंदोलन छेड़ना चाहिए। केंद्र सरकार जानबूझकर हिंदी को पीछे रखने के षडयंत्र में सक्रिय रूप से शामिल है और हिंदी को विकसित करने के लिए बनाई गई समितियों के माध्यम से दिखावा कर रही है। यह पूर्ण रूप से संविधान और राजभाषा अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन कर रही है और इसका कहीं कोई विरोध नहीं किया जा रहा है।
संविधान के अनुच्छेद 351 मे निदेशी सिद्धांत नियत किया गया है जिसमें हिंदी के विकास की बात कही गई है। इसमें अंग्रेज़ी को विकसित करने का न तो कोई ज़िक्र है और न ही संविधान निर्माताओं की ऐसी कोई मंशा थी। इसमें इस बात का भी ज़िक्र नहीं है कि अंग्रेज़ी से शब्दों को उधार ले बल्कि इसकी मूल प्रकृति को छेड़े बिना और संविधान की आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारतीय भाषाओं के रूप, शैली और अभिव्यक्तियों को समाहित करते हुए हिंदी भाषा का विकास किया जाए।
अतः राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने असंवैधानिक तरीके से यह सिफ़ारिश की है कि अंग्रेज़ी की शिक्षा के लिए पहली कक्षा से पढ़ाई की योजना अमल में लाई जाए तथा हिंदी की शिक्षा का कोई ज़िक्र नहीं है। इस असंवैधानिक कार्रवाई के विरुद्ध तुरंत आंदोलन शुरू करने की आवश्यकता है। साथ ही राजभाषा विभागों से पूछा जाए कि वे क्या कर रहे? इस बारे में उन्होंने क्या कार्रवाई की है?

गुरुवार, जनवरी 05, 2012

गुजरातियों को हिंदी नहीं आती

गुजरात के जूनागढ़ ज़िले में राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा बनाई जा रही सड़क के बारे में स्थानीय लोगों की ज़मीन अधिग्रहण में विवाद होने पर मामला अदालत गया और फिर गुजरात उच्च न्यायालय में गया जहाँ पर वादी पक्ष ने प्राधिकरण पर आरोप लगाया कि उसने परियोजना के बारे में अखबार में जो अधिसूचना छपवाई थी वह केवल अंग्रेज़ी और हिंदी में प्रकाशित की गई है जबकि गुजरात की वर्नाकुलर भाषा गुजराती है। जूनागढ़ के निवासियों को गुजराती समझ में आती है हिंदी नहीं। गुजरात उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 की धारा 3A(3) के अनुसार जारी अधिसूचना अवैध घोषित की क्योंकि अधिसूचना गुजरात की वर्नाकुलर भाषा गुजराती में नहीं जारी की गई थी। इससे यह साबित होता है कि राज्य के लिए राज्य की भाषा का ही महत्व है। यदि न्यायालय ने हिंदी को महत्व नहीं दिया तो अंग्रेज़ी को भी महत्व नहीं दिया है। यह अच्छा लक्षण है। वैसे भी गुजरातियों को हिंदी भले ही समझ में आती हो परंतु निजी लाभ के लिए इसकी बलि तो दी ही जा सकती है।

गुरुवार, दिसंबर 22, 2011

कंप्‍यूटरीकृत, कागज़ रहित कार्यालय - यूनिवर्सल कोड में कार्यालय का संपूर्ण काम हिंदी में


कंप्‍यूटरीकृत, कागज़ रहित पृष्ठभूमि
