राजभाषा संसदीय समिति का गठन राजभाषा अधिनियम की धारा 4 के तहत वर्ष 1976 में किया गया। इस समिति में संसद के 30 सदस्य होने का प्रावधान है 20 लोकसभा से और 10 राज्यसभा से। बाद में 1977, 1980, 1984, 1989, 1991, 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों के पश्चात् समिति का पुनर्गठन हुआ है।
इस समिति का कर्तव्य है कि संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए हिंदी के प्रयोग में की गई प्रगति का पुनरावलोकन करे और उस पर सिफ़ारिश करते हुए राष्ट्रपति को प्रतिवेदन प्रस्तुत करे। राष्ट्रपति उस प्रतिवेदन को संसद के हर सदन के समक्ष रखने के लिए आदेश जारी करेंगे और सदन के अनुमोदन के बाद उसे सभी राज्य सरकारों, संघ शासित क्षेत्रों की सरकारों, केंद्रीय सरकार के सभी मंत्रालयों, कार्यालयों, निगमों, कमीशनों, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को भेजा जाता है।
अपने प्रेक्षण के आधार पर केंद्रीय सरकार के कार्यालयों में हिंदी के प्रयोग से संबंधित स्थिति की समीक्षा करते हुए समिति द्वारा अपना प्रतिवेदन सिफारिशों सहित राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाता है ताकि केंद्र सरकार के कार्यालयों को हिंदी का अधिकतम प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके जिससे संवैधानिक उपबंधों के लक्ष्य प्राप्त हो सकें। वस्तुस्थिति का मूल्यांकन करने के लिए समिति ने अन्य तरीकों के साथ-साथ केंद्रीय सरकार के विभिन्न कार्यकलापों का निरीक्षण करने का भी निर्णय लिया था।
समिति ने 1987 में पुणे में कार्यालयों का दौरा किया और उसमें भारतीय रिज़र्व बैंक के कृषि बैंकिंग महाविद्यालय के प्रधानाचार्य व तत्कालीन कार्यपालक निदेशक सत्यानंद बगाई के साथ चर्चा की और कहा कि सरकारी क्षेत्र के बैंकों की प्रशिक्षण संस्थाओं में हिंदी माध्यम से प्रशिक्षण देने की शुरुआत की जाए और प्रथम चरण में, बैंकों के विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों में इस्तेमाल होने वाली पाठ्य सामग्री का हिंदी अनुवाद छह महीने में पूरा कर लिया जाए तथा उसके बाद प्रशिक्षण कार्यकेरम हिंदी माद्यम से आयोजित किए जाएँ।
कृषि बैंकिंग महाविद्यालय के प्रधानाचार्य ने सभी बैंकों की शीर्ष प्रशिक्षण संस्थाओं के प्रधानाचार्यों, मानव संसाधन विकास विभाग के प्रमुखों की बैठक बुलाई और पाठ्य सामग्री के हिंदी अनुवाद का काम प्रारंभ कराया। परंतु वह काम आगे नहीं बढ़ पाया क्योंकि समन्वय कार्य के लिए कोई उपयुक्त और पूर्णकालिक राजभाषा अधिकारी नहीं नियुक्त किया गया था। अतः काम आगे बढ़ता न देख भारतीय रिज़र्व बैंक नो कृषि बैंकिंग महाविद्यालय के प्रधानाचार्य के पास एक प्रबंधक (राजभाषा) नियुक्त कर दिया और पाठ्य सामग्री का हिंदी अनुवाद छह महीने में पूरा करने का लक्ष्य रखा। बैंक ने उसे तो पूरा किया ही उसके साथ ही सभी बैंकों की पाठ्य सामग्री का भी हिंदी अनुवाद छह महीने में पूरा करा लिया। वह गुरुतर काम था जिसे रिज़र्व बैंक ने कराया था। उसके बाद अगले चरण की शुरुआत होनी थी और वह भी शुरू किया गया और लक्ष्य रखा गया कि बैंक अपने क क्षेत्र और ख क्षेत्र में स्थित प्रशिक्षण संस्थाओं में हिंदी माध्यम से प्रशिक्षण शुरू कराएँ तथा समयबद्ध तरीके से उनकी संख्या में वृद्धि की जाए। इस प्रकार बैंकों की प्रशिक्षण संस्थाओं में हिंदी का प्रयोग शुरू हुआ परंतु बाद में आँकड़ों का खेल शुरू हो गया और आज वैश्विकता और लाभप्रदता के नाम पर हिंदी प्रशिक्षण संस्थाओं में हाशिए पर आ गई है।
*****
रविवार, अगस्त 07, 2011
शुक्रवार, अगस्त 05, 2011
उत्तर प्रदेश में अदालतों की नाजायज़ वसूली और खुला भ्रष्टाचार
आम आदमी न्याय के लिए अदालत में जाता है और अदालत न्याय प्रशासन के लिए अपनी प्रक्रिया शुरू करती है परंतु उसका अंत नज़र नहीं आता और मुवक्किल वकील तथा अदालत की पेशी तथा वकील के बीच पिसता रहता है, कम से कम बीस पचीस साल तक। उस दौरान गवाह तक भगवान को प्यारे हो जाते हैं। मुकदमा करमे वाला तो अपने आपको कोसने लगता है कि कहाँ से मुसीबत को दावत दे बैठा?
इतना सब तो झेलने के बाद हर पेशी पर, अदालत में न्याय की गद्दी पर बैठे न्यायाधीश के सामने सरे आम न्यायालय की पुकार डालने वाला चपरासी, हर पुकार का रु.10/- मेहनताना माँगता है। उसकी आवाज़ की कीमत तो फ़िल्मों में डबिंग करने वालों की आवाज़ की कीमत से भी ज़्यादा प्रतीत होती है। पहले यह कीमत रु.5/- होती थी। परंतु बढ़ती मँहगाई के कारण इसने अपना मेहनताना भी बढ़ा दिया है और सरकार का अनुमोदन भी मिल गया है।
उत्तर प्रदेश में अदालतों में एक दिन में पचास से सौ तक मुकदमे अदालत में लगे होते हैं। जब कि एक दिन में सुनवाई के लिए पंद्रह से बीस मुकदमों से अधिक नहीं रखे जाने चाहिए। इस स्थिति में आधे से अधिक मुकदमों में पेशी पर कोई कार्यवाही नहीं हो पाती है। अदालत पुराने मुकदमों में कार्यवाही करती है और नए मुकदमों में पेशी बदल देती है। वकील को तो मेहनताना देना ही पड़ता है, कचहरी जाने आने का खर्च उठाने के साथ अन्य कृषि कार्य आदि में भी बाधा होती है।
क्या यह वकीलों और अदालतों की ज़्यादती नहीं है? जब मुकदमें में 20-25 साल लगने ही हैं और उससे पहले निर्णय नहीं होना है तो मुवक्किल को नाहक परेशान क्यों किया जाता है बार-बार तारीख देकर? क्यों नहीं एक मुकदमा उठाया जाए और उसे निपटा कर ही अगला मुकदमा लिया जाए चाहे इसके लिए एक दिन एक दो तीन मुकदमे रखे जाएँ? क्या यह मजबूर व्यक्ति से धन वसूलने का नाजायज़ तरीका नहीं है? क्या यह खुले आम भ्रष्टाचार नहीं है? क्या सरकार और भ्रष्टाचार को समाप्त कराने में लगी संस्थाएँ इस बारे में अपनी आवाज़ बुलंद करेंगी? क्या विधि मंत्रालय, उच्च अदालतें निचली अदालतों पर नज़र नहीं रख सकती हैं? मैं नहीं समझता कि ये कोई नए मुद्दे हैं परंतु इन पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है।
*******
इतना सब तो झेलने के बाद हर पेशी पर, अदालत में न्याय की गद्दी पर बैठे न्यायाधीश के सामने सरे आम न्यायालय की पुकार डालने वाला चपरासी, हर पुकार का रु.10/- मेहनताना माँगता है। उसकी आवाज़ की कीमत तो फ़िल्मों में डबिंग करने वालों की आवाज़ की कीमत से भी ज़्यादा प्रतीत होती है। पहले यह कीमत रु.5/- होती थी। परंतु बढ़ती मँहगाई के कारण इसने अपना मेहनताना भी बढ़ा दिया है और सरकार का अनुमोदन भी मिल गया है।
उत्तर प्रदेश में अदालतों में एक दिन में पचास से सौ तक मुकदमे अदालत में लगे होते हैं। जब कि एक दिन में सुनवाई के लिए पंद्रह से बीस मुकदमों से अधिक नहीं रखे जाने चाहिए। इस स्थिति में आधे से अधिक मुकदमों में पेशी पर कोई कार्यवाही नहीं हो पाती है। अदालत पुराने मुकदमों में कार्यवाही करती है और नए मुकदमों में पेशी बदल देती है। वकील को तो मेहनताना देना ही पड़ता है, कचहरी जाने आने का खर्च उठाने के साथ अन्य कृषि कार्य आदि में भी बाधा होती है।
क्या यह वकीलों और अदालतों की ज़्यादती नहीं है? जब मुकदमें में 20-25 साल लगने ही हैं और उससे पहले निर्णय नहीं होना है तो मुवक्किल को नाहक परेशान क्यों किया जाता है बार-बार तारीख देकर? क्यों नहीं एक मुकदमा उठाया जाए और उसे निपटा कर ही अगला मुकदमा लिया जाए चाहे इसके लिए एक दिन एक दो तीन मुकदमे रखे जाएँ? क्या यह मजबूर व्यक्ति से धन वसूलने का नाजायज़ तरीका नहीं है? क्या यह खुले आम भ्रष्टाचार नहीं है? क्या सरकार और भ्रष्टाचार को समाप्त कराने में लगी संस्थाएँ इस बारे में अपनी आवाज़ बुलंद करेंगी? क्या विधि मंत्रालय, उच्च अदालतें निचली अदालतों पर नज़र नहीं रख सकती हैं? मैं नहीं समझता कि ये कोई नए मुद्दे हैं परंतु इन पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है।
*******
रविवार, जुलाई 31, 2011
इन्स्क्रिप्ट/हिंदी ट्रेडिशनल कीबोर्ड - ज़्यादा वैज्ञानिक और मान्य टाइपिंग ले आउट
इन्स्क्रिप्ट शब्द इंडियन + स्क्रिप्ट से बना है जिसका मतलब है मन्य, मानक भारतीय लिपियाँ। इन लिपियों में कंप्यूटर पर टाइपिंग करने या किसी इलेक्ट्रॉनिक युक्ति (डिवाइस) से लिखना (टाइप) करना। क्वेर्टी कीबोर्ड पर से भारतीय लिपियों में टाइप करने के लिए टाइप फ़ेस सेट किए गए थे। प्रारंभ में रेमिंगटन और गोदरेज कंपनियों ने टाइप राइटर बनाना शुरू किया इसलिए उन्होंने अपने नाम पर ही कीबोर्ड लेआउटों के नाम रखे, जैसे, रेमिंगटन और गोदरेज। आज भी इन्हीं नामों से लेआउट उपयोग में लाए जा रहे हैं परंतु जिस प्रकार क्वेर्टी कीबोर्ड के आविष्कारक, क्रिस्टोफ़र लोथम शोल्स (1868) ने लैटिन वर्णों को एक नियमबद्ध क्रम में नियत किया था भारतीय लिपियों में टाइप करने के लिए उस प्रकार की वैज्ञानिक रीति का अनुसरण न करके बेतरतीब कीबोर्ड बना दिया गया जिसे सीखने के लिए बहुत समय लगाना पड़ता था। इसके अलावा मेकैनिकल टाइप राइटर में 45 कुंजियों की सीमा होने के कारण शुद्धता से टाइप करना भी मुश्किल होता था।
कंप्यूटर के आगमन के बाद, विश्व की सभी भाषाओं, अंग्रेज़ी के सिवाय, के लिए अलग-अलग अनेक की बोर्ड बनाए गए जिनका आधार था क्वेर्टी कीबोर्ड। कंप्यूटर प्रौद्योगिकी में नित नए अनुसंधान तथा विकास के बाद जब कंप्यूटर का आगमन भारत में हुआ तो भारतीय भाषाओं में काम करने, पुस्तकें/पत्रिकाएँ प्रकाशित करने के लिए कंप्यूटर द्वारा उनके पाठ भारतीय भाषाओं में तैयार करने की आवश्यकता पड़ी। अतः पेजमेकर, वेचुरा, क्वार्क आदि प्रकाशन विशिष्ट सॉफ़्टवेयर उपयोग में लाए जाने लगे और उनमें एटीम फ़ॉन्टों का इस्तेमाल होने लगा जो पोस्ट स्क्रिप्ट फ़ॉन्ट होते थे। उसके बाद टीटीएफ़ फ़ॉन्टों का ज़माना आ गया और प्रकाशनों के लिए विभिन्न डिज़ाइन और आकार के फ़ॉन्ट बनाए गए। अंग्रेज़ी के लिए तो हर प्रकार के फ़ॉन्टों को मिलाकर कुल गिनती एक लाख तक पहुंच जाती है। फिर भी समस्या बनी रही क्योंकि वे फ़ॉन्ट गैर यूनीकोड फ़ॉर्मैट वाले थे जो अपने ही परिवेश में काम कर सकते थे। इसके बाद ज़माना आया यूनीकोड को। इसके बाद एक कंप्यूटर पर बना डॉक्यमेंट दूसरे कंप्यूटर पर पढ़ना संभव हो गया। लेकिन यूनीकोड आने के बाद लोगों की मानसिकता में परिवर्तन उस गति से नहीं आया जिस गति से आना चाहिए था। लोग अपनी ही शर्तों पर अंग्रेज़ी क्वेर्टी कीबोर्ड द्वारा ही भारतीय भाषाओं में टाइप करने की सहूलियत की माँग करने लगे और अपना माल बेचने की ग़रज़ू कंप्यूटर कंपनियों ने कीबोर्डों के अनेक लेआउट बना कर अराजकता की स्थिति पैदा कर दी। लोग नया सीखने के बजाय अपनी सहूलियत तथा शर्तों पर अड़े रहे जिसकी वजह से टाइपराइटर रेमिंगटन, टाइपराइटर गोदरेज, टाइपराइटर फ़ेसिट, टाइपराइटर (गेल), टाइपराइटर (सीबीआई), फ़ोनेटिक, ट्रांसलिटरेशन, ऐंग्लोनागरी, कृतिका देवनागरी, हिंदी वेबदुनिया, दैनिक जागरण आदि लेआउट बन गए। अतः अपनी डफ़ली अपना राग, एक विकराल समस्या जिसका समाधान आसान नहीं दिखता है।
इतने पर ही समस्या का सृजन स्थगित नहीं हुआ। सभी वेबसाइटों के निर्माताओं ने अपने उत्पाद को लोकप्रिय बनाने तथा प्रचलित करने के लिए अपने-अपने टाइपिंग टूल बना दिए और अपने एडिटर में जोड़ दिए। नतीज़ा यह हुआ कि यदि उनके सिस्टम में कोई खराबी आ जाए तो उसका उपयोग करना संभव नहीं होता है जैसा कि अभी गूगल के ब्लॉगर के साथ हुआ और जो लोग उसके आदती थे उनके लिए हिंदी टाइपिंग असंभव हो गया। इसके विपरीत जो लोग आईएमई का प्रयोग करते थे या इन्स्क्रिप्ट में टाइपिंग करते थे उनके लिए कोई कठिनाई नहीं हुई। अतः भारतीय भाषाओं में यूनीकोड में टाइपिंग के लिए सबसे अच्छा और स्वयंपूर्ण लेआउट हिंदी ट्रेडिशनल या इन्स्क्रिप्ट है।
इन्स्क्रिप्ट लेआउट 1986 में सीडैक द्वारा भारत सरकार के निदेशानुसार मानकीकृत किया गया था और 2008 में, सभी भारतीय भाषाओं के लिए समान और विस्तारित लेआउट बना दिया गया है जिसमें काम करना बहुत आसान और याद करना भी उतना ही आसान है क्योंकि यह एक निश्चित नियम पर आधारित है। यद्यपि इसे और सरल और वैज्ञानिक बनाया जा सकता है जो हिंदी की वर्णमाला के अनुरूप हो तथा प्रमुख विराम चिह्न एवं स्पेशल चिह्न, जैसे, !@#$%^* ?/। और संख्याएँ 1234567890 अंग्रेज़ी मोड में गए बिना ही टाइप किए जा सकें। ऐसा प्रयास राजभाषा विकास परिषद द्वारा किया गया है परंतु इसे भारत सरकार का समर्थन मिलना और इन्स्क्रिप्ट में इसके अनुसार संशोधन करना राजभाषा विभाग की सोच तथा कार्रवाई पर निर्भर करता है। फिर भी आज की तारीख में सबसे ज़्यादा वैज्ञानिक और मान्य टाइपिंग ले आउट इन्स्क्रिप्ट/हिंदी ट्रेडिशनल है और इसे अपनाने की ज़रूरत है।
इसके लिए टाइपिंग की मदद हेतु ऑन स्क्रीन कीबोर्ड की व्यवस्था है जिसका उपयोग किया जा सकता है – Start>All Programs>Accessaries>Accesbility>on-screen keyboard ।
********
कंप्यूटर के आगमन के बाद, विश्व की सभी भाषाओं, अंग्रेज़ी के सिवाय, के लिए अलग-अलग अनेक की बोर्ड बनाए गए जिनका आधार था क्वेर्टी कीबोर्ड। कंप्यूटर प्रौद्योगिकी में नित नए अनुसंधान तथा विकास के बाद जब कंप्यूटर का आगमन भारत में हुआ तो भारतीय भाषाओं में काम करने, पुस्तकें/पत्रिकाएँ प्रकाशित करने के लिए कंप्यूटर द्वारा उनके पाठ भारतीय भाषाओं में तैयार करने की आवश्यकता पड़ी। अतः पेजमेकर, वेचुरा, क्वार्क आदि प्रकाशन विशिष्ट सॉफ़्टवेयर उपयोग में लाए जाने लगे और उनमें एटीम फ़ॉन्टों का इस्तेमाल होने लगा जो पोस्ट स्क्रिप्ट फ़ॉन्ट होते थे। उसके बाद टीटीएफ़ फ़ॉन्टों का ज़माना आ गया और प्रकाशनों के लिए विभिन्न डिज़ाइन और आकार के फ़ॉन्ट बनाए गए। अंग्रेज़ी के लिए तो हर प्रकार के फ़ॉन्टों को मिलाकर कुल गिनती एक लाख तक पहुंच जाती है। फिर भी समस्या बनी रही क्योंकि वे फ़ॉन्ट गैर यूनीकोड फ़ॉर्मैट वाले थे जो अपने ही परिवेश में काम कर सकते थे। इसके बाद ज़माना आया यूनीकोड को। इसके बाद एक कंप्यूटर पर बना डॉक्यमेंट दूसरे कंप्यूटर पर पढ़ना संभव हो गया। लेकिन यूनीकोड आने के बाद लोगों की मानसिकता में परिवर्तन उस गति से नहीं आया जिस गति से आना चाहिए था। लोग अपनी ही शर्तों पर अंग्रेज़ी क्वेर्टी कीबोर्ड द्वारा ही भारतीय भाषाओं में टाइप करने की सहूलियत की माँग करने लगे और अपना माल बेचने की ग़रज़ू कंप्यूटर कंपनियों ने कीबोर्डों के अनेक लेआउट बना कर अराजकता की स्थिति पैदा कर दी। लोग नया सीखने के बजाय अपनी सहूलियत तथा शर्तों पर अड़े रहे जिसकी वजह से टाइपराइटर रेमिंगटन, टाइपराइटर गोदरेज, टाइपराइटर फ़ेसिट, टाइपराइटर (गेल), टाइपराइटर (सीबीआई), फ़ोनेटिक, ट्रांसलिटरेशन, ऐंग्लोनागरी, कृतिका देवनागरी, हिंदी वेबदुनिया, दैनिक जागरण आदि लेआउट बन गए। अतः अपनी डफ़ली अपना राग, एक विकराल समस्या जिसका समाधान आसान नहीं दिखता है।
इतने पर ही समस्या का सृजन स्थगित नहीं हुआ। सभी वेबसाइटों के निर्माताओं ने अपने उत्पाद को लोकप्रिय बनाने तथा प्रचलित करने के लिए अपने-अपने टाइपिंग टूल बना दिए और अपने एडिटर में जोड़ दिए। नतीज़ा यह हुआ कि यदि उनके सिस्टम में कोई खराबी आ जाए तो उसका उपयोग करना संभव नहीं होता है जैसा कि अभी गूगल के ब्लॉगर के साथ हुआ और जो लोग उसके आदती थे उनके लिए हिंदी टाइपिंग असंभव हो गया। इसके विपरीत जो लोग आईएमई का प्रयोग करते थे या इन्स्क्रिप्ट में टाइपिंग करते थे उनके लिए कोई कठिनाई नहीं हुई। अतः भारतीय भाषाओं में यूनीकोड में टाइपिंग के लिए सबसे अच्छा और स्वयंपूर्ण लेआउट हिंदी ट्रेडिशनल या इन्स्क्रिप्ट है।
इन्स्क्रिप्ट लेआउट 1986 में सीडैक द्वारा भारत सरकार के निदेशानुसार मानकीकृत किया गया था और 2008 में, सभी भारतीय भाषाओं के लिए समान और विस्तारित लेआउट बना दिया गया है जिसमें काम करना बहुत आसान और याद करना भी उतना ही आसान है क्योंकि यह एक निश्चित नियम पर आधारित है। यद्यपि इसे और सरल और वैज्ञानिक बनाया जा सकता है जो हिंदी की वर्णमाला के अनुरूप हो तथा प्रमुख विराम चिह्न एवं स्पेशल चिह्न, जैसे, !@#$%^* ?/। और संख्याएँ 1234567890 अंग्रेज़ी मोड में गए बिना ही टाइप किए जा सकें। ऐसा प्रयास राजभाषा विकास परिषद द्वारा किया गया है परंतु इसे भारत सरकार का समर्थन मिलना और इन्स्क्रिप्ट में इसके अनुसार संशोधन करना राजभाषा विभाग की सोच तथा कार्रवाई पर निर्भर करता है। फिर भी आज की तारीख में सबसे ज़्यादा वैज्ञानिक और मान्य टाइपिंग ले आउट इन्स्क्रिप्ट/हिंदी ट्रेडिशनल है और इसे अपनाने की ज़रूरत है।
इसके लिए टाइपिंग की मदद हेतु ऑन स्क्रीन कीबोर्ड की व्यवस्था है जिसका उपयोग किया जा सकता है – Start>All Programs>Accessaries>Accesbility>on-screen keyboard ।
********
बुधवार, जुलाई 27, 2011
बहुभाषिकता – आज की ज़रूरत
जब आप कहते हैं कि चार कोस पर पानी बदले और आठ कोस पर बानी तो इसका मतलब है कि आठ कोस की दूरी पर रहने वाले व्यक्ति के साथ बात करते हुए लोग उसकी पूरी बात नहीं समझ पाएंगे। तो लोग आपस में कैसे संवाद कर पाएंगे? परंतु आठ कोस के निकट वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोग दोनों बोलिओं में संवाद करने की क्षमता रखते हैं। इसी प्रकार दो भिन्न भाषाओं के क्षेत्रों में निवास करने वाली जनता भी सीमा क्षेत्रों में निवास करने वाले लोगों के सहारे पर प्रदेश के लोगों के साथ संवाद कर सकते हैं। यदि इस सिद्धांत को और विस्तृत किया जाए तो दो देशों की जनता भी सीमा क्षेत्रों में निवास करने वाले लोगों के सहारे उस देश के लोगों के साथ संवाद कर सकते हैं। इस प्रकार द्विभाषिकता की स्थिति का निर्माण हुआ। अतः सीमा क्षेत्र में, चाहे प्रदेश का हो या देश का, निवास करने वाले लोग स्वभावतः द्विभाषी होते हैं, जैसे, नेपाल की सीमा के साथ रहने वाले अपनी मातृभाषा के साथ नेपाली भाषा, चीन और रूस की सीमा के साथ रहने वाले लोग चीनी और रूसी दोनों भाषाओं में संवाद करने की क्षमता रखते हैं।
यह स्थिति तो सामान्य परिस्थितियों में और स्वाभाविक रूप से बरकरार रहती आई है। यह द्विभाषिकता की स्थिति आज देश प्रदेश के सीमा क्षेत्र तक ही महदूद नहीं रह गई है। अब सीमा क्षेत्र से परे रहने वाले लोग भी अपने आप देश प्रदेश की भाषा सीखने लगे हैं और इसे अतिरिक्त योग्यता माने जाने लगी है। आज हिंदुस्तान का हर सुशिक्षित व्यक्ति द्विभाषी है, अपनी मातृभाषा के अलावा हिंदी और अंग्रेज़ी सीखता है। कई लोग बहुभाषी हो रहे हैं। इसी प्रकार विश्व के अन्य देशों में रहने वाले भी अपने देश की राजभाषा के अलावा फ़्रेंच, स्पैनिश, जर्मन, लैटिन और चीनी, कोरियाई आदि भाषाएं सीख रहे हैं। चीन और जापान के लोग अंग्रेज़ी और अन्य यूरोपीय भाषाएं एवं हिंदी सीख रहे हैं। ब्रिटेन के लोग अपने बच्चों की शिक्षा के लिए बहुभाषी शिक्षकों की तलाश में विज्ञापन दे रहे हैं। अतः आज द्विभाषिकता या बहुभाषिकता एक ज़रूरत बन गई है। आज यदि कोई व्यक्ति कोई विदेशी भाषा नहीं जानता है तो उसे शिक्षित नहीं माना जाता है। आज द्विभाषिकता या बहुभाषिकता शौक नहीं ज़रूरत बन गई है।
*******
यह स्थिति तो सामान्य परिस्थितियों में और स्वाभाविक रूप से बरकरार रहती आई है। यह द्विभाषिकता की स्थिति आज देश प्रदेश के सीमा क्षेत्र तक ही महदूद नहीं रह गई है। अब सीमा क्षेत्र से परे रहने वाले लोग भी अपने आप देश प्रदेश की भाषा सीखने लगे हैं और इसे अतिरिक्त योग्यता माने जाने लगी है। आज हिंदुस्तान का हर सुशिक्षित व्यक्ति द्विभाषी है, अपनी मातृभाषा के अलावा हिंदी और अंग्रेज़ी सीखता है। कई लोग बहुभाषी हो रहे हैं। इसी प्रकार विश्व के अन्य देशों में रहने वाले भी अपने देश की राजभाषा के अलावा फ़्रेंच, स्पैनिश, जर्मन, लैटिन और चीनी, कोरियाई आदि भाषाएं सीख रहे हैं। चीन और जापान के लोग अंग्रेज़ी और अन्य यूरोपीय भाषाएं एवं हिंदी सीख रहे हैं। ब्रिटेन के लोग अपने बच्चों की शिक्षा के लिए बहुभाषी शिक्षकों की तलाश में विज्ञापन दे रहे हैं। अतः आज द्विभाषिकता या बहुभाषिकता एक ज़रूरत बन गई है। आज यदि कोई व्यक्ति कोई विदेशी भाषा नहीं जानता है तो उसे शिक्षित नहीं माना जाता है। आज द्विभाषिकता या बहुभाषिकता शौक नहीं ज़रूरत बन गई है।
*******
रविवार, जुलाई 24, 2011
विंडोज़ व एम. एस. ऑफ़िस के साथ कंप्यूटर सॉफ़्टवेयरों की सहायता से हिंदी में पेपरलेस कार्यालय का प्रगत (ऐडवांस) प्रशिक्षण कार्यक्रम (GAHN29)
परिषद राजभाषा हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए कंप्यूटर द्वारा हिंदी में संपूर्ण कार्यालयी कार्य यूनीकोड आधारित प्रणाली में करने के लिए उनतीसवाँ प्रशिक्षण कार्यक्रम 18 से 22 जुलाई तक आयोजित किया गया जिसमें भारतीय रिज़र्व बैंक, महालेखाकार (लेखा परीक्षा) के कार्यालय, नैशनल इंश्योरेंस कंपनी लि. और भारतीय वन सर्वेक्षण के कीर्यालयों के अधिकारी/कर्मचारियों ने भाग लिया। परिषद का अगला कार्यक्रम नागपुर स्थित केंद्र सरकार के कार्यालयों के लिए 22-24 अगस्त तक आयोजित है।
कार्यक्रम के सहभागियों का सामूहिक चित्र
कार्यक्रम के सहभागियों का सामूहिक चित्र
शनिवार, जुलाई 16, 2011
हिंदी के कार्यान्वयन में परिवर्तनकारी अभिकर्ता की भूमिका
हिंदी का प्रश्न भाषा का प्रश्न नहीं है बल्कि इस प्रश्न का संबंध राष्ट्रीयता से है। परंतु इधर इस सोच में परिवर्तन आ गया है। हिंदी के प्रति जिस संकल्पशील निष्ठा की ज़रूरत है उसकी झलक हिंदी कक्ष/विभाग से जुड़े कार्मिकों के अलावा कहीं और नहीं दिख रही है। मैं अपनी बात एक छोटे से दृष्टांत से प्रारंभ करना चाहूंगा। यह अभिकर्ता कोन है और इसे क्या करना चाहिए?