कल्‍पना करें, आप किसी कार्यालय में घुसें और दरवाज़े पर कोई दरवान न हो परंतु दरवाज़ा खुल जाता हो, आप मेटल डिटेक्‍टर गेट से पार होकर आगे बढ़ते हैं तो हॉल में एक व्‍यक्ति अपने लैपटॉप या डेस्‍कटॉप के साथ बैठा हो, उसके टेबल पर मॉनीटर के सिवाय और कुछ नहीं नज़र आता हो, आपसे आपके बारे में जानकारी प्राप्‍त करके अपने डेस्‍कटॉप में कुछ प्रविष्‍ट करे, आपको एक टोकन समान विज़िटर पास देकर आपको बता दे कि आप अमुक मं‍ज़िल पर अमुक केबिन में जाएं। केबिन में बैठा व्‍यक्ति आपको देखते ही आपको आपके नाम से संबोधित करे तो आपको हैरानी के साथ अच्‍छा भी लगेगा कि मेरी पहचान है। कुछ साल पहले ऐसा संभव नहीं था और बहुत कम लोगों ने कल्‍पना की होगी कि ऐसा भी हो सकता है। परंतु आज वह सब संभव हो गया है जिसे आप कल्‍पना कहते थे।
जब रिसेप्‍शनिस्‍ट से स्‍वागत काउंटर पर मिले तो उसने आपके विवरण आपसे पूछकर कंप्‍यूटर में प्रविष्‍ट किया और उसके कंप्‍यूटर में लगे कैमरा द्वारा आपकी छबि उसमें कैद हो गई और वह छबि आपके विवरण समेत, केबिन में बैठे अधिकारी के पास पहुंच गई। न किसी संदेशवाहक व्‍यक्ति की ज़रूरत पड़ी और कोई समय लगा और वांछित जानकारी बिना समय के व्‍यपगमन के उपलब्‍ध हो गई।
अब आप कल्‍पना करें कि इसी प्रकार किसी कार्यालय में व्‍यक्तिगत रूप से गए बिना, कंप्‍यूटर के माध्‍यम से जानकारी प्रस्‍तुत की जाए और वह कार्यालय नियत समय में उस पर कार्रवाई करके आपको सूचित कर दे तो कितने समय, धन व श्रम की बचत होगी तथा काम में देरी न होगी। यह सब संभव है। अब यह कल्‍पना की बात नहीं रह गई है।
सन् 1970 के दशक में इस हक़ीक़त की शुरुआत हुई जब हॉलीवुड की फ़िल्‍मी हस्तियों या वि‍कसित देशों के शीर्षस्‍त राजनीतिज्ञों/अधिकारि‍यों के पास इलेक्‍ट्रॉनिक नोटबुक होती थी जो उनके निजी सचिवों के पास होता था जिसमें उनके कई महीने/सालों के कार्यों की अनुसूची बनी होती थी।  
आज पेपरलेस कार्यालय बनाने का प्रचलन बढ़ रहा है। हर कार्यालय पेपरलेस की ओर बढ़ने के लिए प्रयासरत है जिसमें सभी काम इलेक्‍ट्रॉनिक माध्‍यम से किया जाता है। बड़े संगठनों ने इसे अपनाना शुरू कर दिया है और इसका बड़ा फ़ायदा उठा रहे हैं। परंतु फिर भी हम अभी ऐसे माहौल में हैं जहॉं यह गंभीरता से चिंतन का विषय है वहीं हमारी मानसिकता ऐसी है कि हम हर बात के लिए दस्‍तावेज़ी प्रमाण के आदती हैं। ऐसे में पूर्ण पेपरलेस कार्यालय की अवधारणा को फलीभूत होने में समय लगेगा। लेकिन आंश‍िक रूप से पेपरलेस कार्यालय देखे जा सकते हैं। दर असल हम पेपरलेस कार्यालय की ओर बढ़ रहे हैं।
पेपरलेस कार्यालय में, कार्यालय के समान्‍य कार्यों से भिन्‍न कोई दूसरा काम नहीं होता है बल्कि वहां वही सारे काम होते हैं जो उस कार्यालय के सामान्‍य कार्य होते हैं। फ़र्क सिर्फ़ इतना होता है कि उन कार्यों में कागज़ का इस्‍तेमाल शून्‍य या नगण्‍य हो जाता है। इसमें यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि ग्राहकों को समय पर सेवा उपलब्‍ध कराई जाए और उसकी सक्षम मॉनिटरिंग की प्रणाली भी बनाई जाए। इसमें यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि वीडियो कॉन्‍फ्रेंसिंग, फ़ोन कॉन्‍फ़्रेंसिंग आदि की व्‍यवस्‍था बनाई जाए तथा उनके द्वारा यह भी सुनिश्चित किया जाए कि किसी व‍िशेष समय में अधिक से अधिक आउटपुट लिया जा सके।  
पेपरलेस कार्यालय ' की संकल्पना
'पेपरलेस कार्यालय ' की संकल्पना, जनता में लोकप्रिय किसी व्यक्ति, विशेष रूप से फ़िल्मी कलाकारों, लेखकों, व्यापार से जुड़े प्रतिष्ठित व्यक्तियों, के प्रचार सचिवों (पब्लिशिस्ट)   द्वारा दिए गए नारे के रूप में प्रचलन में आई थी। इसका उद्देश्य, भविष्य में कार्यालय  का कैसा स्वरूप होगा उसकी रूप रेखा देना था। इसकी मूल भावना यह थी कि कार्यालय  के कामों को इस ढंग से मशीनीकृत किया जाए कि नेमी किस्म के दैनिक कार्यों, जैसे, रिकार्डकीपिंग बुककीपिंग, में कागज़ का उपयोग समाप्त करके कंप्यूटर की हार्ड डिस्क में ही जानकारी डॉक्यूमेंट सुरक्षित रखने की व्यवस्था हो। यह विचार उस समय प्रचलित हुआ जबकि पर्सनल कंप्यूटर का प्रचलन हुआ। उस समय यह पूर्वानुमान (prescient) लगाया गया था कि अगले कुछ सालों में हर डेस्क पर कंप्यूटर होंगे। परंतु पेपरलेस कार्यालय  की भविष्यवाणी (prophetic) उतनी मुखर नहीं थी। लेकिन वर्ड प्रोसेसरों के विकास लेखन कार्य की सुगमता के कारण आसानी से डॉक्यूमेंट तैयार करने की सुविधा, उन्नत किस्म के प्रिंटरों के निर्माण और फ़ोटो कॉपियर मशीनों की सुलभता के कारण कार्यालयों में कागज़ की खपत बढ़ने लगी और मुद्रित काग़ज़ों का ढेर इकट्ठा होने लगा। अतः पेपरलेस कार्यालय  की संकल्पना का प्रादुर्भाव हुआ। पेपरलेस कार्यालय  के बारे में सबसे पहला लेख ''बिजनेस वीक'' में सन् 1975 में छपा था। उसके बाद अनेक लेख प्रकाशित हुए और आज इंटरनेट पर अनेक लेख और सॉल्यूशन उपलब्ध हैं।
पेपरलेस कार्यालय  का मतलब
विकीपीडिया के अनुसार पेपरलेस कार्यालय  को ''भविष्य के कार्यालय  के स्वरूप'' के रूप में देखा जाना चाहिए। हर क्षेत्र मेंविशेष रूप से कंप्यूटर के क्षेत्र में हो रही प्रगति के साथ ही जीवन के हर क्षेत्र में प्रौद्योगिकी के उपयोग का प्रचलन बढ़ रहा है। आज हर कोई मोबाइल होना चाहता है और हर स्थान पर तुरंत जानकारी चाहता है। तो यह तभी संभव होगा जब हम हर जानकारी को कंप्यूटर पर या कंप्यूटर पर प्रोसेस किए जाने वाले फ़ॉर्मैट में उपलब्ध करा सकें। अतः सरल शब्दों में पेपरलेस कार्यालय  का मतलब महत्वपूर्ण काग़ज़ी दस्तावेज़ को बिना काग़ज़ वाले रूप में बदलना और उसे कंप्यूटर में भंडारित करना तथा उसका प्रलेखीकरण (documentation) करना।
का़ग़ज़ों का ढेर व इससे जुड़ी समस्‍या