एक राजा शिकार करने के लिए जंगल में गया और दिन भर भटका परंतु कोई शिकार नहीं मिला। निराश होकर देर से लौटा और अपने अस्त्र-अस्बाब उतार कर एक कोने में फेंक दिया तथा सो गया। अगले दिन फिर उसी तरह तैयार हुआ कि शिकार के लिए चला जाए। जब अपने अस्त्र-अस्बाब उठाने गया तो देखा कि एक चूहा उसके नीचे दबा दर्द से कराह रहा है। उसने अपने अस्त्र-अस्बाब उठाया और चूहे को मुक्त किया। फिर चूहे से बोला कि भई! सारी रात दर्द से कराहते रहे क्यों नहीं शिकायत की? चूहे ने विनम्रता से जवाब दिया, महाराज आप न्यायदाता हैं और कष्ट भी आपने ही दिया है। यदि कोई और अन्याय करता तो न्याय के लिए आपके पास आता। जब स्वयं न्यायदाता ने ही अन्याय किया हो तो न्याय किससे माँगने जाता। अतः सारी रात दर्द से कराहता रहा।
इसका उदाहरण हिंदी या राजभाषा से संबंधित राष्ट्रपति के आदेशों और उनके अनुसरण में गृह मंत्रालय द्वारा जारी कार्यालय ज्ञापन में
मिलता है। दिनांक 3 दिसंबर 1955 को जारी आदेश में कहा गया था कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 343 के खंड (2) के परंतुक द्वारा दी गई शक्तियों का प्रयोग करते हुए राष्ट्रपति ने निम्नलिखित आदेश दिया है, -
1. यह आदेश संविधान (राजकीय प्रयोजनों के लिए हिंदी भाषा) आदेश 1955, कहलाएगा,
2. संघ के जिन प्रयोजनों के लिए अंग्रेज़ी भाषा के अतिरिक्त हिंदी भाषा का प्रयोग किया जाएगा, वे इससे संलग्न अनुसूची में दिए गए हैं।
अनुसूची
(1) जनता के साथ पत्र व्यवहार।
(2) प्रशासनिक रिपोर्टें, राजकीय पत्रिकाएं और संसद को दी जाने वाली रिपोर्टें।
(3) सरकारी संकल्प और विधायी अधिनियमितियाँ।
(4) जिन राज्य सरकारों ने अपनी राजभाषा के रूप में हिंदी को अपना लिया है, उनसे पत्र व्यवहार।
(5) संधियां और करार।
(6) अन्य देशों की सरकारों, उनके दूतों तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों से पत्र व्यवहार।
(7) राजनयिक और कौंसलीय पदाधिकारियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भारतीय प्रतिनिधियों के नाम जारी किए जाने वाले औपचारिक दस्तावेज़।
इसके बाद सरकारी कार्यालयों द्वारा इसका कार्यान्वयन के लिए गृह मंत्रालय को एक ज्ञापन जारी करके सभी सरकारी कार्यालयों को सूचित किया जाना था और सत्य निष्ठा से कार्यान्वयन को अंजाम दिया जाना था। परंतु गृह मंत्रालय ने क्या किया?
अब ज़रा देखिए, इसके आधार पर गृह मंत्रालय द्वारा 8 दिसंबर 1955 को जारी कार्यालय ज्ञापन की भाषा देखें।
"का.ज्ञा. संख्या 59/2/54 पीयूबी. दिनांक 8 दिसंबर 1955
विषय : - संविधान (राजकीय प्रयोजनों के लिए हिंदी भाषा) आदेश 1955
मुझे यह कहने का निदेश हुआ है कि संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार अंग्रेज़ी भाषा के स्थान पर धीरे-धीरे हिंदी भाषा का प्रयोग करने के संबंध में जो सुझाव दे गए थे उन पर अप्रैल, 1954 में एक अंतर विभागीय बैठक में विचार किया गया। भारत सरकार के मंत्रालयों में हिंदी में काम शुरू करने के लिए जो प्रबंध तत्काल करने का विचार है उसका ब्योरा संक्षेप में इस प्रकार है –
1. जनता से हिंदी में जो भी पत्रादि मिले उनके उत्तर भरसक हिंदी में ही दिए जाने चाहिए। ये उत्तर सरल हिंदी में दिए जाने चाहिए।
2. प्रशासनिक रिपोर्टें, सरकरी पत्रिकाएं, संसद को दी जाने वाली रिपोर्टें आदि, जहाँ तक संभव हो, अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिंदी में भी प्रकाशित की जानी चाहिए।
3. सरकारी संकल्पों और विधायी अधिनियमों में धीरे-धीरे अंग्रेज़ी के स्थान पर हिंदी का प्रयोग करने और जनता की सहायता करने के विचार से, जहाँ तक संभव हो, उन्हें अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिंदी में भी निकाला जाए किंतु इन पर यह बात स्पष्ट रूप से लिख देनी चाहिए कि अंग्रेज़ी पाठ ही प्रामाणिक माना जाएगा।
4. जिन राज्य सरकारों ने हिंदी को अपनी राजभाषा के रूप में अपना लिया है उनके साथ पत्र व्यवहार अंग्रेज़ी में होना चाहिए किंतु यदि हो सके तो भारत सरकार द्वारा भेजे गए सभी पत्रादि के साथ उनका हिंदी अनुवाद भी भेजा जाना चाहिए ताकि सांविधानिक कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।
5. संविधान के उपबंधों का पालन करने के लिए ऊपर बताए गए तरीके के अनुसार काम शुरू करने से पहले राष्ट्रपति का आदेश ले लेना उचित होगा।
भारत सरकार ने ये निर्णय स्वीकार कर लिए हैं किंतु हर मंत्रालय स्वयं इस बात का निश्चय करेगा कि उसका कितना काम हिंदी में हो सकता है और इसके लिए उसे कितने और कर्मचारियों की ज़रूरत होगी। इस कार्यक्रम को अमल में लाने के लिए भारत सरकार के सभी मंत्रालयों और संबद्ध तथा अधीनस्थ कार्यालयों में संभवतः कर्मचारियों की संख्या बढ़ानी पड़ेगी और इस तरह उन्हें अधिक पैसा खर्च करना पड़ेगा। कार्यक्रम के वित्तीय पहलुओं पर वित्त मंत्रालय से सलाह करके विचार करना होगा। फिर भी सामान्य नीति के के रूप में इस विषय पर निर्णय कर लिया गया है और हिंदी में काम करने के लिए आवश्यक अतिरिक्त कर्मचारी मंत्रालय स्वयं रख सकते हैं और आवश्यकता पड़ने पर वित्त मंत्रालय से इस संबंध में सलाह भी कर सकते हैं।"
क्या इससे लगता है कि ब्यूरोक्रेसी ने सत्यनिष्ठा से कार्रवाई की? अनावश्यक रूप से वे शब्द डाले गए जिनसे अनिश्चतता पैदा हुई और लोगों ने यह धारणा बना ली कि जहाँ तक संभव होगा किया जाएगा।
अब राष्ट्रपति के आदेश और ज्ञापन की तुलना की जाए
"गैर सरकारी, गैर शिक्षण संस्थाओं द्वारा किए जा रहे कार्य ही वास्तव में हिंदी के प्रचार-प्रसार में ज़्यादा सहायक हैं।" इसका मतलब है कि अन्यत्र इस विषय में सकारात्मक सोच का अभाव है या नकारात्मक सोच सकारात्मक सोच पर अभिभावी हो गई है। हम एक ऐसी संस्था में कार्य कर रहे हैं जिसका स्वरूप अखिल भारतीय है और हमारा संपर्क अनेक भाषा भाषी व्यक्तियों से होता है। उस परिस्थिति में हमसे क्या अपेक्षित है और हमारा व्यवहार कैसा हो?
2. हम पहले इस पहलू पर विचार कर लें कि सकारात्मक सोच और नकारात्मक सोच क्या है और इसका प्रभाव किस प्रकार पड़ता है? - (क) साकरात्मक सोच वाले व्यक्ति के पास समाधान होता है और नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति के पास समस्या होती है। वह हर काम में समस्या देख लेता है। (ख) साकरात्मक सोच वाले व्यक्ति के पास कार्यक्रम होता है और नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति के पास बहाना होता है। (ग) साकरात्मक सोच वाला व्यक्ति काम करने का इच्छुक होता है और नकारात्मक सोच वाल व्यक्ति कहता है कि यह काम मेरा नहीं है। (घ) साकरात्मक सोच वाले व्यक्ति के पास समस्या में समाधान होता है जबकि नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति के पास समाधान में समस्या होती है। (ङ) साकरात्मक सोच वाले व्यक्ति के पास यह सोच होती है कि कठिन ज़रूर है पर असंभव नहीं है।
संगठन के स्तर पर सोच परिवर्तन
3. परिवर्तन को दो स्तर पर लागू करना होता है – संगठन के स्तर पर और कार्यान्वयन के स्तर पर। सबसे पहले संगठन के शीर्ष स्तर पर यह निश्चय और स्वीकार किया जाना चाहिए कि परिवर्तन आवश्यक है और होना चाहिए। उसके बाद कार्यान्वयन के लिए कार्य योजना का आरेखन (डिज़ाइनिंग) और फिर कार्यान्वयन करना। परिवर्तन के प्रबंध के लिए संगठन की ओर से वांछित कार्रवाई –
क) परिवर्तन के बारे में चरणबद्ध योजना बनाना,
ख) उसके बारे में लोगों के साथ संवाद,
ग) लोगों को दिशा निदेश देना,
घ) उभरने वाले प्रतिरोध (टकराव) का समाधान करना,
च) नियमित प्रशिक्षण।
राजभाषा अधिकारी – तृणमूल (ग्रास रूट) अभिकर्ता
4. यह मान लिया जाए कि हिंदी के प्रति, राजभाषा अधिकारी के अलावा अन्य लोगों की सोच नकारात्मक है क्योंकि हिंदी में काम करने के लिए वर्षों से बनी लीक छोड़ना होगा। कुछ नया प्रयास करना होगा। कुछ नया सीखना होगा अर्थात्, परिवर्तन। मनुष्य किसी भी परिवर्तन का सहज विरोधी होता है। अतः परिवर्तन के समय ही मानसिकता (सोच) का इजहार होता है। जो लोग परिवर्तन को स्वीकार करते हैं वे साकारात्मक सोच वाले होते हैं और जो इसका विरोध करते हैं उन्हें नकारात्म सोच वाली श्रेणी में रखा जाता है। जब भी कोई नई विचारधारा, नया उत्पाद, नई प्रणाली, नई व्यवस्था लागू करने का प्रयास किया गया तो उसके कार्यान्वयन के दौरान इन परिस्थितियों से होकर गुज़रना पड़ा। ये समय सिद्ध और स्वानुभूत स्थितियाँ हैं -
1) आवेशपूर्ण अस्वीकार (indignant rejection) -
2) तर्कपूर्ण आपत्ति (reasoned objection) -
3) सशर्त विरोध (qualified opposition) -
4) अस्थायी स्वीकृति (tentative acceptance) -
5) सशर्त सहमति/स्वीकृति (qualified endorsement) -
6) तर्कसंगत संशोधन (judicious modification) -
7) सवाधानीपूर्वक प्रचार (cautious propagation) -
8) भावनात्मक गठबंधन (impassioned espousal) -
9) गर्वपूर्ण पितृत्व (proud parenthood) -
10) अंधभक्तिपूर्वक प्रचार (dogmatic propagation)।
5. हम यहाँ राजभाषा हिंदी को नई विचारधारा या नई व्यवस्था के रूप में लेते हैं और विचार करते हैं कि इन मनोभाषिक बाधाओं से कैसे निपटा जाए? इसके लिए हम उदाहरण लेंगे राष्ट्रपति के 1960 के आदेश का। आप जानते हैं कि राजभाषा आयोग ने 1956 में अपना प्रतिवेदन दिया था और उस प्रतिवेदन में की गई सिफ़ारिशों पर विचार करने और उनके विषय में अपनी राय देने के लिए 30 सांसदों की समिति गठित की गई थी। समिति ने राजभाषा आयोग, 1956 के प्रतिवेदन में की गई सिफ़ारिशों पर विचार करके 8 फ़रवरी 1959 को अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत की। समिति ने अपनी रिपोर्ट में पाँच बातें लिखी थीं –
(क) राजभाषा के बारे में संविधान में बड़ी समन्वित योजना दी हई है। इसमें, योजना के दायरे से बाहर जाए बिना स्थिति के अनुसार परिवर्तन करने की गुंजाइश है।
(ख) विभिन्न प्रादेशिक भाषाएं राज्यों में शिक्षा और सरकारी काम-काज के माध्यम के रूप में तेज़ी से अंग्रेज़ी का स्थान ले रही हैं। यह स्वाभाविक ही है कि प्रादेशिक भाषाएं अपना उचित स्थान प्राप्त करें। अतः व्यावहारिक दृष्टि से यह बात आवश्यक हो गई है कि संघ के प्रयोजनों के लिए कोई एक भारतीय भाषा काम में लाई जाए। किंतु यह आवश्यक नहीं है कि यह परिवर्तन किसी नियत तारीख को ही हो। यह परिवर्तन धीरे-धीरे इस प्रकार किया जाना चाहिए कि कोई गड़बड़ी न हो और कम से कम असुविधा हो।
(ग) 1965 तक अंग्रेज़ी मुख्य भाषा और हिंदी सहायक राजभाषा रहनी चाहिए। 1965 में हिंदी संघ की मुख्य भाषा हो जाएगी किंतु उसके उपरांत अंग्रेज़ी सहायक भाषा के रूप चलती रहनी चाहिए।
(घ) संघ के प्रयोजनों में से किसी के लिए अंग्रज़ी के प्रयोग पर कोई रोक इस समय नहीं लगाई जानी चाहिए और अनुच्छेद 343 के खंड (3) के अनुसार इस बात की व्यवस्था की जानी चाहिए कि 1965 के उपरांत भी अंग्रेज़ी का प्रयोग उन प्रयोजनों के लिए जिन्हें संसद विधि द्वारा उल्लिखित करे, तब तक होता रहे जब तक कि वैसा करना आवश्यक रहे।
(ङ) अनुच्छेद 351 का यह उपबंध कि हिंदी का विकास ऐसे किया जाए कि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सब तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके, अत्यंत महत्वपूर्ण है और इस बात के लिए पूरा प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए कि सरल और सुबोध शब्द काम में लाए जाएं।
6. संसदीय समिति की उक्त रिपोर्ट संसद के दोनों पटलों पर अप्रैल 1959 में रखी गई उस पर सितंबर 1959 में चर्चा हुई और उसके बाद राष्ट्रपति ने 27 अप्रैल 1960 को आदेश जारी किया। उस आदेश में कुल 14 मदें हैं और प्रारंभिक तौर पर उनका कार्यान्वन किया जाना था। अतः अन्य बातों के साथ-साथ हिंदी का शिक्षण प्रशिक्षण भी दिया जाना था इसलिए अंतर्सेवाकालीन प्रशिक्षण के लिए हिंदी शिक्षण योजना का प्रारंभ हुआ। परंतु राष्ट्रपति के उस आदेश को मद्रास उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई कि यह आदेश मौलिक अधिकारों का हनन है। हमें ज़बरदस्ती हिंदी सिखाई जा रही है। हालाँकि उच्चतम न्यायालय ने इस बात को सही नहीं पाया और याचिका खारिज कर दी गई। इतना ही नहीं, आज हम जिन उपयोगी वस्तुओं के बिना नहीं रह सकते, जैसे, जेम्सवाट का स्टीम इंजन, ग्राहमवेल का फ़ोन, आइंस्टीन व गैलीलियो के आविष्कारों को भी लोगों ने तुरंत नहीं स्वीकारा था क्योंकि नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति ज़्यादा मुखर होते हैं। उन्हें मनाने के लिए सुनियोजित ढंग से प्रयास करना होता है। ऐसा भी नहीं है कि नकारात्मक सोच वाले सदैव गलत ही होते हैं। वे हमें, अपनी कमियों को सुधारने में प्रेरक होते हैं। इसीलिए कबीर ने कहा है कि 'निंदक नेड़े राखिए आंगन कुटी छवाय'। इसलिए नकारात्मक सोच को प्रथम चरण से चलाकर आठवें चरण तक लाने के प्रयास करना पड़ेगा। उसके बाद तो वे आपका धर्मध्वज स्वयं अपने हाथ में ले लेंगे और फिर आप प्रत्यक्ष दृश्य से पीछे आ जाएं जिस प्रकार कि रामचंद्र जी ने हनुमान को स्वतंत्र छोड़ दिया था। आप एक नेता हैं। नेता को तभी तक आगे रहना चाहिए जब तक कि आपके अनुयायी आगे नहीं आ जाते। अभी अनुयायी चलने को ही तैयार नहीं हैं। उन्हें चलने से लेकर आगे आने तक आपको अथक परिश्रम करना है। मनोवृत्ति परिवर्तन के रास्ते में आए उक्त पड़ावों के सफ़र को तय करने के लिए ये कार्य करने होंगे –
क) अपने उद्देश्य और अपनी योजना के बारे में लोगों को जागरूक करना होगा,
ख) परिवर्तन के लिए लोगों में इच्छा जागृत करना होगा,
ग) लोगों के ज्ञान में वृद्धि करना होगा,
घ) क्षमता में वृद्धि करना होगा।
*****
एक राजा शिकार करने के लिए जंगल में गया और दिन भर भटका परंतु कोई शिकार नहीं मिला। निराश होकर देर से लौटा और अपने अस्त्र-अस्बाब उतार कर एक कोने में फेंक दिया तथा सो गया। अगले दिन फिर उसी तरह तैयार हुआ कि शिकार के लिए चला जाए। जब अपने अस्त्र-अस्बाब उठाने गया तो देखा कि एक चूहा उसके नीचे दबा दर्द से कराह रहा है। उसने अपने अस्त्र-अस्बाब उठाया और चूहे को मुक्त किया। फिर चूहे से बोला कि भई! सारी रात दर्द से कराहते रहे क्यों नहीं शिकायत की? चूहे ने विनम्रता से जवाब दिया, महाराज आप न्यायदाता हैं और कष्ट भी आपने ही दिया है। यदि कोई और अन्याय करता तो न्याय के लिए आपके पास आता। जब स्वयं न्यायदाता ने ही अन्याय किया हो तो न्याय किससे माँगने जाता। अतः सारी रात दर्द से कराहता रहा।
इसका उदाहरण हिंदी या राजभाषा से संबंधित राष्ट्रपति के आदेशों और उनके अनुसरण में गृह मंत्रालय द्वारा जारी कार्यालय ज्ञापन में
मिलता है। दिनांक 3 दिसंबर 1955 को जारी आदेश में कहा गया था कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 343 के खंड (2) के परंतुक द्वारा दी गई शक्तियों का प्रयोग करते हुए राष्ट्रपति ने निम्नलिखित आदेश दिया है, -
1. यह आदेश संविधान (राजकीय प्रयोजनों के लिए हिंदी भाषा) आदेश 1955, कहलाएगा,
2. संघ के जिन प्रयोजनों के लिए अंग्रेज़ी भाषा के अतिरिक्त हिंदी भाषा का प्रयोग किया जाएगा, वे इससे संलग्न अनुसूची में दिए गए हैं।
अनुसूची
(1) जनता के साथ पत्र व्यवहार।
(2) प्रशासनिक रिपोर्टें, राजकीय पत्रिकाएं और संसद को दी जाने वाली रिपोर्टें।
(3) सरकारी संकल्प और विधायी अधिनियमितियाँ।
(4) जिन राज्य सरकारों ने अपनी राजभाषा के रूप में हिंदी को अपना लिया है, उनसे पत्र व्यवहार।
(5) संधियां और करार।
(6) अन्य देशों की सरकारों, उनके दूतों तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों से पत्र व्यवहार।
(7) राजनयिक और कौंसलीय पदाधिकारियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भारतीय प्रतिनिधियों के नाम जारी किए जाने वाले औपचारिक दस्तावेज़।
इसके बाद सरकारी कार्यालयों द्वारा इसका कार्यान्वयन के लिए गृह मंत्रालय को एक ज्ञापन जारी करके सभी सरकारी कार्यालयों को सूचित किया जाना था और सत्य निष्ठा से कार्यान्वयन को अंजाम दिया जाना था। परंतु गृह मंत्रालय ने क्या किया?
अब ज़रा देखिए, इसके आधार पर गृह मंत्रालय द्वारा 8 दिसंबर 1955 को जारी कार्यालय ज्ञापन की भाषा देखें।
"का.ज्ञा. संख्या 59/2/54 पीयूबी. दिनांक 8 दिसंबर 1955
विषय : - संविधान (राजकीय प्रयोजनों के लिए हिंदी भाषा) आदेश 1955
मुझे यह कहने का निदेश हुआ है कि संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार अंग्रेज़ी भाषा के स्थान पर धीरे-धीरे हिंदी भाषा का प्रयोग करने के संबंध में जो सुझाव दे गए थे उन पर अप्रैल, 1954 में एक अंतर विभागीय बैठक में विचार किया गया। भारत सरकार के मंत्रालयों में हिंदी में काम शुरू करने के लिए जो प्रबंध तत्काल करने का विचार है उसका ब्योरा संक्षेप में इस प्रकार है –
1. जनता से हिंदी में जो भी पत्रादि मिले उनके उत्तर भरसक हिंदी में ही दिए जाने चाहिए। ये उत्तर सरल हिंदी में दिए जाने चाहिए।
2. प्रशासनिक रिपोर्टें, सरकरी पत्रिकाएं, संसद को दी जाने वाली रिपोर्टें आदि, जहाँ तक संभव हो, अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिंदी में भी प्रकाशित की जानी चाहिए।
3. सरकारी संकल्पों और विधायी अधिनियमों में धीरे-धीरे अंग्रेज़ी के स्थान पर हिंदी का प्रयोग करने और जनता की सहायता करने के विचार से, जहाँ तक संभव हो, उन्हें अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिंदी में भी निकाला जाए किंतु इन पर यह बात स्पष्ट रूप से लिख देनी चाहिए कि अंग्रेज़ी पाठ ही प्रामाणिक माना जाएगा।
4. जिन राज्य सरकारों ने हिंदी को अपनी राजभाषा के रूप में अपना लिया है उनके साथ पत्र व्यवहार अंग्रेज़ी में होना चाहिए किंतु यदि हो सके तो भारत सरकार द्वारा भेजे गए सभी पत्रादि के साथ उनका हिंदी अनुवाद भी भेजा जाना चाहिए ताकि सांविधानिक कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।
5. संविधान के उपबंधों का पालन करने के लिए ऊपर बताए गए तरीके के अनुसार काम शुरू करने से पहले राष्ट्रपति का आदेश ले लेना उचित होगा।
भारत सरकार ने ये निर्णय स्वीकार कर लिए हैं किंतु हर मंत्रालय स्वयं इस बात का निश्चय करेगा कि उसका कितना काम हिंदी में हो सकता है और इसके लिए उसे कितने और कर्मचारियों की ज़रूरत होगी। इस कार्यक्रम को अमल में लाने के लिए भारत सरकार के सभी मंत्रालयों और संबद्ध तथा अधीनस्थ कार्यालयों में संभवतः कर्मचारियों की संख्या बढ़ानी पड़ेगी और इस तरह उन्हें अधिक पैसा खर्च करना पड़ेगा। कार्यक्रम के वित्तीय पहलुओं पर वित्त मंत्रालय से सलाह करके विचार करना होगा। फिर भी सामान्य नीति के के रूप में इस विषय पर निर्णय कर लिया गया है और हिंदी में काम करने के लिए आवश्यक अतिरिक्त कर्मचारी मंत्रालय स्वयं रख सकते हैं और आवश्यकता पड़ने पर वित्त मंत्रालय से इस संबंध में सलाह भी कर सकते हैं।"
क्या इससे लगता है कि ब्यूरोक्रेसी ने सत्यनिष्ठा से कार्रवाई की? अनावश्यक रूप से वे शब्द डाले गए जिनसे अनिश्चतता पैदा हुई और लोगों ने यह धारणा बना ली कि जहाँ तक संभव होगा किया जाएगा।
अब राष्ट्रपति के आदेश और ज्ञापन की तुलना की जाए
"गैर सरकारी, गैर शिक्षण संस्थाओं द्वारा किए जा रहे कार्य ही वास्तव में हिंदी के प्रचार-प्रसार में ज़्यादा सहायक हैं।" इसका मतलब है कि अन्यत्र इस विषय में सकारात्मक सोच का अभाव है या नकारात्मक सोच सकारात्मक सोच पर अभिभावी हो गई है। हम एक ऐसी संस्था में कार्य कर रहे हैं जिसका स्वरूप अखिल भारतीय है और हमारा संपर्क अनेक भाषा भाषी व्यक्तियों से होता है। उस परिस्थिति में हमसे क्या अपेक्षित है और हमारा व्यवहार कैसा हो?