अब से 10 साल पहले तक पेपरलेस कार्यालय  की अवधारणा का कोई उल्लेख नहीं होता था। हर प्रलेख को काग़ज़ पर लिखा जाता था और उसे फ़ाइल में नत्थी करके रखा जाता था। यही सबसे विश्वसनीय माध्यम माना जाता था। परंतु जैसे-जैसे समय बीत रहा है काग़ज़ों और फ़ाइलों का भंडार बढ़ता जा रहा है। आज उनकी संभाल करना उनमें से संगत जानकारी आवश्यकतानुसार निकालना भी दुष्कर होता जा रहा है। ज़रूरत के समय पता चलता है कि रिकार्ड कीपर उपलब्ध नहीं है, फ़ाइल नहीं मिल रही है। दूसरी अहम समस्या है संवेदनशील जानकारी की गोपनीयता बनाए रखना। इन समस्याओं का हल पेपरलेस कार्यालय  की संकल्पना में नज़र आता है।
पेपरलेस कार्यालय  का परिणाम
  • जानकारी को खोजना आसान
  • सुरक्षा में वृद्धि
  • संप्रेषण में सुधार
  • लागत में किफ़ायत
  • कीमती स्थान की बचत
  • पर्यावरण की सुरक्षा
पेपरलेस कार्यालय  बनाने के लिए वांछित बुनियादी ढाँचा
पेपरलेस कार्यालय प्रौद्योगिकी उन्मुख प्रक्रिया है। अतः इसके लिए कुछ बुनियादी ढॉचा तैयार करना होगा। उस बुनियादी ढाँचे में निम्नलिखित शामिल हैं -
Ø  कम स्‍थान लेने वाले परंतु कंफ़र्टेबल वर्क स्टेशनों का निर्माण
Ø  आवश्यकतानुसार और कॉम्पैटिबल कंप्यूटर
Ø  आईआईएस के साथ विंडोज़ सक्षम सर्वर
Ø  स्कैनर
Ø  लोकल/लैन प्रिंटर
Ø  विंडोज़ फ़ैक्स सॉफ़्टवेयर
Ø  ईमेल सपोर्टएम पी आई, एम एस आउटलुक
Ø  वेब
Ø  प्रशिक्षित लैन एडमिनिसट्रेटर
Ø  डॉक्यूमेंट मैनेजमेंट और प्रोसेस अप्लिकेशन सॉफ़्टवेयर
Ø  सीएटी5/सीएटी6 के साथ 10/100/1000 एमबीपीएस आउटपुट देने वाली स्ट्रक्चर्ड केबलिंग द्वारा लैन या वाई-फ़ाई लैन बनाना  
Ø  सभी अधिकारियों/कर्मचारियों के प्रशिक्षण की व्यवस्था
प्रारंभिक कठिनाई
किसी भी संगठन में पूर्व स्थापित प्रणाली में परिवर्तन के प्रयास का विरोध लाजमी है क्योंकि मानव स्वाभावतः परिवर्तन का विरोधी रहा है और प्रकृति परिवर्तन चाहती है। विकास की धारा परिवर्तन की धुरी पर ही टिकी हुई है। किसी भी नई विचारधारा या नई प्रणाली को प्रचलन की प्रक्रिया के दौरान निम्नलिखित दस चरणों से गुज़रना ही पड़ता है
  1. आवेशपूर्ण तिरस्कार (indignant rejection)
  2. तर्कपूर्ण आपत्ति (reasoned objection)
  3. सशर्त विरोध (qualified opposition)
  4. अस्थायी स्वीकृति (tentative acceptance)
  5. सशर्त सहमति/स्वीकृति (qualified endorsement)
  6. तर्कसंगत संशोधन (judicious modification)
  7. सवाधानीपूर्वक प्रचार (cautious propagation)
  8. भावनात्मक गठबंधन (impassioned espousal)
  9. गर्वपूर्ण पितृत्व (proud parenthood)
10.        अंधभक्तिपूर्वक प्रचार (dogmatic propagation)
अतः इन चरणों को पार करके पेपरलेस कार्यालय की अवधारणा को आगे बढ़ाना होगा। कार्यालय प्रमुख को इनसे निपटने की नीति बनानी होगी।