2. हम पहले इस पहलू पर विचार कर लें कि सकारात्मक सोच और नकारात्मक सोच क्या है और इसका प्रभाव किस प्रकार पड़ता है? - (क) साकरात्मक सोच वाले व्यक्ति के पास समाधान होता है और नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति के पास समस्या होती है। वह हर काम में समस्या देख लेता है। (ख) साकरात्मक सोच वाले व्यक्ति के पास कार्यक्रम होता है और नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति के पास बहाना होता है। (ग) साकरात्मक सोच वाला व्यक्ति काम करने का इच्छुक होता है और नकारात्मक सोच वाल व्यक्ति कहता है कि यह काम मेरा नहीं है। (घ) साकरात्मक सोच वाले व्यक्ति के पास समस्या में समाधान होता है जबकि नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति के पास समाधान में समस्या होती है। (ङ) साकरात्मक सोच वाले व्यक्ति के पास यह सोच होती है कि कठिन ज़रूर है पर असंभव नहीं है।
संगठन के स्तर पर सोच परिवर्तन
3. परिवर्तन को दो स्तर पर लागू करना होता है – संगठन के स्तर पर और कार्यान्वयन के स्तर पर। सबसे पहले संगठन के शीर्ष स्तर पर यह निश्चय और स्वीकार किया जाना चाहिए कि परिवर्तन आवश्यक है और होना चाहिए। उसके बाद कार्यान्वयन के लिए कार्य योजना का आरेखन (डिज़ाइनिंग) और फिर कार्यान्वयन करना। परिवर्तन के प्रबंध के लिए संगठन की ओर से वांछित कार्रवाई –
क) परिवर्तन के बारे में चरणबद्ध योजना बनाना,
ख) उसके बारे में लोगों के साथ संवाद,
ग) लोगों को दिशा निदेश देना,
घ) उभरने वाले प्रतिरोध (टकराव) का समाधान करना,
च) नियमित प्रशिक्षण।
राजभाषा अधिकारी – तृणमूल (ग्रास रूट) अभिकर्ता
4. यह मान लिया जाए कि हिंदी के प्रति, राजभाषा अधिकारी के अलावा अन्य लोगों की सोच नकारात्मक है क्योंकि हिंदी में काम करने के लिए वर्षों से बनी लीक छोड़ना होगा। कुछ नया प्रयास करना होगा। कुछ नया सीखना होगा अर्थात्, परिवर्तन। मनुष्य किसी भी परिवर्तन का सहज विरोधी होता है। अतः परिवर्तन के समय ही मानसिकता (सोच) का इजहार होता है। जो लोग परिवर्तन को स्वीकार करते हैं वे साकारात्मक सोच वाले होते हैं और जो इसका विरोध करते हैं उन्हें नकारात्म सोच वाली श्रेणी में रखा जाता है। जब भी कोई नई विचारधारा, नया उत्पाद, नई प्रणाली, नई व्यवस्था लागू करने का प्रयास किया गया तो उसके कार्यान्वयन के दौरान इन परिस्थितियों से होकर गुज़रना पड़ा। ये समय सिद्ध और स्वानुभूत स्थितियाँ हैं -
1) आवेशपूर्ण अस्वीकार (indignant rejection) -
2) तर्कपूर्ण आपत्ति (reasoned objection) -
3) सशर्त विरोध (qualified opposition) -
4) अस्थायी स्वीकृति (tentative acceptance) -
5) सशर्त सहमति/स्वीकृति (qualified endorsement) -
6) तर्कसंगत संशोधन (judicious modification) -
7) सवाधानीपूर्वक प्रचार (cautious propagation) -
8) भावनात्मक गठबंधन (impassioned espousal) -
9) गर्वपूर्ण पितृत्व (proud parenthood) -
10) अंधभक्तिपूर्वक प्रचार (dogmatic propagation)।
5. हम यहाँ राजभाषा हिंदी को नई विचारधारा या नई व्यवस्था के रूप में लेते हैं और विचार करते हैं कि इन मनोभाषिक बाधाओं से कैसे निपटा जाए? इसके लिए हम उदाहरण लेंगे राष्ट्रपति के 1960 के आदेश का। आप जानते हैं कि राजभाषा आयोग ने 1956 में अपना प्रतिवेदन दिया था और उस प्रतिवेदन में की गई सिफ़ारिशों पर विचार करने और उनके विषय में अपनी राय देने के लिए 30 सांसदों की समिति गठित की गई थी। समिति ने राजभाषा आयोग, 1956 के प्रतिवेदन में की गई सिफ़ारिशों पर विचार करके 8 फ़रवरी 1959 को अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत की। समिति ने अपनी रिपोर्ट में पाँच बातें लिखी थीं –
(क) राजभाषा के बारे में संविधान में बड़ी समन्वित योजना दी हई है। इसमें, योजना के दायरे से बाहर जाए बिना स्थिति के अनुसार परिवर्तन करने की गुंजाइश है।
(ख) विभिन्न प्रादेशिक भाषाएं राज्यों में शिक्षा और सरकारी काम-काज के माध्यम के रूप में तेज़ी से अंग्रेज़ी का स्थान ले रही हैं। यह स्वाभाविक ही है कि प्रादेशिक भाषाएं अपना उचित स्थान प्राप्त करें। अतः व्यावहारिक दृष्टि से यह बात आवश्यक हो गई है कि संघ के प्रयोजनों के लिए कोई एक भारतीय भाषा काम में लाई जाए। किंतु यह आवश्यक नहीं है कि यह परिवर्तन किसी नियत तारीख को ही हो। यह परिवर्तन धीरे-धीरे इस प्रकार किया जाना चाहिए कि कोई गड़बड़ी न हो और कम से कम असुविधा हो।
(ग) 1965 तक अंग्रेज़ी मुख्य भाषा और हिंदी सहायक राजभाषा रहनी चाहिए। 1965 में हिंदी संघ की मुख्य भाषा हो जाएगी किंतु उसके उपरांत अंग्रेज़ी सहायक भाषा के रूप चलती रहनी चाहिए।
(घ) संघ के प्रयोजनों में से किसी के लिए अंग्रज़ी के प्रयोग पर कोई रोक इस समय नहीं लगाई जानी चाहिए और अनुच्छेद 343 के खंड (3) के अनुसार इस बात की व्यवस्था की जानी चाहिए कि 1965 के उपरांत भी अंग्रेज़ी का प्रयोग उन प्रयोजनों के लिए जिन्हें संसद विधि द्वारा उल्लिखित करे, तब तक होता रहे जब तक कि वैसा करना आवश्यक रहे।
(ङ) अनुच्छेद 351 का यह उपबंध कि हिंदी का विकास ऐसे किया जाए कि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सब तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके, अत्यंत महत्वपूर्ण है और इस बात के लिए पूरा प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए कि सरल और सुबोध शब्द काम में लाए जाएं।
6. संसदीय समिति की उक्त रिपोर्ट संसद के दोनों पटलों पर अप्रैल 1959 में रखी गई उस पर सितंबर 1959 में चर्चा हुई और उसके बाद राष्ट्रपति ने 27 अप्रैल 1960 को आदेश जारी किया। उस आदेश में कुल 14 मदें हैं और प्रारंभिक तौर पर उनका कार्यान्वन किया जाना था। अतः अन्य बातों के साथ-साथ हिंदी का शिक्षण प्रशिक्षण भी दिया जाना था इसलिए अंतर्सेवाकालीन प्रशिक्षण के लिए हिंदी शिक्षण योजना का प्रारंभ हुआ। परंतु राष्ट्रपति के उस आदेश को मद्रास उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई कि यह आदेश मौलिक अधिकारों का हनन है। हमें ज़बरदस्ती हिंदी सिखाई जा रही है। हालाँकि उच्चतम न्यायालय ने इस बात को सही नहीं पाया और याचिका खारिज कर दी गई। इतना ही नहीं, आज हम जिन उपयोगी वस्तुओं के बिना नहीं रह सकते, जैसे, जेम्सवाट का स्टीम इंजन, ग्राहमवेल का फ़ोन, आइंस्टीन व गैलीलियो के आविष्कारों को भी लोगों ने तुरंत नहीं स्वीकारा था क्योंकि नकारात्मक सोच वाले व्यक्ति ज़्यादा मुखर होते हैं। उन्हें मनाने के लिए सुनियोजित ढंग से प्रयास करना होता है। ऐसा भी नहीं है कि नकारात्मक सोच वाले सदैव गलत ही होते हैं। वे हमें, अपनी कमियों को सुधारने में प्रेरक होते हैं। इसीलिए कबीर ने कहा है कि 'निंदक नेड़े राखिए आंगन कुटी छवाय'। इसलिए नकारात्मक सोच को प्रथम चरण से चलाकर आठवें चरण तक लाने के प्रयास करना पड़ेगा। उसके बाद तो वे आपका धर्मध्वज स्वयं अपने हाथ में ले लेंगे और फिर आप प्रत्यक्ष दृश्य से पीछे आ जाएं जिस प्रकार कि रामचंद्र जी ने हनुमान को स्वतंत्र छोड़ दिया था। आप एक नेता हैं। नेता को तभी तक आगे रहना चाहिए जब तक कि आपके अनुयायी आगे नहीं आ जाते। अभी अनुयायी चलने को ही तैयार नहीं हैं। उन्हें चलने से लेकर आगे आने तक आपको अथक परिश्रम करना है। मनोवृत्ति परिवर्तन के रास्ते में आए उक्त पड़ावों के सफ़र को तय करने के लिए ये कार्य करने होंगे –
क) अपने उद्देश्य और अपनी योजना के बारे में लोगों को जागरूक करना होगा,
ख) परिवर्तन के लिए लोगों में इच्छा जागृत करना होगा,
ग) लोगों के ज्ञान में वृद्धि करना होगा,
घ) क्षमता में वृद्धि करना होगा।
*****
बुधवार, जुलाई 13, 2011
अंग्रेज़ी का घटता वर्चस्व-यूपीएससी की दलील खारिज ("मूक होंहि वाचाल")
मैंने अपने इसी ब्लॉग में "मूक होंहि वाचाल" शीर्षक से निम्नलिखित पोस्ट लिखी थी -
"यदि आप अंग्रेज़ी लिख सकते हैं तो आप अंग्रेज़ी बोल भी सकते हैं। यह बात, संघ लोक सेवा आयोग ने 2008 की भारतीय प्रशासनिक सेवा की लिखित परीक्षा में पास होने वाले श्री चितरंजन कुमार से कही है। श्री कुमार ने संघ लोक सेवा आयोग पर आरोप लगाया है कि आयोग अंग्रेज़ी माध्यम वाले उम्मीदवारों को तरजीह देता है क्योंकि श्री कुमार साक्षात्कार में अग्रेज़ी में न बोल पाने के कारण असफल घोषित कर दिए गए।
इस बारे में, संघ लोक सेवा आयोग का ध्यान राजभाषा आयोग, 1956 द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के हिंदी संस्करण के पृष्ठ 153 पर पहले पैराग्राफ़ की अंतिम तीन पंक्तियों में व्यक्त विचार की ओर आकृष्ट करना चाहता हूं। आयोग ने कहा है, "प्रतियोगी परीक्षाएं ऐसी होनी चाहिए कि उनसे उम्मीदवारों की बौद्धिक योग्यता और अनुशासन की सामान्य परीक्षा ली जा सके। भाषा संबंधी योग्यता की परीक्षा पर अनुचित महत्व नहीं दिया जाना चाहिए।"
अतः संघ लोक सेवा आयोग अपने ऊपर लगे आरोप से बचने के लिए तकनीकी बहाने का आश्रय न ले। यह तो अंग्रेज़ी दंश का एक और ज्वलंत उदाहरण है।"
चितरंजन कुमार ने यूपीएससी की दलील को चनौती दी थी। अतः इस याचिका के प्रितिवादी की हैसियत से, यूपीएससी ने बॉम्बे हाई कोर्ट में दाखिल हलफ़नामे में कहा है कि इसके लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाई गई थी। इसकी सिफ़ारिशों के अनुसार उम्मीदवार ने भले ही मुख्य परीक्षा अंग्रेज़ी में दी हो लेकिन वह साक्षात्कार क्षेत्रीय भाषा में दे सकता है।
संघ लोक सेवा आयोग ने चितरंजन कुमार की याचिका पर हलफ़नामा दाखिल किया है।
संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में अब उम्मीदवार अपना इंटरव्यू भी क्षेत्रीय भाषा में दे सकेंगे। इससे पहले साक्षात्कार सिर्फ़ हिंदी या अंग्रेज़ी भाषा में दिया जा सकता है।
अंग्रेज़ी का घटता वर्चस्व और भारतीय भाषाओं के विकास का रास्ता प्रशस्त हो रहा है।
"यदि आप अंग्रेज़ी लिख सकते हैं तो आप अंग्रेज़ी बोल भी सकते हैं। यह बात, संघ लोक सेवा आयोग ने 2008 की भारतीय प्रशासनिक सेवा की लिखित परीक्षा में पास होने वाले श्री चितरंजन कुमार से कही है। श्री कुमार ने संघ लोक सेवा आयोग पर आरोप लगाया है कि आयोग अंग्रेज़ी माध्यम वाले उम्मीदवारों को तरजीह देता है क्योंकि श्री कुमार साक्षात्कार में अग्रेज़ी में न बोल पाने के कारण असफल घोषित कर दिए गए।
इस बारे में, संघ लोक सेवा आयोग का ध्यान राजभाषा आयोग, 1956 द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के हिंदी संस्करण के पृष्ठ 153 पर पहले पैराग्राफ़ की अंतिम तीन पंक्तियों में व्यक्त विचार की ओर आकृष्ट करना चाहता हूं। आयोग ने कहा है, "प्रतियोगी परीक्षाएं ऐसी होनी चाहिए कि उनसे उम्मीदवारों की बौद्धिक योग्यता और अनुशासन की सामान्य परीक्षा ली जा सके। भाषा संबंधी योग्यता की परीक्षा पर अनुचित महत्व नहीं दिया जाना चाहिए।"
अतः संघ लोक सेवा आयोग अपने ऊपर लगे आरोप से बचने के लिए तकनीकी बहाने का आश्रय न ले। यह तो अंग्रेज़ी दंश का एक और ज्वलंत उदाहरण है।"
चितरंजन कुमार ने यूपीएससी की दलील को चनौती दी थी। अतः इस याचिका के प्रितिवादी की हैसियत से, यूपीएससी ने बॉम्बे हाई कोर्ट में दाखिल हलफ़नामे में कहा है कि इसके लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाई गई थी। इसकी सिफ़ारिशों के अनुसार उम्मीदवार ने भले ही मुख्य परीक्षा अंग्रेज़ी में दी हो लेकिन वह साक्षात्कार क्षेत्रीय भाषा में दे सकता है।
संघ लोक सेवा आयोग ने चितरंजन कुमार की याचिका पर हलफ़नामा दाखिल किया है।
संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में अब उम्मीदवार अपना इंटरव्यू भी क्षेत्रीय भाषा में दे सकेंगे। इससे पहले साक्षात्कार सिर्फ़ हिंदी या अंग्रेज़ी भाषा में दिया जा सकता है।
अंग्रेज़ी का घटता वर्चस्व और भारतीय भाषाओं के विकास का रास्ता प्रशस्त हो रहा है।
शनिवार, जुलाई 09, 2011
परिवर्तन क्या है?
परिवर्तन क्या है?
व्यक्ति (माइक्रो) समाज (मैक्रो) का हिस्सा है। आज जो समाज है वह कल नहीं था। इसका मतलब है कि कल के समाज में और आज के समाज में अंतर है। इसी अंतर को सामान्य अर्थ में परिवर्तन कहा जाता है। परिवर्तन को अनेक रूप से व्यक्त किया जा सकता है। सामान्य रूप से यह भी कहा जा सकता है कि नेमी जीवन से विचलन परिवर्तन है। सुरक्षा को किसी भी प्रकार का ख़तरा उत्पन्न होना भी परिवर्तन है। हमारी वर्तमान जीवन शैली में कोई भी बदलाव परिवर्तन है। यदि जीवन में अनायास रूप से कोई नुकसान उठाने के कारण कोई द्विविधा उत्पन्न हो जाए, कोई अनिश्चितता पैदा हो जाए तो उसके परिणाम स्वरूप उत्पन्न परिस्थिति परिवर्तन है। नुकसान उठाने के कारण प्राचीन विश्वास, प्रवृत्ति और मूल्यों के प्रति आस्था को चुनौती दिया जाना परिवर्तन है। आज यह आवाज़ उठ रही है कि हमारा कानून पुराना पड़ गया है। सामाजिक रूप से किए जा रहे सामूहिक व्यवहार (सोच) में बदलाव आना और उस सोच के परिणाम स्वरूप ढलने का प्रयास परिवर्तन कहलाता है। लीक से हटना परिवर्तन है। पहले से स्थापित मूल्यों में हलचल और बदलाव ही परिवर्तन कहलाता है। कोई भी नुकसान हो जाए तो उसके प्रति व्यक्त की गई प्रतिक्रिया के ढंग में आए बदलाव को परिवर्तन कहा जाता है। इस बदलते परिवेश में नई परिस्थितियों के कारण आए बदलाव में ढल जाने की प्रक्रिया परिवर्तन है। निरंतर उथल पुथल या स्थान परिवर्तन के कारण भी घरेलू जीवन में आने वाले अप्रत्याशित बदलाव से व्यक्ति के जीवन में अवांछित वास्तविकता का सामना करने के लिए तैयार होना परिवर्तन है। जीवन में जो नेमी नियम हम अपना रहे हैं उसके क्रम में बदलाव परिवर्तन है। परिवर्तन के परिणाम स्वरूप प्राथमिकताओं और सोच में बदलाव परिवर्तन है। असंतुलन जिसमें हम अपने बारे में अथवा बदले हुए हालात में ढलने के बारे में आश्वस्त न हों परिवर्तन है। परिणाम के साथ तारतम्यता बिठाने के लिए अपनी अंतरात्मा को पुकारना, अनप्रयुक्त संसाधनों को उपयोग में लाना परिवर्तन है।
जब जीवन में बदलाव की संभावना होती है तो लोग कैसा महसूस करने लग जाते हैं?
परिवर्तन की आशंका से मन में भय, निरुत्साह, चिंता, रोष, संभ्रम, कयास, प्रच्छन्न निरुत्साह, अवसाद, एकांत की इच्छा, आकुलता, उत्साह उत्पन्न होते हैं।
लोग बदलाव से कैसे बचना चाहते हैं?
जो लोग जीवन के हर मामले में परिवर्तन को टालना चाहते हैं वे किसी भी परिवर्तन को बिना कुछ सोचे समझे आवेशपूर्ण ढंग से उसे अस्वीकृत (indignant rejection) कर देते हैं। जब उस परिवर्तन और उसके लाभ के बारे में तर्क पूर्ण ढंग से उन्हें बताया जाता है तो वे तर्कपूर्ण आपत्ति (reasoned objection) उठाएंगे, चर्चा में भाग लेने से कतरेंगे और आपत्तियाँ उठाएंगे तथा परिवर्तन को टालने की हर संभव कोशिश करेंगे। उसके बाद भी जब उनकी आपत्तियों का निराकरण किया जाएगा तो वे तब भी उसे स्वीकार तो नहीं करेंगे परंतु उसका सशर्त विरोध (qualified oppostion) ज़रूर करेंगे। अस्थायी स्वीकृति (tentative acceptance) की स्थिति तब आती है जब पुनः परिवर्तन से होने वाले लाभ के बारे में बताया जाता है। सशर्त सहमति/स्वीकृति (qualified endorsement) की स्थिति तक पहुंचाने में बहुत मशक्कत करनी पड़ती है। जब परिवर्तन को स्वीकार करने की इस स्थिति तक पहुंच जाते हैं तो परिवर्तन से अधिकतम लाभ मिल सके इसके लिए परिवर्तन में तर्कसंगत संशोधन (judicious modification) को सुझाव मिलने लग जाते हैं। उसके बाद असुरक्षा की भावना कम होने लगती है और आत्म विश्वास में वृद्धि होने लगती है। यह बात बैंकिंग में कंप्यूटरी करण की प्रक्रिया से साबित हो जाती है। प्रारंभ में कर्मचारी यूनियनों के प्रतिनिधियों द्वारा बहुत विरोध किया गया परंतु उसके बाद निरंतर प्रयास और चर्चा के माध्यम से कंप्यूटरीकरण को लागू किया गया और आज कोई भी व्यक्ति अपने बैंक खाते से किसी भी कोने में रहते हुए धन निकाल सकता है।
परिवर्तन के बारे में अनौचित्यपूर्ण धारणा
परिवर्तन अच्छा नहीं होता है क्योंकि मानव स्वाभावतः परिवर्तन विरोधी होता है। परिवर्तन अहितकर है। मेरी ज़िंदग़ी में कोई भी परिवर्तन मेरे नियंत्रण को मेरे हाथ से निकाल देगा। हालाँकि मैं यह मैं जानता हूं कि परिवर्तन हितकर है फिर भी मैं अपनी जीवन शैली में परिवर्तन नहीं चाहता हूं। प्रकृति परिवर्तनशील होती है। जो प्रकृति के विपरीत जाने का प्रयास करते हैं उन्हें अंततः का कोप भाजन बनना पड़ता है। अतः परिवर्तन शाश्वत है और अपरिहार्य है।
परिवर्तन से तालमेल रखकर स्वीकार करने का लाभ
परिवर्तन के अनुकूल ढल जाने से वैयक्तिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास होता है। इससे निजी, पारिवारिक उत्पादकता बढ़ती है, जीवन की उपयोगिता के बार में दृष्टिकोण में बदलाव आता है, परिवर्तन के कारण खुलने वाले नए संसाधनों से समग्र रूप से विकास की संभावना में वृद्धि, हमारी आंतरिक शक्ति और ऊर्जा में वृद्धि होती है, मानसिक रूप से संतुष्टि आने से स्वास्थ्य में सुधार आता है जिसका राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव पड़ता है। जब समृद्धि आती है तो समाज में स्थिरता आती है, आत्म निर्भर्ता आती है, सोच में सकारात्मकता तथा दृष्टिकोण में व्यापकता आती है।
परिवर्तन स्वीकार करने के लिए उपाय
चरण 1 – उच्च स्तर पर नीतिगत निर्धारण करना होगा कि परिवर्तन क्या होगा? उसका स्वरूप क्या होगा? उससे क्या बदलाव आने वाला है? बदलाव की प्रक्रिया कैसी होगी? उसका अंततोगत्वा परिणाम क्या होगा? आदि का निर्धारण किया जाए और यह तय किया जाए कि परिवर्तन को स्वीकार करने के लिए निजी धारणा, मत, मनोवृत्ति अथवा व्यवहार में किस प्रकार के बदलाव की ज़रूरत होगी? इसमें वरिष्ठ कार्यपालकों के साथ गंभीर और गहन चर्चा की जानी चाहिए।
चरण 2 – जब नीतिगत निर्धारण के बाद वांछित परिवर्तन को लागू करने की योजना या चरण दर चरण कार्यान्वयन का कार्यक्रम बनाया जाए। एक समन्वयक नामित किया जाए और या चरण दर चरण कार्यान्वयन के कार्यक्रम को अंजाम देने के लिए उप समितियाँ बनाई जाएँ जो उपयुक्त निगरानी रखते हुए दैनिक समस्याओं का समाधान करेंगी तथा उसकी रिपोर्ट समन्वय समिति को देगी।
चरण 3 – अब परिवर्तन का पूरा खाका तैयार हो गया है। इसके बाद उसकी छवि बनाएं कि वांछित परिवर्तन के बाद अगला छह माह में विभाग/संस्था का स्वरूप ऐसा होगा। उस छवि में सभी कर्मियों की भूमिका, उनकी बदली हुई मनोवृत्ति की छवि का सफल अक्स नज़र आना चाहिए। उसका मूल्यांकन किया जाए, लोगों की प्रतिक्रिया प्राप्त की जाए और नज़र आई कमियों को दूर किया जाए। उसके बाद परिवर्तन को नियमित किया जाए और उस परिवर्तन के साथ आगे बढ़ जाए। समितियों को स्थायी रूप से आवधिक समीक्षा करते रहना सुनिश्चित करने लिए नियमित रूप से बैठक करते रहने की व्यवस्था की जाए।
चरण 5 – यदि इसके बाद भी परिवर्तन नहीं होता है तो इसका मतलब है कि आपने परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया है इसलिए मनोवृत्ति में वांछित बदलाव नहीं आया है। अतः नए सिरे से समाक्षा की जाए और पुनः प्रयास किया जाए।
वास्तविक उदाहरण
इस संदर्भ में हम देश की राजभाषा हिंदी को लागू करने को परिवर्तन मान कर समीक्षा करें तो हम पाते हैं कि नीति निर्धारण किया गया, कार्यान्वयन की योजना बनाई गई परंतु कार्यान्वयन की प्रणाली ठीक ढंग से या निष्ठापूर्वक काम नहीं की। अतः पुनरीक्षण की आवश्यकता है।
*******
व्यक्ति (माइक्रो) समाज (मैक्रो) का हिस्सा है। आज जो समाज है वह कल नहीं था। इसका मतलब है कि कल के समाज में और आज के समाज में अंतर है। इसी अंतर को सामान्य अर्थ में परिवर्तन कहा जाता है। परिवर्तन को अनेक रूप से व्यक्त किया जा सकता है। सामान्य रूप से यह भी कहा जा सकता है कि नेमी जीवन से विचलन परिवर्तन है। सुरक्षा को किसी भी प्रकार का ख़तरा उत्पन्न होना भी परिवर्तन है। हमारी वर्तमान जीवन शैली में कोई भी बदलाव परिवर्तन है। यदि जीवन में अनायास रूप से कोई नुकसान उठाने के कारण कोई द्विविधा उत्पन्न हो जाए, कोई अनिश्चितता पैदा हो जाए तो उसके परिणाम स्वरूप उत्पन्न परिस्थिति परिवर्तन है। नुकसान उठाने के कारण प्राचीन विश्वास, प्रवृत्ति और मूल्यों के प्रति आस्था को चुनौती दिया जाना परिवर्तन है। आज यह आवाज़ उठ रही है कि हमारा कानून पुराना पड़ गया है। सामाजिक रूप से किए जा रहे सामूहिक व्यवहार (सोच) में बदलाव आना और उस सोच के परिणाम स्वरूप ढलने का प्रयास परिवर्तन कहलाता है। लीक से हटना परिवर्तन है। पहले से स्थापित मूल्यों में हलचल और बदलाव ही परिवर्तन कहलाता है। कोई भी नुकसान हो जाए तो उसके प्रति व्यक्त की गई प्रतिक्रिया के ढंग में आए बदलाव को परिवर्तन कहा जाता है। इस बदलते परिवेश में नई परिस्थितियों के कारण आए बदलाव में ढल जाने की प्रक्रिया परिवर्तन है। निरंतर उथल पुथल या स्थान परिवर्तन के कारण भी घरेलू जीवन में आने वाले अप्रत्याशित बदलाव से व्यक्ति के जीवन में अवांछित वास्तविकता का सामना करने के लिए तैयार होना परिवर्तन है। जीवन में जो नेमी नियम हम अपना रहे हैं उसके क्रम में बदलाव परिवर्तन है। परिवर्तन के परिणाम स्वरूप प्राथमिकताओं और सोच में बदलाव परिवर्तन है। असंतुलन जिसमें हम अपने बारे में अथवा बदले हुए हालात में ढलने के बारे में आश्वस्त न हों परिवर्तन है। परिणाम के साथ तारतम्यता बिठाने के लिए अपनी अंतरात्मा को पुकारना, अनप्रयुक्त संसाधनों को उपयोग में लाना परिवर्तन है।
जब जीवन में बदलाव की संभावना होती है तो लोग कैसा महसूस करने लग जाते हैं?
परिवर्तन की आशंका से मन में भय, निरुत्साह, चिंता, रोष, संभ्रम, कयास, प्रच्छन्न निरुत्साह, अवसाद, एकांत की इच्छा, आकुलता, उत्साह उत्पन्न होते हैं।
लोग बदलाव से कैसे बचना चाहते हैं?
जो लोग जीवन के हर मामले में परिवर्तन को टालना चाहते हैं वे किसी भी परिवर्तन को बिना कुछ सोचे समझे आवेशपूर्ण ढंग से उसे अस्वीकृत (indignant rejection) कर देते हैं। जब उस परिवर्तन और उसके लाभ के बारे में तर्क पूर्ण ढंग से उन्हें बताया जाता है तो वे तर्कपूर्ण आपत्ति (reasoned objection) उठाएंगे, चर्चा में भाग लेने से कतरेंगे और आपत्तियाँ उठाएंगे तथा परिवर्तन को टालने की हर संभव कोशिश करेंगे। उसके बाद भी जब उनकी आपत्तियों का निराकरण किया जाएगा तो वे तब भी उसे स्वीकार तो नहीं करेंगे परंतु उसका सशर्त विरोध (qualified oppostion) ज़रूर करेंगे। अस्थायी स्वीकृति (tentative acceptance) की स्थिति तब आती है जब पुनः परिवर्तन से होने वाले लाभ के बारे में बताया जाता है। सशर्त सहमति/स्वीकृति (qualified endorsement) की स्थिति तक पहुंचाने में बहुत मशक्कत करनी पड़ती है। जब परिवर्तन को स्वीकार करने की इस स्थिति तक पहुंच जाते हैं तो परिवर्तन से अधिकतम लाभ मिल सके इसके लिए परिवर्तन में तर्कसंगत संशोधन (judicious modification) को सुझाव मिलने लग जाते हैं। उसके बाद असुरक्षा की भावना कम होने लगती है और आत्म विश्वास में वृद्धि होने लगती है। यह बात बैंकिंग में कंप्यूटरी करण की प्रक्रिया से साबित हो जाती है। प्रारंभ में कर्मचारी यूनियनों के प्रतिनिधियों द्वारा बहुत विरोध किया गया परंतु उसके बाद निरंतर प्रयास और चर्चा के माध्यम से कंप्यूटरीकरण को लागू किया गया और आज कोई भी व्यक्ति अपने बैंक खाते से किसी भी कोने में रहते हुए धन निकाल सकता है।
परिवर्तन के बारे में अनौचित्यपूर्ण धारणा
परिवर्तन अच्छा नहीं होता है क्योंकि मानव स्वाभावतः परिवर्तन विरोधी होता है। परिवर्तन अहितकर है। मेरी ज़िंदग़ी में कोई भी परिवर्तन मेरे नियंत्रण को मेरे हाथ से निकाल देगा। हालाँकि मैं यह मैं जानता हूं कि परिवर्तन हितकर है फिर भी मैं अपनी जीवन शैली में परिवर्तन नहीं चाहता हूं। प्रकृति परिवर्तनशील होती है। जो प्रकृति के विपरीत जाने का प्रयास करते हैं उन्हें अंततः का कोप भाजन बनना पड़ता है। अतः परिवर्तन शाश्वत है और अपरिहार्य है।
परिवर्तन से तालमेल रखकर स्वीकार करने का लाभ
परिवर्तन के अनुकूल ढल जाने से वैयक्तिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास होता है। इससे निजी, पारिवारिक उत्पादकता बढ़ती है, जीवन की उपयोगिता के बार में दृष्टिकोण में बदलाव आता है, परिवर्तन के कारण खुलने वाले नए संसाधनों से समग्र रूप से विकास की संभावना में वृद्धि, हमारी आंतरिक शक्ति और ऊर्जा में वृद्धि होती है, मानसिक रूप से संतुष्टि आने से स्वास्थ्य में सुधार आता है जिसका राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव पड़ता है। जब समृद्धि आती है तो समाज में स्थिरता आती है, आत्म निर्भर्ता आती है, सोच में सकारात्मकता तथा दृष्टिकोण में व्यापकता आती है।
परिवर्तन स्वीकार करने के लिए उपाय
चरण 1 – उच्च स्तर पर नीतिगत निर्धारण करना होगा कि परिवर्तन क्या होगा? उसका स्वरूप क्या होगा? उससे क्या बदलाव आने वाला है? बदलाव की प्रक्रिया कैसी होगी? उसका अंततोगत्वा परिणाम क्या होगा? आदि का निर्धारण किया जाए और यह तय किया जाए कि परिवर्तन को स्वीकार करने के लिए निजी धारणा, मत, मनोवृत्ति अथवा व्यवहार में किस प्रकार के बदलाव की ज़रूरत होगी? इसमें वरिष्ठ कार्यपालकों के साथ गंभीर और गहन चर्चा की जानी चाहिए।
चरण 2 – जब नीतिगत निर्धारण के बाद वांछित परिवर्तन को लागू करने की योजना या चरण दर चरण कार्यान्वयन का कार्यक्रम बनाया जाए। एक समन्वयक नामित किया जाए और या चरण दर चरण कार्यान्वयन के कार्यक्रम को अंजाम देने के लिए उप समितियाँ बनाई जाएँ जो उपयुक्त निगरानी रखते हुए दैनिक समस्याओं का समाधान करेंगी तथा उसकी रिपोर्ट समन्वय समिति को देगी।
चरण 3 – अब परिवर्तन का पूरा खाका तैयार हो गया है। इसके बाद उसकी छवि बनाएं कि वांछित परिवर्तन के बाद अगला छह माह में विभाग/संस्था का स्वरूप ऐसा होगा। उस छवि में सभी कर्मियों की भूमिका, उनकी बदली हुई मनोवृत्ति की छवि का सफल अक्स नज़र आना चाहिए। उसका मूल्यांकन किया जाए, लोगों की प्रतिक्रिया प्राप्त की जाए और नज़र आई कमियों को दूर किया जाए। उसके बाद परिवर्तन को नियमित किया जाए और उस परिवर्तन के साथ आगे बढ़ जाए। समितियों को स्थायी रूप से आवधिक समीक्षा करते रहना सुनिश्चित करने लिए नियमित रूप से बैठक करते रहने की व्यवस्था की जाए।
चरण 5 – यदि इसके बाद भी परिवर्तन नहीं होता है तो इसका मतलब है कि आपने परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया है इसलिए मनोवृत्ति में वांछित बदलाव नहीं आया है। अतः नए सिरे से समाक्षा की जाए और पुनः प्रयास किया जाए।
वास्तविक उदाहरण
इस संदर्भ में हम देश की राजभाषा हिंदी को लागू करने को परिवर्तन मान कर समीक्षा करें तो हम पाते हैं कि नीति निर्धारण किया गया, कार्यान्वयन की योजना बनाई गई परंतु कार्यान्वयन की प्रणाली ठीक ढंग से या निष्ठापूर्वक काम नहीं की। अतः पुनरीक्षण की आवश्यकता है।
*******
शनिवार, जुलाई 02, 2011
हर हिंदुस्तानी से अनुरोध
डॉ. अब्दुल कलाम ने एक बार मीडिया से कहा था कि आप लोग हमेशा नकारात्मक बातों को ही उछालते हैं जब कि देश में इतनी अच्छी बातें हैं जिनका प्रचार नहीं हो पाता है। हम लोग कई मायने में नंबर एक हैं परंतु उनको बताने से परहेज़ करते हैं। कई बातें ऐसी हैं जिन्हें हम फ़ख़्र से कह सकते हैं परंतु हम उनसे मुँह मोड़ लेते हैं। हम दूध उत्पादन में, विश्व में नंबर एक हैं और आयुर्वेद में दूध को अमृत के समान बताए जाने के बावज़ूद आज किसी विचलित व्यक्ति के अनुसंधान के आधार पर कहने लगे हैं कि दूध स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। हमें शर्म महसूस होती है यदि हम यह कहें कि हमें अंग्रेज़ी नहीं आती और गर्व अनुभव करते हैं जब यह कहते हैं कि हमें हिंदी नहीं आती। लेकिन हमें आता क्या है? अभी दो दिन पूर्व, बी.एस. पाबला के ब्लॉग ज़िंदगी के मेले पर एक सत्य घटना का ज़िक्र था कि एमबीए पास छात्र से एक साक्षात्कार में पूछ गया कि वाटर हारवेस्टिंग क्या है? उसका जवाब था पानी से जो खेती की जाती है उसे वाटर हारवेस्टिंग कहते हैं। दूसरा प्रश्न था कि गुड़ कैसे बनता है? उसका जवाब था चीनी घोलकर उससे गुड़ बनाया जाता है। ऐसे ही और भी प्रश्न पूछे गए थे परंतु किसी भी प्रश्न का उत्तर सही नहीं मिला।
क्या कलाम साहब का सवाल ऐसे ही मीडिया वालों से था जो यथार्थ से परे निराधार या अव्यावहारिक बात करते हैं। कुएं में बैल गिर जाए तो माडिया वाले वैन लेकर तब तक डटे रहते हैं जब तक कि बैल बाहर न निकाल लिया जाए। परंतु माडिया वाले किसी भी ऐसी खबर पर ध्यान नहीं देंगे जब तक को उनको न लगे कि उस खबर से उनको लाभ नहीं मिलने वाला है। बाढ़ की विभीषिका का दृश्य तो दिखा देंगे परंतु उसके बाद की तबाही और पीड़ित लोगों के दुःखों का निवारण हुआ कि नहीं उसका अनुवर्तन (फ़ॉलोअप) नहीं करेंगे। मीडिया चूज़ी, मौकापरस्त और पक्षपाती हो गई है। अन्ना हज़ारे को तो कवरेज देगी, स्वामी निगमानंद को नहीं। राज ठाकरे को तो तरज़ीह देगी परंतु उनके साथियों द्वारा सताए गए लोगों को न्याय दिलाने में समय नहीं देगी। लंबी सूची है। कहा तक गिनाएं?
सरकार अक्षम है, हमारा कानून पुराना पड़ गया है, नगर पालिका कचरा नहीं उठाती, फ़ोन काम नहीं करता, रेलगाड़ियाँ समय पर नहीं चलती हैं, एयर लाइनें ठीक से नहीं चल रही हैं, डाक समय से नहीं पहुंचती है, कुरियर कंपनियाँ खूब ऐंठकर पैसा लेने के बावज़ूद समय पर डिलिवरी नहीं करती हैं, ऐसी तमाम शिकायतें हैं जिनसे रोज़ दो चार होते हैं। हम टीवी के सामने खड़े होकर ट्रैफ़िक पुलिस पर उंगली उठाते हैं लेकिन उसकी मजबूरी और कानून की तरफ़ ध्यान ही नहीं देते। सिग्नल तोड़ देते हैं या पीयूसी नहीं कराते हैं, ग़लत साइड से आते हैं तब पुलिस की नज़र में आने पर बचने की कोशिश करते हैं, उससे बहस करते हैं और जब सफलता नहीं मिलती तो अनैतिक तरीका अपना कर उसे भ्रष्ट बनाने का प्रयास भी करते हैं तथा बाद में पुलिस वाले को ही कोसते हैं। क्या ये सब नैतिक है? क्या इन सब के हल के लिए अन्ना जी या बाबा रामदेव ज़िम्मेदार हैं जिन्हें आगे करके हम लड़ना चाहते हैं? हम विदेश यात्रा पर जाते हैं और एयर पोर्ट पर उतरते ही सजग हो जाते हैं कि किसी भी प्रकार से कानून का उल्लंघन न हो। न तो सिगरेट पिएंगे और न ही उसका टुकड़ा, चॉकलेट का रैपर, केले का छिलका फेंकेंगे। सिंगापुर में यदि कार चला रहे हैं तो सेफ़्टी बेल्ट ज़रूर लगाएंगे, स्पीड भी सीमा में रखेंगे, स्कूटर या मोबाइक चलाएंगे तो हेल्मेट भी लगाएंगे। परंतु अपने देश में पुलिस वाले की मौजूदगी देखकर कर ही ये सारे संयम रखेंगे वरना आँख बचाकर निकल ही जाएंगे। तो ऐसे में कानून क्या करेगा और क्या करेंगे कानून के रखवाले? दोष किसका? भ्रष्टाचार की खिलाफ़त कहाँ गई? END is not end. इसे मान जाए कि Effort Never Dies अतः "BE POSITIVE". सकारात्मक होकर बेहतर करने में अपना योगदान दें। सामाजिक समरसता बनाने में पहल करें। अच्छा अपने आप दिखने लगेगा यदि हम भ्रष्टाचार में आहुति डालने की बजाय उनमें शामिल न हों। किसी भी समाज विरोधी गति विधि में शामिल होना भी भ्रष्टाचार है।
क्या कलाम साहब का सवाल ऐसे ही मीडिया वालों से था जो यथार्थ से परे निराधार या अव्यावहारिक बात करते हैं। कुएं में बैल गिर जाए तो माडिया वाले वैन लेकर तब तक डटे रहते हैं जब तक कि बैल बाहर न निकाल लिया जाए। परंतु माडिया वाले किसी भी ऐसी खबर पर ध्यान नहीं देंगे जब तक को उनको न लगे कि उस खबर से उनको लाभ नहीं मिलने वाला है। बाढ़ की विभीषिका का दृश्य तो दिखा देंगे परंतु उसके बाद की तबाही और पीड़ित लोगों के दुःखों का निवारण हुआ कि नहीं उसका अनुवर्तन (फ़ॉलोअप) नहीं करेंगे। मीडिया चूज़ी, मौकापरस्त और पक्षपाती हो गई है। अन्ना हज़ारे को तो कवरेज देगी, स्वामी निगमानंद को नहीं। राज ठाकरे को तो तरज़ीह देगी परंतु उनके साथियों द्वारा सताए गए लोगों को न्याय दिलाने में समय नहीं देगी। लंबी सूची है। कहा तक गिनाएं?
सरकार अक्षम है, हमारा कानून पुराना पड़ गया है, नगर पालिका कचरा नहीं उठाती, फ़ोन काम नहीं करता, रेलगाड़ियाँ समय पर नहीं चलती हैं, एयर लाइनें ठीक से नहीं चल रही हैं, डाक समय से नहीं पहुंचती है, कुरियर कंपनियाँ खूब ऐंठकर पैसा लेने के बावज़ूद समय पर डिलिवरी नहीं करती हैं, ऐसी तमाम शिकायतें हैं जिनसे रोज़ दो चार होते हैं। हम टीवी के सामने खड़े होकर ट्रैफ़िक पुलिस पर उंगली उठाते हैं लेकिन उसकी मजबूरी और कानून की तरफ़ ध्यान ही नहीं देते। सिग्नल तोड़ देते हैं या पीयूसी नहीं कराते हैं, ग़लत साइड से आते हैं तब पुलिस की नज़र में आने पर बचने की कोशिश करते हैं, उससे बहस करते हैं और जब सफलता नहीं मिलती तो अनैतिक तरीका अपना कर उसे भ्रष्ट बनाने का प्रयास भी करते हैं तथा बाद में पुलिस वाले को ही कोसते हैं। क्या ये सब नैतिक है? क्या इन सब के हल के लिए अन्ना जी या बाबा रामदेव ज़िम्मेदार हैं जिन्हें आगे करके हम लड़ना चाहते हैं? हम विदेश यात्रा पर जाते हैं और एयर पोर्ट पर उतरते ही सजग हो जाते हैं कि किसी भी प्रकार से कानून का उल्लंघन न हो। न तो सिगरेट पिएंगे और न ही उसका टुकड़ा, चॉकलेट का रैपर, केले का छिलका फेंकेंगे। सिंगापुर में यदि कार चला रहे हैं तो सेफ़्टी बेल्ट ज़रूर लगाएंगे, स्पीड भी सीमा में रखेंगे, स्कूटर या मोबाइक चलाएंगे तो हेल्मेट भी लगाएंगे। परंतु अपने देश में पुलिस वाले की मौजूदगी देखकर कर ही ये सारे संयम रखेंगे वरना आँख बचाकर निकल ही जाएंगे। तो ऐसे में कानून क्या करेगा और क्या करेंगे कानून के रखवाले? दोष किसका? भ्रष्टाचार की खिलाफ़त कहाँ गई? END is not end. इसे मान जाए कि Effort Never Dies अतः "BE POSITIVE". सकारात्मक होकर बेहतर करने में अपना योगदान दें। सामाजिक समरसता बनाने में पहल करें। अच्छा अपने आप दिखने लगेगा यदि हम भ्रष्टाचार में आहुति डालने की बजाय उनमें शामिल न हों। किसी भी समाज विरोधी गति विधि में शामिल होना भी भ्रष्टाचार है।
गुरुवार, जून 09, 2011
भ्रष्टाचार की परिभाषा
जो चीज़ अत्यधिक व्यापक हो जाती है उसकी परिभाषा देना उतना ही मुश्किल होता है। परंतु तर्कशास्त्र के आधार पर इसे सिद्ध किया जा सकता है। जैसे ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है परंतु किसी को दिखाई नहीं देता है। लेकिन है। इसी तर्क पर भ्रष्टाचार को भी सिद्ध किया जा सकता है कि वह है। कहाँ है? कैसा दिखता है? उसका स्वरूप क्या है? आइए इसी आधार पर कुछ कोशिश की जाए कि भ्रष्टाचार किसे कहते हैं? जब एक बार रोग के लक्षणों के आधार पर इसका निदान हो जाए तो इलाज भी किया जा सकेगा।
भ्रष्टाचार के लक्षणों की पहचान करने के लिए अपने कुछ हम सोच वाले साथियों के साथ चर्चा की और यह तय किया गया कि हर व्यक्ति भ्रष्टाचार के एक लक्षण की पहचान करेगा और फिर समूह चर्चा के दौरान उसे बताएगा। इस निर्णय के बाद हम सब इस असाध्य काम में लग गए।
अपने-अपने असाइनमेंट को पूरा करने के बाद हम सब जब इकट्ठा हुए तो एक-एक करके अपने शोध परक विचार प्रस्तुत करने के लिए अपने बीच से ही एक संयोजक मनोनीत किए। फिर उसके समक्ष प्रस्तुतीकरण का सत्र शुरू हुआ। पहले शोधकर्ता ने संयोजक को संबोधित करते हुए आभार व्यक्त किया कि मुझे इस गुरुतर कार्य में योगदान करने का अवसर दिया गया और उसके बाद उन्होंने दार्शनिक की मुद्रा में कहा कि जहाँ तक हमारी दृष्टि गई हमें भ्रष्टाचार नज़र आया। संयोजक ने तुरंत टोका कि हमें तो भ्रष्टाचार को पहले परिभाषित करना है। हमें तो यही नहीं मालूम कि भ्रष्टाचार है क्या? अतः पहले भ्रष्टाचार के लक्षण तो बताएँ। उन लक्षणों में से निचोड़कर परिभाषा देना तो संयोजक का काम है। इसलिए आप भ्रष्टाचार के लक्षण गिनाएँ।
इसके बाद प्रथम पुरुष ने अपनी दूर और व्यापक दृष्टि को थोड़ा संकुचित किया तथा छोटे दायरे में भ्रष्टाचार के लक्षण खोजने की कोशिश की एवं बहुत कोशिश करके नेताओं के अंदाज़ में कहा कि भ्रष्टाचार समाज में लगा दीमक है जो समाज की जड़ को खोखला कर रहा है। संयोजक ने फिर टोका कि भ्रष्टाचार क्या है? इस बार कुछ और संकुचित हुए और किसी बुद्धिजीवी के रूप में थोड़ा संयत हुए और बोले कि भ्रष्टाचार को परिभाषित करने के लिए हमें कार्ल मार्क्स, लेनिन, नेहरू, लोहिया आदि के साहित्य का अध्ययन करना चाहिए और भ्रष्टाचार की परिभाषा वैश्वीकरण, सूचना प्रौद्योगिकी के विस्तार के संदर्भ में संशोधित करके नियत करना चाहिए। अब संयोजक को लगने लगा कि ये सज्जन हमें भटकाने का प्रयास कर रहे हैं। अतः उनसे कहा कि यह आपके लिए अंतिम अवसर है। यदि इस बार भ्रष्टाचार के लक्षण नहीं बताएँगे तो हम समय नष्ट नहीं करेंगे और अगले शोधकर्ता को आमंत्रित करेंगे। अब उस सज्जन ने अपने अंतिम प्रयास में आम आदमा की तरह भ्रष्टाचार के लक्षण को परिभाषित करने का प्रयास किया और बताया कि "ईमानदारी, सदाचार, नैतिक सिद्धांतों का ह्रास होना भ्रष्टाचार है।" लोगों ने तालियाँ बजाईं और बधाई दी कि वाह क्या मौलिक परिभाषा दी है भ्रष्टाचार की।
इसके बाद संयोजक ने द्वितीय पुरुष से कहा आप भ्रष्टाचार की अपनी परिभाषा दें। इस सज्जन के दिमाग़ में, विषयांतर होने पर संयोजक के टोकने की बात ताज़ा थी अतः बोले कि मैं सीधे ही परिभाषा पर आता हूँ। एक दूसरे शोधकर्ता ने टिप्पणी की कि यह कहने की क्या आवश्यकता है? सीधे ही परिभाषा पर आइए न। सज्जन ने कहा कि ठीक है ठीक है परिभाषा पर ही आता हूँ। अतः उन्होंने कहा कि "शुद्धता या ईमानदारी की हानि, दुष्टता की ओर झुकाव और अशुद्धता एवं रिश्वतखोरी ही भ्रष्टाचार है।" लोगों ने तालियाँ बजाईं और बधाई दी कि परिभाषा में नए आयाम जोड़े हैं।
इसके बाद संयोजक ने तृतीय पुरुष से कहा आप भ्रष्टाचार की अपनी परिभाषा दें। इस सज्जन ने कोई भूमिका नहीं बाँधी और सीधे ही कहा कि "शुद्ध, सरल या सही से च्युत होना, अच्छे से बदलकर बुरा बनना ही भ्रष्टाचार है।" लोगों ने तालियाँ बजाईं और बधाई दी कि आम आदमी की समझ में आने वाली परिभाषा दी है भ्रष्टाचार की। संयोजक को समझ में नहीं आया कि लोग किस बात की तारीफ़ कर रहे हैं? इन परिभाषाओं से तो मुझे ही नहीं समझ में आया कि भ्रष्टाचार क्या है तो आम आदमी को क्या समझ में आएगा कि भ्रष्टाचार क्या है?
इसके बाद संयोजक ने चतुर्थ पुरुष से कहा आप भ्रष्टाचार की अपनी परिभाषा दें। इस सज्जन ने भ्रष्टाचार की परिभाषा इस प्रकार की - "अनुचित साधन (रिश्वत के रूप में) द्वारा प्रलोभन देकर, लोक सेवक को कर्तव्य का उल्लंघन करने (घोर अपराध करने) के लिए प्रेरित करना भ्रष्टाचार है।" इस बार संयोजक कुछ संतुष्ट नज़र आए। लोगों ने तालियाँ बजाईं और बधाई दी।
इसके बाद संयोजक ने पंचम पुरुष से कहा आप भ्रष्टाचार की अपनी परिभाषा दें। पंचम पुरुष से कहा कि "किसी साधन या कृत्य द्वारा, किसी किन्हीं लोगों की ईमानदारी या निष्ठा को कम करना, ग्रामीण भोलेपन की प्रवृत्ति को समाप्त करने का प्रयास करना ही भ्रष्टाचार है।" इस बार भी संयोजक को लगा कि भ्रष्टाचार की परिभाषा कुछ समझ में आने वाली नहीं है और असंतुष्ट नज़र आए। फिर भी इस बार उन्होंने भी ताली बजाई और बधाई दी क्योंकि यह अंतिम शोधकर्ता था। इसके बाद उन्होंने कहा कि इन सब लक्षणों का समावेश करते हुए आसान, सर्व समावेशी और तर्क संगत परिभाषा बाद में घोषित करूंगा और बैठक बर्ख़ास्त कर दी।
चारों ओर भ्रष्टाचार का शोर है। सदाचार और नैतिकता का ज़ोर है। फिर भी बरकत नहीं है क्योंकि नीयत की खराबी है। अब इन लक्षणों से भ्रष्टाचार की परिभाषा आप कर सकते हों तो इसे सिविल सोसायटी के पास भेज दिया जाए ताकि लोकपाल विधेयक में संशोधन किया जा सके।
*****
भ्रष्टाचार के लक्षणों की पहचान करने के लिए अपने कुछ हम सोच वाले साथियों के साथ चर्चा की और यह तय किया गया कि हर व्यक्ति भ्रष्टाचार के एक लक्षण की पहचान करेगा और फिर समूह चर्चा के दौरान उसे बताएगा। इस निर्णय के बाद हम सब इस असाध्य काम में लग गए।
अपने-अपने असाइनमेंट को पूरा करने के बाद हम सब जब इकट्ठा हुए तो एक-एक करके अपने शोध परक विचार प्रस्तुत करने के लिए अपने बीच से ही एक संयोजक मनोनीत किए। फिर उसके समक्ष प्रस्तुतीकरण का सत्र शुरू हुआ। पहले शोधकर्ता ने संयोजक को संबोधित करते हुए आभार व्यक्त किया कि मुझे इस गुरुतर कार्य में योगदान करने का अवसर दिया गया और उसके बाद उन्होंने दार्शनिक की मुद्रा में कहा कि जहाँ तक हमारी दृष्टि गई हमें भ्रष्टाचार नज़र आया। संयोजक ने तुरंत टोका कि हमें तो भ्रष्टाचार को पहले परिभाषित करना है। हमें तो यही नहीं मालूम कि भ्रष्टाचार है क्या? अतः पहले भ्रष्टाचार के लक्षण तो बताएँ। उन लक्षणों में से निचोड़कर परिभाषा देना तो संयोजक का काम है। इसलिए आप भ्रष्टाचार के लक्षण गिनाएँ।
इसके बाद प्रथम पुरुष ने अपनी दूर और व्यापक दृष्टि को थोड़ा संकुचित किया तथा छोटे दायरे में भ्रष्टाचार के लक्षण खोजने की कोशिश की एवं बहुत कोशिश करके नेताओं के अंदाज़ में कहा कि भ्रष्टाचार समाज में लगा दीमक है जो समाज की जड़ को खोखला कर रहा है। संयोजक ने फिर टोका कि भ्रष्टाचार क्या है? इस बार कुछ और संकुचित हुए और किसी बुद्धिजीवी के रूप में थोड़ा संयत हुए और बोले कि भ्रष्टाचार को परिभाषित करने के लिए हमें कार्ल मार्क्स, लेनिन, नेहरू, लोहिया आदि के साहित्य का अध्ययन करना चाहिए और भ्रष्टाचार की परिभाषा वैश्वीकरण, सूचना प्रौद्योगिकी के विस्तार के संदर्भ में संशोधित करके नियत करना चाहिए। अब संयोजक को लगने लगा कि ये सज्जन हमें भटकाने का प्रयास कर रहे हैं। अतः उनसे कहा कि यह आपके लिए अंतिम अवसर है। यदि इस बार भ्रष्टाचार के लक्षण नहीं बताएँगे तो हम समय नष्ट नहीं करेंगे और अगले शोधकर्ता को आमंत्रित करेंगे। अब उस सज्जन ने अपने अंतिम प्रयास में आम आदमा की तरह भ्रष्टाचार के लक्षण को परिभाषित करने का प्रयास किया और बताया कि "ईमानदारी, सदाचार, नैतिक सिद्धांतों का ह्रास होना भ्रष्टाचार है।" लोगों ने तालियाँ बजाईं और बधाई दी कि वाह क्या मौलिक परिभाषा दी है भ्रष्टाचार की।
इसके बाद संयोजक ने द्वितीय पुरुष से कहा आप भ्रष्टाचार की अपनी परिभाषा दें। इस सज्जन के दिमाग़ में, विषयांतर होने पर संयोजक के टोकने की बात ताज़ा थी अतः बोले कि मैं सीधे ही परिभाषा पर आता हूँ। एक दूसरे शोधकर्ता ने टिप्पणी की कि यह कहने की क्या आवश्यकता है? सीधे ही परिभाषा पर आइए न। सज्जन ने कहा कि ठीक है ठीक है परिभाषा पर ही आता हूँ। अतः उन्होंने कहा कि "शुद्धता या ईमानदारी की हानि, दुष्टता की ओर झुकाव और अशुद्धता एवं रिश्वतखोरी ही भ्रष्टाचार है।" लोगों ने तालियाँ बजाईं और बधाई दी कि परिभाषा में नए आयाम जोड़े हैं।
इसके बाद संयोजक ने तृतीय पुरुष से कहा आप भ्रष्टाचार की अपनी परिभाषा दें। इस सज्जन ने कोई भूमिका नहीं बाँधी और सीधे ही कहा कि "शुद्ध, सरल या सही से च्युत होना, अच्छे से बदलकर बुरा बनना ही भ्रष्टाचार है।" लोगों ने तालियाँ बजाईं और बधाई दी कि आम आदमी की समझ में आने वाली परिभाषा दी है भ्रष्टाचार की। संयोजक को समझ में नहीं आया कि लोग किस बात की तारीफ़ कर रहे हैं? इन परिभाषाओं से तो मुझे ही नहीं समझ में आया कि भ्रष्टाचार क्या है तो आम आदमी को क्या समझ में आएगा कि भ्रष्टाचार क्या है?