नीति निर्धारण
1. सबसे पहले विभाग/संस्था के वरिष्ठ अधिकारियों को इस बात के लिए तैयार कराना होगा कि कंप्यूटरीकरण ज़रूरी है। विभाग/संस्था के वरिष्ठ अधिकारी कंप्यूटर ले तो लेते हैं परंतु उसे शोभा की वस्तु समझ कर रखते हैं। उसका उपयोग नहीं करना चाहते हैं,, उनके लिए टाइपिस्ट होते हैं, स्टेनोग्राफ़र होते हैं। अतः उनकी मानिसकता बदलने के लिए उनके लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था पहले हो तथा उन्हें कंप्यूटर ऑपरेट करने तथा अपना काम कंप्यूटर पर करने के लिए तैयार करना होगा।
2. संस्था के स्तर पर यह निर्णय करना होगा कि पेपरलेस कार्यालय की प्रक्रिया में पहला चरण क्या हो? उसके बाद प्राथमिकता के आधार पर एक एक क्षेत्र को पेपरलेस बनाया जाए।
3. पेपरलेस कार्यालय के लिए कुछ हार्डवेयर/सॉफ़्टवेयर भी लेने होंगे। अतः उनके हार्डवेयर/ सॉफ़्टवेयर के बारे में एक्सपर्ट समिति बनाकर शीघ्रता से निर्णय करना होगा।
4. प्रारंभ में कुछ कार्यों की आउटसोर्सिंग भी करना पड़ सकता है। अतः उसके बारे में निर्णय करना और नीति निर्धारित करना होगा।
5. नई प्रक्रिया के प्रारंभ होने के साथ ही स्टाफ़ सदस्यों के पुनर्नियोजन की भी आवश्यकता हो सकती है।
कार्यान्वयन
कार्यान्वयन के स्तर पर आने पर पता चलेगा कि पेपरलेस कार्यालय का अर्थ कागज़ रहित कार्यालय कतई नहीं है। पेपरलेस कार्यालय का अर्थ है जानकारी के भंडारण के लिए पुरातन माध्यमों के बदले नए उच्च विशेषीकृत डिजिटल माध्यमों का उपयोग। परंतु जहाँ आवश्यक है वहाँ पर तो कागज़ी दस्तावेज़ रखने ही पड़ेंगे। अतः भंडारण माध्यमों (स्टोरेज मीडिया) के लिए आधुनिक हार्ड डिस्क, चिप्स, टेप आधारित माध्यमों का उपयोग करना ही पेपरलेस कार्यालय की अवधारणा है। पिछले लगभग तीस सालों से पेपरलेस कार्यालय का सिलसिला शुरू हुआ है और आज भी पेपरलेस कार्यालय की अवधारणा को अपनाने के लिए औचित्य बताना पड़ रहा है तथा इसे अपनाने पर ज़ोर देना पड़ रहा है। हमारे देश में तो ऐसा कोई कार्यालय नहीं है जिसने पूर्ण पेपरलेस कार्यालय का मज़ा चखा हो अथवा लाभ लिया हो और जिसे पूर्ण पेपरलेस कार्यालय का दर्जा दिया जा सके। परंतु जिन कार्यालयों या संगठनों में पेपरलेस कार्यालय की अवधारणा को अपना लिया गया है उनकी कार्यक्षमता में अत्यधिक सुधार आया है और समय  पर तथा परिशुद्धतापूर्वक ग्राहक सेवा देना संभव हो गया है। इंटरनेट के विकास वर्ल्ड वाइड वेब की सुविधा तथा इसकी क्षमता से लोग अब परिचित हो रहे हैं। इस पर उपलब्ध जानकारी के भंडार ने दूरी और समय की सीमाओं को खत्म कर दिया है। अतः इस प्ररिप्रेक्ष्य में पेपरलेस कार्यालय के लिए प्रयास करना होगा तथा संस्थाओं को अपने स्तर पर कार्यान्व्यन की नीति निर्धारित करना होगा।
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