इसके बाद संयोजक ने चतुर्थ पुरुष से कहा आप भ्रष्टाचार की अपनी परिभाषा दें। इस सज्जन ने भ्रष्टाचार की परिभाषा इस प्रकार की - "अनुचित साधन (रिश्वत के रूप में) द्वारा प्रलोभन देकर, लोक सेवक को कर्तव्य का उल्लंघन करने (घोर अपराध करने) के लिए प्रेरित करना भ्रष्टाचार है।" इस बार संयोजक कुछ संतुष्ट नज़र आए। लोगों ने तालियाँ बजाईं और बधाई दी।
इसके बाद संयोजक ने पंचम पुरुष से कहा आप भ्रष्टाचार की अपनी परिभाषा दें। पंचम पुरुष से कहा कि "किसी साधन या कृत्य द्वारा, किसी किन्हीं लोगों की ईमानदारी या निष्ठा को कम करना, ग्रामीण भोलेपन की प्रवृत्ति को समाप्त करने का प्रयास करना ही भ्रष्टाचार है।" इस बार भी संयोजक को लगा कि भ्रष्टाचार की परिभाषा कुछ समझ में आने वाली नहीं है और असंतुष्ट नज़र आए। फिर भी इस बार उन्होंने भी ताली बजाई और बधाई दी क्योंकि यह अंतिम शोधकर्ता था। इसके बाद उन्होंने कहा कि इन सब लक्षणों का समावेश करते हुए आसान, सर्व समावेशी और तर्क संगत परिभाषा बाद में घोषित करूंगा और बैठक बर्ख़ास्त कर दी।
चारों ओर भ्रष्टाचार का शोर है। सदाचार और नैतिकता का ज़ोर है। फिर भी बरकत नहीं है क्योंकि नीयत की खराबी है। अब इन लक्षणों से भ्रष्टाचार की परिभाषा आप कर सकते हों तो इसे सिविल सोसायटी के पास भेज दिया जाए ताकि लोकपाल विधेयक में संशोधन किया जा सके।
*****
सोमवार, जून 06, 2011
भवन निर्माण की तकनीक में `इंटेलिजेंट बिल्डिंग्स' (अर्थप्रद भवन) और `इंटेलिजेंट होम्स'
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर ऊर्जा बचत और ग्रीन हाउस की संकल्पना पर लेख। डॉ. दलसिंगार यादव द्वारा लिखित, राष्ट्रीय आवास बैंक द्वारा पुरस्कृत लेख है।)
भवन निर्माण की तकनीक में `इंटेलिजेंट बिल्डिंग्स' (अर्थप्रद भवन) और `इंटेलिजेंट होम्स' ऐसी संकल्पनाएं (कांसेप्ट) हैं जिनमें सिविल इंजिनियरिडग, इलेक्ट्रॉनिकी, विद्युत विज्ञान, ऊर्जा संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण, सुरक्षा के प्रवेश नियंत्रण (एक्सेस कंट्रोल), दृश्यश्रव्य व मनोरंजन प्रणाली, वायु आवागमन, पानी की सफाई, उपयोग में लाए गए पानी की सफाई व उनका पुनः उपयोग, कूड़ा कचरा निपटान आदि का स्वचालित ढंग से अंजाम देने जैसे अनेक पहलू शामिल हैं। इन्फ्रास्ट्रक्चर (आधारभूत कार्य ढांचा) में बुनियादी ज़रूरतों की वे सभी व्यवस्था शामिल हैं जो सुगम, स्वस्थ एवं शांतिपूर्वक जीवन यापन के लिए ज़रूरी हैं। अतः भवन निर्माण के लिए स्थल विकास से शुरू करके भवन निर्माण के बाद उसमें नियमित कार्यव्यापार प्रारंभ हो जाने और उसके सतत उपयोग तक की बातों का ध्यान रखना पड़ता है। अतः इस संदर्भ में इस लेख की संकल्पना तीन शब्दों, `इंटेलिजेंट', `अर्बन बिल्डिंग्स' तथा `इन्फ्रास्ट्रक्चर' में समाहित है। ये तीनों शब्द मूलतः आधुनिक प्रौद्योगिकी से संबंधित हैं।
इंटेलिजेंट बिल्डिंग यानी कि उसमें आधुनिकतम स्वचालित सूचना प्रौद्योगिकी का इष्टतम उपयोग हो। उसमें लगे गैजेट और अन्य युक्तियां, आधुनिक विज्ञान के चमत्कार की भांति हों। प्रौद्योगिकी के बारे में `इंटेलिजेंट' शब्द के प्रयोग का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। यह शब्द तब प्रयोग में आया जबकि बुद्धिमान मानव ने अपना मेकैनिकल काम जो पुनरावृत्ति (रेपिटेटिव) स्वरूप का होता है उसे स्वचालित रूप से, तीव्र गति से तथा परिशुद्धता पूर्वक करते रहने की प्रक्रिया को अंजाम देने के लिए युक्तियों (डिवाइसेज़) का निर्माण किया। इस संबंध में `इंटेलिजेंट' वह होता है जिसमें किसी जानकारी या आंकड़े की प्रोसेसिंग (संसाधित) करने की क्षमता होती है। प्रोसेसिंग वही करेगा जिसमें प्रोसेसर लगा होगा। प्रोसेसर वह कृत्रिम युक्ति है जो कंप्यूटर विज्ञान के आधार पर एकीकृत परिपथ बोर्ड (इंटीग्रेटेड सर्किट बोर्ड) पर छापे गए अनुदेशों को पढ़ने तथा उसे अनुभाषित (कंपाइल) करके कार्रवाई करने की क्षमता हो। किसी भी स्मार्ट युक्ति का मतलब होता है - वह उपकरण जिसमें भंडारित जानकारी या अनुदेश के आधार पर प्रोसेसिंग करके परिणाम निकालना तथा उसके अनुसार काम को अंजाम देना। अतः इस विषय के संदर्भ में, शहरों में बनने वाले भवनों में `इंटेलिजेंट' युक्तियों का उपयोग तथा बुनियादी ढांचों की आवश्यकता पर आगे विभिन्न उपशीर्षों में चर्चा की जा रही है।
शहरीकरण की प्रवृत्ति और जनित समस्याएं
शहरीकरण का दायरा पूरे विश्व में बढ़ रहा है। वास्तव में यह वृद्धि बीसवीं सदी में अभूतपूर्व घटना है। सन् 1990 तक विश्व की केवल 29.8 1 प्रतिशत जन संख्या शहरी क्षेत्रों में निवास करती थी जो सन् 2000 में 47.2 प्रतिशत हो गई तथा सन् 2030 में 60.2 प्रतिशत हो जाने का अनुमान है। अतः बीसवीं सदी में अभूतपूर्व तरीके से शहरीकरण हुआ है और यह आश्चर्यजनक बात है कि पूरा विश्व इस दौर से गुज़र रहा है। इस समय हम इतिहास के उस मोड़ पर खड़े हैं जहां शहरों में रहने वालों की संख्या उतनी हो जाने वाली है जो कि कभी ग्रामीण आबादी की हुआ करती थी। यह परिवर्तन एशिया में और तीव्र गति से हो रहा है और भारत एशिया का प्रमुख बड़ा देश है जहाँ ग्रामीण जनसंख्या का शहरों की ओर तीव्र गति से पलायन जारी है। तेज़ी से हो रहे शहरीकरण की स्थिति अप्रत्याशित है और इससे मानवीय भूगोल इतना बदल गया है जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते थे। अतः 21 वीं शताब्दी शहरी शताब्दी होगी। मानव इतिहास में पहली बार ऐसा होगा कि गांव से अधिक लोग शहर में रहेंगे। यह पूरी तरह सिद्ध हो चुका है कि शहरीकरण की गति आम तौर पर आर्थिक वृद्धि की गति से जुड़ी होती है। आर्थिक संपन्नता का प्रमुख औद्योगीकरण है और उद्योगों का जुड़ाव शहरीकरण से है क्योंकि शहरीकरण को जिन बातों से प्रोत्साहन मिलता है, वे हैं - विनिर्माण क्षेत्र (मैन्युफ़ैक्चरिंग), सूचना प्रौद्योगिकी का विस्तार, प्रौद्योगिकी विकास - खास तौर से भवनों और परिवहन जैसी बुनियादी ढांचे की व्यवस्था। जैसे-जैसे विनिर्माण प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर विस्तार होने लगता है तो निर्माण व्यय में किफ़ायत होने लगती है और परियोजना के आकार में वृद्धि। जब लोगों का शहरों की ओर पलायन को रोकना संभव न हो ते ऐसे में यह ज़रूरी हो जाता है कि अधिक से अधिक लोगों के बसने की आवश्यकता की पूर्ति हो सके। जब लोगों की आबादी बढ़ेगी तो उन्हें वांछित सेवाओं, भवनों की आवश्यकता होगी। इसका परिणाम यह होगा कि अधिक लोग एक साथ रहना शुरू कर देंगे। इसी प्रकार शहरों का उद्गम हुआ है और शहरीकरण बढ़ाता रहा है। शहरों में भूमि की कमी होने के कारण ऊंची इमारतें बनाने, कम स्थान में अधिक आबादी बसाने की मज़बूरी पैदा हो गई है तथा बुनियादी ढांचे पर भी दबावे बढ़ने लगा है। ऐसे में यह आवश्यक है कि `इंटेलिजेंट बिल्डिंगों' का निर्माण हो तथा उनकी प्रबंध प्रणाली ऐसी हो जिससे सुविधाओं का बेहतर प्रबंध हो, उनकी आयोजना की जा सके पर्यावरण प्रदूषण से बचाव की समस्याएं का निराकरण हो।
इंटेलिजेंट बिल्डिंग (अर्थप्रद भवन)
इंटेलिजेंट बिल्डिंग और बिल्डिंग मैनेजमेंट सिस्टम (भवन प्रबंध प्रणाली) संकल्पना का स्रोत 1970 के दशक में औद्योगिक क्षेत्र में नियंत्रण संबंधी तकनीकों का उपयोग है। इस प्रणाली के माध्यम से सभी सेवाओं और उपस्करों (इक्विपमेंट) का एकीकरण है जो संबंधित भवन के पर्यावरण का प्रबंध करने के लिए सेवाएं देते है एवं उनका प्रबंध करते हैं। नियंत्रण संबंधी तकनीकों का आधार प्रोग्रामिकल लॉजिक कंट्रोलर (पीएलसी) होता है। वाणिज्यिक और आवासीय उपकरणों का विकास `डिस्ट्रीब्यूटेड इंटेलिजेंस माइक्रो प्रोसेसरों' के आधार पर हुआ। 1970 के दशक में जो प्रौद्योगिकी औद्योगिक क्षेत्र में प्रयुक्त होती थी वह 1980 के दशक में वाणिज्यिक और आवासीय भवनों में भी प्रयुक्त होने लगी। उनके आधार पर ठंडे क्षेत्रों के भवनों को गरम रखने, गरम क्षेत्रों के भवनों को ठंडा रखने, प्रकाश के उपकरणों को आवश्यकतानुसार स्वचालित ढंग से चालू करना उन्हें बंद करना, ऊर्जा की बचत करना आदि नियंत्रण तकनीकों का विकास किया गया। (यहां पर उनमें से कुछ आधारभूत तथा प्रमुख तरीकों व प्रणालियों की चर्चा की जाएगी।) इन तकनीकों का उपयोग करके सेवाओं तथा ऊर्जा की लागत में भारी बचत की जा सकती है।
इसके लिए अनेक तरीके हैं जिनसे भवनों की सेवाओं को भवन के अंदर नियंत्रित किया जा सकता है। ऐसे उपकरणों को मोटे तौर पर दो वर्गों में रखा जा सकता है - एक समय आधारित (टाइमबेस्ड) - जब ज़रूरत हो तभी एयरकंडिशनिंग एवं प्रकाश के उपकरणों को चालू रखा जाए और दूसरा, इष्टतम उपयोग मापदंड आधारित (ऑप्टिमल यूसेज़ मेज़र्स बेस्ड) - वांछित मात्रा के अनुसार एयरकंडिशनिंग, प्रकाश आदि की उपलब्धता सुनिश्चित करना। ऐसी सुविधाओं से युक्त भवनों को `इंटेलिजेंट बिल्डिंग' की श्रेणी में रखा जाता है।
एयरकंडिशनिंग के तरीके
तापमान नियंत्रण (टेम्परेचर कंट्रोल); प्रतिपूरित प्रणालियां (कंपेंसेटेड सिस्टम्स); थर्मोस्टेट द्वारा गर्मी निकालने का वॉल्व (थर्मोस्टैट रेडिएटर वॉल्व); आनुपातिक नियंत्रण (प्रोपोर्शनल कंट्रोल) - स्वचालित ढंग से उपस्करों का चालू और बंद होना ताकि उससे मिलने वाला परिणाम नियंत्रित हो सके। इसके लिए अन्य तरीके भी हैं जिनमें, थर्मोस्टैट, व्यक्तियों की उपस्थिति के अनुसार पीआइआर (पैसिव इन्फ्रारेडसेंसर) प्रणालियां/यदि भवन में/कार्य स्थल पर कोई व्यक्ति न हो तो बत्तियाँ अपने आप बंद हो जाएं, एयरकंडिशनिंग प्लांट का उत्पादन कम हो जाए आदि।
प्रकाश नियंत्रण तरीके
ऊपर जो दो वृहत् श्रेणियां बताई गई हैं उनके आधार पर इंटेलिजेंट भवन में प्रकाश नियंत्रण की अनेक प्रणालियां उपलब्ध हैं। उनका उपयोग किया जाता है।
क्षेत्र के अनुसार बिल्डिंग के अलग-अलग क्षेत्रों के लिए ऐसी व्यवस्था होती है ताकि क्षेत्र के लेआउट के अनुसार बत्तियां जलाई और बुझाई जा सकें। अतः जब थोड़े से क्षेत्र में प्रकाश की ज़रूरत हो तो उतने ही क्षेत्र की बत्तियां जलाई जाएं। यह काम तीन तरीके से किया जा सकता है :-
1. समय नियंत्रण - इस विधि के प्रयोग से एक समय सारणी तय कर ली जाती है और बत्तियां उसी अनुसूची के अनुसार घड़ी के साथ जोड़कर स्वचालित रूप से जलती व बुझती हैं। जिस समय में उस क्षेत्र में कोई न हो या उस क्षेत्र में व्यक्तियों के आने के समय ही बत्तियां जलें।
2. पैसिव इन्फ्रारडे ऑकुपैंसी सेंसिंग - यह वह व्यवस्था है जब कोई क्षेत्र लगातार उपयोग में नहीं आता है। ऐसे में उपयोगों के बीच अंतराल के दौरान बत्तियां अपने-आप बुझ जाती हैं। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि जब उस क्षेत्र में कोई न हो और सेंसर स्वचालित प्रणाली को इस बात की सूचना दे दे तो वह प्रणाली उसके अनुसार बत्तियां बुझा देगी और जब उस क्षेत्र में कोई व्यक्ति आ तो जला दी जाएंगी। मान लीजिए लिफ़्ट हो, मनोरंजन कक्ष हो तो उन स्थानों पर इन्फ्रारेड सेंसर लगा कर प्रकाश की व्यवस्था का नियंत्रण किया जाए।
3. प्रकाश की वांछित मात्रा का अनुप्रवर्तन (लाइट लेवल मॉनिटरिंग)
यह वह व्यवस्था है जो प्रकाश की कोशिकाओं (फोटो सेल) द्वारा नियंत्रित होती है। यहां भी सेंसिंग प्रणाली से स्वचालित रूप से नियंत्रण अथवा अनुप्रवर्तन किया जाता है। यदि ज़रूरत न हो तो बत्तियों की चमक को कृत्रिम रूप से कम करके ऊर्जा की बचत की जा सकती है।
भवन प्रबंध प्रणालियाँ और इंटेलिजेंट बिल्डिंग
अभी तक हमने इंटेलिजेंट बिल्डिंग के नियंत्रण संबंधी सिद्धांतों की चर्चा की है। अब हम इंटेलिजेंट बिल्डिंगों के प्रबंध की प्रणालियों पर चर्चा करेंगे। यह चर्चा ऊर्जा की बचत, पर्यावरण और ग्रीन हाउस, गैस के लाभों, इन प्रणालियों के बारे में बाज़ार में क्या रुझान है, व्यावहारिक लाभों के परिप्रेक्ष्य में चर्चा करेंगे।
ऊर्जा की बचत : हमारे देश में सभी स्रोतों से, पारंपरिक तथा अपारंपरिक दोनों, 621.5 बिलियन किलो वॉट विद्युत उत्पादन की क्षमता है (भारत का आर्थिक सर्वेक्षण 2005 - 06) यह उत्पादन क्षमता हमारी आवश्यकता से बहुत कम है। हमारे गांव आज भी अंधेरे में डूबे रहते हैं तथा शहरों में भी 24 घंटे निर्बाध आपूर्ति नहीं हो पा रही है। इसके बावज़ूद हम अभी भी ऊर्जा के संबंध तथा ऊर्जा की बचत के प्रति सचेत नहीं हो रहे हैं। भवनों में यह पहलू उपेक्षा का शिकर रहा है या कहें कि जागरूकता के अभाव के कारण ऐसा है। अतः भवनों के प्रबंध में इस पहलू का इलाज इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रण युक्तियों द्वारा संभव है। परंतु अब लोगों में जागृति आ रही है तथा संपदाओं के रखरखाव से संबंधित उपकरण विकसित करने में लगी प्रौद्योगिकी इकाइयां नए-नए अविष्कारों द्वारा लोगों को जागरूक बना रही हैं। व्यावसायिक या वाणिज्यिक भवनों के अलावा अब आवासीय भवनों में भी इनका प्रवेश हो चुका है।
प्रकाश के संबंध में इस विधि द्वारा ऊर्जा की बचत, मूल सर्किट भार के 75 प्रतिशत तक की जा सकती है। इससे किसी भी वाणिज्यिक अथवा आवासीय क्षेत्रों की कुल खपत की 5 प्रतिशत तक की बचत की जा सकती है। इसी प्रकार एयरकंडिशनिंग या पानी गरम करने के लिए मूल सर्किट भार के 10 प्रतिशत तक की बचत हो सकती है जो कि कुल खपत के 7 प्रतिशत के बराबर होता है।
हमारे देश में इस प्रकार का अध्ययन नहीं किया जाता है। परंतु आस्ट्रिया में इस प्रकार के अध्ययन से ज्ञात होता है कि सरकारी या सार्वजनिक भवनों में इस प्रकार की प्रबंध व्यवस्था करके 30 प्रतिशत तक बचत की जा सकती है (गैरी मिल्स - 2004)।
पर्यावरण और ग्रीन हाउस गैस के लाभ
ग्रीन हाउस का अर्थ हरित भवन या मकान नहीं है। ग्रीन हाउस का अर्थ शुद्ध पर्यावरण सहायक भवन है। उससे उत्सर्जित होने वाली गैसों में कमी तथा ऊर्जा की कम खपत होनी चाहिए। अतः इंटेलिजेंट भवन, भवन प्रबंध प्रणालियों का सीधा संबंध ऊर्जा में बचत करना है चाहे वे वाणिज्यिक, औद्योगिक, संस्थागत और आवासीय क्षेत्र से संबंधित हों। अतः संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि इंटेलिजेंट भवन तथा उपयुक्त रूप से लागू की गई भवन प्रबंध प्रणाली पर्यावरण के दृष्टिकोण से अच्छी होती है।
सांविधिक और सरकार का समर्थन व आधारिक कार्य ढांचा
इंटेलिजेंट भवन निर्माण तथा भवन प्रबंध प्रणालियों से संबंधित प्रौद्योगिकी विकसित करने के लिए देश की सरकार का समर्थन ज़रूरी है। स्वास्थ्य के मानक, भवनों के अंदर शुद्ध हवा की उपलब्धता का स्टैंडर्ड (मानक) बनाए रखने संचार तंत्र के लिए विधिक समर्थन तथा नियंत्रण व निरीक्षण प्रणाली सुदृढ़ होनी चाहिए। इनका महत्व सबसे ज़्यादा है क्योंकि सरकार के समर्थन के बिना बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) का निर्माण तथा उसका अनुरक्षण संभव नहीं है।
आज विश्वभर में ऊर्जा, पर्यावरण व प्रदूषण तथा जन स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ी है। सरकार भी सुरक्षा के दृष्टिकोण से भवनों में तरह-तरह की युक्तियां लगाने लगी हैं। बाज़ार में विश्व स्तर के मानकों वाली ताप नियंत्रण, पानी गरम करने तथा वातानुकूलन की प्रणालियां उपलब्ध हैं जिनके उपयोग से जीवन की गुणवत्ता तो बढ़ेगी ही साथ ही ऊर्जा की पर्याप्त मात्रा में बचत होगी।
मौजूदा भवनों की स्थिति
फिल हाल तो, मेरी अधिकतम जानकारी के मुताबिक, देश में ऐसी कोई बिल्डिंग नहीं है जिसमें स्वास्थ्य, सुरक्षा, पर्यावरण, ऊर्जा तथा स्वच्छता के आइएसओ मानकों का अनुपालन किया जा रहा है। संसद भवन पर हमला, बंगलौर में विस्फोट, 26/11 के आतंकी हमले के मद्देनज़र कुछ जागरूकता बढ़ी है। परंतु अभी भी नाकाफ़ी है। भवनों में लगाई जाने वाली युक्तियों का प्रशिक्षण भवनों में युक्तियां लगा देने मात्र से ही भवन इंटेलिजेंट नहीं बन जाएंगे। इंटेलिजेंट भवनों में रहने वाले व्यक्तियों को शिक्षा देना; युक्तियों का उपयोग सरल और ज़रूरी तथा संगत अनुदेशों का प्रसार बहुत महत्वपूर्ण है। सिद्धांतों को व्यवहार में लाना ज़रूरी है। इंटेलिजेंट बिल्डिंग उनका अनुरक्षण महंगा पड़ता है। परंतु बिजली के बिल में भारी बचत होती है। लागत ज़्यादा होने के कारण लोग इन्हें लगाना नहीं चाहेंगे। अतः इंटेलिजेंट भवन के लाभ की जानकारी देकर लोगों को जागरूक बनाया जा सकता है।
कंप्यूटर प्रणाली तथा उसमें भी नवीनतम डिजिटल प्रौद्योगिकी के व्यापक रूप से उपयोग किए जाने के परिणाम स्वरूप संचार प्रणाली में अभूतपूर्व प्रगति हुई है और मानव जीवन में अब समय और दूरी का अंतराल समाप्त सा होता नज़र आने लगा है। अब लोग अपने घर को स्वयं पूर्ण तथा सर्व सुविधा संपन्न बनाने में लगे हैं जिससे उन्हें कारोबार या बैंक से धन लेने के लिए परिसर से बाहर न जाना पड़े। अतः अब इंटेलिजेंट भवन की संकल्पना आवासीय भवनों में भी प्रविष्ट हो रही है। इंटरनेट तथा केबल ने सारा संसार व मनोरंजन के साधनों को समेट का एक आंगन में रख दिया है। अतः इंटेलिजेंट होम की संकल्पना भी इंटेलिजेंट बिल्डिंग्स में समाहित हो गई है। हम यहाँ इंटेलिजेंट होम पर भी संक्षिप्त चर्चा करने जा रहे हैं।
स्मार्ट होम बिल्डिंग
स्मार्ट होम का मतलब वही है जो इंटेलिजेंट होम का है। स्मार्ट का मतलब है प्रोसेसर युक्त युक्ति। कुछ वर्ष पूर्व यह संकल्पना कपोल कल्पना तथा अंतरिक्ष की बात लगती थी। परंतु आज वास्तविकता है। कल्पना कीजिए आप अपने घर के पास पहुंचे और आपकी कार जैसे ही परिसर के पास पहुंचती है आपके भवन का गेट अपने आप खुल जाता है, सेक्यूरिटी एलार्म अपने आप बता देता है कि ख़तरा है या नहीं, गैरेज का शटर ऊपर उठ जाता है, कार पार्क करके कार से बाहर आते ही शटर अपने आप बंद हो जाता है, बत्ती बंद हो जाती है आपके फ्लैट का मेन डोर खुल जाता है। ए.सी. चालू होकर वांछित डिग्री पर तापमान पहुंच जाता है, म्यूज़िक सिस्टम चालू हो जाता है, बाथरूम में गीज़र चालू हो जाता है। ये सारी बातें पूर्व निर्धारित कंप्यूटर प्रोग्राम द्वारा पूरी होती हैं। ये सारी व्यवस्था आप अपनी ज़रूरत के अनुसार निश्चित करा सकते हैं। इसी प्रकार घर में सुबह उठने से आपके बाहर जाने तक आपकी ज़रूरतों तथा घर में रहने वालों की आवश्यकता के अनुसार लगाए गए गैजेट चलेंगे, बंद होंगे, धीमे अथवा तेज़ होंगे। इंटेलिजेंट होम की बातें परीलोक की बातें लगती हैं। परंतु आज यह सब संभव है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि इंटेलिजेंट होम से मानव जीवन की गुणवत्ता, समय की पाबंदी तनाव रहित कार्य निष्पादन, दैनिक गतियों का विनियमन हो जाएगा तथा सर्वोपरि ऊर्जा की भारी बचत व सुरक्षा सुनिश्चित हो जाएगी।
*****
भवन निर्माण की तकनीक में `इंटेलिजेंट बिल्डिंग्स' (अर्थप्रद भवन) और `इंटेलिजेंट होम्स' ऐसी संकल्पनाएं (कांसेप्ट) हैं जिनमें सिविल इंजिनियरिडग, इलेक्ट्रॉनिकी, विद्युत विज्ञान, ऊर्जा संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण, सुरक्षा के प्रवेश नियंत्रण (एक्सेस कंट्रोल), दृश्यश्रव्य व मनोरंजन प्रणाली, वायु आवागमन, पानी की सफाई, उपयोग में लाए गए पानी की सफाई व उनका पुनः उपयोग, कूड़ा कचरा निपटान आदि का स्वचालित ढंग से अंजाम देने जैसे अनेक पहलू शामिल हैं। इन्फ्रास्ट्रक्चर (आधारभूत कार्य ढांचा) में बुनियादी ज़रूरतों की वे सभी व्यवस्था शामिल हैं जो सुगम, स्वस्थ एवं शांतिपूर्वक जीवन यापन के लिए ज़रूरी हैं। अतः भवन निर्माण के लिए स्थल विकास से शुरू करके भवन निर्माण के बाद उसमें नियमित कार्यव्यापार प्रारंभ हो जाने और उसके सतत उपयोग तक की बातों का ध्यान रखना पड़ता है। अतः इस संदर्भ में इस लेख की संकल्पना तीन शब्दों, `इंटेलिजेंट', `अर्बन बिल्डिंग्स' तथा `इन्फ्रास्ट्रक्चर' में समाहित है। ये तीनों शब्द मूलतः आधुनिक प्रौद्योगिकी से संबंधित हैं।
इंटेलिजेंट बिल्डिंग यानी कि उसमें आधुनिकतम स्वचालित सूचना प्रौद्योगिकी का इष्टतम उपयोग हो। उसमें लगे गैजेट और अन्य युक्तियां, आधुनिक विज्ञान के चमत्कार की भांति हों। प्रौद्योगिकी के बारे में `इंटेलिजेंट' शब्द के प्रयोग का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। यह शब्द तब प्रयोग में आया जबकि बुद्धिमान मानव ने अपना मेकैनिकल काम जो पुनरावृत्ति (रेपिटेटिव) स्वरूप का होता है उसे स्वचालित रूप से, तीव्र गति से तथा परिशुद्धता पूर्वक करते रहने की प्रक्रिया को अंजाम देने के लिए युक्तियों (डिवाइसेज़) का निर्माण किया। इस संबंध में `इंटेलिजेंट' वह होता है जिसमें किसी जानकारी या आंकड़े की प्रोसेसिंग (संसाधित) करने की क्षमता होती है। प्रोसेसिंग वही करेगा जिसमें प्रोसेसर लगा होगा। प्रोसेसर वह कृत्रिम युक्ति है जो कंप्यूटर विज्ञान के आधार पर एकीकृत परिपथ बोर्ड (इंटीग्रेटेड सर्किट बोर्ड) पर छापे गए अनुदेशों को पढ़ने तथा उसे अनुभाषित (कंपाइल) करके कार्रवाई करने की क्षमता हो। किसी भी स्मार्ट युक्ति का मतलब होता है - वह उपकरण जिसमें भंडारित जानकारी या अनुदेश के आधार पर प्रोसेसिंग करके परिणाम निकालना तथा उसके अनुसार काम को अंजाम देना। अतः इस विषय के संदर्भ में, शहरों में बनने वाले भवनों में `इंटेलिजेंट' युक्तियों का उपयोग तथा बुनियादी ढांचों की आवश्यकता पर आगे विभिन्न उपशीर्षों में चर्चा की जा रही है।
शहरीकरण की प्रवृत्ति और जनित समस्याएं
शहरीकरण का दायरा पूरे विश्व में बढ़ रहा है। वास्तव में यह वृद्धि बीसवीं सदी में अभूतपूर्व घटना है। सन् 1990 तक विश्व की केवल 29.8 1 प्रतिशत जन संख्या शहरी क्षेत्रों में निवास करती थी जो सन् 2000 में 47.2 प्रतिशत हो गई तथा सन् 2030 में 60.2 प्रतिशत हो जाने का अनुमान है। अतः बीसवीं सदी में अभूतपूर्व तरीके से शहरीकरण हुआ है और यह आश्चर्यजनक बात है कि पूरा विश्व इस दौर से गुज़र रहा है। इस समय हम इतिहास के उस मोड़ पर खड़े हैं जहां शहरों में रहने वालों की संख्या उतनी हो जाने वाली है जो कि कभी ग्रामीण आबादी की हुआ करती थी। यह परिवर्तन एशिया में और तीव्र गति से हो रहा है और भारत एशिया का प्रमुख बड़ा देश है जहाँ ग्रामीण जनसंख्या का शहरों की ओर तीव्र गति से पलायन जारी है। तेज़ी से हो रहे शहरीकरण की स्थिति अप्रत्याशित है और इससे मानवीय भूगोल इतना बदल गया है जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते थे। अतः 21 वीं शताब्दी शहरी शताब्दी होगी। मानव इतिहास में पहली बार ऐसा होगा कि गांव से अधिक लोग शहर में रहेंगे। यह पूरी तरह सिद्ध हो चुका है कि शहरीकरण की गति आम तौर पर आर्थिक वृद्धि की गति से जुड़ी होती है। आर्थिक संपन्नता का प्रमुख औद्योगीकरण है और उद्योगों का जुड़ाव शहरीकरण से है क्योंकि शहरीकरण को जिन बातों से प्रोत्साहन मिलता है, वे हैं - विनिर्माण क्षेत्र (मैन्युफ़ैक्चरिंग), सूचना प्रौद्योगिकी का विस्तार, प्रौद्योगिकी विकास - खास तौर से भवनों और परिवहन जैसी बुनियादी ढांचे की व्यवस्था। जैसे-जैसे विनिर्माण प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर विस्तार होने लगता है तो निर्माण व्यय में किफ़ायत होने लगती है और परियोजना के आकार में वृद्धि। जब लोगों का शहरों की ओर पलायन को रोकना संभव न हो ते ऐसे में यह ज़रूरी हो जाता है कि अधिक से अधिक लोगों के बसने की आवश्यकता की पूर्ति हो सके। जब लोगों की आबादी बढ़ेगी तो उन्हें वांछित सेवाओं, भवनों की आवश्यकता होगी। इसका परिणाम यह होगा कि अधिक लोग एक साथ रहना शुरू कर देंगे। इसी प्रकार शहरों का उद्गम हुआ है और शहरीकरण बढ़ाता रहा है। शहरों में भूमि की कमी होने के कारण ऊंची इमारतें बनाने, कम स्थान में अधिक आबादी बसाने की मज़बूरी पैदा हो गई है तथा बुनियादी ढांचे पर भी दबावे बढ़ने लगा है। ऐसे में यह आवश्यक है कि `इंटेलिजेंट बिल्डिंगों' का निर्माण हो तथा उनकी प्रबंध प्रणाली ऐसी हो जिससे सुविधाओं का बेहतर प्रबंध हो, उनकी आयोजना की जा सके पर्यावरण प्रदूषण से बचाव की समस्याएं का निराकरण हो।
इंटेलिजेंट बिल्डिंग (अर्थप्रद भवन)
इंटेलिजेंट बिल्डिंग और बिल्डिंग मैनेजमेंट सिस्टम (भवन प्रबंध प्रणाली) संकल्पना का स्रोत 1970 के दशक में औद्योगिक क्षेत्र में नियंत्रण संबंधी तकनीकों का उपयोग है। इस प्रणाली के माध्यम से सभी सेवाओं और उपस्करों (इक्विपमेंट) का एकीकरण है जो संबंधित भवन के पर्यावरण का प्रबंध करने के लिए सेवाएं देते है एवं उनका प्रबंध करते हैं। नियंत्रण संबंधी तकनीकों का आधार प्रोग्रामिकल लॉजिक कंट्रोलर (पीएलसी) होता है। वाणिज्यिक और आवासीय उपकरणों का विकास `डिस्ट्रीब्यूटेड इंटेलिजेंस माइक्रो प्रोसेसरों' के आधार पर हुआ। 1970 के दशक में जो प्रौद्योगिकी औद्योगिक क्षेत्र में प्रयुक्त होती थी वह 1980 के दशक में वाणिज्यिक और आवासीय भवनों में भी प्रयुक्त होने लगी। उनके आधार पर ठंडे क्षेत्रों के भवनों को गरम रखने, गरम क्षेत्रों के भवनों को ठंडा रखने, प्रकाश के उपकरणों को आवश्यकतानुसार स्वचालित ढंग से चालू करना उन्हें बंद करना, ऊर्जा की बचत करना आदि नियंत्रण तकनीकों का विकास किया गया। (यहां पर उनमें से कुछ आधारभूत तथा प्रमुख तरीकों व प्रणालियों की चर्चा की जाएगी।) इन तकनीकों का उपयोग करके सेवाओं तथा ऊर्जा की लागत में भारी बचत की जा सकती है।
इसके लिए अनेक तरीके हैं जिनसे भवनों की सेवाओं को भवन के अंदर नियंत्रित किया जा सकता है। ऐसे उपकरणों को मोटे तौर पर दो वर्गों में रखा जा सकता है - एक समय आधारित (टाइमबेस्ड) - जब ज़रूरत हो तभी एयरकंडिशनिंग एवं प्रकाश के उपकरणों को चालू रखा जाए और दूसरा, इष्टतम उपयोग मापदंड आधारित (ऑप्टिमल यूसेज़ मेज़र्स बेस्ड) - वांछित मात्रा के अनुसार एयरकंडिशनिंग, प्रकाश आदि की उपलब्धता सुनिश्चित करना। ऐसी सुविधाओं से युक्त भवनों को `इंटेलिजेंट बिल्डिंग' की श्रेणी में रखा जाता है।
एयरकंडिशनिंग के तरीके
तापमान नियंत्रण (टेम्परेचर कंट्रोल); प्रतिपूरित प्रणालियां (कंपेंसेटेड सिस्टम्स); थर्मोस्टेट द्वारा गर्मी निकालने का वॉल्व (थर्मोस्टैट रेडिएटर वॉल्व); आनुपातिक नियंत्रण (प्रोपोर्शनल कंट्रोल) - स्वचालित ढंग से उपस्करों का चालू और बंद होना ताकि उससे मिलने वाला परिणाम नियंत्रित हो सके। इसके लिए अन्य तरीके भी हैं जिनमें, थर्मोस्टैट, व्यक्तियों की उपस्थिति के अनुसार पीआइआर (पैसिव इन्फ्रारेडसेंसर) प्रणालियां/यदि भवन में/कार्य स्थल पर कोई व्यक्ति न हो तो बत्तियाँ अपने आप बंद हो जाएं, एयरकंडिशनिंग प्लांट का उत्पादन कम हो जाए आदि।
प्रकाश नियंत्रण तरीके
ऊपर जो दो वृहत् श्रेणियां बताई गई हैं उनके आधार पर इंटेलिजेंट भवन में प्रकाश नियंत्रण की अनेक प्रणालियां उपलब्ध हैं। उनका उपयोग किया जाता है।
क्षेत्र के अनुसार बिल्डिंग के अलग-अलग क्षेत्रों के लिए ऐसी व्यवस्था होती है ताकि क्षेत्र के लेआउट के अनुसार बत्तियां जलाई और बुझाई जा सकें। अतः जब थोड़े से क्षेत्र में प्रकाश की ज़रूरत हो तो उतने ही क्षेत्र की बत्तियां जलाई जाएं। यह काम तीन तरीके से किया जा सकता है :-
1. समय नियंत्रण - इस विधि के प्रयोग से एक समय सारणी तय कर ली जाती है और बत्तियां उसी अनुसूची के अनुसार घड़ी के साथ जोड़कर स्वचालित रूप से जलती व बुझती हैं। जिस समय में उस क्षेत्र में कोई न हो या उस क्षेत्र में व्यक्तियों के आने के समय ही बत्तियां जलें।
2. पैसिव इन्फ्रारडे ऑकुपैंसी सेंसिंग - यह वह व्यवस्था है जब कोई क्षेत्र लगातार उपयोग में नहीं आता है। ऐसे में उपयोगों के बीच अंतराल के दौरान बत्तियां अपने-आप बुझ जाती हैं। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि जब उस क्षेत्र में कोई न हो और सेंसर स्वचालित प्रणाली को इस बात की सूचना दे दे तो वह प्रणाली उसके अनुसार बत्तियां बुझा देगी और जब उस क्षेत्र में कोई व्यक्ति आ तो जला दी जाएंगी। मान लीजिए लिफ़्ट हो, मनोरंजन कक्ष हो तो उन स्थानों पर इन्फ्रारेड सेंसर लगा कर प्रकाश की व्यवस्था का नियंत्रण किया जाए।
3. प्रकाश की वांछित मात्रा का अनुप्रवर्तन (लाइट लेवल मॉनिटरिंग)
यह वह व्यवस्था है जो प्रकाश की कोशिकाओं (फोटो सेल) द्वारा नियंत्रित होती है। यहां भी सेंसिंग प्रणाली से स्वचालित रूप से नियंत्रण अथवा अनुप्रवर्तन किया जाता है। यदि ज़रूरत न हो तो बत्तियों की चमक को कृत्रिम रूप से कम करके ऊर्जा की बचत की जा सकती है।
भवन प्रबंध प्रणालियाँ और इंटेलिजेंट बिल्डिंग
अभी तक हमने इंटेलिजेंट बिल्डिंग के नियंत्रण संबंधी सिद्धांतों की चर्चा की है। अब हम इंटेलिजेंट बिल्डिंगों के प्रबंध की प्रणालियों पर चर्चा करेंगे। यह चर्चा ऊर्जा की बचत, पर्यावरण और ग्रीन हाउस, गैस के लाभों, इन प्रणालियों के बारे में बाज़ार में क्या रुझान है, व्यावहारिक लाभों के परिप्रेक्ष्य में चर्चा करेंगे।
ऊर्जा की बचत : हमारे देश में सभी स्रोतों से, पारंपरिक तथा अपारंपरिक दोनों, 621.5 बिलियन किलो वॉट विद्युत उत्पादन की क्षमता है (भारत का आर्थिक सर्वेक्षण 2005 - 06) यह उत्पादन क्षमता हमारी आवश्यकता से बहुत कम है। हमारे गांव आज भी अंधेरे में डूबे रहते हैं तथा शहरों में भी 24 घंटे निर्बाध आपूर्ति नहीं हो पा रही है। इसके बावज़ूद हम अभी भी ऊर्जा के संबंध तथा ऊर्जा की बचत के प्रति सचेत नहीं हो रहे हैं। भवनों में यह पहलू उपेक्षा का शिकर रहा है या कहें कि जागरूकता के अभाव के कारण ऐसा है। अतः भवनों के प्रबंध में इस पहलू का इलाज इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रण युक्तियों द्वारा संभव है। परंतु अब लोगों में जागृति आ रही है तथा संपदाओं के रखरखाव से संबंधित उपकरण विकसित करने में लगी प्रौद्योगिकी इकाइयां नए-नए अविष्कारों द्वारा लोगों को जागरूक बना रही हैं। व्यावसायिक या वाणिज्यिक भवनों के अलावा अब आवासीय भवनों में भी इनका प्रवेश हो चुका है।
प्रकाश के संबंध में इस विधि द्वारा ऊर्जा की बचत, मूल सर्किट भार के 75 प्रतिशत तक की जा सकती है। इससे किसी भी वाणिज्यिक अथवा आवासीय क्षेत्रों की कुल खपत की 5 प्रतिशत तक की बचत की जा सकती है। इसी प्रकार एयरकंडिशनिंग या पानी गरम करने के लिए मूल सर्किट भार के 10 प्रतिशत तक की बचत हो सकती है जो कि कुल खपत के 7 प्रतिशत के बराबर होता है।
हमारे देश में इस प्रकार का अध्ययन नहीं किया जाता है। परंतु आस्ट्रिया में इस प्रकार के अध्ययन से ज्ञात होता है कि सरकारी या सार्वजनिक भवनों में इस प्रकार की प्रबंध व्यवस्था करके 30 प्रतिशत तक बचत की जा सकती है (गैरी मिल्स - 2004)।
पर्यावरण और ग्रीन हाउस गैस के लाभ
ग्रीन हाउस का अर्थ हरित भवन या मकान नहीं है। ग्रीन हाउस का अर्थ शुद्ध पर्यावरण सहायक भवन है। उससे उत्सर्जित होने वाली गैसों में कमी तथा ऊर्जा की कम खपत होनी चाहिए। अतः इंटेलिजेंट भवन, भवन प्रबंध प्रणालियों का सीधा संबंध ऊर्जा में बचत करना है चाहे वे वाणिज्यिक, औद्योगिक, संस्थागत और आवासीय क्षेत्र से संबंधित हों। अतः संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि इंटेलिजेंट भवन तथा उपयुक्त रूप से लागू की गई भवन प्रबंध प्रणाली पर्यावरण के दृष्टिकोण से अच्छी होती है।
सांविधिक और सरकार का समर्थन व आधारिक कार्य ढांचा
इंटेलिजेंट भवन निर्माण तथा भवन प्रबंध प्रणालियों से संबंधित प्रौद्योगिकी विकसित करने के लिए देश की सरकार का समर्थन ज़रूरी है। स्वास्थ्य के मानक, भवनों के अंदर शुद्ध हवा की उपलब्धता का स्टैंडर्ड (मानक) बनाए रखने संचार तंत्र के लिए विधिक समर्थन तथा नियंत्रण व निरीक्षण प्रणाली सुदृढ़ होनी चाहिए। इनका महत्व सबसे ज़्यादा है क्योंकि सरकार के समर्थन के बिना बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) का निर्माण तथा उसका अनुरक्षण संभव नहीं है।
आज विश्वभर में ऊर्जा, पर्यावरण व प्रदूषण तथा जन स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ी है। सरकार भी सुरक्षा के दृष्टिकोण से भवनों में तरह-तरह की युक्तियां लगाने लगी हैं। बाज़ार में विश्व स्तर के मानकों वाली ताप नियंत्रण, पानी गरम करने तथा वातानुकूलन की प्रणालियां उपलब्ध हैं जिनके उपयोग से जीवन की गुणवत्ता तो बढ़ेगी ही साथ ही ऊर्जा की पर्याप्त मात्रा में बचत होगी।
मौजूदा भवनों की स्थिति
फिल हाल तो, मेरी अधिकतम जानकारी के मुताबिक, देश में ऐसी कोई बिल्डिंग नहीं है जिसमें स्वास्थ्य, सुरक्षा, पर्यावरण, ऊर्जा तथा स्वच्छता के आइएसओ मानकों का अनुपालन किया जा रहा है। संसद भवन पर हमला, बंगलौर में विस्फोट, 26/11 के आतंकी हमले के मद्देनज़र कुछ जागरूकता बढ़ी है। परंतु अभी भी नाकाफ़ी है। भवनों में लगाई जाने वाली युक्तियों का प्रशिक्षण भवनों में युक्तियां लगा देने मात्र से ही भवन इंटेलिजेंट नहीं बन जाएंगे। इंटेलिजेंट भवनों में रहने वाले व्यक्तियों को शिक्षा देना; युक्तियों का उपयोग सरल और ज़रूरी तथा संगत अनुदेशों का प्रसार बहुत महत्वपूर्ण है। सिद्धांतों को व्यवहार में लाना ज़रूरी है। इंटेलिजेंट बिल्डिंग उनका अनुरक्षण महंगा पड़ता है। परंतु बिजली के बिल में भारी बचत होती है। लागत ज़्यादा होने के कारण लोग इन्हें लगाना नहीं चाहेंगे। अतः इंटेलिजेंट भवन के लाभ की जानकारी देकर लोगों को जागरूक बनाया जा सकता है।
कंप्यूटर प्रणाली तथा उसमें भी नवीनतम डिजिटल प्रौद्योगिकी के व्यापक रूप से उपयोग किए जाने के परिणाम स्वरूप संचार प्रणाली में अभूतपूर्व प्रगति हुई है और मानव जीवन में अब समय और दूरी का अंतराल समाप्त सा होता नज़र आने लगा है। अब लोग अपने घर को स्वयं पूर्ण तथा सर्व सुविधा संपन्न बनाने में लगे हैं जिससे उन्हें कारोबार या बैंक से धन लेने के लिए परिसर से बाहर न जाना पड़े। अतः अब इंटेलिजेंट भवन की संकल्पना आवासीय भवनों में भी प्रविष्ट हो रही है। इंटरनेट तथा केबल ने सारा संसार व मनोरंजन के साधनों को समेट का एक आंगन में रख दिया है। अतः इंटेलिजेंट होम की संकल्पना भी इंटेलिजेंट बिल्डिंग्स में समाहित हो गई है। हम यहाँ इंटेलिजेंट होम पर भी संक्षिप्त चर्चा करने जा रहे हैं।
स्मार्ट होम बिल्डिंग
स्मार्ट होम का मतलब वही है जो इंटेलिजेंट होम का है। स्मार्ट का मतलब है प्रोसेसर युक्त युक्ति। कुछ वर्ष पूर्व यह संकल्पना कपोल कल्पना तथा अंतरिक्ष की बात लगती थी। परंतु आज वास्तविकता है। कल्पना कीजिए आप अपने घर के पास पहुंचे और आपकी कार जैसे ही परिसर के पास पहुंचती है आपके भवन का गेट अपने आप खुल जाता है, सेक्यूरिटी एलार्म अपने आप बता देता है कि ख़तरा है या नहीं, गैरेज का शटर ऊपर उठ जाता है, कार पार्क करके कार से बाहर आते ही शटर अपने आप बंद हो जाता है, बत्ती बंद हो जाती है आपके फ्लैट का मेन डोर खुल जाता है। ए.सी. चालू होकर वांछित डिग्री पर तापमान पहुंच जाता है, म्यूज़िक सिस्टम चालू हो जाता है, बाथरूम में गीज़र चालू हो जाता है। ये सारी बातें पूर्व निर्धारित कंप्यूटर प्रोग्राम द्वारा पूरी होती हैं। ये सारी व्यवस्था आप अपनी ज़रूरत के अनुसार निश्चित करा सकते हैं। इसी प्रकार घर में सुबह उठने से आपके बाहर जाने तक आपकी ज़रूरतों तथा घर में रहने वालों की आवश्यकता के अनुसार लगाए गए गैजेट चलेंगे, बंद होंगे, धीमे अथवा तेज़ होंगे। इंटेलिजेंट होम की बातें परीलोक की बातें लगती हैं। परंतु आज यह सब संभव है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि इंटेलिजेंट होम से मानव जीवन की गुणवत्ता, समय की पाबंदी तनाव रहित कार्य निष्पादन, दैनिक गतियों का विनियमन हो जाएगा तथा सर्वोपरि ऊर्जा की भारी बचत व सुरक्षा सुनिश्चित हो जाएगी।
*****
शनिवार, जून 04, 2011
कार्यालयों की कार्यप्रणाली का बदलता स्वरूप और हिंदी कार्यशालाओं की भूमिका
विचारणीय मुद्दे
अतः हमें दो बातों पर विचार करना है - एक, `कार्यालयों की कार्यप्रणाली का बदलता स्वरूप', दो, `हिंदी कार्यशालाओं की भूमिका'। पहले हम पहली बात पर विचार कर लें। कार्यालयों की कार्यप्रणाली के बदलते स्वरूप से हमारा क्या आशय है? क्या कार्यालयों की कार्यप्रणाली बदली है? बैंकों की कार्यप्रणली तो बदली है। इनकी कार्यप्रणाली में कोई खास परिवर्तन हुआ है। वैश्वीकरण और उदारीकरण के कारण इनका क्षेत्र और अधिक व्यापक हो गया है। तेज़ी से विकास करती सूचना प्रौद्योगिकी के कारण संचार व संप्रेषण के माध्यमों में ज़रूर बदलाव आ गया है। कार्यालयों की कार्यप्रणाली कुछ हद तक बदली है। अतः इनकी कार्यप्रणाली के बदलते स्वरूप से संभवतः हमारा आशय सूचना प्रौद्योगिकी के अत्यधिक प्रयोग की आवश्यकता के कारण तेज़ी से परिवर्तनशील माहौल से है। इसलिए इलेक्ट्रॉनिक युग और संचार के नए माध्यमों के माहौल में कार्यशालाओं की भूमिका की चर्चा करना समीचीन लगता है। लेकिन इससे पहले पृष्ठभूमि पर विचार करना समीचीन रहेगा।
कार्यशालाओं की शुरुआत
कार्यालयों में राजभाषा कक्षों की स्थापना राजभाषा नियम...1976 के अस्तित्व में आने के बाद हुई। हिंदी में काम करने वाले अधिकारियों/कर्मचारियों की सहायता के लिए कार्यशालाएं आयोजित करने का निदेश है। उसके बाद तीसरे खंड में भी इसका ज़िक्र आया और समिति ने कहा कि कारअयशालाओं का अच्छा प्रभाव हुआ है इसलिए नियमित आधार पर इनका आयोजन किया जाता रहे और पाँच वर्ष तक कार्यशालाओं का आयोजन इसी प्रकार से जारी रखा जाए ताकि कार्यालय के हर व्यक्ति को साल में कम से कम एक बार भाग लेने का अवसर मिल सके। संसदीय समिति ने अपने पहले, तीसरे और चौथे प्रतिवेदनों में कार्यशालाएँ आयोजित करने का सुझाव दिया था परंतु विषयों के बारे में कोई निदेश नहीं था। पहले प्रतिवेदन में केवल शब्दावली का अभ्यास कराने का ज़िक्र था।
वर्तमान कार्यशाला का स्वरूप
`कार्यशाला' शब्द अंग्रेजी के शब्द `वर्कशॉप का पर्याय है। इसका मतलब है, `काम करके सीखना', अर्थात्, अभ्यास उन्मुख प्रशिक्षण। इसका अर्थ है कि व्याख्यान आधारित प्रशिक्षण के बजाय व्यावहारिक कार्य की परिस्थिति में कार्य आधारित प्रशिक्षण दिया जाए। हमारी कार्यशाला में दोनों ही विधियों का अनुसरण किया जाता है, अर्थात्, व्याख्यान और अभ्यास दोनों का शुमार है। कार्यशाला के विषय और प्रशिक्षण के तरीके में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कुछ परिवर्तन के साथ कार्यशालाएँ आज भी उसी प्रकार आयोजित की जा रही हैं।
वर्तमान कार्यशाला का स्वरूप
`कार्यशाला' शब्द अंग्रेजी के शब्द `वर्कशॉप का पर्याय है। इसका मतलब है, `काम करके सीखना', अर्थात्, अभ्यास उन्मुख प्रशिक्षण। इसका अर्थ है कि व्याख्यान आधारित प्रशिक्षण के बजाय व्यावहारिक कार्य की परिस्थिति में कार्यालय के कार्य आधारित प्रशिक्षण दिया जाए।
विभिन्न केन्द्रीय कार्यालयों, उपक्रमों, सरकारी बैंकों में राजभाषा कार्यान्वयन की एक चुनौती हिंदी में कामकाज करने का प्रशिक्षण प्रदान करना है। सामान्यतया अधिकांश कर्मचारी अपने टेबल का कार्य अंग्रेजी में ही करना पसंद करते हैं। अंग्रेज़ी में कार्य करने के दो प्रमुख कारण है – पहला कारण अंग्रेज़ी भाषा में कार्य करने की आदत है तथा दूसरा कारण अंग्रेज़ी भाषा को एक बेहतर भाषा मानने की मानसिकता है। हिंदी कार्यशाला प्रमुखतया इन्हीं दो पक्षों पर केंद्रित रहती है। यह प्रशिक्षण न्यूनतम एक दिवस से लेकर अधिकतम सात दिनों का रहता है। यद्यपि वर्तमान में सामान्यतया यह 2 अथवा 3 दिवसीय होती है। विशेष परिस्थितियों में एक दिवसीय कार्यशालाएँ आयोजित की जाती है जो महज खाना पूर्ति साबित होती हैं। इससे आँकड़े तो तैयार हो जाते हैं परंतु हिंदी का भला नहीं होता है।
हिंदी कार्यशाला अधिकारियों तथा लिपिकों के लिए अलग-अलग आयोजित की जाती है। अलग-अलग आयोजन का उद्देश्य इन प्रवर्गों के अलग-अलग कार्यप्रणाली के कारण है। कहीं-कहीं अधिकारियों तथा लिपिकों की संयुक्त कार्यशालाएँ आयोजित की जाती हैं जिसे व्यावहारिक नहीं कहा जा सकता है। इस कार्यशाला का प्रथम चरण नामांकन का होता है जिसमें हिंदी के कार्यसाधक ज्ञान कर्मचारियों को ही नामित किया जाता है। मैट्रिक स्तर तक एक विषय के रूप में हिंदी का अध्ययन अथवा प्राज्ञ परीक्षा उत्तीर्ण या लिखित घोषणा को हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान माना जाता है। इस नामांकन में यह भी ध्यान रखना होता है कि नामित कर्मचारी को पिछले 5 वर्षों तक हिंदी कार्य़शाला में प्रशिक्षण हेतु नामित नहीं किया गया हो। प्रत्येक वर्ष हिंदी कार्यशालाओं के लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं तथा तदनुसार कार्यशालाएँ आयोजित की जाती हैं अतएव यह प्रतिवर्ष जारी रहने वाला कार्यक्रम है।
कार्यशाला के विषय व अवधि
कार्यशाला में भाग लेने वाले अधिकारियों/कर्मचारियों की यही प्रवृत्ति होती है कि कुछ लिखना न पड़े जबकि कार्यशाला का उद्देश्य ही अभ्यास है। अतः कार्यशाला में सत्रों के संचालन के लिए दोनों ही विधियों का अनुसरण किया जाता है, अर्थात्, व्याख्यान और अभ्यास दोनों का शुमार है।
कार्यशाला के विषय और प्रशिक्षण के तरीके में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कुछ परिवर्तन के साथ कार्यशालाएँ आज भी उसी प्रकार आयोजित की जा रही हैं जबकि विषयों का चयन कार्यशाला में नामित कर्मचारियों के कार्यों के अनुरूप होना चाहिए। सभी कार्यालयों के केंद्रीय कार्यालयों से कार्यशाला का पहला सत्र राजभाषा नीति का होना चाहिए । यह बहुत महत्वपूर्ण सत्र है। कार्यालयों में, राजभाषा के बारे में बहुत भ्रामक बातें प्रचलन में हैं। राजभाषा नीति को देश हित में व्यापक रूप से समझना तथा भाषा के बारे में नकारात्मक मानसिकता को दूर करके यसकारात्मक महौल तैयार करने की ज़िम्मेदारी इसी सत्र की है। शब्दावली निर्माण की आवश्यकता, हिंदी पत्राचार में इनके प्रयोग, प्रोत्साहन योजनाएँ, आंतरिक कामकाज में हिंदी का प्रयोग, हिंदी पारिभाषिकों के निर्माण की विधि, उच्चारण के नियम, मानक वर्तनी, प्रौद्योगिकी में हिंदी आदि विषयों का समावेश किया जाना चाहिए। इस प्रकार कार्यशाला में शामिल कर्मचारियों को हिंदी में चर्चा करने, हिंदी में लिखने तथा कंप्यूटर पर यूनीकोड आधारित हिंदी में कार्य करने आदि का पूर्ण और उपयोगी अवसर मिलता है।
कार्यशाला के प्रशिक्षकों की भूमिका
हिंदी कार्यशाला के प्रशिक्षकों पर कार्यशाला का पूरा दारोमदार रहता है। हिंदी कार्यशालाओं के प्रशिक्षक राजभाषा अधिकारी या हिंदी अधिकारी होते हैं। राजभाषा अधिकारी के ज्ञान, उसका अभिव्यक्ति कौशल, विषय का गंभीरता से विश्लेषण, प्रश्नों के सार्थक समाधान करने की क्षमता से ही कार्यशाला की सफलता जुड़ी होती है। कार्यशाला में जागरूक, प्रतिभाशाली और कार्यालयी कामकाज में कुशल कर्मचारी होते हैं ऐसी स्थिति में यदि योग्य और प्रभावशाली संप्रेषण क्षमता वाले प्रशिक्षकों का चुनाव न केवल कार्यशाला को सफल बनाता है बल्कि इससे कार्यशाला का गौरव भी बनता है।
कार्यशाला की भूमिका
जहाँ तक कार्यशाला की भूमिका का प्रश्न है तो इस बारे में कोई दो राय नहीं है कि कार्यशालाएँ हिंदी में काम करने का माहौल तैयार करने और स्टाफ में हिंदी के बारे में जागरूकता फैलाने में अहम भूमिका निभा रही हैं। कार्यशालाओं के उपरांत सहभागियों से प्राप्त प्रतिक्रियाओं के आधार पर निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि कार्यशालाएँ उपयोगी हैं और इनकी भूमिका निर्विवाद है।
कार्यशलाएँ कब तक चलाई जाती रहेंगी
अब प्रश्न यह उठता है कि कार्याशालाओं की ज़रूरत है और 1976 से ही कार्यशलाएँ चलाई जा रही हैं तो अभी तक हमारे सभी स्टाफ प्रशिक्षित क्यों नहीं हो पाए? इतने वर्षों के बावज़ूद हम सभी अधिकारियों/कर्मचारियों को प्रशिक्षित नहीं कर पाए। जब हम इस पर गौर करते हैं तो कुछ अहम बातें सामने आती हैं। हम उन्हें समस्या के रूप में पहचानें और उनका समाधान करें ताकि इस उपयोगी मंच का व्यापक उपयोग हो सके।
कार्यशाला आयोजन की समस्याएँ
कार्यशालाएँ आयोजित करने में दो प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है - प्रशासनिक और अकादमिक ।
प्रशासनिक समस्याएँ
निदेशानुसार कार्यशालाओं में उन्हें प्रशिक्षित किया जाना है जिन्हें हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान हो। भारत सरकार ने कार्यसाधक ज्ञान का निर्धारण करने के लिए नया रोस्टर बनाने का निदेश दिया है। उसके अनुसार रोस्टर बनाने के बाद अब कार्यशाला में प्रशिक्षित किए जाने वाले स्टाफ़ ही नहीं मिलेंगे क्योंकि राजभाषा कक्षों के पास रोस्टर ही नहीं है।
दूसरी प्रशासनिक समस्या यह है कि कार्यशालाएँ आयोजित करने के लिए सभी विभागों और कार्यालयों में स्थान नहीं नहीं मिलता, कार्यशालाओं में भाग लेने के लिए स्टाफ़ भी आना नहीं चाहते, कार्य की आवश्यकता के नाम पर विभाग स्टाफ सदस्यों को प्रतिनियुक्त नहीं करते हैं।
अकादमिक समस्या
जब यह सिद्ध हो गया है कि हिंदी के प्रयोग में वृद्धि के लिए कार्यशालाओं की भूमिका निर्विवाद है तो दूसरा प्रश्न उठता है कि क्या वर्तमान परिस्थितियों में, उसमें पढ़ाए जाने वाले विषयों की प्रासंगिकता है और प्रशिक्षण की विधि में कुछ परिवर्तन की आवश्यकता है? अतः अब कार्यशाला आयोजित करने के स्वरूप के बारे में चर्चा करना और उसे बदलने के लिए प्रयास करना आवश्यक है।
जब यह सिद्ध हो गया है कि हिंदी के प्रयोग में वृद्धि के लिए कार्यशालाओं की भूमिका निर्विवाद है तो दूसरा प्रश्न उठता है कि क्या वर्तमान परिस्थितियों में, उसमें पढ़ाए जाने वाले विषयों की प्रासंगिकता है और प्रशिक्षण की विधि में कुछ परिवर्तन की आवश्यकता है? अतः अब कार्यशाला आयोजित करने के स्वरूप के बारे में चर्चा करना और उसे बदलने के लिए प्रयास करना आवश्यक है।
नवोन्मेषी तरीके की शुरुआत - दोनों समस्यओं का समाधान
मेरे विचार में इन दोनों समस्याओं का समाधान नवोन्मेषी मॉडल अपनाकर किया जा सकता है। कार्यशालाओं के आयोजन में नवोन्मेषी मॉडल लाना अनिवार्य हो गया है क्योंकि हमारे कार्य करने का माध्यम सूचना प्रौद्यागिकी और कंप्यूटर हो गया है। हमारे सभी काम अब कंप्यूटर आधारित ही होंगे। हम पूर्ण कंप्यूटरीकरण और ऑपरेशन क्रिटिकल प्रणाली की ओर बढ़ रहे हैं। अतः सूचना प्रौद्योगिकी के आधुनिक युग में पुरातन पद्धति तथा पाठ्यक्रम एकदम कालबाह्य (Obsolete) हो गए हैं। कार्यशालाएँ इंटरैक्टिव और कंप्यूटर आधारित बनाई जा सकती हैं।
यदि कार्यालयों में इन्फ़्रास्ट्रक्चर की व्यवस्था करना संभव न हो तो स्थानीय आधार पर किसी हिंदी सेवी संस्था की मदद से इस काम को पूरा किया जा सकता है। गैर सरकारी हिंदी सेवी संस्थाएं कम खर्च में, कार्यालयों की आवश्यकता के अनुसार स्ट्रक्चर्ड प्रशिक्षण मॉड्यूल तैयार करके कम से कम तीन दिन की कार्यशाला का आयोजन कर सकती हैं। अतः कार्यालयों के स्तर पर इस प्रकार की जा सकती है। हर विभाग तथा कार्यालय स्थनीय नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति (नराकास) के माध्यम से व्यवस्था कर सकते हैं। इस प्रकार एकरूप, मानक और वांछित कार्यक्रम को लागू किया जा सकेगा तथा नराकास के माध्यम से अनुवर्तन करना भी संभव होगा। इस प्रकार हर कार्यालय द्वारा कार्यों की पुनरावृत्ति और क्लास रूम की आवश्यकता से बचा जा सकता है। हर विभाग के कार्यालय में अलग-अलग कार्यशालाएं आयोजित करना ज़रूरी नहीं होगा।
राजभाषा कार्यान्वयन समिति (नराकास) की वेबसाइट
हम सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से, नराकास की वेबसाइट के माध्यम से एक-एक विभाग के लिए, विभाग स्पेस्फिक कार्यशालाएं आयोजित कर सकते हैं। एक घंटा रोज, दस दिन तक ऑनलाइन अभ्यास हो और केंद्रीकृत ढंग से हिंदी में कंप्यूटर पर टाइपिंग करना, पत्रलेखन के टेंप्लेट (शैली) के प्रयोग से पत्र तैयार कराना तथा विभागीय टिप्पणियाँ लिखाना, कंप्यूटर द्वारा वर्तनी संशोधन करना, अंग्रेजी टेक्स्ट का हिंदी में शब्दानुवाद करके वाक्य रचना सिखाया जाए तो ज़्यादा उपयोगी होगा और छह माह के भीतर सभी विभागों, क्षेत्रीय कार्यलयों के सभी अधिकारियों / कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया जा सकता है। प्रशिक्षण के लिए अभ्यास पुस्तिका भी दी जा सकती है जिसे प्रशिक्षणोपरांत उपयोग में लाया जा सकता है। कार्यशालाओं के बाद हमारे पास प्रशिक्षित स्टाफ सदस्यों का डाटाबेस भी तैयार हो जाएगा जिसके बाद अनुवर्तन करना तथा हिंदी पत्राचार में वृद्धि सुनिश्चित करना संभव हो जाएगा।
2. सभी प्रकार की कार्यशालाओं को समन्वित करके एक ही पाठ्यक्रम बनाया जाए।
3. विभाग स्पेसिफिक क कार्यशलाएँ आयोजित की जाएँ।
4. प्रशिक्षणोपरांत अनुवर्तन ज़रूरी है। प्रशिक्षण से लौटने के बाद अभ्यास न करने से प्रशिक्षण व्यर्थ हो जाता है।
************
अतः हमें दो बातों पर विचार करना है - एक, `कार्यालयों की कार्यप्रणाली का बदलता स्वरूप', दो, `हिंदी कार्यशालाओं की भूमिका'। पहले हम पहली बात पर विचार कर लें। कार्यालयों की कार्यप्रणाली के बदलते स्वरूप से हमारा क्या आशय है? क्या कार्यालयों की कार्यप्रणाली बदली है? बैंकों की कार्यप्रणली तो बदली है। इनकी कार्यप्रणाली में कोई खास परिवर्तन हुआ है। वैश्वीकरण और उदारीकरण के कारण इनका क्षेत्र और अधिक व्यापक हो गया है। तेज़ी से विकास करती सूचना प्रौद्योगिकी के कारण संचार व संप्रेषण के माध्यमों में ज़रूर बदलाव आ गया है। कार्यालयों की कार्यप्रणाली कुछ हद तक बदली है। अतः इनकी कार्यप्रणाली के बदलते स्वरूप से संभवतः हमारा आशय सूचना प्रौद्योगिकी के अत्यधिक प्रयोग की आवश्यकता के कारण तेज़ी से परिवर्तनशील माहौल से है। इसलिए इलेक्ट्रॉनिक युग और संचार के नए माध्यमों के माहौल में कार्यशालाओं की भूमिका की चर्चा करना समीचीन लगता है। लेकिन इससे पहले पृष्ठभूमि पर विचार करना समीचीन रहेगा।
कार्यशालाओं की शुरुआत
कार्यालयों में राजभाषा कक्षों की स्थापना राजभाषा नियम...1976 के अस्तित्व में आने के बाद हुई। हिंदी में काम करने वाले अधिकारियों/कर्मचारियों की सहायता के लिए कार्यशालाएं आयोजित करने का निदेश है। उसके बाद तीसरे खंड में भी इसका ज़िक्र आया और समिति ने कहा कि कारअयशालाओं का अच्छा प्रभाव हुआ है इसलिए नियमित आधार पर इनका आयोजन किया जाता रहे और पाँच वर्ष तक कार्यशालाओं का आयोजन इसी प्रकार से जारी रखा जाए ताकि कार्यालय के हर व्यक्ति को साल में कम से कम एक बार भाग लेने का अवसर मिल सके। संसदीय समिति ने अपने पहले, तीसरे और चौथे प्रतिवेदनों में कार्यशालाएँ आयोजित करने का सुझाव दिया था परंतु विषयों के बारे में कोई निदेश नहीं था। पहले प्रतिवेदन में केवल शब्दावली का अभ्यास कराने का ज़िक्र था।
वर्तमान कार्यशाला का स्वरूप
`कार्यशाला' शब्द अंग्रेजी के शब्द `वर्कशॉप का पर्याय है। इसका मतलब है, `काम करके सीखना', अर्थात्, अभ्यास उन्मुख प्रशिक्षण। इसका अर्थ है कि व्याख्यान आधारित प्रशिक्षण के बजाय व्यावहारिक कार्य की परिस्थिति में कार्य आधारित प्रशिक्षण दिया जाए। हमारी कार्यशाला में दोनों ही विधियों का अनुसरण किया जाता है, अर्थात्, व्याख्यान और अभ्यास दोनों का शुमार है। कार्यशाला के विषय और प्रशिक्षण के तरीके में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कुछ परिवर्तन के साथ कार्यशालाएँ आज भी उसी प्रकार आयोजित की जा रही हैं।
वर्तमान कार्यशाला का स्वरूप
`कार्यशाला' शब्द अंग्रेजी के शब्द `वर्कशॉप का पर्याय है। इसका मतलब है, `काम करके सीखना', अर्थात्, अभ्यास उन्मुख प्रशिक्षण। इसका अर्थ है कि व्याख्यान आधारित प्रशिक्षण के बजाय व्यावहारिक कार्य की परिस्थिति में कार्यालय के कार्य आधारित प्रशिक्षण दिया जाए।
विभिन्न केन्द्रीय कार्यालयों, उपक्रमों, सरकारी बैंकों में राजभाषा कार्यान्वयन की एक चुनौती हिंदी में कामकाज करने का प्रशिक्षण प्रदान करना है। सामान्यतया अधिकांश कर्मचारी अपने टेबल का कार्य अंग्रेजी में ही करना पसंद करते हैं। अंग्रेज़ी में कार्य करने के दो प्रमुख कारण है – पहला कारण अंग्रेज़ी भाषा में कार्य करने की आदत है तथा दूसरा कारण अंग्रेज़ी भाषा को एक बेहतर भाषा मानने की मानसिकता है। हिंदी कार्यशाला प्रमुखतया इन्हीं दो पक्षों पर केंद्रित रहती है। यह प्रशिक्षण न्यूनतम एक दिवस से लेकर अधिकतम सात दिनों का रहता है। यद्यपि वर्तमान में सामान्यतया यह 2 अथवा 3 दिवसीय होती है। विशेष परिस्थितियों में एक दिवसीय कार्यशालाएँ आयोजित की जाती है जो महज खाना पूर्ति साबित होती हैं। इससे आँकड़े तो तैयार हो जाते हैं परंतु हिंदी का भला नहीं होता है।
हिंदी कार्यशाला अधिकारियों तथा लिपिकों के लिए अलग-अलग आयोजित की जाती है। अलग-अलग आयोजन का उद्देश्य इन प्रवर्गों के अलग-अलग कार्यप्रणाली के कारण है। कहीं-कहीं अधिकारियों तथा लिपिकों की संयुक्त कार्यशालाएँ आयोजित की जाती हैं जिसे व्यावहारिक नहीं कहा जा सकता है। इस कार्यशाला का प्रथम चरण नामांकन का होता है जिसमें हिंदी के कार्यसाधक ज्ञान कर्मचारियों को ही नामित किया जाता है। मैट्रिक स्तर तक एक विषय के रूप में हिंदी का अध्ययन अथवा प्राज्ञ परीक्षा उत्तीर्ण या लिखित घोषणा को हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान माना जाता है। इस नामांकन में यह भी ध्यान रखना होता है कि नामित कर्मचारी को पिछले 5 वर्षों तक हिंदी कार्य़शाला में प्रशिक्षण हेतु नामित नहीं किया गया हो। प्रत्येक वर्ष हिंदी कार्यशालाओं के लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं तथा तदनुसार कार्यशालाएँ आयोजित की जाती हैं अतएव यह प्रतिवर्ष जारी रहने वाला कार्यक्रम है।
कार्यशाला के विषय व अवधि
कार्यशाला में भाग लेने वाले अधिकारियों/कर्मचारियों की यही प्रवृत्ति होती है कि कुछ लिखना न पड़े जबकि कार्यशाला का उद्देश्य ही अभ्यास है। अतः कार्यशाला में सत्रों के संचालन के लिए दोनों ही विधियों का अनुसरण किया जाता है, अर्थात्, व्याख्यान और अभ्यास दोनों का शुमार है।
कार्यशाला के विषय और प्रशिक्षण के तरीके में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कुछ परिवर्तन के साथ कार्यशालाएँ आज भी उसी प्रकार आयोजित की जा रही हैं जबकि विषयों का चयन कार्यशाला में नामित कर्मचारियों के कार्यों के अनुरूप होना चाहिए। सभी कार्यालयों के केंद्रीय कार्यालयों से कार्यशाला का पहला सत्र राजभाषा नीति का होना चाहिए । यह बहुत महत्वपूर्ण सत्र है। कार्यालयों में, राजभाषा के बारे में बहुत भ्रामक बातें प्रचलन में हैं। राजभाषा नीति को देश हित में व्यापक रूप से समझना तथा भाषा के बारे में नकारात्मक मानसिकता को दूर करके यसकारात्मक महौल तैयार करने की ज़िम्मेदारी इसी सत्र की है। शब्दावली निर्माण की आवश्यकता, हिंदी पत्राचार में इनके प्रयोग, प्रोत्साहन योजनाएँ, आंतरिक कामकाज में हिंदी का प्रयोग, हिंदी पारिभाषिकों के निर्माण की विधि, उच्चारण के नियम, मानक वर्तनी, प्रौद्योगिकी में हिंदी आदि विषयों का समावेश किया जाना चाहिए। इस प्रकार कार्यशाला में शामिल कर्मचारियों को हिंदी में चर्चा करने, हिंदी में लिखने तथा कंप्यूटर पर यूनीकोड आधारित हिंदी में कार्य करने आदि का पूर्ण और उपयोगी अवसर मिलता है।
कार्यशाला के प्रशिक्षकों की भूमिका
हिंदी कार्यशाला के प्रशिक्षकों पर कार्यशाला का पूरा दारोमदार रहता है। हिंदी कार्यशालाओं के प्रशिक्षक राजभाषा अधिकारी या हिंदी अधिकारी होते हैं। राजभाषा अधिकारी के ज्ञान, उसका अभिव्यक्ति कौशल, विषय का गंभीरता से विश्लेषण, प्रश्नों के सार्थक समाधान करने की क्षमता से ही कार्यशाला की सफलता जुड़ी होती है। कार्यशाला में जागरूक, प्रतिभाशाली और कार्यालयी कामकाज में कुशल कर्मचारी होते हैं ऐसी स्थिति में यदि योग्य और प्रभावशाली संप्रेषण क्षमता वाले प्रशिक्षकों का चुनाव न केवल कार्यशाला को सफल बनाता है बल्कि इससे कार्यशाला का गौरव भी बनता है।
कार्यशाला की भूमिका
जहाँ तक कार्यशाला की भूमिका का प्रश्न है तो इस बारे में कोई दो राय नहीं है कि कार्यशालाएँ हिंदी में काम करने का माहौल तैयार करने और स्टाफ में हिंदी के बारे में जागरूकता फैलाने में अहम भूमिका निभा रही हैं। कार्यशालाओं के उपरांत सहभागियों से प्राप्त प्रतिक्रियाओं के आधार पर निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि कार्यशालाएँ उपयोगी हैं और इनकी भूमिका निर्विवाद है।
कार्यशलाएँ कब तक चलाई जाती रहेंगी
अब प्रश्न यह उठता है कि कार्याशालाओं की ज़रूरत है और 1976 से ही कार्यशलाएँ चलाई जा रही हैं तो अभी तक हमारे सभी स्टाफ प्रशिक्षित क्यों नहीं हो पाए? इतने वर्षों के बावज़ूद हम सभी अधिकारियों/कर्मचारियों को प्रशिक्षित नहीं कर पाए। जब हम इस पर गौर करते हैं तो कुछ अहम बातें सामने आती हैं। हम उन्हें समस्या के रूप में पहचानें और उनका समाधान करें ताकि इस उपयोगी मंच का व्यापक उपयोग हो सके।
कार्यशाला आयोजन की समस्याएँ
कार्यशालाएँ आयोजित करने में दो प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है - प्रशासनिक और अकादमिक ।
प्रशासनिक समस्याएँ
निदेशानुसार कार्यशालाओं में उन्हें प्रशिक्षित किया जाना है जिन्हें हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान हो। भारत सरकार ने कार्यसाधक ज्ञान का निर्धारण करने के लिए नया रोस्टर बनाने का निदेश दिया है। उसके अनुसार रोस्टर बनाने के बाद अब कार्यशाला में प्रशिक्षित किए जाने वाले स्टाफ़ ही नहीं मिलेंगे क्योंकि राजभाषा कक्षों के पास रोस्टर ही नहीं है।
दूसरी प्रशासनिक समस्या यह है कि कार्यशालाएँ आयोजित करने के लिए सभी विभागों और कार्यालयों में स्थान नहीं नहीं मिलता, कार्यशालाओं में भाग लेने के लिए स्टाफ़ भी आना नहीं चाहते, कार्य की आवश्यकता के नाम पर विभाग स्टाफ सदस्यों को प्रतिनियुक्त नहीं करते हैं।
अकादमिक समस्या
जब यह सिद्ध हो गया है कि हिंदी के प्रयोग में वृद्धि के लिए कार्यशालाओं की भूमिका निर्विवाद है तो दूसरा प्रश्न उठता है कि क्या वर्तमान परिस्थितियों में, उसमें पढ़ाए जाने वाले विषयों की प्रासंगिकता है और प्रशिक्षण की विधि में कुछ परिवर्तन की आवश्यकता है? अतः अब कार्यशाला आयोजित करने के स्वरूप के बारे में चर्चा करना और उसे बदलने के लिए प्रयास करना आवश्यक है।
जब यह सिद्ध हो गया है कि हिंदी के प्रयोग में वृद्धि के लिए कार्यशालाओं की भूमिका निर्विवाद है तो दूसरा प्रश्न उठता है कि क्या वर्तमान परिस्थितियों में, उसमें पढ़ाए जाने वाले विषयों की प्रासंगिकता है और प्रशिक्षण की विधि में कुछ परिवर्तन की आवश्यकता है? अतः अब कार्यशाला आयोजित करने के स्वरूप के बारे में चर्चा करना और उसे बदलने के लिए प्रयास करना आवश्यक है।
नवोन्मेषी तरीके की शुरुआत - दोनों समस्यओं का समाधान
मेरे विचार में इन दोनों समस्याओं का समाधान नवोन्मेषी मॉडल अपनाकर किया जा सकता है। कार्यशालाओं के आयोजन में नवोन्मेषी मॉडल लाना अनिवार्य हो गया है क्योंकि हमारे कार्य करने का माध्यम सूचना प्रौद्यागिकी और कंप्यूटर हो गया है। हमारे सभी काम अब कंप्यूटर आधारित ही होंगे। हम पूर्ण कंप्यूटरीकरण और ऑपरेशन क्रिटिकल प्रणाली की ओर बढ़ रहे हैं। अतः सूचना प्रौद्योगिकी के आधुनिक युग में पुरातन पद्धति तथा पाठ्यक्रम एकदम कालबाह्य (Obsolete) हो गए हैं। कार्यशालाएँ इंटरैक्टिव और कंप्यूटर आधारित बनाई जा सकती हैं।
यदि कार्यालयों में इन्फ़्रास्ट्रक्चर की व्यवस्था करना संभव न हो तो स्थानीय आधार पर किसी हिंदी सेवी संस्था की मदद से इस काम को पूरा किया जा सकता है। गैर सरकारी हिंदी सेवी संस्थाएं कम खर्च में, कार्यालयों की आवश्यकता के अनुसार स्ट्रक्चर्ड प्रशिक्षण मॉड्यूल तैयार करके कम से कम तीन दिन की कार्यशाला का आयोजन कर सकती हैं। अतः कार्यालयों के स्तर पर इस प्रकार की जा सकती है। हर विभाग तथा कार्यालय स्थनीय नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति (नराकास) के माध्यम से व्यवस्था कर सकते हैं। इस प्रकार एकरूप, मानक और वांछित कार्यक्रम को लागू किया जा सकेगा तथा नराकास के माध्यम से अनुवर्तन करना भी संभव होगा। इस प्रकार हर कार्यालय द्वारा कार्यों की पुनरावृत्ति और क्लास रूम की आवश्यकता से बचा जा सकता है। हर विभाग के कार्यालय में अलग-अलग कार्यशालाएं आयोजित करना ज़रूरी नहीं होगा।
राजभाषा कार्यान्वयन समिति (नराकास) की वेबसाइट
हम सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से, नराकास की वेबसाइट के माध्यम से एक-एक विभाग के लिए, विभाग स्पेस्फिक कार्यशालाएं आयोजित कर सकते हैं। एक घंटा रोज, दस दिन तक ऑनलाइन अभ्यास हो और केंद्रीकृत ढंग से हिंदी में कंप्यूटर पर टाइपिंग करना, पत्रलेखन के टेंप्लेट (शैली) के प्रयोग से पत्र तैयार कराना तथा विभागीय टिप्पणियाँ लिखाना, कंप्यूटर द्वारा वर्तनी संशोधन करना, अंग्रेजी टेक्स्ट का हिंदी में शब्दानुवाद करके वाक्य रचना सिखाया जाए तो ज़्यादा उपयोगी होगा और छह माह के भीतर सभी विभागों, क्षेत्रीय कार्यलयों के सभी अधिकारियों / कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया जा सकता है। प्रशिक्षण के लिए अभ्यास पुस्तिका भी दी जा सकती है जिसे प्रशिक्षणोपरांत उपयोग में लाया जा सकता है। कार्यशालाओं के बाद हमारे पास प्रशिक्षित स्टाफ सदस्यों का डाटाबेस भी तैयार हो जाएगा जिसके बाद अनुवर्तन करना तथा हिंदी पत्राचार में वृद्धि सुनिश्चित करना संभव हो जाएगा।
2. सभी प्रकार की कार्यशालाओं को समन्वित करके एक ही पाठ्यक्रम बनाया जाए।
3. विभाग स्पेसिफिक क कार्यशलाएँ आयोजित की जाएँ।
4. प्रशिक्षणोपरांत अनुवर्तन ज़रूरी है। प्रशिक्षण से लौटने के बाद अभ्यास न करने से प्रशिक्षण व्यर्थ हो जाता है।
************
बुधवार, जून 01, 2011
इलेक्ट्रॉनिक युग में भुगतान प्रणाली व जुड़े जोखिम
दैनिक कार्य व्यापार के सिलसिले में समाज का हर व्यक्ति किसी न किसी पर निर्भर है और अपनी ज़रूरत के अनुसार वह दूसरों से माल या सेवाएं लेता है। सामाजिक व्यवस्था के विकास के साथ-साथ परस्पर निर्भरता तथा आपसी लेनदेन बढ़ते गए। हर व्यक्ति हर काम में कुशल बनने का प्रयास करने के बजाय आपसी सहयोग तथा सह अस्तित्व के सिद्धांत को अपनाने लगा और ऐसी प्रणाली विकसित करते रहने की ओर सतत प्रयासशील रहा कि उसका जीवन सुकर बने, उसका कारोबार बढ़े तथा उसकी देनदारियों एवं लेनदारियों का समाधान होता रहे। उसके लिए ही 'भुगतान प्रणाली' का विकास हुआ। अतः भुगतान प्रणाली भी समय के साथ तथा आवश्यकतानुसार विकसित होती रही। आज के परिप्रेक्ष्य में भुगतान प्रणाली का मतलब संस्थागत भुगतान प्रणाली से है, चाहे वह नकद भुगतान हो या किसी लिखत या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से हो। दूसरे, जब भुगतान की प्रणाली विकसित होती है तो साथ ही उसकी खामियाँ भी विकसित होती हैं जिसका ज्ञान हमें समय के साथ-साथ ही होता है। हम इस लेख में भुगतान प्रणाली तथा इससे जुड़े जोखिमों पर चर्चा करेंगे।
भुगतान प्रणाली का उद्देश्य
जब बैंकिंग व्यवस्था विकसित हुई तो भुगतान प्रणाली की संस्थागत व्यवस्थाएँ अस्तित्व में आईं। उसके परिणामस्वरूप समाशोधन प्रणाली प्रचलन में आई जिसमें कोई चेक, ड्राफ़्ट अथवा परक्राम्य लिखत बैंकिंग क्रियाविधि के माध्यम से प्रस्तुत किए जाने लगे। आजकल भुगतान की कई प्रणालियाँ प्रचलित हैं। परंतु उन सबका एक ही उद्देश्य है - एक पक्ष के खाते से दूसरे पक्ष के खाते में धन का अंतरण। भुगतान करने वाला पक्ष यदि चाहे तो नकद भुगतान कर सकता है या विनिमय प्रणाली द्वारा भी भुगतान कर सकता है। बैंक भी अपनी निधियों का अंतरण करने के लिए भुगतान प्रणाली का उपयोग करते हैं। उनके निधि अंतरण करने का स्वरूप ग्राहकों के निधि अंतरण से भिन्न होता है। भुगतान प्रणाली का स्वरूप चाहे जो भी हो उसका उद्देश्य है दो संबंधित पार्टियों के बीच आपसी देयताओं या देनदारियों को पूरा करना। उसके लिए लिखतों, नियमों तथा क्रियाविधियों का संग्रहण किया जाता है जिसके द्वारा लेनदेनकर्ता आपस में अपनी देनदारियों तथा लेनदारियों का समाधान करते हैं।
भुगतान प्रणाली के तीन प्रमुख तत्व हैं :
1. भुगतान करने वाले व्यक्ति द्वारा अपने खाते से धन का अंतरण करने के लिए बैंक को प्राधिकृत करना । बैंक को दिया जाने वाला प्राधिकार किसी न किसी लिखत के रूप में जैसे, चेक, पे आर्डर आदि हो सकता है।
2. भुगतान अनुदेश को संबंधित बैंक को भेजना तथा उनका आदान प्रदान - सामान्यतया समाशोधन।
3. संबंधित बैंकों के बीच देनदारियों/लेनदारियों का समाधान, अर्थात्, अदाकर्ता को बैंक द्वारा प्राप्तकर्ता के बैंक को या तो आपस में या किसी अन्य पक्ष के पास रखे गए खातों के माध्यम से (रिज़र्व बैंक या कोई अन्य बैंक) देनदारियों
लेनदारियों का समाधान।
प्रस्तुतकर्ता बैंक आहर्ता बैंक से उस लिखत का मूल्य समाशोधन गृह के माध्यम से प्राप्त करने लगे। यह प्रणाली बहुत दिनों तक देश विदेश में प्रचलित रही। जैसे-जैसे बैंकिंग का विस्तार होता गया भुगतान प्रणाली का भी विविधीकरण होता गया। पहले भुगतान के तरीके सीमित होते थे। परंतु आज नकद के अलावा चेक, ड्रॉफ़्ट, हुंडी, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, यात्री चेक, डाक अंतरण, तार अंतरण, ए.टी.एम, ऑनलाइन अंतरण, चिप कार्डों आदि के माध्यम से भुगतान होने लगे हैं। उसमें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और कंप्यूटर की नेटवर्किंग का महत्व बहुत बढ़ गया है। बैंकिंग के संदर्भ में भुगतान प्रणाली ऐसी व्यवस्था है जिसमें कई संस्थाएँ शामिल होती हैं और एक संस्था उनमें समन्वय का कार्य करती है।
भुगतान से जुड़े संभावित जोखिम
समाशोधन प्रणाली ऐसी व्यवस्था है जिसके तहत अलग-अलग लिखतों का भुगतान अलग-अलग नहीं किया जाता है बल्कि एक बैंक की संपूर्ण देयता का एक मुश्त रकम द्वारा भुगतान कर दिया जाता है। ऐसे में यदि भुगतान करने के बाद कोई बैंक किसी एक लिखत की देयता का भुगतान करने से मना कर दे या जब भुगतान देय हो उसके बहुत दिन बाद भुगतान करे तो ऐसी स्थिति में जोखिम की गुंजाइश रहती है। इसमें कुछ प्रणालीगत जोखिम भी है। यदि कोई बैंक अपने दायित्वों से मुकर जाए तो उसकी देयता अन्य बैंकों को उठानी पड़ेगी। चूँकि वित्तीय लेनदेनों में बहुत अधिक वृद्धि हो चुकी है और दिनों दिन उसकी मात्रा व संख्या बढ़ती जा रही है इसलिए समय समय पर प्रणाली में परिवर्तन परिवर्द्धन होते रहना चाहिए। नई तकनीकों के आगमन से उनके अनुरूप प्रणाली में यथावश्यक संशोधन किया जाना चाहिए। संचार माध्यमों और इलेक्ट्रॉनिक प्रौद्योगिकी में आई क्रांति के कारण जहाँ बहुत त्वरित गति से परिवर्तन हुए हैं, सुविधाएँ बढ़ी हैं वहीं जोखिम की संभावनाएँ भी बढ़ी हैं क्योंकि जितनी जटिल व उच्च तकनीकी प्रणाली, जोखिम की संभावना भी उतनी ही बढ़ी। अतः प्रणाली में निहित भुगतान जोखिमों को निम्नलिखित दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है :
प्रणालीगत जोखिम
इस प्रकार का जोखिम उस समय उत्पन्न होती है जबकि प्रणाली में शामिल कोई पक्ष अपनी देनदारियों से मुकर जाता है।
ऐसी स्थिति में उसका शृंखलात्मक प्रभाव होता है और प्रणाली ही छिन्न भिन्न हो जाती है।
समाधान जोखिम
इस प्रकार का जोखिम प्रायः समाधान में अनिश्चितता के कारण होता है। किसी भी भुगतान में इस प्रकार की गुंजाइश होती है कि देनदार पक्ष समय पर भुगतान करने में चूक कर दे। इसे साख जोखिम कहा जाता है। इससे तरलता (नकदी) जोखिम उत्पन्न हो सकती है क्योंकि जब समाधान में नकदी नहीं प्राप्त होगी तो उससे नकदी की स्थिति प्रभावित होगी। अतः उस पक्ष को धन की आवश्यकता की पूर्ति के लिए मजबूरन बाज़ार से धन जुटाना होगा। यदि आस्ति बेचकर धन जुटाना होगा तो उसे तत्कालीन बाज़ार जोखिम का सामना करना होगा।
इधर हाल में अंतरराष्ट्रीय भुगतानों की संख्या और मात्रा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। फिलहाल पूरे विश्व में एकरूप भुगतान प्रणाली नहीं प्रचलित है। इसलिए ऐसे भुगतान जिसमें दो या अधिक देश शामिल होते हैं भुगतान समाधान से पूर्व उन्हें कई प्रक्रिया और प्रणालियों से गुज़रना पड़ता है। ऐसी प्रणालियों की सुदृढ़ता कई घटकों पर निर्भर होती है, जैसे, प्रणाली की गति, उसकी दक्षता, सहयोगियों या ग्राहकों की निष्ठा, प्रणाली विषयक तकनीक की उन्नति इत्यादि। अंतरराष्ट्रीय भुगतानों की सबसे बड़ी कठिनाई अधिकारिता क्षेत्र (जूरिसडिक्शन) की होती है क्योंकि उनमें भिन्न-भिन्न देश होते हैं और अंतरराष्ट्रीय कानूनों को लागू करने के बारे में बड़ी पेचीदगी का सामना करना पड़ सकता है।
जोखिम कम करने के उपाय
भारत के बैंक जोखिमों से चिंतित नहीं दिखते हैं क्योंकि इधर बहुत दिनों से सार्वजनिक क्षेत्र का कोई बैंक फेल नहीं हुआ है। भारतीय रिज़र्व बैंक, बैंकिंग उद्योग का नियामक होने के कारण समाशोधन गृह के कार्यों में महत्वपूर्ण या निर्णायक दखल रखता है। समाशोधन गृह को चलाने में रिज़र्व बैंक की निर्धारक भूमिका होती है। वह समाशोधन गृह के लिए मानक नियम व शर्तें निर्धारित करता है। वह समाशोधन गृह की सदस्यता लेने तथा किसी बैंक द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले चेकों की रकम को सीमित कर सकता है।
भुगतान प्रणाली में निहित जोखिमों को कम करने के लिए आवश्यक है कि `जोखिम नियंत्रण प्रणाली' विकसित की जाए।
भुगतान प्रणाली का उद्देश्य
जब बैंकिंग व्यवस्था विकसित हुई तो भुगतान प्रणाली की संस्थागत व्यवस्थाएँ अस्तित्व में आईं। उसके परिणामस्वरूप समाशोधन प्रणाली प्रचलन में आई जिसमें कोई चेक, ड्राफ़्ट अथवा परक्राम्य लिखत बैंकिंग क्रियाविधि के माध्यम से प्रस्तुत किए जाने लगे। आजकल भुगतान की कई प्रणालियाँ प्रचलित हैं। परंतु उन सबका एक ही उद्देश्य है - एक पक्ष के खाते से दूसरे पक्ष के खाते में धन का अंतरण। भुगतान करने वाला पक्ष यदि चाहे तो नकद भुगतान कर सकता है या विनिमय प्रणाली द्वारा भी भुगतान कर सकता है। बैंक भी अपनी निधियों का अंतरण करने के लिए भुगतान प्रणाली का उपयोग करते हैं। उनके निधि अंतरण करने का स्वरूप ग्राहकों के निधि अंतरण से भिन्न होता है। भुगतान प्रणाली का स्वरूप चाहे जो भी हो उसका उद्देश्य है दो संबंधित पार्टियों के बीच आपसी देयताओं या देनदारियों को पूरा करना। उसके लिए लिखतों, नियमों तथा क्रियाविधियों का संग्रहण किया जाता है जिसके द्वारा लेनदेनकर्ता आपस में अपनी देनदारियों तथा लेनदारियों का समाधान करते हैं।
भुगतान प्रणाली के तीन प्रमुख तत्व हैं :
1. भुगतान करने वाले व्यक्ति द्वारा अपने खाते से धन का अंतरण करने के लिए बैंक को प्राधिकृत करना । बैंक को दिया जाने वाला प्राधिकार किसी न किसी लिखत के रूप में जैसे, चेक, पे आर्डर आदि हो सकता है।
2. भुगतान अनुदेश को संबंधित बैंक को भेजना तथा उनका आदान प्रदान - सामान्यतया समाशोधन।
3. संबंधित बैंकों के बीच देनदारियों/लेनदारियों का समाधान, अर्थात्, अदाकर्ता को बैंक द्वारा प्राप्तकर्ता के बैंक को या तो आपस में या किसी अन्य पक्ष के पास रखे गए खातों के माध्यम से (रिज़र्व बैंक या कोई अन्य बैंक) देनदारियों
लेनदारियों का समाधान।
प्रस्तुतकर्ता बैंक आहर्ता बैंक से उस लिखत का मूल्य समाशोधन गृह के माध्यम से प्राप्त करने लगे। यह प्रणाली बहुत दिनों तक देश विदेश में प्रचलित रही। जैसे-जैसे बैंकिंग का विस्तार होता गया भुगतान प्रणाली का भी विविधीकरण होता गया। पहले भुगतान के तरीके सीमित होते थे। परंतु आज नकद के अलावा चेक, ड्रॉफ़्ट, हुंडी, क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, यात्री चेक, डाक अंतरण, तार अंतरण, ए.टी.एम, ऑनलाइन अंतरण, चिप कार्डों आदि के माध्यम से भुगतान होने लगे हैं। उसमें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और कंप्यूटर की नेटवर्किंग का महत्व बहुत बढ़ गया है। बैंकिंग के संदर्भ में भुगतान प्रणाली ऐसी व्यवस्था है जिसमें कई संस्थाएँ शामिल होती हैं और एक संस्था उनमें समन्वय का कार्य करती है।
भुगतान से जुड़े संभावित जोखिम
समाशोधन प्रणाली ऐसी व्यवस्था है जिसके तहत अलग-अलग लिखतों का भुगतान अलग-अलग नहीं किया जाता है बल्कि एक बैंक की संपूर्ण देयता का एक मुश्त रकम द्वारा भुगतान कर दिया जाता है। ऐसे में यदि भुगतान करने के बाद कोई बैंक किसी एक लिखत की देयता का भुगतान करने से मना कर दे या जब भुगतान देय हो उसके बहुत दिन बाद भुगतान करे तो ऐसी स्थिति में जोखिम की गुंजाइश रहती है। इसमें कुछ प्रणालीगत जोखिम भी है। यदि कोई बैंक अपने दायित्वों से मुकर जाए तो उसकी देयता अन्य बैंकों को उठानी पड़ेगी। चूँकि वित्तीय लेनदेनों में बहुत अधिक वृद्धि हो चुकी है और दिनों दिन उसकी मात्रा व संख्या बढ़ती जा रही है इसलिए समय समय पर प्रणाली में परिवर्तन परिवर्द्धन होते रहना चाहिए। नई तकनीकों के आगमन से उनके अनुरूप प्रणाली में यथावश्यक संशोधन किया जाना चाहिए। संचार माध्यमों और इलेक्ट्रॉनिक प्रौद्योगिकी में आई क्रांति के कारण जहाँ बहुत त्वरित गति से परिवर्तन हुए हैं, सुविधाएँ बढ़ी हैं वहीं जोखिम की संभावनाएँ भी बढ़ी हैं क्योंकि जितनी जटिल व उच्च तकनीकी प्रणाली, जोखिम की संभावना भी उतनी ही बढ़ी। अतः प्रणाली में निहित भुगतान जोखिमों को निम्नलिखित दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है :
प्रणालीगत जोखिम
इस प्रकार का जोखिम उस समय उत्पन्न होती है जबकि प्रणाली में शामिल कोई पक्ष अपनी देनदारियों से मुकर जाता है।
ऐसी स्थिति में उसका शृंखलात्मक प्रभाव होता है और प्रणाली ही छिन्न भिन्न हो जाती है।
समाधान जोखिम
इस प्रकार का जोखिम प्रायः समाधान में अनिश्चितता के कारण होता है। किसी भी भुगतान में इस प्रकार की गुंजाइश होती है कि देनदार पक्ष समय पर भुगतान करने में चूक कर दे। इसे साख जोखिम कहा जाता है। इससे तरलता (नकदी) जोखिम उत्पन्न हो सकती है क्योंकि जब समाधान में नकदी नहीं प्राप्त होगी तो उससे नकदी की स्थिति प्रभावित होगी। अतः उस पक्ष को धन की आवश्यकता की पूर्ति के लिए मजबूरन बाज़ार से धन जुटाना होगा। यदि आस्ति बेचकर धन जुटाना होगा तो उसे तत्कालीन बाज़ार जोखिम का सामना करना होगा।
इधर हाल में अंतरराष्ट्रीय भुगतानों की संख्या और मात्रा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। फिलहाल पूरे विश्व में एकरूप भुगतान प्रणाली नहीं प्रचलित है। इसलिए ऐसे भुगतान जिसमें दो या अधिक देश शामिल होते हैं भुगतान समाधान से पूर्व उन्हें कई प्रक्रिया और प्रणालियों से गुज़रना पड़ता है। ऐसी प्रणालियों की सुदृढ़ता कई घटकों पर निर्भर होती है, जैसे, प्रणाली की गति, उसकी दक्षता, सहयोगियों या ग्राहकों की निष्ठा, प्रणाली विषयक तकनीक की उन्नति इत्यादि। अंतरराष्ट्रीय भुगतानों की सबसे बड़ी कठिनाई अधिकारिता क्षेत्र (जूरिसडिक्शन) की होती है क्योंकि उनमें भिन्न-भिन्न देश होते हैं और अंतरराष्ट्रीय कानूनों को लागू करने के बारे में बड़ी पेचीदगी का सामना करना पड़ सकता है।
जोखिम कम करने के उपाय
भारत के बैंक जोखिमों से चिंतित नहीं दिखते हैं क्योंकि इधर बहुत दिनों से सार्वजनिक क्षेत्र का कोई बैंक फेल नहीं हुआ है। भारतीय रिज़र्व बैंक, बैंकिंग उद्योग का नियामक होने के कारण समाशोधन गृह के कार्यों में महत्वपूर्ण या निर्णायक दखल रखता है। समाशोधन गृह को चलाने में रिज़र्व बैंक की निर्धारक भूमिका होती है। वह समाशोधन गृह के लिए मानक नियम व शर्तें निर्धारित करता है। वह समाशोधन गृह की सदस्यता लेने तथा किसी बैंक द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले चेकों की रकम को सीमित कर सकता है।
भुगतान प्रणाली में निहित जोखिमों को कम करने के लिए आवश्यक है कि `जोखिम नियंत्रण प्रणाली' विकसित की जाए।
रविवार, मई 29, 2011
प्रयोजनशील भाषा और नई शब्दावली
अपने शब्द भंडार की कमी या शब्द की जटिलता
हम जब किसी लेख में नए शब्द पाते हैं जिनका अर्थ नहीं जानते हैं तब उनका अर्थ सीखने के बजाय यह कोशिश करते हैं कि अपने पुराने और सीमित शब्द भंडार से ही काम चला लें। अतः हम लेखक पर ही जटिल शब्दों के प्रयोग का आरोप लगाकर अपनी अज्ञानता प्रकट तो करते ही हैं साथ ही यह भी संदेश देते हैं कि हमें व्यंजना शब्द शक्ति के प्रयोग का ज्ञान ही नहीं होता है।
नए शब्द सीखने की परंपरा
जब हम बच्चे होते हैं तो हमारे अंदर सीखने की प्रबल इच्छा होती है। शैक्षणिक अनुसंधानों से ज्ञात होता है कि एक पढ़े लिखे के बच्चे दस वर्ष की उम्र तक सामान्यतया बीस हज़ार शब्द सीख लेते हैं और चार साल की आयु के बाद हर साल कई सौ नए शब्द की दर से शब्द भंडार में वृद्धि करते रहते हैं। यह एक चौंकाने वाला तथ्य है सामने आया है कि प्रौढ़ लोग जो स्कूल नहीं जाते हैं उनके शब्द भंडार में बीस-पचीस शब्दों की वृद्धि होती है जब कि स्कूल जाने वाले प्रौढ़ लोगों के शब्द भंडार में सौ से ज़्यादा की दर से शब्दों की वृद्धि होती है। यदि बड़े होने पर पढ़ने की आदत छोड़ दें और कुछ नए शब्दों से परहेज़ करते हुए पुराने और अपने सीमित भंडार से ही काम चलाने का प्रयास करते रहें तो शब्द ज्ञान नहीं बढ़ेगा और ज्ञान विज्ञान के नए ज्ञान से अपरिचित रह जाएंगे। अतः नए शब्दों के प्रति उत्सुकता बनाए रखें और उनके अर्थ एवं प्रयोग को ज़िंदगी का हिस्सा बनाने की आदत डाली जाए।
हिंदी में भाषा सिखाने के साहित्य का अभाव
अंग्रेज़ी में तो अनेक पुस्तकें और अभ्यास पुस्तिकाएं उपलब्ध हैं जिनके उपयोग से लोग अंग्रेज़ी के नए शब्द सीख सकते हैं और उनका अभ्यास कर सकते हैं। साथ ही अंग्रेज़ी सीखने में समय भी लगाते हैं परंतु हिंदी या भारतीय भाषाओं में कुछ लिखा जाता है तो उसे पढ़ने में रुचि दिखाने के बजाय शब्दों की जटिलता का आरोप लगाकर पढ़ने से विमुख हो जाते हैं।
प्रयोजनशील विषयों पर लेखन की आवश्यकता
हिंदी में ज्ञान विज्ञान के विषयों पर अनुसंधान के प्रपत्र लिखने की परंपरा नहीं बन पाई है। हिंदी भाषा सशक्त तभी बनेगी जब इसमें हर विषय के साहित्य और शब्दावली प्रयोग में आएगी। 28 मई 2011 को नागपुर में ऑथर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया की संगोष्ठी में डॉ. बाला सुब्रमन्यम में अपने संबोधन में कहा कि आज के लेखक केवल कविता और उपन्यास तक ही सीमित न रहें बल्कि समाज से सरोकार रखने वाले विषयों पर अपनी लेखनी चलाएं।
*******
हम जब किसी लेख में नए शब्द पाते हैं जिनका अर्थ नहीं जानते हैं तब उनका अर्थ सीखने के बजाय यह कोशिश करते हैं कि अपने पुराने और सीमित शब्द भंडार से ही काम चला लें। अतः हम लेखक पर ही जटिल शब्दों के प्रयोग का आरोप लगाकर अपनी अज्ञानता प्रकट तो करते ही हैं साथ ही यह भी संदेश देते हैं कि हमें व्यंजना शब्द शक्ति के प्रयोग का ज्ञान ही नहीं होता है।
नए शब्द सीखने की परंपरा
जब हम बच्चे होते हैं तो हमारे अंदर सीखने की प्रबल इच्छा होती है। शैक्षणिक अनुसंधानों से ज्ञात होता है कि एक पढ़े लिखे के बच्चे दस वर्ष की उम्र तक सामान्यतया बीस हज़ार शब्द सीख लेते हैं और चार साल की आयु के बाद हर साल कई सौ नए शब्द की दर से शब्द भंडार में वृद्धि करते रहते हैं। यह एक चौंकाने वाला तथ्य है सामने आया है कि प्रौढ़ लोग जो स्कूल नहीं जाते हैं उनके शब्द भंडार में बीस-पचीस शब्दों की वृद्धि होती है जब कि स्कूल जाने वाले प्रौढ़ लोगों के शब्द भंडार में सौ से ज़्यादा की दर से शब्दों की वृद्धि होती है। यदि बड़े होने पर पढ़ने की आदत छोड़ दें और कुछ नए शब्दों से परहेज़ करते हुए पुराने और अपने सीमित भंडार से ही काम चलाने का प्रयास करते रहें तो शब्द ज्ञान नहीं बढ़ेगा और ज्ञान विज्ञान के नए ज्ञान से अपरिचित रह जाएंगे। अतः नए शब्दों के प्रति उत्सुकता बनाए रखें और उनके अर्थ एवं प्रयोग को ज़िंदगी का हिस्सा बनाने की आदत डाली जाए।
हिंदी में भाषा सिखाने के साहित्य का अभाव
अंग्रेज़ी में तो अनेक पुस्तकें और अभ्यास पुस्तिकाएं उपलब्ध हैं जिनके उपयोग से लोग अंग्रेज़ी के नए शब्द सीख सकते हैं और उनका अभ्यास कर सकते हैं। साथ ही अंग्रेज़ी सीखने में समय भी लगाते हैं परंतु हिंदी या भारतीय भाषाओं में कुछ लिखा जाता है तो उसे पढ़ने में रुचि दिखाने के बजाय शब्दों की जटिलता का आरोप लगाकर पढ़ने से विमुख हो जाते हैं।
प्रयोजनशील विषयों पर लेखन की आवश्यकता
हिंदी में ज्ञान विज्ञान के विषयों पर अनुसंधान के प्रपत्र लिखने की परंपरा नहीं बन पाई है। हिंदी भाषा सशक्त तभी बनेगी जब इसमें हर विषय के साहित्य और शब्दावली प्रयोग में आएगी। 28 मई 2011 को नागपुर में ऑथर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया की संगोष्ठी में डॉ. बाला सुब्रमन्यम में अपने संबोधन में कहा कि आज के लेखक केवल कविता और उपन्यास तक ही सीमित न रहें बल्कि समाज से सरोकार रखने वाले विषयों पर अपनी लेखनी चलाएं।
*******
मंगलवार, मई 24, 2011
ललित लेखन और शब्द शक्तियाँ
ललित लेखन जिसमें कोई बंधन नहीं है सोच का, शब्द का, विषय का। साहित्य समाज का दर्पण है। इसमें समाज का हू-ब-हू अक्स दिखता है। अतः समाज में जो घटित होता है उसका चित्रण ही साहित्य है। इस प्रकार का साहित्य कितना प्रभावी है? पढ़ने में कितना रुचिकर है? भाषा की दृष्टि से कितना संप्रेषणीय है? यह सब तो पढ़ने वाले के भाषा ज्ञान, विषय ज्ञान, सामाजिक परिस्थितियों के ज्ञान तथा संस्कार पर निर्भर करता है। परंतु कुछ लेखक हर परिस्थिति में अपनी छाप छोड़ जाते हैं और पाठक के हृदय को छू जाते हैं। प्रेमचंद, अमृत लाल नागर, महादेवी वर्मा, पंत, निराला जैसे कालजयी साहित्यकारों की रचनाएं ऐसी शक्तियों से परिपूर्ण हैं।
ये शब्द शक्तियाँ क्या हैं? साहित्य में तीन प्रकार की शब्द शक्तियों का उल्लेख मिलता है – अभिधा, लक्षणा और व्यंजना। इनके अलावा सूक्ति, कहावत और मुहावरे, अलंकार भी हैं जिनके प्रयोग से लेखन की धार पैनी हो जाती है। परंतु आज कल के लेखन में इनका अभाव होता जा रहा है। लेकिन जिन लेखकों ने इनके महत्व को समझा है और इनका उपयोग किया है उनके लेखन में पाठकों को आनंद मिला है। अभी गिरिजा कुलश्रेष्ठ की एक कहानी – मास्टरसाब – पढ़ी। अनेक स्थलों पर भाषा की प्रभाविता तो देखने में आई ही, एक स्थान पर उन्होंने मुहावरे का उपयोग किया जो बहुत ही सटीक रहा। बुढ़ापे में नींद कुछ कम हो जाती है और ऐसे में जो थोड़ी बहुत नींद आए और उसमें किसी के कृत्य से खलल पड़ जाए तो खीझ उत्पन्न होती है और उस खीझ को व्यक्त करने के लिए यदि उपमान तथा मुहावरे के प्रयोग से व्यक्त किया जाए तो उसका प्रभाव कुछ और ही होगा। लेखक ने इस खीझ को कैसे व्यक्त किया है देखें - आजकल उनकी नींद चार बजे ही खुल जाती है और इसके लिए उन्हें पड़ोसी गणपति के मुर्ग़े से शिकायत है। कमबख़्त ठीक चार बजे इतनी ज़ोर से चिल्लाता है मानो उसके दड़वे में डाका पड़ गया हो -। यहाँ "चिल्लाने" शब्द और "डाका पड़ जाने" अभिव्यक्ति से जो प्रभाव उत्पन्न होता है और जो बिंब उभरता है वह सीधे सपाट शब्दों से नहीं उभरता। मुर्ग़े की बाँग किसी के लिए आवश्यक हो सकती है तो किसी के लिए अनावश्यक। यहाँ जिस लक्षणा शब्द शक्ति का उपयोग हुआ उसकी जगह अभिधा काम नहीं कर सकती थी।
ग़ालिब ने अपने एक शेर में कहा है – "मौत का इक दिन मुअय्यन है, नींद क्यों रातभर नहीं आती? " इस शेर का आमतौर पर तो यही अर्थ है कि मौत तो एक दिन आएगी फिर डरना किस बात के लिए। "मौत का इक दिन मुअय्यन है" का अभिधार्थ तो यह है कि "मौत दिन में आएगी", फिर रात में तो निश्चिंत होकर सोना चाहिए। इसका व्यंजना से जो अर्थ निकलता है वह यह है कि एक न एक दिन तो संसार से जाना ही है। वह तो मुक़र्रर (मुअय्यन) है फिर क्यों चिंता ग्रस्त हो बेचैन रहता है इंसान।
शब्द की शक्ति उसमें छिपे (अंतर्निहित) अर्थ को व्यक्त करने का प्रकार्य (फ़ंक्शन) है। अर्थ का बोध कराने में शब्द कारण है और अर्थ को बोध कराने वाले प्रकार्य – अभिधा, लक्षणा और व्यंजना। आचार्यों ने इन्हीं को "शक्ति" या "वृत्ति" का नाम दिया है। अभिधा में तो शब्द के मुख्य अर्थ का बोध होता है। लक्षणा में मुख्य अर्थ के बजाय अन्य अमुख्य अर्थ का बोध होता है जिसे लक्षण से जाना जाता है, जैसे, "गधा" शब्द बुद्धिहीनता का प्रतीक माना जाता है। अब यदि किसी इंसान को "गधा" कहा जाए तो इसका लाक्षणिक अर्थ ही अभिप्रेत होगा। इस प्रकार लक्षणा की तीन परिस्थितियाँ होती हैं – 1.मुख्य अर्थ का बाधित होना अर्थात् मुख्य अर्थ नहीं लिया जाना है, जैसे, "गधा" कहने से "गधे का अर्थ" नहीं लेना है, 2. मुख्य अर्थ के बजाय लक्ष्यार्थ अभिप्रेत होता है, जैसे, "मूर्ख" अर्थ अभिप्रेत है, 3. आरोपित अर्थ रूढ़ हो गया हो, जैसे, गधा का अर्थ मूर्ख के लिए रूढ़ हो गया है। व्यंजना शक्ति शब्द के मुख्य अर्थ और लक्ष्यित अर्थ को पीछे छोड़ती हुई उसके मूल में छिपे अकथित अर्थ का बोध कराती है। अभिधा और लक्षणा अपने अर्थ का बोध करा कर जब पीछे हट जाती हैं तब सहायता के लिए व्यंजना आगे आती है। जब अभिधा और लक्षणा अभीष्ट अर्थ को बोध कराने में असमर्थ रहती हैं तब व्यंजना शक्ति का ही सहारा लेना पड़ताहै। अभिधा और लक्षणा का अर्थ केवल शब्द से होता है परंतु व्यंजना का अर्थ व्यंजक होता है। कथित और लक्ष्यित न होने पर भी सहृदय द्वारा उसका अर्थ समझ लिया जाता है। अतः शब्द शक्तियाँ लेखन को धारदार, रुचिकर और संप्रेषणीय बनाती हैं।
*****
शनिवार, मई 21, 2011
भाषा आंदोलन में हिंदी ब्लॉगों की भूमिका
हिंदी के अधिकतम ब्लॉगों को देखने से ज्ञात होता है कि इनके व्यवस्थापकों ने स्वप्रकाशन के लिए इनका सृजन किया हो। इनमें स्वरचित कविताएं, कहानियाँ, कवि गोष्ठियों की चर्चाएं, कहानियों/उपन्यासों की कृतियों के लोकार्पण समारोहों की चर्चाएं प्रकाशित होती रहती हैं। इन लेखनों से सूचना प्रौद्योगिकी, ज्ञान-विज्ञान की नवीनतन विधाओं/विषयों आदि के शब्द-चयन और ध्वनि-सौंदर्य का बोध पैदा नहीं होता है। भाव, भाषा, लय और अलंकरण के विविध उपकरणों का भी बोध बमुश्किल ही होता है। इन ब्लॉगो के व्यवस्थापक तो केवल हिंदी के ही ज्ञाता नहीं हैं। इनमें से बहुतेरे वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर, विधिवेत्ता और समाज विज्ञानी हैं। इन लोगों ने भी अपने लेखन का विषय कविता और कहानी ही रखा है। परंतु एकाध लोगों ने अपने लेखन का विषय अपने व्यावसायिक क्षेत्र के अनुरूप ही रखा है, जैसे, दिनेशराय द्विवेदी विधि के विषयों पर हिंदी में अच्छा और मानक लेखन करते हैं। ऐसे अन्य ब्लॉगर बंधुओं से भी अपेक्षित है कि वे ज्ञान-विज्ञान की नवीनतन विधाओं/विषयों पर हिंदी में लिखें ताकि हिंदी में अभिव्यक्ति के लिए शब्द और परंपरा का सृजन हो। भाषा को संपन्न और समृद्ध बनाने के लिए जिन ब्लॉगों का सृजन किया गया है यदि वे हिंदी को सर्व उद्देश्य की पूर्ति के लिए सक्षम बनाने के अपने उद्देश्य से भटक जाएंगे तो हिंदी को इसका वांछित स्थान नहीं दिला पाएंगे और अंग्रेज़ी अनंतकाल तक राज करती रहेगी।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)